सोमवार, 28 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - सूफी का जूता

सूफी का जूता

(1)

पूरे हिन्दुस्तान में सूफियों की तलाश शुरू हो गई हैं। पुराने, अनुभवी और थोड़ा-बहुत अपने आत्म-सम्मान का ध्यान रखने वाले सूफी इधर-उधर छिप गए ताकि विज्ञापन कंपनियों के दलालों से बच सकें, जो उनकी तलाश में घूम रहे हैं। किस्सा ये है कि सूफियों को कई बड़ी भारतीय कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती हैं। ‘बिजनस विजार्ड्स’ ने बताया है कि अमेरिका में सफल हो जाने के बाद हिन्दुस्तान में भी सूफी फार्मूला पूरी तरह कामयाब होगा। अमेरिका में सूफी फॉर्मूला इसलिए सफल हो गया था कि वहां लोग सूफियों के दर्शन, प्रेम, त्याग और मैत्री के बारे में कुछ न जानते थे और ये उनके लिए आकर्षित करने वाले शब्द बन गए थे। जबकि हिन्दुस्तान में दो पीढ़ियों पहले लोग इन शब्दों से परिचित थे और अब ये शब्द नई जनरेशन के लिए नोस्टैल्जिया बन चुके हैं। और उनकी जगह डिस्को संगीत में सुरक्षित हो चुकी है।

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बहुत खोजने के बाद एक सूफी मिला जो विज्ञापन एजेंसी वालों से बचने के लिए डाकू बन गया था। उसे यह भ्रम था कि डाकू बनकर बच जाएगा। पर चूंकि सूफी था इसलिए डाकू बनने के बाद भी सूफी ही रहा और पकड़ा गया। इस सूफी को दिल्ली की प्रसिद्ध तिहाड़ जेल से पकड़ा गया था। पहले उसकी सजा माफ कराई गई और उससे कहा गया कि अरबों डॉलर का मुनाफा कमानेवाली एक कारॅपोरेशन उसे जनहित के काम में लगाना चाहती है।

‘‘जनहित का क्या काम होगा’ सूफी ने पूछा।

‘‘कॉरपोरेशन ने जिस इलाके में अपनी विशालकाय फैक्टरी लगाई है। वहां पीने का पानी खत्म हो गया है, हवा दूषित हो गई है, पेड़ जल गए हैं। बच्चे अपंग पैदा होते हैं। वहां जाकर संतोष, त्याग, बलिदान का सन्देश देना है।’’

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सूफियों की इतनी चर्चा के बाद एक सज्जन ने सोचा कि पुराने-धुराने सूफी की तलाश की जाए और उससे सूफी बनने के हुनर सीखकर खुद सूफी बना जाए।

बहुत खोजने पर सज्जन की सूफी तो नहीं, सूफी के एक पैर का जूता मिल गया। सज्जन को बहुत खोजने पर भी दूसरे पैर का जूता न मिला तो निराश होकर एक जूता घर ले आए।

पर रात में जूते ने बोलना शुरू कर दिया।

उसने कहा, ‘‘आजकल सूफियों का सबसे अच्छा प्रोफाइल डिजाइन अमेरिकन ड्रेस डिजाइनर पॉप जक्सीम करता है, तुम उसके पास जाओ।’’

ये सुनकर सज्जन बेहोश हो गए और सूफी का जूता हंसने लगा। और फिर जूता सज्जन की खोपड़ी और चेहरे पर लगातार बरसने लगा। सज्जन का चेहरा लाल हो गया।

कुछ देर बाद सज्जन की जब आंख खुली तो वो पूरे सूफी बन चुके थे। और जूता वहां नहीं था।

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देश के सबसे महंगे ड्रेस डिजाइनर ने सूफी कॉस्ट्यूम डिजाइन किया। चार कॉरपोरेशनों ने गुडविल फंडिंग की। एक एयर लाइन ने कहा कि अब उनकी एयर लाइन की एयर होस्टेस अगले महीने से सूफी ड्रेस में होंगी।

बहरहाल, एक सात-सितारा होटल में सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी को सूफी ड्रेस का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया।

जगमगाते दरकार हॉल में कई देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मौजूद थे। बिजना और फैशन की दुनिया का तो कोई सितारा ऐसा न था जो वहां न हो।

सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी के साथ कई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सूफी ड्रेस पहनकर मंच पर आए।

फिर सबने देखा कि सूफी समेत सब वी.वी.आई.पी. नंगे नजर आने लगे।

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जब मामला सूफी कविता और सूफी संगीत से होता सूफी कॉस्ट्यूम, सूफी टूरिज्म सूफी फर्नीचर, सूफी डेकोर, सूफी डेकोर, सूफी बाथरूम, सूफी फूड, सूफी ज्वैलरी, सूफी शू, सूफी अंडर वियर और सूफी चाट मसाले तक आ गया तो सूफी वहीउद्दीन वल्द जहीरुद्दीन वल्द सुहीदुद्दीन वल्द करीमुद्दीन ने अपने बेटे टॉमउद्दीन से कहा ‘‘बेटा, अब तुम सूफी कफन की दुकान खोल लो।’’

‘‘क्यों डैडी’ उनके बेटे टॉमउद्दीन ने पूछा।

‘‘बेटा, अब वही बचा है...वो काम हमने न किया तो यही कफन-चोर कर लेंगे।’’

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कोई दो सौ साल के बाद सूफी कदीर ने फिर से शरीर धारण किया तो उन्हें पता चला कि उनकी कब्र पर बहुत शानदार मकबरा बन गया है। पास ही विशाल दरगाह है। मकबरे के परिसर में ही एक पांच-सितारा होटल है। हजारों लोग कब्र पर फातिहा पढ़ने और चादर चढ़ाने आते हैं। लाखों रुपए रोज का चढ़ावा आता है। मुम्बई का हर डॉन और फिल्म स्टार उनकी पूजा करता है। ये सब जानकर सूफी कदीर बहुत खुश हुए और अपने मकबरे की तरफ बढ़े तो उन्हें उस तरफ से कुछ लोग भागकर आते दिखाई पड़े। इन लोगों ने सूफी कदीर से कहा कि मकबरे की तरफ मत जाना।

‘‘क्यों’ सूफी कदीर ने पूछा।

‘‘उधर गालियां चल रही हैं।’’

रोकने के बावजूद सूफी दरगाह की तरफ लपके। उन्हें डर था कि कहीं पुलिस की गोली से कोई मासूम न मर जाए।

वे दरगाह के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा बन्दूकधारियों का एक दल मकबरे के अन्दर है और दूसरा बाहर। दोनों के बीच गोलीबारी हो रही है।

‘‘ये कौन लोग हैं जो एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं।’’ सूफी ने किसी से पूछा।

‘‘ये सूफी कदीर की औलादें...उनके वंशज हैं।’’

‘‘ये क्यों लड़ रहे हैं।

‘‘दरगाह पर कब्जा करने के लिए।’’

‘‘कब्जा कैसा कब्जा।’’

‘‘लगता है, नए आए हो...चले...जाओ...नहीं तो बेकार में मार दिए जाओगे।’’

लेकिन सूफी कदीर तेजी से मकबरे की तरफ बढ़े।

‘‘ओय बुड्ढ़े, हट वहां से...कहां जा रहा है’

‘‘मैं सूफी कदीर हूं बेटा।’’

‘‘तो तू किसकी तरफ है हमारी तरफ या उनकी तरफ’

‘‘मैं अपनी तरफ हूं बेटा।’’

‘‘नौजवान ने उनके ऊपर गोलियां तड़तड़ा दीं और सूफी कदीर फिर दो सौ साल के लिए मर गए।

(7)

सूफी रहमानी के पास सब कुछ था। नाम था। इज्जत थी। शोहरत थी। लेकिन बदनसीबी यह कि सन्तान न थी। कोई औलाद न बचती थी। जब वह बहुत परेशान हो गया तो एक दिन उसके दोस्तों ने सलाह दी कि देश में एक ही आदमी है, जिसके आशीर्वाद से तुम्हारी औलाद बच सकती है।

‘‘ये आदमी कौन है।’’ सूफी ने पूछा।

‘‘ये हमारे देश का प्रधानमंत्री है।’’

‘‘क्या उसकी दुआ में इतनी तासीर है’

‘‘हां...वो चाहे तो ये हो सकता है...लेकिन उससे मिलना आसान नहीं है...’’

‘‘क्या करना होगा’

‘‘तुमको उसके दर तक सिर पर पैर रखकर जाना पड़ेगा।’’

मरता क्या न करता, सूफी प्रधानमंत्री के पास गया और उसके आशीर्वाद से एक बेटे का बाप बना। सूफी ने अपने बेटे का नाम प्रधानमंत्री के नाम पर रखा ताकि पूरी दुनिया ये समझ सके कि उसके ऊपर किसका क्या उपकार है।

(8)

सूफी हमीद की दुकान नहीं चल रही थी। सब कुछ करने के बावजूद न तो लोग उनके पास आते थे और न वे कहीं बुलाए जाते थे। खाने-पीने के लाले पड़ गए थे।

एक दिन सूफी हमीद की बीवी ने कहा, ‘‘सुनो, मेरी मानो तो तुम अंग्रेजी बोलना सीख लो।’’

सूफी हमीद को बीवी की अक्लमन्दी पर हैरत हुई।

वे बोले, ‘‘तू ये कैसे जानती है कि मेरी बदनसीबी का यही राज है कि मैं अंग्रेजी नहीं बोल सकता’

बीवी बोली, ‘‘लो, मैं न जानूंगी तो कौन जानेगा...सोते हुए तुम हर रात यही बड़बड़ाते हो कि अंग्रेजी बोल सकता होता तो ये हालत न होती।’’

(9)

सूफी अजमली के पुत्र ने अपने पिता से कहा कि डैडी आप बेकार में शायरी,वायरी किया करते हैं। उसे आजकल कौन समझता है। आजकल के सूफी तो सूफी मुखड़ों को फिल्मी गानों में लाकर लाखों कमा रहे हैं। आप इधर ट्राई क्यों नहीं करते

सूफी बोले, ‘‘बेटा वहां मैं ट्राई कर चुका हूं। गीतकारों और म्यूजिक डायरेक्टरों ने बड़ी सांठ-गाठं कर रखी है। वहां किसी की दाल गलना मुश्किल है।’’

बेटा बोला, ‘‘वो सब छोड़िए आप डांस के एरिया में क्यों नहीं निकल जाते मैं बैंड पकड़ लुंगा। सिस्टर डांस करेगी। मां एंकर हो जाएंगी। छोटू पब्लिसिटी में लग जाएगा। दादा जी को बुकिंग विंडो पर बैठा देंगे।’’

(10)

चार सूफियों को सोने के लिए एक कम्बल दे दिया गया। पहले तो चारों सूफी कम्बल देने वाले पर बहुत चिल्लाए। उन्होंने कहा, ‘‘चार कम्बल नहीं थे चार सूफियों को बुलाया ही क्यों था। ये सूफियों का अपमान है।’’ खैर कम्बल देने वाला जान बचाकर चला गया। लाने से पहले कह गया कि मैं आयोजकों को भेजता हूं।

उसके जाने के बाद एक सूफी ने कहा, ‘‘मैं तो तुम जैसे तीन घटिया सूफियों के साथ एक कम्बल में सोने से मर जाना ज्यादा पसन्द करूंगा।’’

‘‘तो यूं मर ही जाओ।’’ तीनो सूफियों ने उसे मार डाला।

अब तीन सूफी बचे।

तीनों ने तय किया कि कम्बल के तीन हिस्से कर लिये जाएं और तीनों एक-एक हिस्सा ले लें।

कम्बल कैसे बनता जाए, इस बात को लेकर तीनों में बहस हो गई। एक सूफी और मर गया। अब दो बचे।

उनमें ये झगड़ा शुरू हुआ कि कम्बल के तीन हिस्से दो सूफियों में केसे बांटे जाएं। इस बात पर दोनों लड़ने लगे और एक और सूफी की जान चली गई।

अब अकेले सूफी ने सोचा कि उस पर ही तीन की हत्या का आरोप आएगा। यह सोचकर उसने आत्महत्या कर ली।

तब आयोजक आए, जो एक नेता थे। उनके साथ तीन नेता और थे।

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