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पखवाड़े की कविताएँ

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श्याम गुप्त ग़ज़ल ज्ञान ग़ज़ल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तों| ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तों |   हो जिस्म से ग़ज़ल विविध रूप रंग की...

श्याम गुप्त

ग़ज़ल ज्ञान
ग़ज़ल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तों|
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तों |
 
हो जिस्म से ग़ज़ल विविध रूप रंग की ,
पर रूह, लय गति ताल ही होती है दोस्तों |
 
कहते हैं विज्ञ कला-कथा ग़ज़ल ज्ञान की ,
यूं ग़ज़ल दिले-रंग ही होती है दोस्तों |
 
बहरें वो किस्म किस्म की, तक्ती सही-गलत ,
पर ग़ज़ल दिल का भाव ही होती है दोस्तों |
 
उठना व गिरना लफ्ज़ का, वो शाने ग़ज़ल भी ,
बस धडकनों का गीत ही होती है दोस्तों |
 
मस्ती में झूम कहदें श्याम ' ग़ज़ल-ज्ञान क्या ,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों ||
-------- 

पंचक श्याम सवैया ... ( वर्ण गणना  एवं पांच पंक्तियाँ )..


प्रीति  वही जो होय लला सौं जसुमति सुत कान्हा बनवारी |
रीति वही  जो निभाई लला हैं  दीननि  के दुःख में दुखहारी |
नीति वही जो सुहाई लला दई ऊधो कौं शुचि सीख सुखारी |
सीख वही दई गोपिन कौं जब चीर हरे गोवर्धन धारी |
जीत वही हो धर्म की जीत रहें संग माधव कृष्ण मुरारी ||

शक्ति वही जो दिखाई कान्ह गोवरधन गिरि उंगरी पै धारो |
युक्ति वही जो निभाई कान्ह दुःख-दारिद ग्राम व देश को टारो |
उक्ति वही जो रचाई कान्ह करो नर कर्म न फल को विचारो |
भक्ति वही जो सिखाई कान्ह जब ऊधो को ज्ञान अहं ते उबारो |
तृप्ति वही श्री कृष्ण भजे भजे राधा-गोविन्द सोई नाम पियारो ||
 
हारि वही हारे घनश्याम तजे रन द्वारिका धाम सिधाए |
हार वही विजयंतीमाल लगै गल श्याम के अंग सुहाए |
रार वही जो मचाई श्याम जो गोपिन-गोप सखा मन भाये |
नार वही हरि सिन्धु-अयन ताही तें नारायन कहलाये |
नारि वही वृषभानु लली जो श्याम सखा मनमीत बनाए ||
 
नीर वही जो बहाए सखा लखि कंटक पांय सुदामा सखा के |
पीर वही जो सही उर माहिं भाई ब्रज छांडत राधा-सखा के  |
धीर वही जो धरे उर धीर ज्यों राधा धरी गए श्याम सखा के |
तीर वही प्रन देय भुलाय कें शस्त्र गहावै जो पार्थ-सखा के |
वीर वही नर त्यागे जग हो राह में भक्ति की द्रुपदि-सखा के ||
 


            ---- डा श्याम गुप्त ,के-३४८, आशियाना लखनऊ

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जसबीर चावला

यथास्थिति पर प्रहार करती जसबीर चावला की कविताएँ

मौन परंपरा
-----------

ताड़पत्रों से लेकर सुंदर काग़ज़ तक
धर्मग्रंथों की जिल्दों में बंधा धर्म
धर्मग्रंथ चुप रहते हैं
वाचन चालू है
संगमरमरी मूर्तियाँ
प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी ताकती हैं अपलक
प्राण का स्पंदन नहीं
सूत्र चक्र चल रहे
बुद्ध मौन
कैसा भी हो अत्याचार
सन्नाटा नहीं टूटता
पता नहीं चर्च में घंटिया क्यों बजती हैं
किसकी अंतिम बिदाई के लिये
'फार हूम दि बेल टॉल्स'

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चौथी क़सम
----------

लड़कपन में चुपके से पढ़े
किसी की डायरी के पन्ने
ज़िक्र कई बार था क़सम खाने का
याचक आत्मग्लानि का
क़सम टूटने का
'आज फिर बीड़ी पी'
'नहीं पियूँगा अब'
ईश्वर माफ़ करे शक्ति दे

फ़िल्म 'तीसरी क़सम' देखी जवानी में
राजकपूर को क़समें खाते देखा
तीसरी क़सम वहीदा से जुदाई के बाद
बैलगाड़ी में नहीं बैठायेगा
किसी नौटंकी की बाई को
कसमों का सिलसिला जारी रहता
फ़िल्म ही समाप्त हो गई

ख़बरों की बदबू देख क़सम खाई
टीवी न देखने की
न अख़बार पढ़ने की
रिमोट को भी छुपाया अपने आप से

पता नहीं क्यों सूरज निकलने से पहले
सचेत हो जाते कान
बरामदे में धम्म की अखबारी आवाज़ के लिये
क़दम उठ जाते
हाथ खोया रिमोट ढूंढ लेते
झुँझलाता मन बदलने लगता चैनल रोज की तरह
लहूलुहान कर लेता
व्यसनी हो गया है
ईश्वर माफ़ कर
शक्ति दे

////////////////////

पाँचों उँगलियाँ घीं में
------------------

मीडियाका स्वर्ण काल
बिकाऊ रीढ़
पुष्य नक्षत्र
धनतेरस
बरस रहा सोना
खबरों का अकाल

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उपयुक्त स्थान
--------------

बहुत सिर चढ़ गया भगवान
थोड़ा करें किनारे
कम दुलारें

कहीं बस्ती में भेजें
इंसान बनायें
सिर से उतारें

////////////////////

आओ मर्द बनें
------------

देश का वीरगाथा काल है
रोपेगें अश्वगंधा
किन्नर नहीं गा सकेंगे अब
'आग लगे तेरे अश्वगंधा के खेत में'
शिलाजीत की पुड़िया मुफ़्त
दिन फिरे चारण भाटों के
सबके दिन फिरें
विरुदावली गायेंगे

मर्द बनाने का काम जारी है
बालश्रमिकों का प्रवेश भी वर्जित नहीं

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कमरे में क्रांति
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तेरह बुलाये
तेरह ही आये
चिंतित हुए
फुसफुसाहट से ऊंचे स्वर तक गये
गुस्साये
अपनी ढफली बजाई
अपना राग अलापा
साम्राज्यवादी शक्तियों को ललकारा
चेतावनी दी
अलगाव वादियों से देश को सावधान किया
प्रस्ताव पास किया
कुछ ने वाकआउट किया
मोहल्ले में शंखनाद हुआ
सत्यनारायण की कथा का समापन हुआ

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इतिहास का परिहास
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सिकन्दर लौटा था पंजाब से वापस
इनका बिहार तक गया
भगतसिंह राजगुरू सुखदेव रहे लाहौर जेल में
इन्होंने अंडमान भेजा
तक्षशिला पाकिस्तान में आज भी है
बिहार में मिला इन्हें
इतिहास पर भारी परिहास
'मैं चाहूँ यह कहूँ मैं चाहे वह कहूँ मेरी मर्ज़ी'

मेरा टेसू वहीं अड़ा
खाने को माँगे दहीबड़ा

////////////////////

देवताओं की तलाश
-----------------

हम थे कभी तैंतीस करोड़
तैंतीस करोड़ देवता
हम बढ़े करोड़ों में
एक सौ बीस करोड़ हुए
देवता सैकड़ों में ही बढ़े
उन पर बोझ बढ़ा
एक देवता
चार चार आदमी
बहुत नाइंसाफ़ी है
अतिरिक्त भार से लदे देवता हमें माफ़ करे
अब किस देव की उपासना करें हम
चाहिये कुछ और देवता
आओ कुछ पत्थर ढ़ूंढे
कुछ सड़कें कुछ चौराहे
कुछ नये देवता बनाएँ
////////////////////
48,Adityanagar
A B Road
Indore 452001
chawla.jasbir@gmail.com
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मोतीलाल

ढूंढने की प्रक्रिया
जहाँ तक पहुंचती है
वो रास्ते बंद पड़े हैं
जो जाते थे मेरे गाँव में ।

यहाँ खिलते थे फूल
हर मौसम में
और गूंजती थी
चिड़ियों की मीठी चहचहाट
विशाल पीपल व बरगद के पेड़ों में ।

यहाँ बसती थी खुश्बू
फसलों की गरमाहट से
हर खेतों के कोख में
और गाये जाते थे गीत
भोली गोरियों के मधुर कंठों से
पनघट के पथ में ।

यहाँ सांझ ढले आती थी
रंभाती हुई गायें
धूल धुसरित मेड़ों से
और आंगन में
दीये जलाती मेरी माँ
तुलसी के चौबारे में ।

यहीं नहीं पहुंच पाती है
हमारे शहरों के रास्ते
रोजाना मनो मिट्टी
कागज में ढूंढा जाता है
और बंद कर दिया जाता है
वह फाईल
जिसे पहुंचना था मेरे गाँव में ।

----------
* मोतीलाल/राउरकेला
संपर्क:  बिजली लोको शेड , बंडामुंडा
          राउरकेला  - 770032 ओडिशा
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पद्मा मिश्रा


राने दोहे -नए सन्दर्भ में
जनमत के ये सारथी
सबक गये हैं भूल ,
आम कहाँ से खायेंगे,
जब बोया पेड़ बबूल,

हरियाली को निगल गई,
इस विकास की धार ,
सूनी आँखें देखतीं
अपत कंटीली डार --

लोकतंत्र के घाट पर ,
भई नेतन की भीर ,
धन-जन-बल ,चंदन घिसें,
तिलक देत ,सब बावन वीर ,
 
महंगाई की मार से ,
जनता है बेजार,
लोकतंत्र के देवता !,
अब तो सुनो हमार ,
 
कंकर-पत्थर जोरि के ,
ऊँचो महल बनाय ,
नीयत में ही खोट थी ,
अब जेल में रहन सुहाय,

धन-बल,-जन-बल,बाहु -बल,
और रतन -धन खान
जब आयक रछापा पड़त है,
सब धन धूरि समान ,
----------.

जागो मेरे देश!,,,,
थम गया ,
वादों -नारों नगाड़ों का शोर ,
खामोश हो गई -
अघोषित महाभारत की दुनिया ,
पर टूट रही है खामोशियाँ -
अंतर्मन की -
खामोशियों को टूटना ही होगा,
सुनो -अंतरात्मा की आवाज सुनो ,
कभी तो जागे यह अंतश्चेतना !
नहीं चाहते क्या ?
इस जागरण को मुखर होने दो,
बदल जाने दो सारी तस्वीरें,
तभी बदलेगा -समूचा परिदृश्य ,
उन तस्वीरों के बदले रंग -
उनका मौन रेखाचित्र ,
एक नई इबारत लिखेगा -
संवेदना की लेखनी से ,
मानवता के नाम --
जागो मेरे देश!,,,,

 

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सुशांत सुप्रिय

१. फ़र्क
                         ------------
                                         ---

मैंने बर्फ से
हाथ मिलाया
सुन्न पड़ गईं
मेरी उँगलियाँ

मैंने आग से
हाथ मिलाया
जल गईं
मेरी उँगलियाँ

मैंने राजनेता से
हाथ मिलाया
मेरा हाथ ही
ग़ायब हो गया

                          ------------०-------------

                            २. महा-गणित
                           ------------------

शून्य में शून्य जोड़ कर
शून्य से शून्य घटा कर
शून्य से शून्य को गुणा कर के
शून्य से शून्य को भाग दे कर
जो अंतिम महा-शून्य
हमारे समक्ष उपस्थित होता है
उसी का नाम राजनेता है

                          -------------०-------------

                             ३. जब आँख खुली
                            ----------------------

कल रात मैंने
एक सपना देखा
मगर वह कोई सपना नहीं था

सपने में मुझे
कुछ जोकर दिखे
लेकिन वे कोई जोकर नहीं थे

वहाँ सर्कस जैसा
माहौल था
किंतु वह कोई सर्कस नहीं था

वहाँ एक अमीर आदमी
लाया गया जो
वास्तव में कोई और ही था

वहाँ झक्क् सफ़ेद धोती-कुर्तों
और उजले सफ़ारी-सूटों में
कुछ जादूगर आए
जो असल में जादूगर थे ही नहीं

उन्होंने उस अमीर आदमी को
जोकरों की तालियों के बीच
देखते-ही-देखते
एक बीमार भिखारी बना दिया
लेकिन यह कोई खेल नहीं था

बहुत देर बाद
जब मेरी आँख खुली
तो मैंने पाया
कि वे सफ़ेदपोश
असल में राजनीतिज्ञ थे
और मेरी बगल में
जो बीमार भिखारी
पड़ा कराह रहा था
वह दरअसल मेरा देश था

                           ------------०------------

१. आश्चर्य
                           -------------
                                          

आज दिन ने मुझे
बिना घिसे
साबुत छोड़ दिया

पृथ्वी अपनी धुरी पर
घूमते हुए
हैरान सोच रही है

                        यह कैसे हुआ
                        यह कैसे हुआ
                        यह कैसे हुआ

                          ----------०----------

                        २. निमंत्रण
                       ---------------

ओ प्रिय
आओ कोई ऐसी जगह तलाश करें
         जहाँ प्रतिदिन मूक समझौतों के सायनाइड
         नहीं लेने पड़ें
         जहाँ ढलती उम्र के साथ
         निरंतर चश्मे का नंबर न बढ़े
         जहाँ एक दिन अचानक
         यह भुतैला विचार नहीं सताए
         कि हम सब महज़
         चाबी भरे खिलौने हैं
चलो प्रिय
कौमा और पूर्ण-विराम से परे कहीं
जिएँ

                           ------------०------------

                      ३. हक़ीक़त
                     ---------------

हथेली पर खिंची
टूटी जीवन-रेखा से
क्या डरते हो

साप्ताहिक भविष्य-फल में की गई
अनिष्ट की भविष्यवाणियों से
क्या डरते हो

कुंडली में आ बैठे
शनि की साढ़े-साती से
क्या डरते हो

यदि डरना है तो
         अपने 'मैं' से डरो
         अपने बेलगाम शब्दों से डरो
         अपने मन के कोढ़ से डरो
         अपने भीतर हो गई
         हर छोटी-सी मौत से डरो
क्योंकि
उँगलियों में
'नीलम' और 'मूनस्टोन' की
अँगूठियाँ पहन कर
तुम इनसे नहीं बच पाओगे

-----.

१. डरावनी बात
                             --------------------
                                                     

एक दिन
मैं अपने घर गया
लेकिन वह मेरे घर जैसा
नहीं लगा

मकान नम्बर वही था
लेकिन वहाँ रहते
सगे-सम्बन्धी
बेगाने लगे

गली वही थी
लेकिन वहाँ एक
अजनबीपन लगा

पड़ोसी वे ही थे
लेकिन उनकी आँखें
अचीन्ही लगीं

यह मेरा ही शहर था
लेकिन इसमें
अपरिचय की
तीखी गंध थी

यह एक डरावनी बात थी
इससे भी डरावनी बात यह थी कि
मैंने पुकारा उन सब को
उन के घर के नाम से
लेकिन कोई अपना वह नाम
नहीं पहचान पाया

                        -----------०------------

                            २. इधर से ही
                          -------------------
                                                  

लुटेरे इधर से ही गए हैं
यहाँ प्रकृति की सारी ख़ुशबू
लुट गई है

भ्रष्ट लोग इधर से ही गए हैं
यहाँ एक भोर के माथे पर
कालिख़ लगी हुई है

फ़रेबी इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ निष्कपट पल
ठग लिए गए हैं

हत्यारे इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ अबोध सपने
मार डाले गए हैं

हाँ, इधर से ही गुज़रा है
रोशनी का मुखौटा पहने
एक भयावह अँधेरा
कुछ मरी हुई तितलियाँ
कुछ टूटे हुए पंख
कुछ मुरझाए हुए फूल
कुछ झुलसे हुए वसंत
छटपटा रहे हैं यही

लेकिन सबसे डरावनी बात
यह है कि
यह जानने के बाद भी
कोई इस रास्ते पर
उनका पीछा नहीं कर रहा

                       ------------०------------

                          ३. किसान का हल
                        -----------------------
                                                    

उसे देख कर
मेरा दिल पसीज जाता है
कई घंटे मिट्टी और
कंकड़-पत्थर से
जूझने के बाद
इस समय वह हाँफ़ता हुआ
ज़मीन पर वैसे ही पस्त पड़ा है
जैसे दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद
शाम को निढाल हो कर पसर जाते हैं
कामगार और मज़दूर

मैं उसे प्यार से देखता हूँ
और अचानक वह निस्तेज लोहा
मुझे लगने लगता है
किसी खिले हुए सुंदर फूल-सा
मुलायम और मासूम
उसके भीतर से झाँकने लगती हैं
पके हुए फ़सलों की बालियाँ
और उसके प्रति मेरा स्नेह
और भी बढ़ जाता है

मेहनत की धूल-मिट्टी से सनी हुई
उसकी धारदार देह
मुझे जीवन देती है
लेकिन उसकी पीड़ा
मुझे दोफाड़ कर देती है

उसे देखकर ही मैंने जाना
कभी-कभी ऐसा भी होता है
लोहा भी रोता है

                           ------------०------------

                              ४. यह सच है
                             -----------------

जब मैं छोटा बच्चा था
तब मेरे भीतर एक नदी बहती थी
जिसका पानी उजला
साफ़ और पारदर्शी था

उस नदी में
रंग-बिरंगी मछलियाँ
तैरती थीं

जैसे-जैसे मैं
बड़ा होता गया
मेरे भीतर बहती नदी
मैली होती चली गई

धीरे-धीरे
मैं युवा हो गया
पर मेरे भीतर बहती नदी
अब एक गंदे नाले में
बदल गई थी

उस में मौजूद
सारी मछलियाँ
मर चुकी थीं

उसका पानी अब
बदबूदार हो गया था
जिसमें केवल
बीमारी फैलाने वाले
मच्छर पनपते थे

                   यह दुनिया की
                   ज़्यादातर नदियों
                   की व्यथा है
                   यह दुनिया के
                   ज़्यादातर लोगों की
                   की कथा है

                           ------------०------------

                               ५. विडम्बना
                             ------------------
                                                    

तुम आई
और मैं तुम्हारे लिए
सर्दियों की
गुनगुनी धूप हो गया

तुमने मुझे देखा
और मैं तुम्हारे लिए
गर्मियों की
घनी छाँह हो गया

तुम्हें एक बग़ीचे की
ज़रूरत थी
और वह मैं हो गया

मैं तुम्हारी प्यास के लिए
मीठे पानी का
कुआँ हो गया

मैं तुम्हारी भूख के लिए
तवे पर फूली हुई
रोटी हो गया

सुस्ता कर
अपनी भूख-प्यास मिटा कर
तुम एक बार फिर
तरो-ताज़ा हो गई

और तब
मैंने देखा
तुम पूछ रही थीं :
" कहाँ रह गया
वह बेवक़ूफ़-सा आदमी
जो मेरी मदद करने का
दावा कर रहा था ! "

 

प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
         मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा
         ५१७४, श्यामलाल बिल्डिंग ,
         बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,
         नई दिल्ली - ११००५५
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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संगीता निषाद

प्रेम और विलाप
वे देख देख मोहे मुस्‍काते रहें    
हम दूर बैठे शरमाते रहे ।
लो आ गई है मिलन कि वो रात
आज है मोरे प्रियतम भी मोरे साथ ।
साथ ये कैसा था......................
पल भर ना रूके पानी के जैसा था
देश का आया उन्‍हें संदेश
वापस आ जाओ अपने देश
सुबह हुई ओ चले गये बार्डर पर
जब वो आये तो थे लिपटे एक चादर पर।
मैं ना रोई उस शहीद पर
जिसने दे दी जान अपनी जमी पर ।
मेरे प्रेम की कहानी लिखी
जीवन की एक डोर पुरानी दिखी।
आस पड़ोस का कोई गम ना था,
जो अपनों से मिले दर्द वो कम ना था
एक पल लगा मैं हारी जिन्‍दगी से
पर मिला हौसला मुझे मेरे जमीन से
लड़ी मैं अपनी तकदीर से
और जीती दुनिया मैंने इन हाथों की लकीर से
यही थी कहानी मेरी
जो लड़ी तो बनी जिन्‍दगानी मेरी 

 

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पूनम सिंह


डर लगता है मुल्क के जां निसारों से,
बेच खाने वाले वतन के जिम्मेदारों से,
नीचे से ऊपर तक रिश्वत के खूंटे हैं,
चपरासी से लेकर वज़ीर तक झूठे हैं,
सब के सब नेता बन जाते है बेईमान,
कुर्सी पे बैठते ही हो जाते हैं धनवान,
कोयला क्या ताबूत तक बैच खाया है,
जानवरों का चारा भी खूब पचाया है।

अब सुनो इन कहानी पुलिस वालों की,
वर्दी पहन के गुंडागर्दी करने वालो की,
महाना न मिले ऊपरी कमाई बहुत है,
आमदनी के पालते ज़रियात बहुत है,
अमीरों से लेकर फकीरों को लूटते हैं,
बच्चों से लेकर बेवाओं को चूसते हैं।

रास्तों पे मनचलों ने किया बुरा हाल है,
माँ बहिन का घर से निकलना मुहाल है,
बेटियों की इज़्जत सरेआम तार तार है,
इनकी हैवानियत पे शेतां भी शर्मसार है,
सबके दरमियां में सज़ा दो संगसार की,
खून की बूंद तक निचोड़ लो बदकार की,
बिना सज़ा के मुआशरा नहीं चलने वाला,
बिना फांसी चढ़ाए कुछ नहीं बदलने वाला,

बिना फांसी चढ़ाए कुछ नहीं बदलने वाला।

पूनम सिंह
आगरा
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विजय वर्मा

  उंगली पर  निशान

काम वाली बाई
वोट के दिन
काम करने नहीं आई।
हम सब ने सोचा
चलो अच्छा है
कुछ तो जागृति आई है
गरीब तबके  ने भी
प्रजातंत्र का महत्व समझा है
भले ही जीवन उसका ग़मज़दा है।
उलटी बेरा
वह काम करने आ गयी।
उसकी उंगली पर निशान देखकर
मेरी पत्नी हर्षा गयी।
क्यों,वोट  दे आई ? पत्नी ने पूछा।
तू वोट ज़रूर  दी है.
कहाँ दे पायी दीदी -----
बिगना के बाबू को
शराब पीने  से मना  की
तो उसने मेरी उंगली ' थुर ' दी है। 

V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]
vijayvermavijay560@gmail.com

 

0000000000000000000

चंद्रप्रकाश


अच्छा है समय का गतिमान रहना
भागता है समय तो भागने दो
समय कुलांचे भरता है , भरने दो
समय चीखता चिल्लाता है
चीखने चिल्लाने दो

अकुलाता है समय तो अकुलाने दो
समय विलाप करता है
तो सुनो समय का विलाप

अच्छा है समय का कुलांचे भरना
चीखना चिल्लाना
हांफना
और विलाप करना

बजाय इसके कि समय ठहर जाये
बजाय इसके कि समय गूंगा-बहरा और पंगु हो जाये
बजाय इसके कि समय कोमा में चला जाये
अच्छा है समय का गतिमान रहना

............................................................................

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सुरभि मिश्रा

नए मतदाता का संकल्प
-------------------------------
                            ---
मैं प्रसन्न हूँ क्योंकि मैंने आज किया मतदान
भारत की मैं एक नागरिक जो है बहुत महान

अपनी इच्छा के वश में ही मैंने बटन दबाया
प्रतिउत्तर में मुझको सुमधुर स्वर एक था आया

हम भारत के वीर सिपाही आगे बढ़ते जायेंगे
मातृभूमि की सेवा में हम हरदम क़दम बढ़ाएंगे ।

जमशेदपुर, झारखण्ड


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विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '

                     कभी
           चर्चा   का    विषय
        हुआ   करता    था   'नल '
               हो   एकमत
              सभी      सोचते
            इस      विषय    पर
                    किन्तु
        जब  से    आगये    वो
         खत्म    हो  गई     जैसे
      गली    की      अन्तरंगता   ही
      गंदा - पानी  दुविधा  बन   गया
                    सबकी,
    हर रोज  कभी  भी  हो  जाता ,
                  ' हो -हल्ला'
             ठहर  जाते  राहगीर
                चलते - चलते
              देखने       नज़ारा
               मेरी   गली    का
        लड़  रहे  होते    जब   सब,
                     'पानी'
               बेवाक   बढ़  जाता
             ढलान    की      तरफ,
      और  तोड़   देता    सभी  बंधन
        जो   बनाये  थे  इंसान  ने ...
              -कवि विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '
कर्मचारी कालोनी , गंगापुर सिटी , स.मा.
00000000000000000
सीताराम पटेल

दिल
कभी कभी दिल खिलता है।
कभी कभी दिल मिलता है॥
खिलता है, दिल मिलता है,
कभी कभी सुख मिलता है॥
हम भी खुश तुम भी खुश,
लेकिन दुखिया सारा संसार।
हमारी चांदी तुम्‍हारी चांदी,
क्‍या करना है हमें बहार॥
लड़े मरे दुनिया हमें क्‍या,
हमें मिलता रहे बस प्‍यार।
खाते रहें हम हलवा पूरी,
भूखा सोये सारा संसार॥
********
सृष्टि का संगीत
सुनो सुनो ध्‍यान से सुनो
सृष्टि का संगीत
परिन्‍दों के कलरव से
निकल रहे हैं अनोखा धुन
मूक मैना भी आज हो रही है वाचाल
चूंकि प्रकृति आज बनी है दुल्‍हन
टिटहरी आज बजा रही है टिमकिड़ी
पिक फूंक रही शहनाई
कठफोड़वा बजा रहा मशान
झींगुर खींच रही है तान
चिंक चिंक फुदक फुदक
नाच रही है गौरेया
पड़कुलिया परेवना गर्दन
लचकाकर नाच रहे हैं हाय दैया
कांव कांव राग आलाप रहा काग
प्रकृति की आवाज को साज दे रहा पपीहरा
पी कहां पी कहां कहते ही आया पुरुष आकाश
दुल्‍हा के भेस में अति सुन्‍दर लग रहा है आज
प्रकृति और पुरुष का पाणिग्रहण होगा आज
पैकों पैकों का गाना गाकर
नाच रहा है मोर आज
फुलझड़ी सा उड़ रहे हैं कौंच का दल
सहजन सेमल सूर्यमुखी सरसों पलाश चार आम
के पुष्पों से पहनी है सतरंगी साड़ी प्रकृति खास
प्रकृति और पुरूष का पाणिग्रहण का कर दर्शन
हुलस रहा है आज जन जन का मन
                                          
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कैलाश यादव

                अमर-प्रेम
जिनके घर पर दर लगवाये, जिनको रोशन दान किये,
मेरे घर जब छाये अंधेरे, मैंने जब-जब उन्‍हें पुकारा,
चीत्‍कार मेरी सुनकर भी, आंख बंद कर सोये हुये,
जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।
   शायद महक जाये फुलवारी, शायद पुरवाई चल जाये,
   इसी आस में जाग रहा हूं, पवन वेग का कोई झोंका,
                     किसी सनम के पट खोल दे,
                      शायद फिर से आयें बहारें,
   कब से डोली सजी हुई है, श्रंगारित साजन बैठे हैं,
   इसी आस में जाग रहा हूं, शायद फिर आ जायें कहारें,
   शायद उनको याद नहीं अब, एहसां जो भी चंद किये,
   जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।
उम्‍मीदों पर दुनिया कायम, यही सोचकर सितम हैं झेले,
वरना इतना विष है जग में, विषधर सारे जग में फैले,
शायद प्रेम का अमृत बरसे, शायद विष सारा धुल जाये,
इसी आस में कब से बैठा, शायद अमर-प्रेम मिल जाये,
   जिनकी याद लिखे थे मुक्‍तक, जिनको अर्पित छंद किये
   शायद उनको याद नहीं अब, एहसां जो भी चंद किये,
   जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।

000000000000000000000

अमित कुमार गौतम ''स्वतन्त्र''

पुकार

चलो!
तैयार हो जाओ
आगे बढ़ो!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!

तुम देश के जवान हो!
हिमालय कि शान हो!!
भारत माँ के लाल हो!
दुश्मनों के काल हो!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!

देश को चाहिए!
बलिदानों का राग!!
देखना है तकते!
कितना बाजुओं में है!!
आ रही  है!
सीमा से पुकार!!

एकता कि ललकार है!
तलवार धार दार है!!
अग्रसर होते जाना है!
विजयी तिरंगा लहराना है!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!


ग्राम-रामगढ न.२,तहसील-गोपद बनास,
     जिला-सीधी,मध्यप्रदेश,486661

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मनोज 'आजिज़'


(१ मई श्रम दिवस पर कविता)

सर्वोदय सन्देश
-------------------
                    ---

किसी देश को विकास पथ पर
ले जाने वाला मजदूर है
सबसे ज्यादा वही आजतक
लाचार, व्यथित, मजबूर ।

मंत्री, संत्री सभी मिलकर
उत्थान की बात करते हैं
हालत उनकी जस की तस है
दो जून रोटी को जूझते हैं ।

श्रम, श्रमिकों के समन्वय ही
नव-निर्माण की जननी है
उनकी बातें सब मिलकर अब
उदार भाव से करनी है ।

डींग हांकते कई लोग हैं
लेखक, नेता, संघ दुकानी
पास श्रमिक के कोई नहीं होता
जब मलिन होता उनकी जवानी ।

आएं, हम सब श्रम करें और
दिशा नयी भारत को दें
श्रमिक वर्ग में भेद न कर हम
सर्वोदय सन्देश जगत को दें ।

पता-- आदित्यपुर-२, जमशेदपुर
00000000000000000000000

 

सुशील यादव

नसीब में कहाँ था, सुर्खाब का ‘पर’ कभी
जिसे  समझते, खुशनुमा मंजर कभी

गुनाह को रहमदिल मेंरे माफ कर देना
मकतल गिर  छूटा  कहीं, खंजर कभी  

हमें हैरत हुई इन  ‘शीशो’ को देख के 
तराशा हुआ  मिल गया , पत्थर कभी
 
नहीं खेल! किस्मत.;  जहाँ में है आसा 
लकीर खिच, कब रुका है समुंदर कभी

तुझे टूट कर चाहने का इनाम ये
तलाश करते हैं, खुद को अन्दर कभी

शहंशाह मिटते हैं बस  आन पे साहब 
झुका के सर, जिया है क्या, अकबर कभी ?

00000000000000000

श्रीमती प्रेम मंगल 

               लोकतंत्र पर व्‍यंग्‍य
लोकतंत्र की परिभाषा को
क्‍या तुम जानो क्‍या पहिचानो
अम्‍बर से भी ऊंची है यह
समन्‍दर से भी गहरी है यह।
                वसुधाष्‍पर झान नहीं है किसी को इसका
                सात समन्‍दर तक भी प्रचार  है इसका  ।
हिन्‍दी भाषा में जनता का शासन अर्थ है इसका,
अपना अपना भाषण देना मर्म है इसका,   
जिसकी लाठी भैंस उसीकी धर्म है उसका,
लूट-खसोट कर माल बटोरना कर्म है इसका।
             तुम्‍हारी भूमि मेरी भूमि है,
             तुम्‍हारा माल मेरा माल है,
             मेरा माल मेरा कमाल है,
             इसके अन्‍दर मेरा कपाल है।
जहां चाहूं वहां ही मैं जाऊं,
जो चाहूं मै वह कर डालूं,
गांजा,भांग औ चरस मैं खाऊं,
संस्‍कारों को क्‍यों मैं अपनाऊं।
               शासन मेरा मेरे अपने लिये है,
                 नियम कानून मेरे अपने ही हैं ,
                 कहां का भ्रष्‍टाचार कहां का घपला,
                 मिलकर चलो नहीं कोई है  घपला ।
कमीशन नहीं मिला गर किसी को,
मसाला मिल जायेगा मीडिया को,
बढ़ाचढ़ा कर भरा जायेगा पेपर को,
मुख्‍य बना दिया जायेगा समाचार को।               
               लोकतंत्र है यहां सबकुछ चलता है,
               मिलजुल कर खानेवाला यहीं पलता है ।
                 

मानव जन्‍म की सार्थकता
जन्‍म मिला जब है मानव का ,
कर्म न कर ए बन्‍दे दानव का,
अच्‍छा गर कर सके न किसी का,
बुरा सोचना मत कभी किसी का ।
                       वफादारी गर निभा न सके जहां में,
                       तो जीना ना बन्‍दे तू गद्दारी में,
                       बहुत मुश्किल है नाम कमाना जहां में,
                       मिटती हस्‍ती है केवल इक पल में।
लेकर किसी से कोई बडा बनता नहीं,
देकर दान घर कभी खाली होता नही,
अपने लिये जीना तो मुश्किल है नहीं,
दूजों के लिये जीकर दिखाना आसान नहीं।
                          कन्‍स औ शकुनी ने बदनाम किया नाम मामा का,
                          कैकयी ने दुर्भाव दिखाकर आंचल गंदला किया सौतेली माता का,
                          हनुमंत ने सीना फाडकर विश्वास दिखा दिया रामभक्‍ति का,
                          मीरा ने प्‍याला पीकर जहर का दिखा दिया सच्‍चा प्‍यार श्याम का ।
नाम कमाना सच्‍चा  धर्म है मानव का,
सद्‌कर्मों से सिर ऊठाना फर्ज है उसका,
कर्ज चुकाना है वसु द्वारा किये गये पालन-पोषण का,
षुक्र्र्‌गुजार करना है छत देने हेतु अम्‍बर का।
                              भगतसिंह,सद्‌गुरु,सुखदेव गर नहीं बन सकते,
                              आदर्षों की पाती गर तुम नहीं लिख सकते,                          
                              सच मानो तुम जीवन अपने को सार्थक नहीं कर सकते,
                             धरा औ अम्‍बर का कर्ज कभी नहीं चुका तुम सकते।
जन्‍म मिला जब है मानव का ,
कर्म न कर ए बन्‍दे दानव का,
अच्‍छा गर कर सके न किसी का,
बुरा सोचना मत कभी किसी का ।         
श्रीमती प्रेम मंगल कार्यालय
कार्यालय पर्यवेक्षक
स्‍वामी विवेकानन्‍द ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्रयूशन्‍स
इन्‍दौर,  म. प्र.

0000000000000

देवेन्द्र सुथार

शपथ-ऊर्जावान
अब मैँ जाग गया हूँ और
आज से ही नए जीवन की
शुरुआत करनी है।
अब मैँ कर्म क्षेत्र मेँ
उतकर संघर्ष करुंगा।
और किसी विजेता की तरह
संसार के सुख-ऐश्वर्य पर
अधिकार जमाऊंगा।
यह मोटर-कारेँ,बंगले,हीरे-मोतियोँ मेँ
परमात्मा ने मेरा हिस्सा भी रख छोडा है।
और मुझे कर्म करके
कठोर मेहनत करके
सूझ-बूझ से अपनी शक्तियोँ को जगाकर
मुझे अपना हिस्सा हक हासिल करना है।
----------.


सुबह-सुबह सपनोँ कि दुनिया से बहार आकर
अपनोँ मेँ खोना जाना
फिर वही पुरानी घाघर लेकर
पानी भरने जाना,पानी न मिलने पर
खाली हाथ लौट जाना
वही पुराने कागजोँ कि फाईल लेकर काम माँगना
किस्मत पर रोना फिर अकेले ही संभल जाना
घर लौटने से पहले माँ कौ लाचार पिता को बेचारा देख मरना
जिन्दगी से इतना डरना आश का तिनका तक खो जाना
जिन्दगी के इतने दुखोँ को हँसते हुए ह्रदय से विदा करना
और कहना तुझ जैसी भी है जिन्दगी पर तुझ पर मुझे नाज हैँ
पर मुझे तुझसे प्यार है प्यार है
---

हिन्दी की स्थिति
आज भारत की क्या
स्थिति हो गई है ।
हिन्दी तो केवल अढाई
शब्दोँ मेँ ही खो गई है ।
लोग अंग्रेजी बोलने मेँ
महसूस करते हैँ सम्मान।
जैसे हिन्दी मेँ बात करके
हो जाएंगे दो टके के इंसान ।
नमस्ते को छोड लोग
कहते है हैलो,हाय।
हाय ! जैसे उन्हेँ हो
कोई दु:ख असहाय।
माँ को तो कहते हैँ
मम्मी-मम्मी।
ममी जो जिन्दा होकर भी
जिन्दा नहीँ।
पिता को कर दिया
पूरी तरह डैड।
पराठोँ को छोड लोग
खा रहे है जैम और ब्रैड।
पारंपरिक नृत्य-गीतोँ का तो
चला गया जमाना।
लोग तो पसन्द करते है
डिस्को जाना,अंग्रेजी मेँ गाना गाना।
बच्चे सबसे पहले सीखते है
ए फाँर एप्पल,जे फाँर जीरो।
और समझते है
अपने आपको हीरो।
हिन्दी के माथे पर बिन्दी
बन गई उसका कलंक।
एक दो तो याद नहीँ पर याद है
सबको अंग्रेजी के अंक।
आने वाली पीढी जब
हिन्दी से नजर चुराएगी।
और बेतुकी बढेगी हिन्दी
कहकर इसकी हंसी उडाएगी।
तो हिन्दी किसकी
शरण मेँ जाएगी?
हिन्दी है हमारी मातृभाषा
जीवित रखे इसका स्वरुप।
नहीँ तो एक दिन हम
पहचान नहीं पाएंगे भारत का रुप।

देवेन्द्र सुथार बागरा जालोर राजस्थान

0000000000000000


सन्‍तोष कुमार सिंह


किसे चुनोगे ?
दाग लगे या साफ हैं।
किसके कितने पाप हैं।
किसे चुनोगे पहचानो अब,
मत के दाता आप हैं॥

जिस थाली में ये खाते हैं।
छेद उसी में कर जाते हैं।
इनका घड़ा भरा पापों से,
ये पापों के तात हैं॥

दुःशासन के ये अवतारी।
लगा मुखौटा बने भिखारी।
चीरहरण औ' सियाहरण ही,
इनके क्रिया-कलाप हैं॥

घूम रहे हैं कुशल मदारी।
इनके रक्‍त भरी मक्‍कारी।
पल-पल में ये रंग बदलते,
ये गिरगिट के बाप हैं॥

जनता को दुःख देने वाले।
कले धन के ये मतवाले।
ए0सी0 बिल से निकल आ गए,
अब जहरीले सांप हैं॥

जनादेश जब खण्‍डित पाते।
चुपके-चुपके हाट लगाते।
घोड़ों से ज्‍यादा कीमत में,
बिकते गधे-प्रताप हैं॥
- सन्‍तोष कुमार सिंह
कवि एवं बाल साहित्‍यकार
मथुरा।

0000000000000

अनुज कुमार


कविता : अनंतिम सत्य

थोड़े दिनों बाद मकड़ा बना चुका होगा,
अपना जाला,
उसका जाला उसके असीम धैर्य का परिचय होगा,
उस जाले की संश्लिष्ट बुनावट में अनेकों भयाक्रांत मकड़ों की मेहनत भी जुटी होगी.

तदोपरांत वह आमंत्रण भेजेगा और तमाम भ्रमित मक्खियाँ..हतप्रभ,
अपने बचे-खुचे छत्ते तहस-नहस कर,
धीरे-धीरे उसी जाले का शिकार होंगी,
जिसके भय से अब तक वे दुबके पड़ी थीं.
वह अब उनके दुःख हर लेगा.
वह जाला उनके अच्छे दिन वापस लाएगा.

मक्खियाँ अपनी धुन भूल चुकी होंगी,
वे जाने-बूझे भूल चुकी होंगी अपना पथ
...जिससे होते आयी थीं वे इस जाले की तरफ,
मकड़ा अपने अकड़ में अकड़ा ही रहेगा,
वह अपने मद में चूर थूक में भर रहा होगा
...थोड़ी और चिपचिपाहट, थोडा और लिजलिजापन
मक्खियाँ अपने ख़त्म होने को असुरक्षा बोध से ज्यादा प्रीतिकर मान चुकी होंगी.
उनमें हिचकिचाहट लेशमात्र न होगी.
अपने दोहन का उनमें कोई मलाल न रहेगा.


ये जो दिल है, माना समूचा मेरा है,
पर इसका आधा हिस्सा तुमसे अटा हुआ है,
इस कारन दो हिस्सों में बंटा हुआ है,
मात्र यह एक विभाजन है,
जिसमें सुख ही सुख है,
कहीं कोई मुटाव नहीं है, कहीं न कोई कटा हुआ है....
इतनी तू-तू-मैं-मैं लेकिन, हर उन्स में प्रेम पगा हुआ है
साथी मेरे...
आधा हिस्सा जो तुमसे पटा हुआ है,
इस कारन जीवन जुटा हुआ है.
-----------------एक सादी प्रेम-कविता---------------------

 


कविता : प्रेम-गणित

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
उसके ऐब क्या गिनाऊं,
एक उत्कट उत्कंठा भर जाता है हर रोज़,
हर रोज़ उसकी खुश्बू मैं घर भर में बिखेरते रहती हूँ,
और उसके विछोह की मात्र निशानी,
मेरे कटे होंठों पर जमी लाली की पपड़ी है..

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
उसका इंतज़ार जैसे सदियों सा,
जैसे उसे गए अरसा हुआ,
जैसे शाम के बदले वह दोपहर आ धमके,
मुझे रसोई के कोने से निहारता रहे,
मेरे बालों को पसिनाये चेहरे से हटाये,
होंठों की पपड़ी हटाये, और कहे बहुत बुरा हुआ...दर्द हुआ होगा...

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
कि उसका रहना न रहना एक बराबर,
कि उसका न होना, होना है, होना, न होना
लो !!! किसी भी वकत वह दरवाज़े पर होगा,
मैं ज़रा संवार लूँ चेहरा,
आँखों में काजर भर लूँ,
ज़रा अपनी थकावट समेट लूँ.
मुस्कान से दग्ध कर दूँ उसे.
हाँ, जानती हूँ बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
मेरी मुस्कान पर टिका है मेरे ऐय्यार का जीवन.


कविता : लांसनायक सुधीर महतो
----------------------------------------------------------
वो बच्चा जिसके सर पर एक घाव बना है,
रिश्ते में मेरा बेटा था,
और कहने को आगे होगा इस देश का अमर सिपाही,
एक सच्चा शहीद.

भान है,
इस शहीद को आनन-फानन याद किया जाएगा,
और हड़बड़ाहट में भूला दिया जाएगा.

कोई समय...मेरी बातों में चाव होता,
किसी बहाने, हर बात में बेटा बेटा और मात्र बेटा होता.

आज, घरवालों की दहाड़ें सीना चीरे दे रहीं हैं,
मन और हेरा रहा है,
काँधों से छिन गई है ताकत,
कांधा तुम सब मिल कर दे देना,
हुमाद भी,
पोते से कहना आग दे दे.

फिलहाल मुझे पेंठिया हो आने दो,
चाय पीने बहाने,
किशन की दूकान पीछे मन भर रोऊँगा
जब जी हल्का हो जाए,
लौट आऊंगा.
आँगन में पसरा रहूँगा,
मन ही मन रोता रहूँगा,
कुछ दिन बाद जीवन की नियति मान,
उन सब को राम-राम कह आऊंगा,
जो हमारे दुःख को अपना दुःख समझ
शोक में साझा होने आये थे.

आगे भी, गाँव वाले बेटे के स्मारक की बात सोचेंगे.


कविता : दिहाड़ी
रोज़ सवेरे,
कानों का एक जत्था,
चौकस,
देश के किसी चौरस्ते पर,
चार खल वाले टिफिन को बगल रखे,
अपने गिने जाने का करते हैं इंतज़ार.
उनकी दिनचर्या का यह सबसे नाजुक समय होता है.

सब कुछ शुभ होने को,
धरती की तरह,
रोज़मर्रा की ज़रूरतों की धूरी पर उनके घर का घूमना भी बेहद ज़रूरी है.
बेहद ज़रूरी है उनका रोज़ का गिना जाना.


कविता : खुले दिल से गले मिलोगे ?
______________________
अभी कहाँ मंझा हूँ,
कितना खुरदुरा है मन,
अभी तो विभक्त होना है खुद से,
अपनी ही छाया से सीखना है होना नम्र,
कभी न ख़त्म होने वाले जद्दोजहद से सीखना है मांझना विवेक,
दूर जंगल में घाँस की बढ़ती जड़ों से सीखना है धैर्य,
रात भर बनते ओस से सीखनी है शांति,
तन्हाई से सीखना है होना साझीदार,
अधीरता से सीखना है होना ईमानदार,
मैं को जब कर आऊंगा दफन,
और कुछ न होने से कुछ होने के बूझ लूँगा अर्थ....
तब प्रेम बोलो तुम...
खुले दिल से गले मिलोगे ?

संपर्क: anujkumarg@gmail.com
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 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी 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रचनाकार: पखवाड़े की कविताएँ
पखवाड़े की कविताएँ
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