शनिवार, 5 अप्रैल 2014

पुस्तक समीक्षा - चिन्तन परक लेखों का संग्रह-''परिया धरती के श्रृंगार''

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चिन्तन परक लेखों का संग्रह-''परिया धरती के श्रृंगार''

वीरेन्द्र'सरल'

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा है कि ''पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है क्योंकि यह अन्तःकरण को उज्जवल करती है।'' साहित्य के महत्त्व को रेखांकित करने के लिए यह एक वाक्य पर्याप्त है। रत्नों की चमक से हमारी आँखें चौंधिया सकती है। रत्न आभूषणों में जड़कर हमारे शारीरिक सौंदर्य में चार चाँद भी लगा सकता है । वह पास में रहकर हमारे चेहरे पर सम्पन्नता और वैभवता का दर्प भी ला सकता है। मगर वह कभी भी मशाल बनकर किसी भूले-भटके मुसाफिर को मंजिल का पता नहीं बता सकता। किसी निराश उदास आदमी के हृदय के भीतर उल्लास भरकर जीवनी शक्ति का संचार नहीं कर सकता। किसी मुर्दे में प्राण नहीं फूंक सकता। इतिहास गवाह है यह कार्य केवल सद्साहित्य के ही बस का है और साहित्य इसे सदियो से करता आ रहा है। स्वार्थ के विष से मूर्च्छित हुये मनुष्य की चेतना को विचारों की संजीवनी पिलाकर चैतन्य करने वाले ऐसे ही सद्साहित्य की श्रृंख्ला में सुधा वर्मा जी की कृति 'परिया धरती के श्रृंगार' को शामिल कर हमें उसका स्वागत करना चाहिए।

हिन्दी के लोकप्रिय दैनिक पत्र देशबंधु के छत्तीसगढ़ी अंक मड़ई के संपादन का गुरूत्तर दायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुये सुधा जी ने अपने संपादकीय लेखों को संग्रहित कर 'तरिया के आंसू' और 'परिया धरती के श्रृंगार' के रूप में एक ऐसा गुलदस्ता तैयार किया है जिसमें अपनी भाषा का सौंदर्य तो है ही साथ-ही -साथ विचारों का सुगंध भी समाहित हैं। जैसे कि कृति के नाम से ही स्पष्ट है जहाँ तरिया के आंसू में प्रकृति की पीड़ा झलक रही है वहीं परिया धरती के श्रृंगार में प्रकृति को बचाने की अपील की गई है। संग्रह के लेखों में लेखिका ने धर्म ,संस्कृति, प्रकृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक पर्व, राजनीति, इतिहास जैसे अन्यान्य महत्त्वपूर्ण विषयों के साथ ही समसामयिक घटनाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। संग्रह के लेखों में जहाँ एक ओर अच्छाई को आत्मसात करने की प्रेरणा है वहीं दूसरी ओर अन्याय का प्रतिकार करने का हौसला भी है। इन कृतियों को पढ़ते हुये लेखिका का समन्वयवादी दृष्टिकोण स्पष्ट परिलक्षित होता है। लेखिका का मत है कि अति आधुनिकता और अति प्राचीनता के मध्य संतुलन की स्थिति में ही 'सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय' के लक्ष्य को पाया जा सकता है। यदि हम प्रकृति के साथ ऐसे ही बेदर्दी से छेड़छाड़ करते रहे तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधकार मय हो जायेगा। इसलिए समय रहते सचेत हो जाना ही अपनी पीढ़ियों को बचाने का एक मात्र विकल्प है।

प्रदूषित पर्यावरण, सूखते जलश्रोत, टूटते पहाड़, कांक्रिट और उद्योगों में तब्दील होते कृषि भूमि, धुआं से छलनी होते आसमान की छाती और प्राकृतिक विपदाओं से कराहती मनुष्यता की चिन्ता हर लेख में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह एक चिन्तनपरक लेखों का संग्रह है जिसमें लेखिका ने वर्तमान के साथ भविष्य की उज्जवलता के लिए अपनी लेखनी चलाने का स्तुत्य कार्य किया है ।

कुछ विद्वान आलोचक संग्रह के लेखों में प्रयुक्त हिन्दी मिश्रित छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर संग्रह की आलोचना कर सकते है पर मेरा मानना है कि भाषा कल-कल, छल-छल बहती हुई नदी के समान होती है। जो अपने उदगम से लेकर समुद्र में मिलने तक के लम्बे सफर में राह में मिलते हुये अन्याय जलधाराओं को अपने आप में समाहित कर और अधिक विस्तुत और विराट होती हैं। वैसे भी लेखन का प्रमुख उद्देश्य जनजागरण ही होता है। जब लेखन की भाषा सरल, सुबोध और बोधगम्य हो तभी इस उद्देश्य को प्राप्त करने की आशा की जा सकती है। शायद यही सोचकर ही सुधा जी ने ऐसी मिश्रित भाषा का प्रयोग अपने संग्रह में किया हो । अस्तु, सुधा जी की लेखनी ऐसे ही अनवरत चलती रहे इसी शुभकामना के साथ इस समाजोपयेगी कृति के लिये लेखिका को बधाई।

वीरेन्द्र 'सरल'

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

पुस्तक का नाम- परिया धरती के सिंगार

प्रकाशक-वैभव प्रकाशन रायपुर

मूल्य-250रू

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