रविवार, 13 अप्रैल 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - जहाँ जाइयेगा ,हमें पाइयेगा .....

जहाँ जाइयेगा ,हमें पाइयेगा .....

इस देश के 542 सीट के उम्मीदवारों ,जनता आपका पीछा नहीं छोड़ने वाली।

जनता अब जाग गई है।

चैन से तुम्हे सोना है...... तो अब तुम भी जाग जाओ.....।

हम काश्मीर से कन्याकुमारी ,राजस्थान से बंगाल समूचे भारत के आम आदमी हैं।

हमें तुमने खूब उल्लू बनाया। अब उल्लू बनाने का नइ ....।

हमारे हाथ में काम भले न हो, इंटरनेट वाला मोबाइल जरुर है। सो उल्लू बनाविंग का खेल ख़त्म।

पारदर्शिता वाला गेम चालू,.....।

 

दृश्य १....

मार्च का महीना,अंतिम सप्ताह ,बजट का अनाप-शनाप पैसा, लेप्स होने के कगार में। ताबड़तोड़ खरीददारी का अभियान चालू। आफिस में ये होते रहता है। बड़े बाबू ,क्या-क्या चाहिए? सब फटाफट ३१ के पहले खरीद लो। मेरे रूम का ऐ सी बदल दो ,पुराने सभी फर्नीचर चेज कर दो ,और स्टाफ को जो-जो चाहिए सब दिला दो।बड़ा बाबू ,जो बात –बात पर डाट खाते रहता साहब के तेवर से हकबकाते हुए कहता ,सर ,पहले कोटेशन्स मंगवाना पड़ेगा।

ये क्या कोटेशन्स लगा रखी है ,पहले कभी खरीदे नही क्या ? श्याम फर्नीचर को फोन लगाओ ,कहो साहब ने याद किया है। तीन –तीन कोटेशन ले के आ जाए।कल बिल ,पेश कर दे ,पेमेंट कर देंगे। सामान आते रहेगा।

बड़े बाबू ने दबी जुबान से कहा ,सर वो आडिट....?

हम हैं ना ? तुम क्यों घबराते हो ....।देख लेगे आडिट वालों को भी , एक-आध ऐ सी से ज्यादा क्या मुह फाड़ेंगे ?

 

दृश्य २

नगर निगम विभाग ,रोड टेंडर .....।

क्या गुप्ता जी बहुत घटिया माल लगा रहे हो। रोड टिकता ही नहीं। अभी तीन महीने हुए हैं, पोटिया सड़क बने हुए ,देख के आओ ,क्या हालत हो गई है।

तुम्हारा टेंडर खुल भी जाए तो काम देने का मन नहीं करता। हमें भी तो ऊपर जवाब देना होता है कि नहीं। पत्रकार लोग पीछा नहीं छोड़ते।

साहब ,आप को कोई झमेला नहीं आयेगा। आप्प बिल पास करवाते जाइए,बाकी से हम निपट लेंगे। और आपको बता दें, इसी निपटने के चक्कर में हमारा काम बढिया नहीं हो पाता। क्वालिटी मेंटेन नहीं कर पाते हम लोग ,वरना हम वो सड़क बना के दे कि बुलडोजर चला लो चाहे प्लेन उतार लो सड़क नहीं टूटेगी।

गुप्ता जी आजकल ज्यादा फेंकने लगे हो। जाओ काम दिखाओ ,काम में मन लगाओ।

 

दृश्य ३

नक्सलाईट उवाच : कमांडर ,यहाँ लगा दे लेंड माइंस .....?

वहाँ क्या तेरा बाप गुजरेगा ,बहन के पिल्लै।

इस गाँव में एक मतदाता है ,सरकार पच्चीसों मुलाजिम भेजती है ,हमको गुमराह करती है। हम चाहे तो मतदाता को पकड़ ला सकते हैं,वे चाहे तो मतदाता को हेलीकाफ्टर में ले जाके मतदान करवा सकते हैं। मगर हम दोनों ये नहीं चाहते। हम दोनों का हक़ इस एक मतदाता वाले गाँव से जुडा है। सरकार को हम पर निगरानी रखने की एवज हेलिकाफ्टर,बोलेरो, अनेक गाड़ियाँ और अन्य सुविधाएं मिलाती हैं। ऊपर से पैसे आते हैं। हमें सरकार की तरफ से ये सुव्विधा है कि वे हम पर इस गाँव में छुपे होने की निगरानी नहीं करते।

 

दृश्य ४

नेता जी ,कुछ आम आदमी सस्ते में मिल रहे हैं ,खरीद ले. क्या ?

क्या रेट बोलते हैं ?

......

अरे ये तो पिछली बार से दो-गुना ज्यादा है ,क्यों ?

- वे कहते हैं ,आप सत्ता में आते ही दाम बढाते हो ,तब तो कुछ नहीं कहते ?इलेक्शन ख़त्म होते ही पेट्रोल-गैस ,साग –सबजी के दामो में आग लगनी है।

- जिनसे चंदा लेकर चुनाव लड रहे हो उनकी भर-पाई में लग के, आम आदमी को जो भूल जाओगे ,उसका क्या ?

- अरे यार ,बहस मत करो ,जो भी मागते हैं दे दो। आज उनकी हर बात जायज है। आने दो ......

“इस तरह कुछ कुछ नेता ,कुछ अधिकारी, कुछ आम आदमी के बहकने-बिकने मात्र से प्रजातंत्र का खेल एकतरफा हो गया है ,आप समझे कि नइ....... ?”

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सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

4 blogger-facebook:

  1. समसामयिक उत्तम व्यंग्य...बधाई...प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. तीखा कटाक्ष! मीठी छुरी से हलाल करता ……

    उत्तर देंहटाएं
  3. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव12:44 pm

    वाह भाई सुशील जी सारे के सारे द्रश्य साकार कर दिये
    यही आज की हकीकत भी है लगता है अपना देश दुष्टों
    चोरो और भ्रष्टाचारियो की सैरगाह बन गया है और आज
    देशभक्त और इमानदार आदमी अपने को इस देश में
    अजनबी अनफिट और ठगा हुवा महसूस कर रहा है
    अच्छे समसामयिक व्यंग के लिये हमारी बधाई

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सचेत पाठको की भूमिका में आप सब को पाकर हार्डक प्रसन्नता अनुभव करता हूँ। आप सब को धन्यवाद।

      हटाएं

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