बुधवार, 16 अप्रैल 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - भागते भूत की लंगोटी .....

बेगम......! ‘ताजमहल जरुर बनेगा’....... ये शाहजहाँ का वादा है।

पिछले चार-सौ सालो सुनते आ रही हूँ , ताजमहल जरुर बनेगा ,ताजमहल जरुर बनेगा ......

लेकिन ताजमहल बनेगा कब ....?

बेगम की यह कोफ्त, अकेले निरीह उखड़े हुए शहंन्शाह पर नहीं है।

सैकड़ों छोटे-छोटे शहंन्शाह हैं, जिनकी बेगमों को “छोटे-मझोले किस्म के ताजमहल” बनाने का वादा आये दिन किया जाता है। या यूँ कहे कि अनेको बेगमें इस दौर में , झांसे में रखी जा रही हैं।

कहीं लोन का चक्कर है तो कही मुनिस्पेलटी वाले नक्सा पास नहीं कर रहे हैं।

‘धांसू शहंशाह’ लोग अगर इनका काट ले भी आयें तो, प्लाट में जाकर देखने पर, अलग नजारा, देखने को मिलता है।

भैंसे बंधी हैं ,भइय्या जी काबिज हैं। दूध दुहे जा रहे हैं।

प्लाट पर पहुचते ही ,वे कहने लगते हैं, गरमी के दिनों में भैंसे कम दूध देती हैं, अभी नये ग्राहक को दूध-सप्लाई नहीं की जा सकती।

आप कहेंगे ,भाई जी ये प्लाट हमारा है ...हम इसमें काम करवाने के लिए नक्शा पास करवा लाये हैं।

वे दो-चार भैंस लगाने वालों को, बुलवा लेते हैं ,हमें डांटने लगते हैं ,प्लाट लेने में जल्दबाजी काहे करते हैं आप लोग ?प्लाट लेके खुले भैंस –सांड को चरने के लिए छोड़ देते हैं। कोई आके ‘खूटा’ गडिया दे, तो पलट के देखने नहीं आते। अब गरिया रहे हैं। प्लाट लिए तो फिर देखना मांगता कि नइ ?पिछले बीस साल से झांकने काहे नहीं आये ?अब कहोगे प्लाट छोडो....... ऐसा होता है क्या ....?

बीस साल पहले आते बाबू ,.... तो हम अपना कब्जा बड़े आराम से कहीं ,नजूल जमीन में नहीं न कर लेते,,,,,।

अब तक हमें,.... वो क्या कहते हैं, सरकार से पट्टा- वट्टा भी मिल गया होता।

देखो साफ कहे देते हैं .......मतलब की बात सुन लो .......अब अगर अपनी जमीन छुडवाना हो, तो तब और अब की कीमत का डिफरेंस दे दो।किस्सा खतम कर देंगे ,,,,,, खूटा-खम्भा सब उखाड़ लेंगे ....।

भैइय्या के कहने के अंदाज से हमें लग गया कि ,खूंटा जोर का गडा है, उखाड़ने में नानी जरुर याद आ जायेगी।

हम उनके डिफरेंस मांगने के गणित पर, तीस से चालीस लाख का अनुमान लगा के हकबका गए ?

पुचकारने- धमकाने के तरीकों पर आगे अध्ययन-मनन , करने की सोच के वहां से लौट जाना, बेहतर लगा सो लौट आये।

“कोर्ट –कचहरी की सोचना भी मत”,..... ये हमारे सभी मिलाने –जुलने वालों की राय थी।

जमीन का मामला पचासों साल खींच लेता है, इसमें हमारी भी राय ‘दो’ नहीं थी,.......क्या करते ?

मान-मनव्वल पर, वे ‘दस’ में राजी हुए।

भैय्ये के लिए ‘भागते-भूत की लंगोटी’ हमारे लिए ‘दस लाख’, यानी पूरे कपडे के शो रूम में रखे, कपड़ों की थान के बराबर की पड़ी।

हमें सहगल साहब का गाना “एक बंगला बने न्यारा......” इस वाकिये को हरदम याद दिलाता रहेगा।

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

16.4.14

4 blogger-facebook:

  1. सच्चाई की परतें खोलता सटीक व्यंग्य...बधाई...प्रमोद यादव

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  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव7:36 am

    बहुत अच्छे सुशील भाई आपका यह व्यंग वास्तव में
    समाज में व्याप्त दादागिरी अव्यवस्था और कानूनी पचड़ों
    की पेंचीदगी फालतू नेतागिरी और एकशरीफ आदमी की
    बेचारगी जिसे अपने ही प्लाट को वापस पाने के लिये
    दस लाख की मोटी रकम चुकानी पड़ी इन सभी का सटीक चित्रण है अच्छे व्यंग के लिए हमारी बधाई

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सर्वश्री अखिलेश जी;प्रमोद एवं सुश्री सुनीता जी;आप सब ने व्यंग पर सार्थक टिप्पणी की ;मै इन्हें अपनी उपलब्धी के खजाने के हवाले कटा हूँ ; आप सब का आभार;धन्यवाद

      हटाएं
  3. बहुत रोचक व्यंग्य था . साधुवाद .

    उत्तर देंहटाएं

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