रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की लंबी कहानी - गवाही

गवाही

वे मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ हैं दूसरे विशेषज्ञों ने मध्यकालीन इतिहास को पढ़ा है, शोध किया है, पढ़ाया है, उसका संबंध आर्थिक कारणों से जोड़ा है। पर इन्होंने मध्यकालीन इतिहास से जीवन-दृष्टि पाई है मध्यकालीन इतिहास जो षड्यंत्रों हत्याओं, सत्ता-लोलुप बादशाहों की निरंकुशता से पटा पड़ा है, इनके लिए केवल शोध करने का विषय ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका रहा है। यही कारण है कि वे जीव में सफल रहे हैं। दूसरों को नौकरी के लिए भागना पड़ता है और नहीं मिलती, पर उनके पीछे नौकरियां भागती रही हैं। दूसरे, जिस जोड़-तोड़ में दो-चार-छः साल लगाते हैं, उसी को वे कुछ महीनों में करके दिखा देते हैं। जिन ‘दरबारों’ तक पहुंचने में अन्य लोगों के जूते घिस जाते हैं, वहां वे हवा की तरह पहुंच जाते हैं।

लंबा कद, भारी जिस्म, थोड़ा सांवला रंग, सिर के बाल आधे से ज्यादा झड़े हुए, मोटे होंठ, बड़ी-बड़ी आंखों पर काले फ्रेम का चश्मा, चौड़े कंधे और मोटी फूली हुई नाक के नीचे क्लीन शेव! थोड़ा झुककर चलते हैं, जिससे यह आभास भी होता है कि इतना विद्वान होने के बाद भी यह आदमी घमंडी नहीं है! मुंह में पाइप दबा रहता है और हाथ में तंबाकू का डिब्बा तथा कोट की जेब में लगी कीमती कलम और लापरवाही से बांधी गई विदेशी टाई-कुल मिलाकर यही प्रभाव छोड़ते हैं कि प्रोफेसर सी.सी. सूरी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के व्यक्ति हैं।

जब देश का विभाजन हुआ था तो लाखों आदमी शरणार्थी हो गए थे। उधर से, यानी पंजाब से, आने वालों में प्रोफेसर सूरी भी थे। उन्होंने हलफनामा लिया था कि उनकी सारी डिग्रियां -पी-एच.डी. की भी-सांप्रदायिकता के शोलों में स्वाहा हो गई हैं। जान बचाना ही मुश्किल था, डिग्रियों को बचाने की चिंता कौन करता इस तर्क को कोई काट न सका। पूरे देश में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के प्रति जो सहानुभूति का भाव था, उसका पंचानबे प्रतिशत लाभ मिला सी. सी. सूरी को और वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक लग गए। जल्दी ही प्राध्यापक से रीडर हो गए और रीडर से प्रोफेसर होने के जुगाड़ से जुट गए। जिंदगी में कभी न चूकने वाले प्रोफेसर सी. सी. सूरी यहां चूक गए। हुआ यह कि विश्वविद्यालय में दो गुट थे, जैसा कि हर विश्वविद्यालय में होता है। एक वी. सी. के समर्थकों का और दूसरा, वी.सी. के विरोधियों का। वे विरोधियों के गुट में थे। इस कारण नहीं कि वे किसी सिद्धान्त या विचारधारा के कारण वी. सी. के विरोध को सही समझते थे, बल्कि इस कारण कि उन्हें लगने लगा था कि वी. सी. का गुट कमजोर पड़ रहा है और वी. सी. की जल्दी ही भाग खड़ा होगा। उस स्थिति में उनकी पांचों उंगलियां घी में होंगी। यह उनकी गलती थी। इस द्वंद्व-युद्ध में वी. सी. जीत गया और उसने एक-एक से बदला लेने की कार्यवाही शुरू कर दी। सूरी साहब को विश्वास था कि एक-न-एक दिन नजला उन पर भी गिरेगा और वे विश्वविद्यालय छोड़कर कहीं और भी पैर जमाने के लिए पर तोलने लगे।

आजादी के बाद पूरे देश में बड़े स्तर पर शोध-संस्थान, अकादमियां, परिषदें आदि खुलना शुरू हो गई थी। हर विषय की एक-एक परिषद या शोध-संस्थान खुल रहा था। वे लोग जिनकी दाल विश्वविद्यालयों में न गल सकी थी, तेजी से हाथ-पैर मारते इधर आ रहे थे। लेकिन इन शोध-संस्थाओं में भी कहीं, ‘बिहार’ छाया हुआ था, कहीं ‘मद्रासी’ का बोल-बाला था, कहीं ‘पंडित’ जमे थे और कहीं ‘पंजाबी’ छाये हुए थे। कुल मिलाकर स्थिति उन लोगों के पक्ष में थी जो ‘आंखें’ रखते थे। सी. सी. सूरी ने सुना कि ‘इतिहास शोध केंद्र’ में जहां अब तक ‘बिहारियों’ का बोलबाला था, अब स्थिति कुछ बदलने वाली है, क्योंकि नए शिक्षामंत्री जो स्वयं किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, यह नहीं चाहते कि उनके मंत्रालय की स्वायत्तशासी संस्था पर उनका नहीं, बल्कि ‘बिहारियों’ का कब्जा रहे। उन्होंने तत्काल इतिहास शोध-केन्द्र के अध्यक्ष को बुलाकर काफी बारीक तरीके से यह समझा दिया था। अध्यक्ष ने मंत्री महोदय को बताया था कि उनकी पहुंच प्रधानमंत्री के सचिवालय तक है और उनके हटाए जाने के परिणाम भयंकर हो सकता हैं पर अध्यक्ष ने यह इशारा दे दिया था कि मंत्री महोदय यह न समझे कि ‘इतिहास शोध-केन्द’ में उनके आदमियों की उपेक्षा की जाएगी। इतना काफी था। मंत्री महोदया किसी ऐसे आदमी की तलाश में लग गए जिसे ‘इतिहास शोध केन्द्र’ का निर्देशक बनाया जा सके। मंत्री महोदय के सलाहकारों ने राय दी कि ‘बिहारी लॉबी’ से लड़ाई का ‘मंच-स्थल’ मंत्रालय नहीं बल्कि ‘इतिहास शोध केन्द्र’ ही होना चाहिए। तरीका यह तय किया गया कि किसी आदमी को वहां किसी अच्छी पोस्ट पर रखा जाए और उसी के माध्यम से ‘इतिहासशोध-केन्द्र’ के अध्यक्ष प्रोफेसर पंडित एच.एल झा को दुरुस्त करा दिया जाए। सलाहकारों की यह राय मंत्री महोदय को पसंद आई और वे किसी ‘योग्य’ आदमी की तलाश में थे, जो ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ का निदेशक बनाया जा सके। वैसे ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ के संविधान के अनुसार ज्यादातर पावर्स तो कमेटियों के पास ही रहती हैं, पर निदेशक भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। निश्चित रूप से कार्यकारिणी तथा अन्य जगहों पर निर्देशक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, या कम-से-कम ऐसी स्थिति तो पैदा कर ही सकता है जिसमें अध्यक्ष के लिए काम करना टेढ़ी खीर हो जाए।

डॉ सूरी को जैसे ही इस सुनहरे अवसर का पता चला, वे मंत्री महोदय के एक निकटतम सलाहकार से उनके अच्छे संबंध थे और वह जानता था कि यदि सूरी ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ के निदेशक हो गए तो केन्द्र पर केवल मंत्री महोदय की, बल्कि उनकी भी पकड़ गहरी हो जाएगी। नतीजा यह निकला कि डॉ. सूरी एक सप्ताह के अन्दर-अन्दर ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ के निदेशक हो गए। निदेशक होते ही वे बिना किसी सिलेक्शन कमेटी को ‘फेस’ किए प्रोफेसर हो गए। यानी अपने-आपको प्रोफेसर लिखने-लिखवाने लगे।

उन्होंने आते ही या आने से पहले ही ‘माहौल’ का अंदाजा लगा लिया था। ऊपर से नीचे तक ‘बिहारी लॉबी’ छाई हुई थी और चपरासी तक उनका आदेश मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने काफी हिम्मत और सब्र के साथ इन बातों का मुकाबला किया और अध्यक्ष पर वार करने का सही मौका तलाश करते रहे। उन्होंने तब तक जिन-जिन दुश्मनों पर वार किये थे, अचूक किए थे, इसलिए उन्हें जल्दी न थी।

प्रोफेसर सूरी को ज्वाइन किए हुए दो ही महीने हुए थे कि अचानक उन्हें अचूक वार करने का मौका मिला! जिस तीन मंजिला इमारत में ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ का कार्यालय था, वह इमारत किसी और संस्था की थी, जिसने ‘इतिहास शोध केन्द्र’ को तीसरा तल्ला किराये पर दे रखा था। पर धांधली करके अध्यक्ष महोदय ने ग्राउड़ फ्लोर का एक कमरा भी अपने कब्जे में कर रखा था, जिसमें वे स्वयं बैठते थे। अध्यक्ष महोदय चूंकि दिल के मरीज थे, इसीलिए उन्हें सीढ़ियां चढने में असुविधा होती थी और बिल्ंिडग की लिफ्ट खराब रहती थी। ग्राउंड फ्लोर का कमरा उनके लिए बड़ा सुविधाजनक था। यह पूरी स्थिति प्रोफेसर सूरी को उस समय पता लगी जब उनके पास उस संस्था का पत्र आया, जिसकी इमारत थी। पत्र में लिखा गया था कि कृपया ग्राउंड फ्लोर का जो कमरा ‘इतिहास शोध केन्द्र’ के पास है, वह खाली कर दिया जाए। डॉ सूरी ने तत्काल पत्र का उत्तर दिया कि अगले महीने की पहली तारीख को कमरा खाली कर दिया जाएगा। निदेशक होने के कारण चूंकि डॉ सूरी प्रशासनिक मामलों के सर्वोच्च अधिकारी थे, इसलिए इस मामले में उन्हें किसी से सलाह लेने की आवश्यकता न थी।

प्रोफेसर सी. सी. सूरी ने एक अन्य पत्र लिखकर प्रोफेसर झा को सूचित कर दिया कि अगले महीने की पहली तारीख से उनको तीसरे तल्ले पर कमरा मिल जाएगा। यह पत्र पाते ही प्रोफेसर झा तिलमिला गए। इतनी छोटी सी-बात को प्रधानमंत्री के सचिवालय तक क्या ले जाते। पर समझ गए कि युद्ध का बिगुल बज चुका है। आखिरकार उन्हें अगले महीने की पहली तारीख को एक सौ अट्ठावन सीढ़ियां चढ़नी पड़ी तो हृदय गति तेज हो गई और वे उस दिन कुछ खास काम न कर सके। आखिरकार उन्होंने तय किया फाइलें घर मंगवा लिया करेंगे और सप्ताह के केवल दो बार आफिस जाया करेंगे। इस तरह प्रोफेसर झा की उपस्थिति का पूरा लाभ प्रोफेसर सूरी को मिला और अब वे ताल ठोंककर मैदान में कूद पड़े। जो पोस्टें खाली थीं, उनकी तत्काल विज्ञापित कर दिया गया। तीन रिसर्च आफिसर चाहिए थे। एक पोस्ट निदेशक स्टेनों की थी, जो पिछले कई साल से खाली पड़ी थी, दो पोस्टे चपरासियों की थी। सुखद संयोग यह हुआ कि जैसे ही ये पोस्टे विज्ञापित हुई, वैसे ही प्रोफेसर सूरी को पता चला कि शिक्षामंत्री के ताऊ का लड़का पी. एन. शर्मा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से इतिहास में एम. ए. की परीक्षा देकर दिल्ली आया हुआ है, और नौकरी की तलाश में हे। वह किसी विश्वविद्यालय में लगना चाहता है, पर उसमें अभी समय है। उन्हें लगा कि यदि यह लड़का पी. एन शर्मा ‘केन्द्र’ में आ जाए तो एक तीर से कई शिकार हो जाएंगे। उन्होंने तत्काल शिक्षामंत्री के निकटतम विश्वासपात्र सलाहकार से बात की। सलाहकार ने शाम की चाय पर अपने घर पी. एन. शर्मा को बुलाया और उसका परिचय प्रोफेसर सूरी से करा दिया।

पी.एन.शर्मा का कद लंबा था और चेहरे पर बड़ी-बड़ी आंखें उसके जहीन होने का सबूत देती थीं। छोटी-सी ही उम्र में उसने सीख लिया था कि बुद्धि के इस्तेमाल से कोई फायदा नहीं हो सकता। हां, कभी-कभी नुकसान जरूर हो जाता है। समाज में तरह-तरह के लोगों से वास्ता पड़ता है। जो ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर है, वे इसलिए हैं कि उन्होंने अपने दिमाग को अपने अफसर के दिमाग से ज्यादा तकलीफ नहीं दी है और न अब देना चाहता हैं। प्रोफेसर सूरी ने उसे समझाया कि विश्वविद्यालय की नौकरी की प्रतीक्षा में समय बर्बाद करने से अच्छा है कि वह ‘केन्द’ में आ जाए। जब किसी अच्छे विश्वविद्यालय में नौकरी लग जाए तो छोड़ दे। बात बहुत साफ थी। पी.एन शर्मा मंत्री का रिश्तेदार होने के साथ-साथ काफी व्यावहारिक भी था। वेतन में कोई फर्क नहीं था। उसने उसी समय ‘हां’ कर दी। प्रोफेसर सूरी ने चैन की सांस ली। एक मसला तो तय हो गया था।

चाय के बाद प्रोफेसर सूरी पी. एन. शर्मा को अपनी कार से घर छोड़ने गए। रास्ते में वे पी.एन.शर्मा से और ‘खुल’ गए। दोनों के बीच कुछ दोस्ती जैसा भाव आ गया। हालांकि उम्र में काफी फर्क था।

अब रिसर्च आफीसरों की दो पोस्टें बची थीं। प्रोफेसर राव एक्सपर्ट बनकर आ रहे थे और उनके बारे में तय था कि जहां एक्सपर्ट बनकर जाते हैं, कम-से-कम अपना एक आदमी जरूर लगाते हैं। जब उनका कोटा पूरा हो जाता है, तब स्थानीय प्रोफेसर की इच्छानुसार नियुक्तियां कर जाते हैं। तीसरी पोस्ट के लिए उनके पास शिक्षामंत्री के पी. ए. का फोन आ गया। वे किसी ‘बिलकुल अपने खास आदमी’ के लिए कह रहे थे। प्रोफेसर सूरी ने न केवल ‘हां’ में तत्काल उत्तर दिया, बल्कि यह भी कहा कि श्री गुप्ता को जल्दी से जल्दी उनके पास भेज दें।

श्री के.के गुप्ता, पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोंगों की तरह बातूनी, चतुर, चालाक, रोब जमाने के शौकीन और पान के रसिया आदमी हैं। सज्जनता उनके व्यक्तित्व में इतना गहरे बैठ चुकी है कि उसे बाहर आने में काफी समय लग जाता है और प्रायः मौका निकल जाने पर ही बाहर आती है। उनका बचपन अपने शहर में बीता, जहां से हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद इंटर में दाखिल हुए तो बलात्कार के एक केस में फंस गए। बलात्कार किया भी था, पर यह आशा नहीं थी कि केस चल जाएगा। केस कई साल चला। पढ़ाई बंद हो गई जो अब तक काम आती है। फिर लखनऊ आ गए। कई तरह के काम किए और प्राइवेट इंटर पास कर लिया। एक स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाता हो गए और लूट की कमाई से घर भरने वालों को ब्लैकमेल करने लगे। फिर अपना अखबार शुरू किया। उसमें पता नहीं। उसमें पता नहीं कैसे, जोश में आकर या किसी गलतफहमी में या अनजाने ही, एक मंत्री और एक कन्या के प्रेम प्रसंग छाप दिए। ब्राह्मण मंत्री ने मानहानि का दावा नहीं किया, पर इनको ऐसा श्राप दिया कि अगले दिन रास्ते में रहस्यात्मक ढंग से बुरी तरह पिट गए। जिससे अखबार छपवाते थे, उसने छापने से इनकार कर दिया। पुलिस को मुलजिम दिखाई देने लगे और उन पर दो-तीन मुकदमे चला दिए गए। मोहल्ले के गुंडों ने उनके कमरे का ताला तोड़कर सुराही तक फोड़ डाली। अंततः लखनऊ से दिल्ली भागे। दिल्ली आकर किसी प्रेम से प्रूफरीडर हो गए और पत्राचार के माध्यम से बी. ए. किया। फिर नौकरी छूट गई तो ‘फ्रीलांस जर्नलिस्ट’ हो गए और साथ-साथ इतिहास में एम. ए. की परीक्षा दे डाली। इसी दौरान एक पंजाबी लड़की से प्रेम हुआ और उसे लेकर अपने शहर भाग गए। काफी चक्कर चला तब जाकर विवाह हुआ और शिक्षा मंत्री के पी.ए.के दामाद हो गए।

प्रोफेसर सूरी श्री के.के. गुप्ता से मिलकर बहुत खुश हुए। उनकी आदर्श टीम बन रही थी। उन्हें विश्वास था कि प्रोफेसर झा को दिन में तारे दिखा देंगे। सबसे पहले उन्होंने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की को अपनी ‘स्टेनो’ नियुक्त कर लिया। इस नियुक्ति के बारे में कार्यालय में कई दिन तक बातचीत और खुसपुस होती रही। उसका जिक्र आने पर कैशियर चुटकी बजाकर सिगरेट की राख झाड़ते हुए अपने गुप्तांग खुजाने लगता था। चपरासी भी आपस में हंसी-मजाक कर लिया करते थे। रिसर्च आफीसरों में तो होड़ लग गई थी कि कौन उसे अपने साथ लंच कराता है। लायब्रेरियन, जो बाल-विधुर थे, पत्रिकाएं लाकर स्टेनो को दे जाया करते थे।

सभी नियुक्तियां प्रोफेसर सूरी के आदमियों की हो चुकी थीं। जाहिर है, प्रोफेसर झा महोदय के ताऊ के लड़के तथा मंत्री महोदय के पी.ए. के दामाद को लेने में कोई अड़चन कैसे डाल सकते थे इन नियुक्तियों के बाद प्रोफेसर सूरी ने ‘बिहारी लॉबी’ के लोगों पर खुलकर हमले शुरू कर दिए।

सबसे बड़ा मौका उन्हें उस वक्त मिला जब प्रोफेसर झा कि किताबों के अनुवाद के पारिश्रमिक का चेक उनके सामने आया। ‘केन्द्र’ ने योजना बनाई थी कि विद्वान लेखकों की किताबों को भारत की सभी भाषाओं में अनूदित किया जाएगा। इस सूचि में प्रोफेसर झा की छः पुस्तकें थीं और ‘केद्र’ में बने नियमों के अनुसार प्रोफेसर झा को ‘केंद्र’ बावन हज़ार रुपये दे रहा था। प्रोफेसर झा के नाम बावन हज़ार के चेक पर हस्ताक्षर करने के बाद डॉ. सूरी ने तुरंत आयकर विभाग को इसकी सूचना भी दी। सूचना एक विश्वास-पात्र स्वयं लेकर गया था। फिर हुआ यह कि प्रोफेसर झा पर लंबा-चौड़ा इनकम टैक्स लगा, जिससे वे घबरा गए और उन्हें लगा कि एक साथ इतना पैसा लेना ठीक नहीं था। इसलिए उन्होंने बावन हज़ार में से चालीस हज़ार ‘केंद्र’ को लौट दिया। अब मामला काफी उलझ चुका था। प्रोफेसर सूरी ने फाइल ‘पब्लिक एकाउंट्स कमेटी’ के पास भेज दी। ऑडिट रिपोर्ट के साथ जैसे ही फाइल पब्लिक एकाउंट्स कमेटी के पास पहुंची, वैसे ही प्रोफेसर झा का मनोल हमालय की चोटी से बंगाल कीह खाड़ी में गिरा। इसकालाभ उाकर प्रोफेसर सूरी ने एक्सपर्ट कमेटियों में से बिहरियों को नकाल बाहर किया। इस पर प्रोफेसर झा ने कार्यकारिणी में अपना मतभेद भी प्रकट किया, पर कार्यकारिणी के अधिकतर सदस्यों को प्रोफेसर सूरी समझा चुके थे कि मंत्री महोदय ‘यही’ चाहते हैं। इसलिए कर्यकारिणी के जितने बुद्धिमान सदस्य थे, और अच्छी बात थी कि अधिकतर बुद्धिमान थे, उन सबने प्रोफेसर सूरी के प्रस्तावों का समर्थन किया और प्रोफेसर झा एक-एक का मुंह देखते रह गए। अब प्रोफेसर झा समझ चुके थे कि उनके लिए ‘इतिहास शोध-केंद्र’ में अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीहं है। इसलिए उनके पटना के अधिक चक्कर लगने लगे और एक दिन समाचार पत्रों में छपा कि वे उपकुलपति बना दिए गए हैं।बिहार की किसी यूनिवर्सिटी के उपकुलपति होकर उनका भविष्य अधिक सुरक्षित था। प्रोफेसर झा को ‘फेयरवेल’ देने के बाद प्रोफेसर सूरी ने वही महसूस किया था जो औरंगज़ेब ने दक्षिण विजय के ाद किया था। पूरे ‘केंद्र’ पर अब उनका एकछत्र राज्य था। लेकिन कुछ ही महीने बाद उन्हें लगा कि ‘बिहारी लॉबी’ के विद्रोही, जंगलों में भाग गए थे, फिर से संगठित होकर हमले करने की तैयारी कर रहे हैं।

नई रणनीति बनाते समय उन्होंने अपनी शक्ति का सही अंदाजा लगाया और ‘हांका’ वाली पद्धति अजमाने की सोची। मध्ययुगीन शासक शेर का शिकार खेलने के लिए ‘हांका’ लगवाते थे और उन्हें ‘बिहारी लॉबी’ के पांच नेताओं का शिकार करना था। ‘हांका’ लगाने की तैयारियां शुरू हो गईं। ऑफिस बंद हो जाने के बाद प्रोफेसर सूरी अपने कमरे में विशेष बैठकें किया करते थे, जिनमें उनके समर्थक शामिल होते थे। प्रोफेसर सूरी जानते थे कि युवा लोगों से काम लेने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उनसे बराबरी का-सा बर्ताव किया जाए और आदमी उनके साथ घुल-मिल जाए। इस प्रक्रिया में प्रोफेसर सूरी तथा उनके गुट के प्रमुख लोगों-के.के. गुप्ता, पी.एन. शर्मा तथा अनवर अहमद, जिन्हें प्रोफेसर राव ने रखवाया था-के बीच बहुत से पर्दे हट चुके थे। जो बहुत से पर्दे हटे थे उनमें एक शराब का पर्दा भी था। के.के. गुप्ता तो पीने के बहुत ही शौकीन थे; शर्मा को भी मुफ्त की मिल जाती थी और अनवर अहमद को तो एक तरह से पीना ही प्रोफेसर सूरी ने सिखया था। छः साढ़े छः बजे के आसपास जब सब लोग चले जाते थे तो प्रोफेसर सूरी का कमरा ‘बार’ में तब्दील हो जाया करता था। अल्मारी से मैकडॉवेल की बोतल निकल आती। ड्राइवर जामा मस्जिद से कबाब ले आता और कमरा अंदर से बंद करके ‘हांका’ लगाने की रणनीति तय होने लगती।

अनवर अहमद जामा मस्जिद के इलाके में रहने वाले एक पुराने कबाड़ी परिवार के ऐसे बिरले युवक थे, जिन्होंने अपने पूरे परिवार में लीक से हटकर एम.ए. कर डालने की गलती की थी। उनका परिवार मोटर-पार्टस का ‘रिस्पेक्टेबुल बिजनेस’ करता था। यह बात और है कि दिल्ली के बचे-खुचे पुराने मुस्लिम संभ्रांत परिवार इन-नव धनाढ्य कबाड़ियों को ‘शाबू’ कहकर पुकारते, जिन्होंने आजादी के बाद न केवल पैसा कमाया था, बल्कि अपनी सामाजिक स्थिति भी बेहतर बना ली थी। पुरानी दिल्ली के शाबुओं में जो गुण होते हैं, वे कूट-कूटकर अनवर अहमद की रग-रग में भरे हुए थे। अनवर को प्रोफेसर राव ने इसलिए नौकरी दिलाई थी कि अनवर के एक फूफा बनारस में डी.एस.ओ थे, जो डॉ,राव को कोठी बनवाने के लिए धड़ाधड़ सीममेंट और लोहे का परमिट दे रहे थे।

सोफों पर लोग धंसे हुए बैठे थे। प्रोफेसर सूरी पाइप में तंबाकू भर रहे थे और अनवर गिलासों में हृिस्की डाल रहे थे। केवल बड़े वाले टेबल लैंप का बल्ब जल रहा था। कमरे में हल्का-सा अंधेरा था। दिन-भर फाइलों से सिर मारने के बाद प्रोफेसर सूरी हल्का-सा भारीपन महसूस हो रहा था।

‘‘मेरे ख्याल में तो अभी दो ही लोगों को लिस्ट पर लिया जाए,’’ शर्मा ने गिलास उठाते हुए कहा।

प्रोफेसर सूरी के चौड़े माथे पर दो-तीन लकीरें उभर आईं।’’ ‘बिहारी लॉबी’ के पांच लोगों को वे किसी भी हालत में बाहर देखना चाहते थे और उनका ख्याल था कि पहला हमला ही ऐसा किया जाए कि पांचों बाहर हो जाएं। प्रोफेसर झा के चले जाने के बाद स्थिति ज्यादा उनके पक्ष में थी, उसका इससे कम फायदा नहीं उठाया जा सकता था।

‘‘क्यों दो ही आदमी क्योंें...तुम किन लोगों के लिए कह रहे हो’ उन्होंने शर्मा से पूछा।

‘‘देखिए, एक तो आप लाइब्रेरियन उपाध्याय को ले लीजिए। दूसरे रिसर्च आफीसर चतुर्वेदी को। दोनों को चित्त करने के बाद तब आगे बढिए।’’

‘‘हां सूरी साहब यही बात ठीक लगती है,’’ गुप्ता बोले, जिन्होंने चाकलेटी रंग का सूट पहन रखा था और उसी के रंग से मिलती-जुलती टाई लगा रखी थी।

‘‘लेकिन ये तो बताओ जी कि इन लोगों को लेना कैसे आसान है’ वे ठहरे और बोले, ‘‘आप लोगों की नजर में क्या है’

‘‘सूरी साहब, कौन नहीं जानता कि लाइब्रेरियन उपाध्याय गिफ्ट में आई हुई किताबों कैशमेमों बनवा लेता है और ‘केन्द्र’ से पैसा वसूल कर अपनी जेब में रख लेता है। ‘रेयर बुक्स’ चोरी से प्रकाशकों को रिप्रिंट के लिए दे देने का आरोप भी उसके ऊपर सिद्ध हो सकता है।’’ गुप्ता ने कहा।

‘‘सुबूत भी तो होना चाहिए जी! बिना प्रूफ के क्या किया जा सकता है’

‘‘मुझे पता चला है सूरी साहब के आपके यहां आने से चार महीने पहले सी.सी.आई.एल ने हमारे ‘सेंटर’ की दो सौ किताबें गिफ्ट की थीं उन सब किताबों की यहां खरीद दिखा दी गई। इस बारे में जो कुछ कॉरेसपौंडेंस हुई थी उसे जला दिया गया। अब आपके सेन्टर में इस बात का कोई सबूत नहीं। लेकिन सी.सी.आई.एल में तो सुबूत है,’’ अनवर अहमद बोलकर कबाब का एक टुकड़ा उठाने लगे।

‘‘हां जी, ये तो कुछ बता बनी,‘‘प्रोफेसर सूरी बोले।

‘‘बात बनी अरे सूरी साहब, उपाध्याय बाहर हो गया,’’ अनवर ने जवाब दिया सब हंसने लगे।

‘‘चलिए इस खुशी में एक दौर हो जाए,’’ के.के.गुप्ता ने कहा।

‘‘इस खुशी में तो हो ही जाएगा। लेकिन यह खुशी न होती तो भी दौर और चलता। सूरी साहब को क्या समझ रखा है’’ शर्मा बोला। सूरी साहब मुस्कुरा दिए। यह लौंडा उनसे थोड़ा ज्यादा ही फ्री हो जाता है। लेकिन अकेले में ही तो कोई बात नहीं। सबके सामने ऐसी बातें करता है, जिससे के. के. गुप्ता और अनवर अहमद का भी फ्री होने का मौका मिल जाता है। प्रोफसर सूरी यह नहीं चाहते कि गुप्ता और अनवर से भी उतने ही फ्री हो जाएं, जितने शर्मा से हैं। शर्मा आखिरकार मंत्री महोदय के ताऊ का लड़का है। उत्तर प्रदेश के एक सुप्रसिद्ध और धनवान जमींदार खानदान का सदस्य है। लेकिन गुप्ता और जामा मस्जिद के इलाके में रहने वाला अनवर-दोनों इस काबिल नहीं हैं कि उनका ज्यादा मुंह लगाया जाय। लेकिन जरूरत के वक्त वे गधे को क्या, किसी को भी बाप बना लेने में कोई हर्ज न समझते थे। वे जानते थे कि आज लगाम ढीली छोड़ी जा रही है तो कल कस दी जाएगी और सब ठीक हो जाएगा।

‘‘और चतुर्वेदी का क्या करोगे’ उन्होंने काफी लापरवाही से पूछा। वे इन लौंडों पर यह साबित नहीं होने देना चाहते थे कि इन लोगों की मदद उनके लिए कितनी जरूरी है।

‘‘चतुर्वेदी नर्वस का आदमी है। उसको फंसाना तो बांए हाथ का खेल है,’’ गुप्ता ने सिगरेट का लंबा कश लेकर कहा।

‘‘कैसे’

‘‘आपकी नई स्टनो मिस दास से लिखित बयान दिलाया जाए कि चतर्ुेवेदी ने उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की है। मैं और अनवर गवाही देंगे कि अपनी आंखों से देखा-यानी चश्मदीद गवाह। उसके खिलाफ पूरा मामला तैयार करके उससे आप बात कीजिए-कि भाई अपने आप इस्तीफा देकर चले जाओ तो अच्छा है, नहीं तो पूरा केस पुलिस को दे दिया जाएगा।इतना सुनते ही उसकी फूंक सरक जाएगी और रिजाइन कर देगा,’’गुप्ता ने पूरी योजना बताई।

‘‘यार गुप्ता, तुमने तो ऐसी पक्की तरकीब बताई है जैसे यह सब तुम्हारे साथ कभी किया जा चुका है या...’’अनवर ने चुटकी ली और प्रोफेसर सूरी ने हंसते हुए गुप्ता का कंधा थपथपाकर यह साबित किया कि वे पिछली चीजों को स्पोर्ट्समैन स्पिरिट’ जैसे अन्दाज में लेते हैं। गुप्ता कुछ झेंपी-झेंपी हंसी हंसकर बोले, ‘‘ये दुनिया है सूरी साहब, जितनी हवा भरिंएगा, फूलेगी, फटगी नहीं।’’

‘‘रात दस बजे तक महफिल जमी रही। सब नीचे उतरे तो इमारत के सामने वाले लॉन में एकदम सन्नाटा था और सड़क पर लगी दूधिया बत्तियों की रोशनी में काली सड़क ऐंडती-सी दिखाई दे रही थी। सूरी साहब ने पहले शर्मा को घर छोड़ा, फिर बंगाली मार्केट के पास गुप्ता और अनवर को उतार दिया। कार की पिछली सीट पर अकेले बैठे-बैठै उन्होंने सोचा कि सब कुछ ठीक चल रहा है। ‘बिहारी लॉबी’ के इन दो लोगों को उखाड़कर वे बाकी तीन के खिलाफ जुट जाएंगे। या हो सकता है कि इन दो लोगों के खिलाफ की जानेवाली कार्यवाही से डरकर बाकी ‘बिहारी’ उनके सामने आत्मसमर्पण कर दें। वे उन बागियों के साथ, जो आत्मसमर्पण कर देते हैं, वही सुलूक किया करते हैं, जो मुगल बादशाह विद्रोह करने और बाद में माफी मांग देने वाले सूबेदारों के साथ करते थे। प्रोफेसर सूरी को अक्सर लगा करता है कि दुनिया बदली नहीं है। क्या बदला है कुछ नहीं वही शासक हैं, वही प्रजा है, वही नौकरशाही है, वही आपाधापी है, वही षड्यंत्र है, वही सत्ता की राजनीति है। सैकड़ों साल पहले जो कुछ किया गया था, वही दोहराया जा रहा है। यह सब सोचकर उन्हें अपने बहुत बुद्धिमान होने का एहसास हो जाता है और वे पाइप में नई तंबाकू भरने लगते हैं।

‘‘चतुर्वेदी के बारे में जैसा अनुमान लगाया गया था वैसा ही हुआ। मतलब जब पूरी फाइल प्रोफेसर सूरी ने उसके सामने रखी तो वह आंसू बड़ी मुश्किल से रोक सका और तत्काल इस्तीफे पर हस्ताक्षर करके अगली गाड़ी से पटना चला गया। हां, लाइब्रेरियन उपाध्याय ने जरूर कुछ नए हाथ दिखाए। उसे जब प्रोफेसर सूरी न सी.सी.आई.एल. का पत्र दिखाया तो वह कहने लगा, ‘‘सर यह काम हैं अपने लिए तो करता नहीं था। प्रोफेसर झा की सहमति से सब कुछ होता था। अब सर, आप चाहें तो हिसाब ले सकते हैं। उस फंड में अभी मेरे पास आठ हजार रुपया बचा पड़ा है। आप कहें तो कल लेता आंऊ। सर, ऐसा पैसा बैंक में तो रखा नहीं जा सकता। घर पर पड़ा है। उससे मुझे छुटकारा मिल जाए तो बड़ी कृपा हो। फिर जैसे आप कहेंगे, मैं करता रहूंगा।’’

प्रोफेसर सूरी ने ध्यान से उसकी ओर देखा। एक पराजित सूबेदार लोहे की जंजीरों में जकड़ा उनके सामने खड़ा है। वे चाहें तो उसे हाथी के पैर से कुचलवा दें, चाहे तो भूखे शेर के पिंजरे में डलवा दें, चाहें तो जिंदा खाल खिंचवा लें। पर यह हारा हुआ सुबेदार उन्हें कीमती जवाहरात, सोने के सिक्के और कीमती साजो-सामान भेंट कर रहा है। यदि वे चतुर हैं तो स्थिति का पूरा लाभ उठाऐंगे। उसको जान से मार देने पर क्या मिलेगा, लेकिन उसे माफ करने से संपत्ति ही नहीं, सहयोग भी मिल सकता है। वे गंभीर हो गये। उपाध्याय ताड़ गया, बोला, ‘‘सर, किताबें खरीदने का दो लाख का बजट है। हर साल बीस-पच्चीस या कभी-कभी तीस और अगर आप कहें तो चालीस हजार तक बड़ी आसानी से निकल सकता है।’’

‘‘तब आप ये आठ हज़ार क्यों बता रहे हैं’

‘‘सर, बाकी पैसा तो प्रोफेसर झा...’’

‘‘देखिए मैं कुछ नहीं जानता। कल दस हज़ार लेकर आ जाइएगा। कहिए ठीक है’ वे आंखें निकालकर बोले।

‘‘जी सर!’’

‘‘जाइए और आइंदा से ख्याल रखिएगा।’’

‘‘यस सर!’’ उपाध्याय उठकर चला गया। उपाध्याय के जाते ही उनकी सलाहकार मंडली के सदस्य जमा हो गए। दरवाजा अंदर से बंद कर दिया गया।

‘‘क्या हुआ डाक्टर साहब’ गुप्ता ने पूछा।

बहुत ठंडे लहजे में प्रोफेसर सूरी बोले, ‘‘चतर्ुेवेदी जैसा उल्लू यह नहीं है। काफी चालाक आदमी है। कह रहा था मामला अदालत में ले जाइए। बिल तो सब ऊपर से ही पास हुए हैं। फंसेंगे तो प्रोफेसर झा भी फंस जाएंगे।’’

‘‘तब’ शर्मा बोला।

‘‘ओहो जी, सोचने की बात है। किसी वाइस चांसलर पर ऐसा केस सरकार पसंद करेगी या मंत्री महोदय को अच्छा लगेगा और फिर केस चलेगा तो जाने कितनी बातें सामने आएं।’’

‘‘बड़ा चालाक है साला!’’ अनवर अहमद बोले।

‘‘अब मैं बताऊं अगली चाल के.के गुप्ता बोले।

‘‘छोड़ो जी, माफी मांग गया है,’’ प्रोफेसर सूरी ने कहा।

‘‘माफी,’’

‘‘बस छोड़ो उसे और बाकी लोगों पर लग जाओ।’’

वहां से उठकर आने के बाद के.के.गुप्ता को विश्वास नहीं हुआ कि उपाध्याय ने इतनी हिम्मत से काम लिया होगा। वे थोड़ी देर अपने केबिन में बैठे रहे और फिर इंटरकाम पर लाइब्रेरी का बटन दबा दिया।

‘‘उपाध्याय जी हैं’

‘‘ठहरिए, हां बात कीजिएगा।’’

‘‘गुप्ता बोल रहा हूं।’’

‘‘ओहो गुप्ताजी! हुकुम दीजिए साहब!’’ उपाध्याय ने काफी सम्मान और शालीनता से बात शुरू की। वैसे भी पिछले चाह ही महीने में गुप्ता और उपाध्याय में अच्छी पटने लगी थी। यह सभी को मालूम था कि के.के गुप्ता शिक्षामंत्री के पी.ए. के दामाद हैं। और यह भी सब जानते थे कि शिक्षामंत्री से भी अधिक काम करवाने की स्थिति में शिक्षामंत्री का पी.ए.होता है।

के.के. गुप्ता ने उपाध्याय को लंच साथ करने का निमंत्रण दिया। उपाध्याय को अंदाजा लगाते देर न लगी कि ‘सुगंध’ पाते ही मधुमक्खियां आ रही हैं। लंचा के दौरान, इधर-उधर की बातें करने के बाद गुप्ता ने पूछा, क्योंकि उपाध्यायजी प्रोफेसर सूरी के यहां कैसी पेशी थी’

‘‘गुप्ताजी, मेरा तो एक ही नियम है-रोटी अवश्य आप खायें पर एक टुकड़ा मुझे भी दे दें।’’

‘‘समझा नहीं,’’ गुप्ताजी चाहते थे कि उपाध्याय और खुले।

‘‘हेर-फेर कहां नहीं होती गुप्ताजी! यहां भी है। कहीं कम होती है, कहीं ज्यादा। प्रोफेसर साहब ने आज स्वीकृति दे दी है। घी लगी चिकनी-चुपड़ी रोटी उन तक पहुंच जाया करेगी। मैं भी एक-आध सूखा टुकड़ा पानी से निगल लिया करूंगा।’’

‘हूं, तो यह बात है! प्रोफेसर सूरी डबल खेल-खेल रहे हैं!’ के.के. गुप्ता ने मन-ही-मन सोचा और बोले,‘‘ऊपर से कभी कोई मदद की जरूरत पड़े तो बताना।’’

‘‘अरे कमाल करते हैं गुप्ताजी! आपसे ने कहेंगे तो कहां जाएंगे। आपका हुकुम न बजाएंगे तो किसका बजाएंगे’

उसी दिन शाम के के.के. गुप्ता ने यह बात शर्मा और अनवर अहमद को बता दी। अनवर अहमद ने प्रोफेसर सूरी को एक मोटी-सी गाली देकर कहा, ‘‘साला हमें चुतिया बनाता है। हम उसके लिए झूठी गवाहीं देने पर तैयार हो गए थे और ये हमारा उल्लू खींचता है। जब तर माल की बात आई तो हमें काट दिया।’’

प्रोफेसर सूरी ने एक साल के अंदर-अंदर बिहारी लॉबी का नामोनिशान मिटा दिया था। बिहारी लॉबी के अंतिम नेता कीर्ति कुमार को उन्होंने सताने के लिए मध्ययुगीन यूनिट से निकालकर, जिसका वह विशेषज्ञ था, मार्डन यूनिट पर लगा दिया था और फिर उसके काम में कमियां निकालनी शुरू कर दी थीं। दो बार उससे लिखित जवाब तलब किया था और एक बार उससे लिखित माफीनामा लिया। फिर उन्होंने कीर्ति को संसद में उठाए गए सवालों का जवाब तैयार करने पर लगा दिया था। उनके हिसाब से यह काम इतना कठिन था कि कीर्ति को जल्दी ही छोड़कर भाग जाना चाहिए था। पर क्या करें कि वह नहीं गया। तंग आकर प्रोफेसर सूरी ने उसके बिल रोकने शुरू कर दिए और दूसरी तरफ उसके असिस्टेंट को लाइब्रेरी में शिफ्ट कर दिया।

शर्मा ने ठीक एक साल के बाद महसूस किया कि प्रोफेसर सूरी को स्टनो मिस दास ने प्यार का तीर उसके दिल में धंस गया है। वह रोज मिस दास को लंच कराने लगा था। मिस दास भी मंत्री महोदय के ताऊ के लड़के के निमंत्रण को अस्वीकार न कर पाती थी। उसने सोच रखा था। बहुत-से-बहुत क्या हो सकता है-शादी; जो किसी तरह भी उसके लिए घाटे का सौदा न होगा। उड़ीसा की रहने वाली और कलकत्ता में शिक्षा प्राप्त मिस दास उड़िया और बंगाली सुंदरता का अद्भुत समिश्रण थीं। बंगाली लड़कियों जैसा खुलता और दमकता हुआ रंग तथा उड़िया लड़कियों जैसी गंभीरता उनके व्यक्तित्व में घुल-मिल गए थे। शर्मा रोज शाम उसे मोटर साइकिल पर बैठाकर पहले कनॉटप्लेस ले जाता। दोनों ‘गेलार्ड’ में कॉफी पीते और फिर शर्मा उसे बंगाली मार्केट छोड़ता हुआ घर निकल जाता। प्रोफेसर सूरी को अपने सूत्रों से इस प्रेमलीला का पता चल चुका था और वे इस प्रतीक्षा में थे कि इस संबंध को अपने पक्ष या हित में कैसे इस्तेमाल किया जाए। उन्हें मालूम था कि यह प्रकरण एक-न-एक दिन रंग लाएगा और मंत्री महोदय के सामने उनकी जवाब-तलबी होगी। वे उसी मौके की प्रतीक्षा कर रहे थे।

शिक्षामंत्री के विश्वासपात्र और निकटतम सलाहकार प्रोफेसर सूरी के माध्यम से ‘इतिहास शोध केन्द्र’ के पैसे को अपने खास-खास लोगों में बड़ी बेदर्दी से वितरित करा रहे थे। किसी विद्वान को डेढ़ लाख का प्रोजेक्ट मंजूर हो रहा था तो किसी को ‘किताब छपाई’ के लिए चालीस हजार रुपया दिया जा रहा था। किसी को ‘मूल सामग्री’ जमा करने के लिए एक साल में अस्सी हजार रुपये दे दिए गये थे तो किसी की पत्नी को हजार रुपये की फेलोशिप बांध दी गई थी। बहरहाल पूरा काम सही तरीके से चल रहा था। प्रोफेसर सूरी एक-आध बार मंत्री महोदय से मिल चुके थे और मंत्री महोदय ने मुक्त कंठ से उनके काम की प्रशंसा की थी। ऐसे स्वस्थ वातावरण में प्रोफेसर सूरी को ‘सलाहकारों’ की जरूरत न रह गई। शर्मा ने तो शाम वाली बैठकों में वैसे ही आना छोड़ दिया था, क्योंकि वह मिस दास को ‘गेलार्ड’ ले जाने लगा था। हां,अनवर और के.के. गुप्ता अवश्य आया करते थे। लकिन प्रोफेसर सूरी ने इन दोंनों को धीरे-धीरे यह जतला दिया था कि उन्हें अब उन लोगों की आवश्यकता नहीं है। अनवर तो उनके इस व्यवहार पर उन्हें गालियां देने लगा था, पर के.के. गुप्ता ने कहा था-प्यारे, अब पालीटिक्स देखो। मैं तुम्हारे सामने साले को ऐसा चित करूंगा कि याद करेगा।

उधर मिस दास और शर्मा ने ‘गेलार्ड’ की सीमाओं को तोड़ दिया था। अब सूरजकुंड और बुद्ध जयंती पार्क का खुला हुआ उन्मुक्त वातावरण ही उन्हें आश्रम देने की सामर्थ्य रखता था। सूरजकुंड में बने रेस्टहाउस के कमरे में वे एक ही दो घंटे गुजार पाते थे, पर जंगल में डूबते हुए सूरज का दृश्य,विशाल जलाशय में उसकी किरणों का प्रतिबिंब, क्लासिकी नायिकाओं जैसे लंबे, सुगंधित, मुलायम मिस दास के केश शर्मा को किसी रहस्यमयी दुनिया की सैर करा देते थे। एक दिन ऐसे ही वातावरण में मिस दास ने उससे कहा था कि वह उसी की है और उसकी हर चीज पर उसी का अधिकार है। सूरज की किरणों से लाल जलाशय में एक झरना फटा था, उसी दिन।

कई वर्षो से लगातर पहने जाने वाले और इस कारण घिसकर चमक गए, गहरे रंगों के सूठ पहने, हाथों में भारी-भारी ब्रीफकेस उठाए, नाक का चश्मा लगाए प्रोफेसरों के कई गुट ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ के लॉन में खड़े आपस में ‘वार्तालाप’ कर रहे हैं। आज कार्यकारिणी की मीटिंग है। प्रोफेसर सूरी चाय की व्यवस्था देखने स्वयं कैटीन की तरफ निकले हुए हैं। उनके पीछे-पीछे के. के. गुप्ता और अनवर अहमद भी सक्रिय हैं।

लॉन पर जनवरी की मीठी-मीठी धूप फैली हुई है। दूर-पास से आए प्रोफेसर सिलेक्शन कमेटियों, एक्सपर्ट कमेटियों, सेमीनारों संगोष्ठियों, डीनशिपों और भविष्य में रिक्त होने वाले प्रोफेसर पदों और ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ में प्रस्तुत किए जाने वाले नए ‘प्रोपोजलों’ के बारे में अलग-अलग बंटे गपशप कर रहे हैं। उनमें से बेश्तर के चेहरों पर बीस-पच्चीस साल तक विश्वविद्यालय में काम करने का ‘जाला’ साफ दिखाई दे रहा था। बेश्तर के नाकों पर काले या सुनहरे फेम के मोटे-मोटे चश्मे लगे हुए हैं। उनके चेहरों पर ऊब, उकताहट, खीज के साथ-साथ आत्मसंतोष के रंग एक-दूसरे में घुलमिल गये हैं। कुछ के चेहरों पर उच्च-शिक्षा की निरर्थकता का भाव साफ झलकता है। और उसके साथ-साथ रिटायर हो जाने पर ‘इतिहास शोध-केन्द्र’ के किसी प्रोजेक्ट को हथिया लेने की लालसा भी दिखाई पड़ती है। अधिकतर प्रोफेसरों के सिर के आगे और पीछे के बाल झड़ चके हैं तथा खिचड़ी बालों के बीच से उनकी चांदें धूप में चमक रही हैं। कंधे झुक आए हैं और गर्दन आगे की ओर लटक आई है। इन सबके अपने छोटे-बड़े साम्राज्य हैं, जिनमें वे अपनी मर्जी से नियुक्तियां करते हैं, लड़कों को अपनी-अपनी इच्छा से फर्स्ट क्लास से लेकर थर्ड क्लास तक देते हैं। शोध करने वाली छात्रों के भविष्य के मालिक और टेंप्रेरी लेक्चरों के माई-बाप हैं। उन सबका अपना-अपना प्रभा-मंडल है। जो प्रांतीय ख्याति के हैं, वे राष्ट्रीय ख्याति के बनने की इच्छा रखते हैं। जो राष्ट्रीय ख्याति के हैं, वे इंडो-योरोपीय ख्याति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। और इस संघर्ष में जो सफल हो गये हैं, वे अंतर्राष्ट्रीय होने की दौड़ में शामिल हो चुके हैं। उनमें से अधिकतर अपनी इच्छा से इस पेशे में नहीं आए थे, क्योंकि बीस-पच्चीस साल पहले अधिक और आज भी पढ़ानेकी नौकरी प्रायः लोग उस समय करने की सोचते हैं जब और सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं। अनिच्छा से बीस-पच्चीस साल पढ़ाने तथा विश्वविद्यालयी राजनीति की उठापटक में कभी गिरने और दूसरों को टंगड़ी मारने की प्रक्रिया में उनमें से अधिकतर धक्का मारकर अपनी जगह बनाने में बहुत निर्मम हो गए हैं। हजारों डिब्बे सिगार, लाखों डिब्बे सिगरेट और टनों तंबाकू पीने के कारण उनके होंठ काले पड़ चुके हैं और चेहरों पर गंभीरता का भाव इतना गहरा बैठ चुका है कि देखने से यह पता ही नहीं चलता कि वे हंसते भी होंगे। उनके चेहरों पर इतनी गंभीरता, इतनी सज्जनता, इतनी विद्वता, इतनी सौम्यता, इतनी सहनशीलता, इतनी तेजस्विता थी कि उन्हें देखकर अंदाजा लगाना कठिन था कि उनमें से अधिकतर ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा घुटन और सधांड़ से भरे वातावरण में बिताया है।

चाय की व्यवस्था ठीक थी। तले हुए काजू, पेस्ट्रीज, फल और कुछ सूखे मेवे थे। कैंन्टीन से लौटते हुए के.के. गुप्ता ने प्रोफेसर सूरी से कहा, ‘‘कल मुझे मेरठ जाना है।’’

प्रोफेसर सूरी इस समय, इस बेतुकी बात पर कुछ खिन्न हो गए। उन्होंने घूरकर गुप्ता की ओर देखा,

‘‘तो चले जाओ।’’

‘‘गाड़ी चाहिए है।’’

‘‘गाड़ी गाड़ी तो ‘आफिशयल’ काम के लिए ही मिलती है,’’ उन्होंने जानबूझकर अपने स्वर को जितना रूखा हो सकता था, बनाया।

‘‘साथ डैडी भी जा रहे हैं।’’ डैडी से मतलब मंत्री महोदय के पी.ए. से था। प्रोफेसर सूरी को इस बात पर गुस्सा आया। डैडी जा रहे हैं तो पहले कहना चाहिए था। बाद में बताने की क्या जरूरत लेकिन डैडी का हवाला सुनते ही उन्होंने चेहरे पर से नाराजगी के भाव वापस समेट लिए और आत्मीयता से बोले,

‘‘अरे भाई तो ‘आफिशियल टूर’ बन जाएगा। ले जाओ गाड़ी। चाहो रात ही में ले जाओ। मैं टैक्सी से घर चला जाऊंगा। या कहो तो सुबह घर भेज दूं।’’

‘‘अगले दिन आफिस से शर्मा, गुप्ता अनवर अहमद और मिस दास-चारों लोग गायब थे। इस आफिस सीट पर ड्राइवर के साथ अनवर अहमद बैठा था। चारों लोग पिकनिक के मूड में थे। गाड़ी में पेट्रोल फुल था। पीछे घूमकर अनवर ने कहा, ‘‘सुना तुमने शर्मा, सूरी साहब मुझसे कह रहे थे छुट्टी ले लो।’’

‘‘क्या दिमाग खराब हो गया है साले का’ शर्मा बोला।

‘‘नहीं जी, अब कोई काम नहीं हैं। न हम लोगों से,’’गुप्ता ने कहा।

‘‘काम काम तो साले की सैकड़ों हैं। रोज कहता है, आज मंत्री से यह कह दो, कल मंत्रीजी से वो कह दो। मैं तो कहते-कहते थक गया।’’

‘‘सीधी बात है यार, वह मुझे और के. के. को काटना चाहता है। तुम भी उस वक्त तक हो, जब तक तुमने उसका उल्लू सीधा हो रहा है,’’ अनवर ने कहा।

‘‘डिवाइड एंड रूल के उसूल पर चल रहा है। परसों ही मुझसे कह रहा था कि देखो, शर्मा मंत्री के रिश्तेदार हैं तो इसका यह मतलब तो नहीं कि मिस दास....’’अनवर ने एक तीर मारा और वह सही निशाने पर पड़ा।

‘‘मैं....यूं मीन ही वाज टाकिंग एबाउट मी एंड....’’मिस दास की बात काटकर शर्मा बोला, ‘‘इतनी हिम्मत हो गई है साले की।’’

‘‘देखो, मैं कहती थी कि एक दिन...’’ मिस दास रुआंसी आवाज में बोली। शर्मा मिस दास की तरफ देखने लगा और के. के. ने अनवर को आंख मारकर नए आइडिये पर बधाई दी।

‘‘यू डोंट वरी डार्लिंग! उससे निपटने के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूं।’’

‘‘नहीं यार, हम सब साथ हैं। तुम कहो तो एक दिन में उसकी बोलती बंद कर दें’’ अनवर ने तपाक से कहा, ‘‘अब यार, इतने भी गए-गुजरे नहीं हैं।’’

‘‘गाड़ी साले ने तब तक नहीं दी, जब तक डैडी का नाम नहीं लिया,’’ के. के. ने कहा।

‘‘क्यों भाई ड्राइवर, गाड़ी सूरी साहब सिर्फ आफीशियल काम के लिए यूज करते हैं’ शर्मा ने ड्राइवर से पूछा।

‘‘साहब हमारे लिए तो चुप रहना ही ठीक है,’’ वह बोला।

‘‘नहीं-नहीं, बताओ। हम पूछ रहे हैं तुमसे,’’ के. के. इस तरह अकड़कर बोले मानो, वे मंत्री महोदय के पी. ए. के दामाद नहीं, स्वयं मंत्री महोदय के पी. ए. हों।

‘‘साहब, सुबह बच्चे स्कूल जाते हैं, उन्हें ले जाता हूं। दोपाहर बीबीजी बाजार जाती हैं। रात में माताजी को मंदिर ले जाता हूं। अब आप ही....’’

‘‘देखा’ अनवर बोला, ‘‘सरकारी पैसा साला इस काम के लिए है’

‘‘हम लोगों को तो बहुत तकलीफ है साहब, आप लोग...’’

‘‘क्या तकलीफ है’

‘‘डायरेक्टर साहब हम लोगों को यूनियन बनाने नहीं देते हैं।’’

‘‘यूनियन,’’ अनवर की आंखें चमक उठीं, ‘‘तुम्हारी युनियन बनेगी औ जरूर बनेगी। मैं देखता हूं कि कैसे नहीं बनती। मैं ही मनाऊंगा। हद हो गई, अब सूरी साहब लोगों के फंडामेंटल राइट्स तक छीन लेंगे।’’

‘‘यार देखों, सौ की सीधी बात यही है कि हम लोगों ने बड़ी ईमानदारी से सूरी की मदद की और उसे ऊपर चढ़ा दिया। हम लोगों से बड़ी गलती हो गई। उसे इतना ऊपर नहीं चढ़ाना चाहिए था। अब मिलकर कोशिश करो कि साला थोड़ा नीचे आए। नहीं तो हम सबका जीना हराम कर देगा,’’ के. के. बोले।

‘‘ये कौन-सा मुश्किल काम है’ शर्मा ने कहा।

‘‘पर यार, मिलकर करना पड़ेगा। वह तो इस चक्कर में है कि हम लोगों की एक-दूसरे से लड़वा दे और बैठकर तमाशा देखे,’’ के.के. उत्तर दिया।

‘‘अब हम इतने मूर्ख नहीं हैं, शर्मा बोला।

जैसे मध्ययुगीन बादशाह षड्यंत्रों और युद्धों द्वारा अपने साम्राज्य को विस्तार देने के बाद भवन-निर्माण जैसे कामों में रुचि लेने लगते थे, वैसे ही प्रोफेसर सूरी कार्यालय को ‘रिनोवेट’ करने मे जुट गए थे। ‘इतिहास शोध-केंद्र’ का नया अध्यक्ष एक अवकाश प्राप्त, नौकरी से नहीं जीवन से, प्रोफेसर था। बुढ़ापे के कारण उसका गंजा सिर, जिस पर चार छः सफेद बाल थे, कांपता रहता था। उसके साथ काम करने में प्रोफेसर सूरी को किसी प्रकार की असुविधा नहीं हो रहा थी, क्योंकि नया अध्यक्ष प्रोफेसर रेखी बड़ी मुश्किल से दिन में चार-पांच हस्ताक्षर करने का साहस ही जुटा पाता था।

सबसे पहले प्रोफेसर सूरी ने अपने कमरे को ‘रिनोवेट’ करने की योजना बनाई। शर्मा, के.के. तथा अनवर ने अपने व्यवहार से प्रोफेसर सूरी पर जाहिर कर दिया था कि वे उनका आदर करते हैं, सम्मान करते हैं, उनकी चालाकियों के आगे सिर झुकाते हैं उनका हर कहना मानने के लिए तैयार रहते हैं। इसलिए वे लोग सलाह दे रहे थे। प्रोफेसर सूरी का दिल बढ़ा रहे थे।

‘‘डाक्टर साहब, आप इजाजत दें तो एक बात कहूं,’’ अनवर ने बहुत आदर से पूछा।

‘‘ओहो जी, बोलो।’’

‘‘साहब, आपके बैठने की कुर्सी बदलनी चाहिए। इतने बड़े शोध केन्द्र के निदेशक के लिए यह कुर्सी ठीक नहीं है।’’

‘‘फिर कैसी कुर्सी होनी चाहिए’

‘‘ये तो देखना पड़ेगा सर!’’

प्रोफेसर सूरी समझ गए कि लड़कों का घूमने का मूड है। वे बोले, ‘‘ओहों जी तो आप लोग जाकर देखो। इसमें मदद तो करनी ही पड़ेगी।’’

‘‘गाड़ी लेकर शर्मा, के. के. और अनवर राजधानी के सबसे मंहगा फर्नीचर बनाने वाली कंपनी में गए। वहां निदेशक महोदय के बैठने के लिए कुर्सी पसंद की जाने लगी। सबसे महंगी कुर्सी तीन हजार की थी। यह जानकर के.के. को बड़ा दुःख हुआ।

‘‘इस कुर्सी का दाम बढ़ नहीं सकता,’’ उन्होंने सूटधारी सेल्समैन से कहा। सेल्समैन ने आंखें फाड़कर उन्हें देखा, पर जल्दी ही संभल गया।

‘‘यह सर, इसका लेदर इम्पार्टेड कर दिया जाएगा।’’

‘‘तब कितना दाम होगा’

सेल्समैन ने कैलकुलेटर पर जोड़ा, ‘‘तीन हजार छः सौ अस्सी।’’

‘‘और’

‘‘इसकी सीट पर डबल कुशनिंग हो सकती है। नीचे जो गरारियां लगी हैं उनकी बदलकर पीतल की गरारियां लग सकती हैं। हैंडरेस्ट और बढ़िया लेदर का दे दिया जाए। और....’’ और इस तरह प्रोफेसर सूरी की कुर्सी जब आई तो प्रियदर्शनी थी। कुल लागत पांच हजार चार सौ अस्सी रुपये आई थी। उस पर जब प्रोफेसर सूरी बैठे तो उन्हें उस सुख का हलका-सा आभास हुआ जो, तख्तेताऊस पर बैठते समय शाहजहां को हुआ होगा। अभी कुर्सी आए तीसरा ही दिन था कि अचानक मंत्रालय से फोन आया और कहा गया, ‘ऑनरेबल मिनिस्टर इज वेरी अपसेट टु नो द फैक्ट दैट यू आर वेस्ंिटग पब्लिक मनी इन बाइंग वेरी एक्सपेंसिव फर्नीचर फार योर आफिस।’ प्रोफेसर सूरी फोन को चोंगा पकड़े सन्नाटे में उसी कुर्सी पर बैठे-के-बैठे रह गए। फिर उन्हें ऐसा लगा कि कुर्सी ने उन्हें डंक मार दिया हो। वे अचानक खड़े हो गए। चपरासी को बुलाने के लिए घंटी बजाई। तत्काल शर्मा और के. के. तलब किया। उन दोनों ने काफी आश्चर्य से खबर को सुना और साबित कर दिया कि एक विरोधी दल के एम. पी. ने पत्र लिखकर मंत्री को कुर्सी के बारे में सूचित किया था। यह विरोधी एम. पी. कीर्तिकुमार का रिश्तेदार है और जरूर उसे कीर्तिकुमार ने बताया होगा। शाम होते-होते मंत्री महोदय के विश्वासपत्र सलाहकार का फोन आया और उन्होंने समझाया कि वे-यानी प्रोफेसर सूरी-राजधानी में हैं। यदि किसी भी अखबार में यह खबर छप गई तो सीधे पी. एम. के सचिवालय तक चली जाएगी। संसद में सवाल उठ खड़ा होगा। हो सकता है, मंत्री महोदय के विरोधी विद्वान इसके विरुद्ध हस्ताक्षर-अभियान छेड़ दें या कोई दिलजला आमरण अनशन पर ही बैठ जाए।

अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कुर्सी का क्या करें। कंपनी ने बिल बना दिया था, कुर्सी रिसीव करने की स्लिप पर एडमिनिस्ट्रटिव आफीसर के हस्ताक्षर हो चुके थे। वे कुर्सी पर बैठ चुके थे। के.के गुप्ता, शर्मा और अनवर मुह लटकाए उनके सामने बैठे थे।

‘‘मैं कह रहा था सर की आप आस्तीन में सांप पाल रहे हैं, ‘‘अनवर ने पान एक कल्ले से दूसरे में खिसकाते हुए कहा।

‘‘खैर जी, जो हो गया सो हो गया। अब बताओ कि क्या किया जाए’

‘‘कुर्सी वापस कर दी जाए,’’ के.के. ने भोलेपन से कहा।

‘‘अब कैसे हो सकती है’ शर्मा बोला।

‘‘सर, इस कुर्सी पर आप एक गंदा-सा कपड़ा डलवा दीजिए,’’अनवर ने इतनी मासूमियत से कह कि शर्मा को हंसी रोकना मुश्किल हो गई।

‘‘ओहो जी, क्या बच्चों वाली बातें करते हो’’ उनसे क्या फर्क पड़ेगा।’’

‘‘फिर सर, इस कुर्सी को गोदाम में डलवा दीजिए।’’

‘‘गोदाम में तब तो और गड़बड़ हो जाएगी। लोग कहेंगे, छः हजार की कुर्सी को गोदाम में सड़ा डाला गया,’’ के. के. ने कहा।

‘‘सर, एक बात समझ में आती है। इस कुर्सी को अध्यक्ष प्रोफेसर रेखी के कमरे में डलवा दिया जाए।’’ शर्मा ने एक सुझाव दिया।

‘‘हां इस बात में तो कुछ जान है।’’

‘‘लेकिन जो बदनामी होनी थी वह तो हो चुकी है। फिर इतनी अच्छी कुर्सी को प्रोफेसर रेखी के कमरे में डलवाने से क्या लाभ’ के. के. ने आपत्ति की।

प्रोफेसर सूरी ने आंखें बंद कर लीं। लंबे-चौड़े माथे पर हाथ फेरने के बाद उन्होंने आंखें खोलीं।

‘‘कुछ है डाक्टर साहब’ के. के. ने उस अलमारी की तरफ इशारा किया, जिसमें हृिस्की रहती थी।

‘‘है जी, निकालो,’’ प्रोफेसर सूरी मरी हुई आवाज में बोले।

प्रोफेसर सूरी ने अपने तथा इन लागों के बीच जो दूरी पिछले छः महीने में पैदा की थी, वह कुर्सी-प्रसंग के कारण घटकर जीरो हो गई। फिर बोतल निकल आई। फिर वे लोग प्रोफेसर सूरी को ‘सर’ न कहकर ‘सूरी साहब’कहने लगे। फिर जामा मस्जिद से कबाब आ गए और प्रोफेसर सूरी के लिए-किराए पर पानी फिर गया।

कुर्सी-प्रसंग के कारण प्रोफेसर सूरी तीन महीने तक कुछ दबे हुए-से रहे। कारण यह था कि उन्हें खबरें मिल रही थीं कि कुर्सी-प्रसंग अभी तक प्रोफेसरों की गपशप का विषय बना हुआ है। इसलिए कुर्सी उनके लिए एक मुसीबत हो गई थी। और चूंकि इसी कुर्सी पर उन्हें दिन-भर बैठना भी पड़ता था, इसलिए इस पूरी कांड का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उन पर पड़ा था। अंततः एक दिन जब शर्मा ने कहा कि मंत्री महोदय अब कुर्सी-खरीद वाली बात को पूरी तरह भूल चुके हैं, तब कहीं जाकर उनकी जान-में-जान आई। उन्होंने खोया हुआ आत्मविश्वास पुनः प्राप्त करना शुरू किया। लेकिन इस बीच के.के. और अनवर के हजारों रुपये के झूठे बिल पास करा लिए थे। के. के. तो बारह बजे के करीब आफिस आने लगे थे। अनवर भी साढ़े दस बजे अपनी सीट पर आकर अपने कागज, फाइलें रख देते थे और कैंटीन में जाकर बैठ जाते। शर्मा को तो वैसे ही कोई पूछने वाला न था। जब जी चाहता आता, मिस दास को साथ लेता और इधर-उधर निकल जाता। वैसे भी ऑफिस में जो भी काम होता था, व्यक्तिगत संबंधों के कारण ही होता था। न किसी को किसी से कुछ कहने की हिम्मत थी और न कोई किसी की बात मानने को तैयार था सब जानते थे, प्रोफेसर सूरी आजकल ‘डाउन’ चल रहे हैं। सभी जानते थे कि फर्नीचर की खरीद में ऊपर से नीचे तक रुपया भी खाया गया है। इसलिए कौन किससे क्या कहता। एक हम्माम में सब नंगेथे।

कुर्सी-खरीद वाला प्रंसग दबा ही था और शर्मा, के.के. तथा अनवर की मार्केट-वल्यू कम हुई ही थी केंद्र के प्रकाशन विभाग के भ्रष्टाचार का मामला भी उसी तरह सामने आया, जैसे कुर्सी वाला मामला आया था। इसमें भी करीब अस्सी पच्चासी हजार बनाए गए थे। इस मामले का फंड़ा होते ही प्रोफेसर सूरी को अपनी कुर्सी हिलती दिखाई देने लगी। उन्होंने पूरी खोजबीन कर डाली। सभी संबंधित लोगों को बुलाया और अंततः पता चला कि जिस प्रेस में पुस्तकें छपी है, वह अनवर अहमद के दोस्त के चाचा का प्रेस है। इतना जानने के बाद प्रोफेसर सूरी को यह समझते देर नहीं लगी कि प्रकाशन में भ्रष्टाचार की खबर अनवर से होती हुई के. के. के माध्यम से मंत्रालय पहुंची है। अब उन्हें लगा कि उन तीनों ने मिलकर उन्हें फांसने के लिए पहले तो चारा डाला और बाद में ब्लैकमेल कर रहे हैं। अब उन्हें सबसे बड़ा काम इस तिगुटे को तोड़ना ही दिखाई देने लगा। इसके लिए सबसे जरूरी था कि शर्मा को पहले हटाया जाए। हटाने का यही तरीका हो सकता है कि उसे किसी विश्वविद्यालय में नौकरी मिल जाए।

शर्मा के चले जाने के बाद तिगुटे को धक्का लगा था। प्रोफेसर सी. सी. सूरी ने रुख बदला ही था कि अनवर अहमद और के. के. ने मिलकर कर्मचारी यूनियन के गठन को पहली बैठक इमारत के सामने वाले लॉन में कर डाली। जिस मुसीबत को प्रोफेसर सूरी दो साल से टाल रहे थे, वह इतनी जल्दी आ जाएगी, इसकी उम्मीद न थी। इस मीटिंग में केंद्र के भ्रष्टाचार को लेकर दो-चार लोगों ने बड़े गरमागरम भाषण दिए। एक प्रतिनिधि मंडल बनाया गया जिसका काम प्रोफेसर सूरी से मिलकर कर्मचारी-यूनियन के गठन की समस्या को तय करना था। प्रोफेसर सूरी जानते थे कि यह अनवर और के.के. की छोड़ी और फुलझड़ी है, जिसमें बची-खुची ‘बिहारी लॉबी’ शामिल हो चुकी है। इस बार प्रोफेसर सूरी समझ गए थे कि दुश्मन किधर से आ रहा है। उन्होंने सारी नाकेबन्दी पूरी कर ली। अगले ही दिन उन्होंने अनवरऔर के. के. को बुलाया और हृिस्की की बोतल खोलकर उनसे साफ शब्दों में कहा कि कर्मचारी यूनियन न बनने दें। इसके बदले में वे दोनों अपने जो काम चाहे करा सकते हैं। इस बार अनवर और के.के. धोखा खा गए। वे समझे प्रोफेसर सूरी फिर हार गए। पर प्रोफेसर सूरी कुछ वक्त चाहते थे और इन दोनों को कुछ महीने गलतफहमी में रखना चाहते थे। अब ‘बिहारी लॉबी’ जोर डाल रही थी कि जल्दी-से-जल्दी यूनियन का गठन हो और अनवर,के.के. पूरे मामले को टालना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि ‘बिहारी लॉबी’ और अनवर तथा के. के. में ठन गई और यूनियन बनने का काम पिछड़ गया। इस दौरान प्रोफेसर सूरी ने कोशिश करके दिल्ली के एक कॉलेज में के.के. गुप्ता की लेक्चररशिप की बात कर ली थी। के.के को अब यह प्रस्ताव मिला तो उन्होंने ‘इतिहास शोध-केंद्र’ की नीरस और ठहरी हुई नौकरी की तुलना में प्राध्यापकी को अधिक समझा। प्रोफेसर सूरी ने उनसे कह भी दिया की था कि नियुक्ति होने से पहले किसी को कानों-कान खबर न होने पाए। इसलिए के. के. की नियुक्ति होेने के दो दिन बाद अनवर को पता चल सका कि वे अकेले रह गए हैं। उन्होंने खतरे की बू अच्छी तरह सूंघ ली और अब उनके तरकश में एक ही तीर बचा था-कर्मयारी यूनियन।

प्रोफसर सूरी शर्मा और के.के. के चले जाने के बाद निरंकुश होते चले गऐ। मीमो इशू करने में उन्होंने रिकार्ड तोड़ दिए। चपरासियों तक सी.आर. खराब कर दी। पूरे आफिस के प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने के नाम पर एक मासूम क्लर्क को सस्पेंड कर दिया। लिफ्ट में एक आशिक मिजाज रिसर्च आफीसर ने किसी लड़की के गाल में काट खाया था। हालांकि यह मजाक यहां बहुत आम था और प्रायः इस पर कोई कार्यवाही नहीं होती थी, प इस बार प्रोफेसर सूरी ने इसे पूलिस केस बना दिया और आशिक पर मुकदमा चलवा दिया। प्रत्येक रिसर्च आफीसर के लिए जरूरी हो गया था कि वह हर सप्ताह पूरे किए काम का विवरण प्रोफेसर सूरी को स्वयं जाकर दे। इस कार्यवाही से पूरा आफिस उनसे नाराज था। लेकिन कर कोई कुछ नहीं सकता था। अनवर इस दौरान कई बार के.के. से मिले थे, पर के.के. ने साफ कह दिया था कि जो छोड़ दिया सो छोड़ दिया। अब क्या करना है। इसका मतलब अकेले रह गए थे। आदतें वहीं थी और प्रोफेसर सूरी नए-नए पैतरे बदल रहे थे। उन्होंने अनवर को एक महीने में पांच मीमो इशू किए और अब हद यह थी कि दोनों में बोलचाल तक बंद थी। अनवर खुले-आम सूरी को गालियां देते थे और कर्मचारियों को उनको पिटाई कर देने को उकसाते रहते थे। कर्मचारियों की मीटिंग के बाद ‘सूरी मुर्दाबाद’ के नारे तो आम तौर से लगते थे। इसके जवाब में प्रोफेसर सूरी ने अनवर के तीन-तीन महीने के बिल रोक रखे थे। कभी-कभी सबको तनख्वाह मिल जाती और उनकी बिना कारण एक-एक सप्ताह तक रुक जाती। वे इसके जवाब में प्रोफेसर सूरी को गालियां देने की रफ्तार तेज कर देते तथा यूनियन के गठन में कर्मठता से जुट जाते। ‘देख लूंगा मादचोद को’, समझ लूंगा साले को’, ‘हराम की औलाद को’ आदि-आदि वाक्य उनकी जबान पर चौबीस घंटे रहते थे। केन्द्र में होने वाले भ्रष्टाचारों की सूची उन्हें जबानी याद हो गई थी। प्रोफेसर सूरी ने किस-किस मद में कितना पैसा खाया है, आफिस में बैठकर शराब पीता है, पंजाबियों को भर रहा है, बनता प्रगतिशील है पर है पक्का प्रतिक्रियावादी आदि-आदि बातें वे घूम-घूमकर करते थे। हिम्मत नहीं है साले में, मुझसे आंख मिलाकर बात नहीं कर सकता। साला कम्यूनल है, तब ही तो मुझे परेशान कर रहा है।

अनवर अहमद के ऊपर अगला ‘वार’ प्रोफेसर सूरी ने इतना सशक्त किया कि वह ऐसे सांप की तरह तड़पने लगे, जिसकी गुर्री की हड्डी तोड़ दी गई हो। अनवर अहमद रिसर्च आफीसर थे और वे मॉडर्न इंडिया की युनिटमें थे। यह यूनिट में रिसर्च आफीसर से ऊंची पोस्ट चीफ रिसर्च को-आरडीनेटर की होती है।

अनवर अहमद की यूनिट में कोई चीफ रिसर्च को-आरडीनेटर नहीं था। उन्हें उम्मीद थी कि वरिष्ठ रिसर्च आफीसर होने के नाते यह पद उन्हें ही मिलेगा। पर प्रोफेसर सूरी ने कार्यकारिणी की मीटिंग में यह पद ‘रिसर्व कोटे’ में डलवा दिया। अर्थात अब कोई हरिजन या आदिवासी ही माडर्न इंडिया यूनिट का चीफ रिसर्च को-आरडीनेटर हो सकता था। अनवर अहमद के लिए यह क्वालीफिकेशन पैदा कर पाना असंभव था। और वे समझ गए थे कि उनके भविष्य को प्रोफेसर सूरी ने खत्म और तबाह कर दिया है।

यूनियन का गठन हो चुका था और उसने शिक्षामंत्री के पास ‘केंद्र’ से संबंधित एक मेमोरेंडम भेजा था, जिसमें केंद्र के कार्यकलाप पर किसी अवकाश-प्राप्त जज से जांच कराने की मांगी की गई थी। इस पत्र दो-चार अखबारों में भी छापा था, क्योंकि काफी भाग-दौड़ के बाद अनवर अहमद ने कुछ अखबारों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने में असफतला प्राप्त कर ली थी। उनका इरादा था कि संसद के अगले अधिवेशन के शुरू होते ही वे इस मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे और संसद में यह सवाल उठाएंगे।

प्रोफेसर सूरी अपने ‘वन प्वाइंट प्रोग्राम’ पर तेजी से अमल कर रहे थे। अनवर को भविष्य ‘ब्लाक’ करने के बाद वे किसी ऐसे प्रमाण की तलाश में थे जिससे अनवर को सस्पेंड किया जा सके। अनवर यह सब कुछ समझ रहे थे। अकेले होने का एहसास भी था। इस दौरान प्रोफेसर सूरी ने कीर्ति कुमार को बुलाकर उसे ‘प्रोमोट’ करा देने का वचन भी दे दिया था और अब ‘बिहारी लॉबी’ भी अनवर के अधिक निकट न थी। कीर्ति कुमार यूनियन की बैठकों में ऐसी बातें करने लगा था जो प्रोफेसर सूरी के हक में जाती थीं। इस तरह घेरे बंदी पूरी हो गई थी और अनवर को पूरी तरह पता चल चुका था कि जल्दी ही तलवार उन पर गिरेगी।

दिन का ग्यारह बजा था। ‘इतिहास शोध-केंद्र’ में चहल पहल थी। अनवर अहमद स्कूटर से बिलकुल ठीक गेट के सामने उतरे। उन्होनें खादी का कुर्त्ता-पाजामा पहन रखा था। मुंह में नब्बे नंबर के दो बनारसी जोड़े और पेट में आधी बोतल हृिस्की थी। उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। उन्हे आफिस आता देखकर दो-चार जिन्होंने देखा, चौंक गए। इसलिए नहीं कि वे हृिस्की पिए हुए थे, बल्कि इसलिए कि वे एक सप्ताह की छुट्टी पर थे। उनकी यह छुट्टी बड़ी चिकपिक करने के बाद प्रोफेसर सूरी ने मंजूर की थी।

‘‘आज मैं इस भोसड़ी वाले की मां चोदने आया हूं,’’ उन्होंने उंगली से तीसरे मंजिल की तरफ इशारा किया, ‘‘जिसे तमाशा देखना हो आ जाए,’’ उन्होंने यह बातें चीखकर कही थीं। आसपास खड़े लोग पास आ गए,’’अनवर भाई, आप पिए हुए हैं, वापस लौट....’’

‘‘अनवर भाई की मां का घंटा! आज मैं साले से दो-दो हाथ करके ही वापस जाऊंगा।’’

‘‘वे सीढ़ियां चढ़ने लगे। धीरे-धीरे उनके पीछे भीड़ हो गई। तीसरी मंजिल पर पहुंचकर वे और भी जोर से गालियां देने लगे और अपने छः महीने के बिल रुके। पड़े रहने की शिकायत करने लगे। उनके चीखने से सब लोग अपने-अपने कमरों से निकल आए। वे बुरी-बुरी गालियां बकते प्रोफेसर सूरी के कमरे की तरफ बढ़ रहे थे, ‘‘मेरा क्या बिगाड़ लेगा साला! मैं तो आज छुट्टी पर हूं और नर्सिंग होम में भरती हूं। क्या कर लेगा मेरा।’’ वे प्रोफेसर सूरी के कमरे के दरवाजे में धक्का मारकर अंदर घुस गए।

‘‘प्रोफेसर सूरी की लंबी-चौड़ी चमचमाती मेज पर तीन पाइप, ऐश-ट्रे, पेपर-वेट और उनका ख्याल रखा था। टेबल-लैंप की रोशनी मेज पर पड़ रही थी। वे कुछ लिख रहे हैं। भड़ से दरवाजा खुलने की आवाज से चौकें। सामने अनवर अहमद खड़े थे। उन्हें देखकर प्रोफेसर सूरी ने बुरा-सा मुंह बनाया और उपेक्षा करने के अंदाज में फिर लिखने लगे।

‘‘आज मैं तुम्हारी मां को चोदने आया हूं।’’अनवर दरवाजे के पास ही से चीखकर बोले। प्रोफेसर सूरी को कानों पर यकीन नहीं आया। फिर चौंककर देखा, ‘‘आपको मालूम है, मैं एप्वाइंटमेंट से मिलता हूं,’’ उन्होंने शुष्क लहजे में कहा।

‘‘एप्वाइंटमेंट गया गधे की गांड में....मैं तो तुम्हे भोसड़ी के...’’वे आगे बढ़े और प्रोफेसर सूरी समझ गए कि मामला गंभीर है। अब उन्हें हृिस्की की गंध भी मालूम पड़ रही थी।

‘‘ओहो जी, बात क्या है आप....’’

‘‘बात ये है कि आज मैं तुम्हारी मां चोदने आया हूं।’’ वे चीखे।

‘‘ओहो जी, बैठो तो...’’

‘‘मादरचोद, मैं बैठूंगा नहीं तुम्हें जरूर बैठा दूंगा। अभी साले एकाउंटटेंट को बुलाकर मेरे बिल पास कराओ।’’

‘‘ओहो जी इस बात के लिए....’’वे रुक गए, क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि अनवर पेपरवेटों की तरफ झटप रहे हैं। उन्होंने जल्दी से पेपरवेट उठाकर कुर्सी पर रख लिए। अनवर ने कोल्हापुरी चप्पल उतारकर दो मीटर के फासले से खींचकर प्रोफेसर सूरी के मुंह पर मारी।

‘‘ये लो मादरचोद, क्लियर हो गए सब बिल!’’ अनवर दूसरी चप्पल उठाने को झूके ही थे कि मिस दास ने कमरे का दरवाजा खोला।

‘‘बंद करो, बाहर जाओ जी, मीटिंग हो रही है मीटिंग’’ प्रोफेसर सूरी ने घबराकर कहा। मिस दास ने दरवाजा तुरंत बंद कर दिया। बाहर दरवाजे पर कान लगाए पूरे ‘इतिहास शोध-केंद्र’ का स्टाफ खड़ा था। अनवर ने दरवाजा हाथ से खोले रखा और प्रोफेसर सूरी को चुन-चुनकर मां-बहन की गालियां देने लगे। फिर उन्होंने दरवाजा धड़ से छोड़ा और सीढियों की तरफ बढ़ गए। एक मिनट बाद प्रोफेसर सूरी भी कमरे के बाहर आ गए।

‘‘सर, इनका मेडिकल होना चाहिए,’’ भीड़ में किसी ने सलाह दी।

‘‘हां जी मेडिकल। ओहो जी, देखो तो कहां गया,’’उन्होंने घबराकर अपने चपरासी से कहा।

‘‘देखो क्या, उसे स्कूटर पर बैठकर लोकनायक अस्पताल ले जाओ और मेडिकल कराओ। नहीं तो क्या केस बनेगा’ कीर्ति ने हंसकर कहा।

‘‘सर, स्कूटर के पैसे।’’चपरासी ने प्रोफेसर सूरी से कहा।

चपरासी बीस रुपये का नोट जेब में खोंसता हुआ सीढ़ियों की तरफ भागा। उस समय तक अनवर गेट पर पहुंच चुके थे। चपरासी उनके पास आ गया। उसने एक स्कूटर रुकवाया और स्कूटर वाले को अनवर के घर का पता बताने लगा। अनवर स्कूटर पर बैठ गया और चपरासी ऊपर आ गया।

‘‘क्या हुआ’ प्रोफेसर सूरी सीढियों के पास ही कई लोगों से घिरे खड़े थे।

‘‘निकल गए साहब!’’ चपरासी ने सिर झुकाकर सोचते रहे।

इसके तुरंत बाद उन्होंने गवाह खोजने शुरू किए। सबसे पहले उन्होंने मिस दास से बात की। मिस दास ने कहा कि उससे तो स्वयं उन्होंने कहा था कि मीटिंग हो रही है। उसका बयान लिया गया तो वह मीटिंग की ही बात कहेगी। चपरासी, जिससे मेडिकल चेकअप कराने की कोशिश थी उसे बुलाया तो वह कहने लगा-‘साब, मैं तो आफिस के काम-से-काम रखता हूं जी! आपके पास जी दिन में सैकड़ों लोग आते हैं। मैं जी, क्या जानूं।’ फिर उन्होंने कीर्ति कुमार को बुलाया। कीर्ति ने कहा, वह गवाही अवश्य देगा पर यह कहेगा कि ऐसा तो इस आफिस में रोज होता रहता है। कोई नई बात नहीं है। कीर्ति के इस जवाब पर प्रोफेसर सूरी बिगड़े। लेकिन क्या हो सकता था।

दो-तीन दिन तक गवाहों की खोज होती रही। प्रोफेसर सूरी ने अपने सारे हथियार इस्तेमाल कर डाले पर कोई गवाह नहीं मिला। अनवर अब भी छुट्टी पर था, लेकिन ऑफिस चला आता था। हंसी-मजाक होता था। कैंटीन में चाय पीता था और प्रोफेसर सूरी को गालियां देकर चला जाता था।

प्रोफेसर सूरी अनवर को ‘सस्पेंड’ कर सकते थे। पर कारण बताना आवश्यक था। यदि उस घटना को कारण बनाया जाता तो गवाह होने जरूरी थे। बिना गवाहों के केस ही नहीं बन रहा था। बाहर के आदमी गवाही क्यों देते, जब अंदर का एक भी आदमी गवाही के लिए तैयार नहीं है। अंत में उन्होंने अपने चपरासी से कहा कि गवाही दो, नहीं तो सी. आर. खराब कर दूंगा। चपरासी ने कहा कि वह तो सर आप पहले ही खराब कर चुके हैं।

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