रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की लघुकथा श्रृंखला - पचहत्तर से ऊपर के हो गए क्रांतिवीर

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

‘‘प्रेमी तटस्थ नहीं रह सकते’’

(1)

क्रांतिवीर जीवन भर इस भ्रम में रहे कि उनका केवल बायां हाथ ही काम करता है। इसलिए जीवन भर उन्होंने दाहिने हाथ से काम न लिया, जबकि दाहिने हाथ से काम न लिया, जबकि दाहिना हाथ बायें से जयादा काम कर सकता था।

अब पचहत्तर साल के हो जाने के बाद दाहिना हाथ बायें से बदतर हो चुका है। यही कारण है कि क्रांतिवीर सब कुछ कर सकते हैं लेकिन शहनाई नहीं बजा पाते।

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(2)

क्रांतिवीर एक किसान के पास गये और बोले, ‘‘हमारे साथ चलो, संगठन बनाओ, संघर्ष करो। हम क्रांति करेंगे। सबको न्याय मिलेगा, सबका जीवर सुधरेगा।’’

किसान ने कहा, ‘‘मेरे छप्पर की बल्ली टूट गयी है। मेरे साथ चल कर बल्ली कटवा लाओ तो छप्पर छा जाये।’’ क्रांतिवीर ने कहा, ‘‘ क्या मुर्खता वाली बातें कर रहे हो। कहां क्रांति और कहां छप्पर’’ क्रांतिवीर यह कहकर चल दिये और किसान बल्ली की जगह खुद खड़ा हो गया ताकि छप्पर गिर न जाये।

सालों बाद क्रांतिवीर उधर से गुजरे तो देखा बल्ली की जगह लगातार खड़ा रहने के कारण किसान खुद बल्ली बन गया है। क्रांतिवीर उसे क्रांतिकारी भाषण देने लगे।

किसान बोला, ‘‘कामरेड़ तुम जो कुछ कह रहे हो बिलकुल ठीक कह रहे हो लेकिन अब मैं चाहूं भी तो तुम्हारे साथ नहीं जा सकता।’’

क्रांतिवीर का मन किया किसान का हाथ पकड़कर घसीट लें पर यह सोच कर ऐसा न किया कि उससे छप्पर गिर जाता और दोनों उसके नीचे ही दब जाते।

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(3)

क्रांतिवीर ने एक तख्ती बनवाई जिस पर लिखवाया ‘क्रांतिवीर’ और उन्होंने यह तख्ती गले में लटका ली और बाहर निकल गये। पर उनके पास कोई न आया।

इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ ने एक लोहे का टोप बनाया और उस पर भी लिखवाया ‘‘क्रांतिकारी’ तब भी कोई क्रांतिवीर के पास न आया।

इसके बाद क्रांतिवीर ने एक जिरह बख्तर बनवाया जिस पर पूरी ‘द कैपिटल’लिखी हुई थी। जिरह बख्तर पहन कर क्रांतिवीर खड़े हो गये। लेकिन उन्होंने जब चलना चाहा तो चल न सके। बैठना चाहा तो बैठ न सके। बोलना चाहा तो बोल न सके, हंसना चाहा तो हंस न सके। वे केवल खड़े रहे। वर्षो खड़े-खड़े जिरह बख्तर के अंदर उनका शरीर गल गया लेकिन जिरह बख्तर खड़ा रहा।

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(4)

क्रांतिवीर को इंग्लिश आती थी, जर्मन आती थी, रुसी आती थी, इतावली आती थी, स्पेनिश आती थी लेकिन हिन्दी आती थी। किसी ने क्रांतिवीर

से पूछा, ‘‘तुम हिन्दी नहीं जानते तो हिन्दुस्तान में क्रांति कैसे करोगे ’’

क्रांतिवीर ने जवाब दिया, मैं पहले इंगलैंड में क्रांति करूंगा, फिर जर्मनी में क्रांति करुंगा, फिर रुस में, फिर इटली में और फिर स्पेन में...और जब इतने सारे देशों में क्रांति हो चुकी होगी तो भारत में बिना हिन्दी के क्रांति हो जायेगी।’’

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(5)

क्रांतिवीर यह रहस्य जीवन भर न समझ सके कि वे गरीबो, शोषितों दलितों, अल्पसंख्यकतों के सच्चे समर्थक हैं तब भी ये सब उनके साथ क्यों नहीं आते।

इस रहस्य को समझने के लिए क्रांतिवीर अपने पार्टी के सबसे बड़े नेता के पास गये और अपना प्रश्न पूछा। उनका सबसे बड़ा नेता सौ-सवा साल का एक बुजुर्ग था। उसकी भवें और पलकें तक सफेद हो चुकी थीं। वह चल-फिर उठ-बैठ नहीं सकता था। उसने क्रांतिवीर का प्रश्न सुन कर कहा, ‘‘इसका मतलब है हमारा दर्शन गलत है। कामरेड’

‘‘नहीं, नहीं कामरेड,’’ क्रांतिवीर घबरा कर बोले।

‘‘या हमारी पार्टी गलत है कामरेड।’’

‘‘नहीं, नहीं कामरेड,’’ क्रांतिवीर फिर गिड़गिड़ाये

‘‘जाओ काम करो, बकवास मत किया करो’’

क्रांतिवीर काम करने लगे। लम्बे समय तक जब उन्हें अपने सवाल का जवाब न मिल पाया तो होते हुआते एक दिन वे एक ज्योतिषी के पास पहुंचे और अपना सवाल पूछा। ज्योतिषी ने कहा, ‘‘सवा पांच रुपये निकालो तो बताऊं।’’

क्रांतिवीर ने सवा पांच रुपये ज्योतिषी के हाथ पर रख दिये।

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(6)

क्रांतिवीर ने एक रात स्वप्न में कार्लमार्क्स को देखा पर यह आश्चर्य की बात थी कि कार्ल मार्क्स ने शेव कर रखा था।

क्रांतिवीर ने कहा, ‘‘प्रभु, ये आपने क्या कर डाला’

कार्ल मार्क्स बोले, ‘‘ये मैंने नहीं, तुम लोगों ने किया है।’’

पचहत्तर से ऊपर के हो गये क्रांतिवीर

(7)

क्रांतिवीर बहुत दिनों से अंडर ग्राउंड नहीं हुए थे। उन्हें यह कुछ अजीब लगता था। एक रात जब वे पत्नी के साथ बिस्तर में लेटे थे तो बोले, ‘‘सुनो कामरेड, हम बहुत दिनों से भूमिगत नहीं हुए हैं।’’

पत्नी बोली, ‘‘चुपचाप लेटे रहिए...मुझे नींद आ रही है।’’

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