शनिवार, 26 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - उनका डर

उनका डर

गाड़ी की रफ्तार साठ के करीब थी। सीधे, बिल्कुल सीधे हाई-वे पर वह पानी की तरह बही जा रही थी। इससे पहले इस तरह इतना लंबा सफर मैंने नहीं किया था। हां, इन इंटरस्टेट हाइवेज के बारे में सुना जरूर था।

वे चारों हिंदुस्तानी थे या जैसे कि वे कहते थे, हैदराबादी थे। मेरी उनसे खास जान-पहचान नहीं है फिर भी मैं उनके साथ डेट्रायट से शिकागो जा रहा था। हुआ यह कि अलीगढ़ के मेरे दोस्त अंजुम ने मुझे फोन करके बताया कि उनके भाई शिकागो आ रहे हैं और मैं चाहूं तो उनके साथ आ सकता हूं और यह कि वे मुझसे पैसा नहीं लेंगे। अंजुम मेरे साथ अलीगढ़ में थे और हम दोनों ने साथ मिलकर उर्दू की खिदमत करने के कई प्लान बनाए थे। एक प्लान के तहत तो कई सौ रुपया चंदा भी जमा हो गया था, खजांची होने की वजह से अंजुम के पास जमा था। फिर इम्ताहन खत्म हो गए। अजुंम हैदराबाद और वहां से अमरीका आ गए। उर्दू बचारी वहीं अलीगढ़ में रह गई।

ये लोग यानी अंजुम के भाई मसरूर साहब और उनके दोस्त मुझे देखने में कुछ अजीब लोग लगे थे। असद साहब ने काली शेरवानी और अलीगढ़कट पाजामा पहन रखा था। उनकी दाढ़ी खास अलीगढ़ के जमाअते-इस्लामी वालों की दाढ़ी की टक्कर की थी। यह सब हिंदुस्तान में मैंने हमेशा देखा औ भुगता था, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि किसी ऐसे आदमी से अमरीका में भी मुलकात हो जायगी। तीसरे साहब डाक्टर ताहिर थे और चौथे मोटे और कुछ बेवकूफ से लगने वाले साहब का नाम अहमद था। बाद में पता चला कि इनमें से तीन लोग यानी मसरूर साहब, असद और डा. ताहिर काफी पढ़े-लिखे हैं। मसरूर साहब ने अमरीका ही की किसी यूनीवर्सिटी से कैमिस्ट्रिी में पी-एच-डी की थी, डा. ताहिर भी वेन यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, असद साहब के पास इंजीनियरिंग की कोई बड़ी डिग्री थी। हां चौथे साहब के बारे में ठीक से नहीं मालूम। लेकिन ये भी बी.ए.पास जरूर रहे होंगे। सफर शुरू हुआ तो डा. ताहिर गाड़ी चला रहे थे। उनको शहर से निकलकर आई नाईंटी फोर तलाश करने में कुछ मुश्किल हो रही थी। मसरूर साहब आगे की सीट पर मिशीगन स्टेट का नक्शा खोले शहर से आई नाईंटी फोर तक पहुंचने का रास्ता बता रहे थे। डा. ताहिर ने किसी गलत एक्जिट पर गाड़ी मोड़ ली और कुछ दूर जाने के बाद पता चला कि हम लोग एक-दूसरे हाई-वे से फिर वापस शहर जा रहे हैं।

‘‘लीजिए, आ गये न गलत हाई-वे पर। अब देखिए कब एक्जिट मिलता है,’’ मसरूर साहब बोले।

‘‘सात-आठ मील तो चलना ही पड़ेगा। ये कमबख्त बड़ी खराबी है हाईवेज की।’’ कुछ देर की भाग-दौड़ के बाद गाड़ी नाईंटी फोर पर आ गई, अब बस सीधा रास्ता था, नाक की सीध में।

‘‘हां, तो मीटिंग कैसी रही अहमद साहब’ मसरूर साहब ने नक्शा बंद कर दिया।

‘‘और तो सब बातें तय हो गईं, लेकिन टोरंटो की ब्रांच से बात करने वाली बात रह गई,’’ अहमद साहब ने जवाब दिया।

‘‘खैर वो ही हो जाएगी। अब एक्जिक्यूटिव की मीटिंग तो शिकागों ही में है न उसमें बात कर लेंगे। और भाई इससे इनकार कौन करेगा। उसूलन तो सही बात है न’

‘‘अरे डॉक्टर साहब, यह बात न कहिए। पिछली बार याद है न, दिल्ली के आखिरी मुशायरे वाली बात पर लोग एतराज कर रहे थे कि यह गैर इस्लामी काम है,’’ असद साहब बोले।

मैं इस बात पर चौंक गया। मुझे इतना ही मालूम था कि ये लोग किसी मीटिंग में शिरक्त करके वापस शिकागो जा रहे हैं। इस मीटिंग से इस्लामी और गैर-इस्लामी बात का क्या ताल्लुक खैर मैंने बोलना ठीक नहीं समझा

‘‘लोग इतनी आसानी से इस्लामी और गैर-इस्लामी लफ्जों का इस्तेमाल कर देते हैं। जैसे वे ही सब कुछ जानते हैं,’’ डा. ताहिर बोले।

‘‘आसमानी किताब है साहब। हम नाचीज़ बंदे उसके बारे में कैसे आखिरी बात कह सकते हैं’ अहमद ने कहा।

‘‘ अहमद साहब, शिकागो में पाकिस्तानियों ने कव्वाली करवाई थी। पच्चीस डालर का टिकट था और सब टिकट बिक गए थे।। मेरे ख्यााल से हम फंड रेज करने के लिए मुशायरा करवा सकते हैं,’’मसरूर साहब ने कहा।

‘‘मुशायरा’ अहमद चौंके, ‘‘फिर वही सवाल आ जाएगा, इस्लाम मेंतो मुशायरा, नौटंकी, ड्रामा यानी भेष बदलना नाजायत हैं।’’

‘‘यह आपसे किसने कह दिया कि मुशायरे में लोग भेष बदलते हैं’ डा. ताहिर कुछ नाराज से हुए।

‘‘साहब मुशायरा कौन-सा इस्लामी काम है’ अहमद बोले।

‘‘इस तरह देखें तो इस्लामी काम कोई नहीं है। सिर्फ घर में बैठे कुरान-नमाज पढते रहो, यही सबसे बड़ा इस्लाम है। फिर हम लोग घर से हजारों मील दूर यहां क्यों नौकरी कर रहे हैं अहमद साहब, इस्लाम दीन के साथ-साथ दुनिया को भी तालीम देता है। आप अहमद साहब, इस्लाम के ‘बेसिक्स’ को जरा दिल लगाकर तशरीह समेत पढ़ डालिए। लेकिन मौलाना आजाद की तशरीह न पढ़िएगा,’’ डा. ताहिर बोले।

अहमद चुप हो गए। फिर बातें कुरान की तशरीहात पर चल पड़ी। मैं अजीब चक्कर में पड़ गया था। इन लोगों को इस मुल्क में ऐसा देखने की कोई उम्मीद नहीं थी।

‘‘मुझे नहीं मालूम आपके क्या खयालात है।’’

अचानक मसरूर साहब ने मुझसे कहा। मैं पीछे बैठा था। बात करने के लिए उन्हें अपनी गर्दन जरा मोड़नी पड़ी।

मैंने जल्दी से कहा, ‘‘जी हां, जी मैं इस्लाम में खासी दिलचस्पी लेता हूं।’’

उन्होंने सामने देखना शुरू कर दिया। मैं अपने जुमले पर खुद शर्मिदा हुआ। अपने-आपको एक मोटी सी गाली दी कि साले तुमको बोलना भी न आया। कौन-सी तुर्की बाल रहे हो, जो उलटी-सीधी बात मुंह से निकल रही है। इस्लाम में दिलचस्पी लेने से क्या मतलब है तुम्हारा क्या इस्लाम भी तुम्हारे लिए घुड़-दौड़, तैराकी या मुक्केबाजी है जिसमें तुम दिलचस्पी लेते हो। खैर अब क्या हो सकता है।

‘‘हम लोगों ने साहब एक आर्गनाइजेशन बनाई है जिसका नाम है, ‘एक्शन कमेटी फार द इंडियन मुस्लिम’। शार्ट फार्म है ए.सी.आई.एम.। हिंदुस्तान में जब कभी फसाद हो जाता है तो हम लोग परेशांहाल मुसलमानों के लिए चंदा भेजते हैं। ए. सी. आई एम ने चार मुसलमान लड़कों को हिंदुस्तान से बुलकार जर्नलिस्ट का कोर्स भी करवाया था। सोचा था, वे वापस जाकर बड़े अखबारों में नौकरी करेंगे, मुसलमानों के बारे में लिखेंगे। लेकिन उनमें से तीन ने यहां का इम्मीग्रेशन वीजा ले लिया और चौथा वहां बेकार है। क्या करें साहब, हमने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी,’’असद साहब मेरे पास बैठे थे और उनके लिए मुझसे बात करना आसान था।

‘‘बस यह समझिए कि यह आर्गेनाइजेशन हिंदुस्तानी मुसलमानों की अमरीका में नुमाइंदगी करती है। इसकी ब्रांचें शिकागो, डेट्रायट, टोरंटो, सेनफ्रांसिस्को और मियामी में हैं। हम लोगों ने हाल ही में श्किागो में एक मस्जिद भी बनवाई है। हर इतवार को गेट-टुगेदर होता है। हम ही लोगों में से कोई किसी मज़हबी मसल पर तकरीर करता है,’’ मसरूर साहब ने बताया।

‘‘आप यहां कब आये’ असद साहब ने पूछा।

‘‘मैं, कोई एक महीना हुआ।’’

‘‘क्या इरादा है कुछ रिश्तेदर वगैरा हैं’

‘‘जी नहीं, एक दोस्त है, उनकी स्पांसरशिप है।’’

‘‘टूरिस्ट वीज़ा दिया है न’

‘‘जी हां’’

‘‘ख़ैर, वह तो कोई प्राब्लम नहीं है। आपके कोई दो हज़ार डालर ख़र्च हो जायेंगे,’’ उन्होंने गम्भीरता से कहा।

मैं समझ नहीं पाया। मैंने कहा, ‘‘जी’

‘‘जी हां, इम्मीग्रेशन वीज़ा के लिए ट्राई करेंगे न’

‘‘मगर मेरा तो ऐसा ख़याल नहीं है। मैं तो जुलाई में लैट जाऊंगा।’’

‘‘अच्छा लौट जाएंगे’ उन्हें काफ़ी हैरत हुई, ‘‘अरे साहब आ गये हैं तो क्या हर्ज है ट्राई कर लें। वैसे आजकल काफी सख्ती हो गई है। फिर भी कुछ-न-कुछ हो जायेगा।’’

‘‘लेकिन कैसे होगा जनाब। मैंने तो सुना है कि अब नामुमकिन है।’’ मैं भी इस मामले में सिर्फ तफरीह के लिए दिलचस्पी लेने लगा।

‘‘वह जो साहब अपनी तरफ़ होता है न,’’ उन्होंने एक आंख दबाई। उनके मौलवीनुमा चेहरे पर आंख मारना अजीब लगा। यह शायद नंबर दो वाले काम की तरफ़ इशारा कर रहे थे, ‘‘वह यहां भी चलता है।’’

‘‘क्या जरा और बताइए।’’

‘‘सहब कुछ अमरीकन लड़कियां हैं जो हज़ार डालर लेकर शादी कर लेती हैं। फिर इम्मीग्रेशन आसानी से मिल जाता है। फिर कुछ पैसा लेकर तलाक दे देती हैं। यही सबसे आसान तरक़ीब है। खलीलुल्लाह साहब के भांजे का मामला इसी तरह बना था। आजकल दो हज़ार डालर फटकार रहे हैं। यानी सोलह हज़ार रुपये महीना। मैं पिछली बार हैदराबाद गया था, तो मैंने तो सब गैरशादीशुदा पढ़े-लिखे मुसलमान लड़कों से कहा कि अमरीका आ जाओ। खूब पैसा पैदा करो और जब मर्जी चाहे वापस चले जाओ।’’

‘‘क्या आपकी ए.सी.आई.एम. भी इस काम में कुछ मदद करती है’

‘‘नहीं। जाती तौर पर आपकी मदद हम लोग कर सकते हैं। कुछ वकील इम्मीग्रेशन का ठेका लेते हैं। कोई दो-तीन हज़ार लेते हैं और काम करवा देते हैं,’’ मसरूर साहब बोले।

‘‘आ जाइए साहब, यहां पैसा-ही-पैसा है। हिंदुस्तान में है क्या फिरकापरस्ती अलग है,’’ असद बोले।

‘‘थोड़ा-सा रिस्क लेना पड़ेगा। मुझे जब यहां आने का मौका मिला तो हैदाराबाद में नौकरी से छुट्टी नहीं मिल रही थी। मैंने दो घंटे के अंदर फैसला किया। इस्तीफा ठोका और चला आया,’’ मसरूर साहब ने बताया।

‘‘तो मुशायरे का क्या तय किया अहमद साहब’ डॉ. ताहिर बोले।

‘‘भाई, ये मामला तो एक्जिक्यूटिव ही में तय हागा,’’ मसरूर साहब ने सांस खींची।

‘‘डॉक्टर साहब, मुशायरे में किसी ऐसे शायर को बुलाया जा सकता है जिसका आइडियल इस्लाम हो,’’ असद बोले।

‘‘हां, अगर ऐसा शायर मिल जाए और कुछ मुकामी शायर हो जाएं तो कामयाब मुशायरा हो सकता है। टिकट पंद्रह डालर से क्या कम होगा,’’ डॉ. ताहिर ने जवाब दिया।

‘‘क्या आप किसी ऐसे शयर को जानते हैं जो इस्लामी फलसफे और उसूलों को सामने रखकर शायरी करता हो’ मसरूर साहब ने मुझसे पूछा।

ज़रा मुश्किल सवाल था। मैंने कहा, ‘‘जानता तो नहीं, लेकिन ऐसा शायर मिल जरूर जाएगा।

नौ बज रहे थे। अब तक बाहर काफ़ी रोशनी थी। शहरों और हाइवेज़ के नामों के बोर्डों के नीचे से गाड़ी तेजी से गुजर रही थी। कभी-कभी सड़क के किनारे पर रोशनी से चमकते ‘फूड’ और ‘गैस’ के बोर्ड दिख जाते थे। दस बजे के आसपास डॉ. ताहिर ने कुछ खाने के लिए एक एक्जिट पर गाड़ी मोड़ ली।

‘‘यहां पैसा बहुत है, लेकिन रूहानी सुकून यहां नहीं है,’’ असद साहब ने मुझसे कहा।

मैंने उनकी ओर गौर से देखा। क्या उनको यहां आने से पहले यह नहीं मालूम होगा कि रूहानी सुकून, अगर वह कुछ होता है, तो यहां नहीं मिलेगा। लेकिन मैंने हां में हां मिलाने के लिए कहा, ‘‘हां साहब, वह अपने इंडिया में ही है।’’

‘‘लेकिन क्या करें, हम तो अब इअंडिया जा नहीं सकते,’’ उन्होंने इस तरह कहा जैसे वाकई इंडिया जाना चाहते हों।

वह हंसने लगे, ‘‘दस साल यहां रहने के बाद वहां अजीब लगता है। अभी पिछले साल गया था। गांव की वही हालत है, लोग वैसे ही हैं। वही ध्च्च-धच्च करके चलने वाले इक्के गांव जाते हैं। दो-चार दिन तो अच्छा लगता है, फिर मज़ा नहीं आता।’’

‘‘आजकल महंगाई भी बहुत है,’’ मैंने बताया।

‘‘महंगाई तो यहां भी बहुत है,’’ उन्होंने कहा।

‘‘लेकिन मेरे ख़याल से ज़िंदगी यहां फिर भी बहुत आसान है।’’

‘‘ज़िंदगी बहुत आसान तो है जनाब, लेकिन यहां भी ‘प्रोब्लम्स’ कम नहीं हैं। खासतौर पर हम लोगो के लिए,’’ मसरूर साहब बोले।

‘‘और खासतौर पर उनके लिए जो फैमिली वाले हैं’’ डॉ. ताहिर बोले।

‘‘अच्छा किया मैंने जो फैमिलीको नहीं बुलाया,’’ अहमद बोले।

‘‘हां, क्या हाल है अहमद साहब उन लोगों का पिछली बार आपने बताया था कि बुलाने वाले हैं, कब तक कच्ची-पक्की खाते रहेंगे बुला ही लीजिए भाभी को, अब तो आपको छः साल हो गए हैं,’’ डॉ. ताहिर बोले

‘‘हां, इस्लामी नज़रिए से भ्ी ठीक नहीं है आप यहां और आपकी बीवी हिंदुस्तान में। इस्लाम कहता है कि मर्द अपनी औरत से दूर सिर्फ छः महीने तक रह सकता है,’’ मसरूर साहब ने कहा।

‘‘और आपको तो छः साल हो गए,’’ असद साहब ने यह बात पता नहीं क्यों दोहराई जो कही जा चुकी थी।

अहमद साहब ने कहा, ‘‘कुछ समझ में नहीं आता क्या करें। इन गर्मियों सोचता हूं चला हाऊं। हैदराबाद में कंपनी वालों के पास काम करना पड़ेगा या दस हजार देना पड़ेगा।’’

‘‘तो क्या आप यहां की नौकरी छोड़ देंगे’

‘‘वहां आपको ज्यादा-से ज्यादा पांच सौ मिलेगा। यहां क्या मिलता है’ असद ने पूछा।

‘‘यहां तो अब डेढ़ हो गया है। डेढ़ का मोटा-मोटा हिसाब दस हजार रुपये महीने से ज्यादा है,’’ उन्होंने बताया, ‘‘घर पांच सौ डालर महीना भेज देता हूं। खत आता है कि सब खर्च हो जाता है। यानी साढ़े तीन हजार खर्च हो जा है। अब मैं वहां पांच सौ रुपये कमा के क्या उन लोगों का पेट भरूंगा और क्या अपना।’’

‘‘तो आप बुला ही लीजिए बीबी को,’’ मसरूर साहब बोले।

‘‘अरे साहब, बुला लें तो बच्चों को भी बुलाएं। तीन लड़कियां और दो लड़के हैं खुदा के फजल से। इन सबका गुजर मेरे एक कमरे वाले प्लैट में तो हो नहीं सकता। तीन सौ डालर महीने का फ्लैट लेना पड़ेगा, बाकी बच्चों की तालीम और इधर-उधर में खर्च हो जाएगा। एक डालर नहीं बचेगा। फिर परदेस से पड़े रहने का फायदा’

‘‘अरे तो फ्लैट खरीद लीजिए ना अभी अच्छन के बराबर वाला बिका नहीं है। तीस हजार में सौदा हो जाएगा, बोलिए’मसरूर साहब ने कहा।

‘‘नहीं साहब, कैश तो इसलिए खून-पसीना करके जोड़ा है कि रिटायर होने के बाद हिंदुस्तान में काम आएगा।’’

‘‘तब तो आपके मसले को कोई हल नहीं है।’’ मसरूर साहब ने सिगरेट सुलगा ली।

‘‘बड़ी लड़की माशाअल्लाह से बीस की हो गई। उसकी शादी का मसल है। मैं यहां हूं। अच्छे लड़कों की तलाश अब कोई हंसी खेल नहीं है,’’ उन्होंने कहा।

‘‘तो आप जनाब यहां से तीन महीने की छुट्टी लीजिए। एयर फ्रांस से वापसी वाला टिकट लेकर हैदराबाद जाइए। लड़की की शादी कीजिए और बाकी बच्चों और बीवी को लेकर आ जाइए। कंपनी वालों के मुंह पर डेढ़ हजार डालर मारकर अपना बांड वापस लीजिए,’’ डा. ताहिर अहमद साहब की पूरी जिंदगी का प्रोग्राम तय करने लगे।

‘‘बीबी पर्दा करती है डाक्टर साहब। दूसरी लड़की भी माशाअल्लाह सत्रह साल की है। एक-दो साल बाद उसकी भी शादी का मसला सामने होगा। एक लड़का वहां इंटर में पढ़ता है, दूसरा हाई स्कूल में। दोनों यहां आकर कहां पढेंगे और कैसे यह सब आसान नहीं डाक्टर साहब,’’ अहमद साहब की आवाज डूबती चली गई।

सामने से आने वाली मोटरों की हेडलाइट में सबके चेहरे कुछ लम्हों के लिए चमक जाते और फिर अंधेरे में डूब जाते। रात के ग्यारह बजने वाले थे और शायद इसीलिए गाड़ी की रफ्तार बढ़ गयी। सब जल्दी से जल्दी और अहमद साहब भी घर पहुंचना चाहते थे। घर, जहां बीवी नहीं है, बच्चे नहीं है, सिर्फ एक कमरे का फ्लैट है।

‘‘सोचता हूं, वापस ही चला जाऊं,’’ वह मरी हुई आवाज में बोले।

डा. ताहिर को पता नहीं इस बात पर क्यों गुस्सा आ गया, ‘‘मैं तो जनबा टैक्सी चला लूंगा, झाडू दे लूंगा, लेकिन रहूंगा अमरीका में। हिंदुस्तान भी साला कोई मुल्क है जहां साइंटिस्ट खुदकुशी कर लेते हैं, इंजीनियर बेकार घूमते हैं। दैट इज द कंट्री ऑफ डिप्रेशन। यहां कम-से-कम यह डर तो नहीं कि हिंदू-मुस्लिम फसाद होगा और मार दिए जाएंगे।’’ उनकी बात का किसी ने विरोध नहीं किया।

‘‘हमें तो साह यहीं रहकर हालात को साजगार बनाना है। अब ए. सी.एम. आई. की शुरूआत हो चुकी है। इसी के जरिए कुछ-न-कुछ करना है,’’ मसरूर साहब बोले।

‘‘ये जो हर संडे को मस्जिद में गेट-टूगेदर होता है, इसको जरा और बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है। हम लोग ‘इंडियन मुस्लिम’ नाम का एक अखबार तो निकाल सकते हैं। और अपने बच्चों के लिए एक ऐसा स्कूल और होस्टल खोल सकते हैं जहां मार्डन तालीम मुस्लिम माहौल में दी जाया करें। ये बहुत जरूरी है अहमद साहब। हमारे बच्चे उन्हीं स्कूलों में जाते हैं जहां अमरीकन लड़के-लड़कियां जाते हैं। दिन भर वहीं रहते हैं। बच्चों के दिमाग पर उसी महौल का असर पड़ेगा। क्या आप पसंद करेंगे कि आपकी जवान लड़की किसी लड़के के साथ घर चली आये और आपसे कहे कि मेरा ‘ब्यॉय फ्रेंड’ है जैसा कि अमरीकी घरानों में होता है। और जनाब ऐसा होगा और जरूर होगा। क्या गांरटी है कि आपकी लड़की आपके कहने से शादी करेगी अगर वह इसी माहौल में पली-बढ़ी तो इस रंग में रंग जायेगी,’’ वह जोश में बोलते गए, ‘‘इसलिए एक ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है जहां हमारे बच्चे उन्हीं मजहबी कदरों को अपना सकें जिनमें हम पले-बढ़े है।’’

‘‘जी हां, स्कूल वाला आइडिया बड़ा अच्छा है। कम-से-कम बच्चे अगर पंद्रह-सोलह बरस की उम्र तक ऐसे माहौल में रहे तो फिर अमरीकी माहौल का असर उन पर नहीं पड़ेगा,’’ असद साहब बोले।

‘‘ताहिर साहब, मैं अपनी बेटी को खुद कुरान शरीफ पढ़ाता हूं। मैं खुद...।’’

मसरूर साहब की बात पर डा. ताहिर बोले, ‘‘मगर मसरूर साहब, कॉलेज में तो वह सेक्स ऐजुकेशन पढ़ती ही होगी। इस मुल्क में लड़कियां चौदह साल की उम्र में डेटिंग करने लगती हैं। पार्को और सड़कों पर जो कुछ हो ता है अखबारों और टेलीविजन पर जो कुछ आता है उसे देखकर हमारे बच्चे क्या सीखेंगे’

मसरूर साहब कुछ डरी हुई आवाज में बोले, ‘‘नहीं नहीं, मैं स्कूल और इस्लामी हॉस्टल वाले आइडिये से बिलकुल एग्री करता हूं। मैं तो आपको सिर्फ अपनी बात बता रहा था।’’

‘‘अभी हमारे बच्चे छोटे हैं मसरूर साहब। हम उनको जैसा बनाना चाहेंगे वैसा वे बनेंगे। लेकिन मैं किसी सूरत में ये गवारा नहीं करूंगा कि मेरी बेटी बगैर शादी किये किसी के साथ रहने लगे, जैसा कि आमतौर पर अमरीका में होता है,’’ डा ताहिर बोले।

असद साहब बोले ‘‘डाक्टर साहब, मैं सोचता हूं कि शहनाज ग्यारह-बारह बरस की हो जाये तो मैं उसे हिंदुस्तान नाना-नानी के पास भेज दूं।’’

‘‘आइडिया बुरा नहीं है,’’ डा. ताहिर बोले, ‘‘लेकिन क्या आपके सास-ससुर उसकी तालीम वगैर का उसी तरह ख्याल करेंगे जैसा आप करते हैं। या क्या लड़की ग्यारह साल तक यहां रहने के बाद हिंदुस्तान के किसी छोटे-से कस्बे के स्कूल में पढ़ना मंजूर करेगी मेरे ख्याल से शायद यह लड़की की ‘साइकॅलाजी’ कि लिए बुरा होगा। लेकिन ठीक है साहब, करना ही पड़ेगा।’’

‘‘कुछ देर तक गाड़ी में खामोशी छा गयी। लोग अपनी-अपनी लड़कियों को अमरीकी लड़कों के साथ संभोग करते देख कर काफी डर गये थे। अहमद साहब गुनगुना रहे थे। उनकी लड़की हिंदुस्तान में है। किसी अमरीकी के साथ संभोग नहीं कर सकती। क्या गांरटी है कि और के साथ यानी किसी हिन्दुस्तानी के साथ संभोग नहीं कर रही होगी लेकिन शायद अहमद साहब इतनी दूर की कौड़ी लाने में यकीन नहीं रखते।

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