सोमवार, 28 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - कत्लेआम का मेला

कत्लेआम का मेला

आसमान का रंग इतना सुर्ख हो गया जैसे तपता हुआ इस्पात और लगा कि अभी कुछ ही सेकेंड में आसमान फट जाएगा और जमीन के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। हवा में जली हुई लाशों की बदबू शामिल हो गई और आसमान पर सफेद बादलों के डरे-सहमे टुकड़े अपनी जान बचाने की कोशिश में इधर-उधर छिपने की जगह तलाश करने के लिए भागने-दौड़ने लगे।

लकड़ी का पुराना दरवाजा हल्की-चरचराहट की आवाज के साथ खुला। दरवाजे की आवाज ऐसी दर्दनाक थी जैसे किसी का दिल चीर दिया गया हो। दरवाजे के अन्दर पहले बूढ़े पिता का सिर आया। उलझे-उलझे बाल और अरस्तु जैसी दाढ़ी के बीच पसीने से भीगा काला चेहरा जो आंखों के बोझ को संभाल नहीं पी रहा था। सिर के बाद पिता ने कन्धे पर लदी जवान बेटे की लाश का लटका हुआ सिर अन्दर आया।

आंगन में खड़ी बूढ़ी औरत, दो लड़के और एक लड़की बूढ़े को अन्दर आता देख रहे थे। बूढ़े ने अपनी परिवार की तरफ नहीं देखा क्योंकि वह जानता था कि बताने के लिए कुछ नहीं है और ये जो सामने खड़े हैं सब जानते हैं। धीरे-धीरे बूढ़ा कन्धे पर जवान बेटे की लाश रख अन्दर आंगन में आ गया। कच्चे आंगन के एक कोने में बेरी के पेड़ से बंधी बकरी बूढ़े को देखकर मिमियाई और चुप हो गई। बूढ़े के कपड़े पसीने में तर थे। उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन उसे देखकर यह नहीं लगता था कि वह थक गया है जबकि ऐसा उसके साथ पहली बार नहीं हो रहा था। पिता अपने बेटे की लाश कन्धे पर उठाए खड़ा रहा। लड़की आगे बढ़ी और कच्चा आंगन बुहारने लगी।

जीवित और मरे हुए आंगन में आने लगे। कुछ ही देर में भीड़ लग गई पिता अपने बेटे की लाश कन्धे पर लिये खड़ा रहा।

...उनके पास हथियारों की कमी नहीं है।

...उनकी सेना को भरपेट खाना मिलता है।

...उनके पास ऐसी दूरबीन हैं जो हमारे दिल के अन्दर तक देख लेती हैं।

कोई क्या कहता, न किसी को दिलासा दिया और न हमदर्दी जताई, न दुःख जाहिर किया और न सांत्वना के दो शब्द बोले।

लड़की आंगन बुहारती रही और पिता बेटे की लाश कन्धे पर रखे खड़ा रहा। लोग प्रेतात्माओं की तरह बातें करते रहे।

-ये देखो हमारे सात बेटों को कुचल डाला है...

-ये तो चलती फिरती रौनक और रौशन सड़क के किनारे मरा है...इसे किसी ने कुचला नहीं...ये...

हमें क्या शिकायत...हम तो जिन्दा कब्रिस्तान में रह रहे हैं।

-देखा इनके गले पर रस्सी के फन्दों के निशान हैं।

-इन्हें फांसी दी गई है।

-नहीं इन्होंने खुद फांसी लगाई...अब उन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं है कि फांसी लगाए...अब तो हम अपने आप ही...।

लड़की ने आंगन साफ कर दिया। मां आगे बढ़ी और आंगन को लीपने लगी। मां आगे बढ़ी और आंगन को लीपने लगी। पिता अपने कन्धे पर बेटे की लाश लिये खड़ा रहा। मां धीरे-धीरे जैसे यह करते-करते ऊब गई हैं, आंगन लीपती रहीं।

...एक सौ ग्यारह लोगों की लाशें आ गई हैं।

...ये नौकरी मांगने गए थे।

...ये इंटरव्यू देने गए थे।

...ये देश की सेना में भरती होने गए थे।

...ये एडमीशन लेने गए थे।

बूढ़े बाप के चेहरे पर थकान के आसार नहीं थे। वह एकटक, एक ही पोजीशन में बेटे की लाश उठाए खड़ा था। उसकी पलकें भी नहीं झपक रही थी। आंगन को लीपती उसकी औरत ने घूंघट के पीछे से बूढ़े को देखा। बूढ़ा जब पहली बार सबसे बड़े बेटे की लाश लाया था तो इसी तरह खड़ा था। तब वह कुछ बोल रहा था, कह रहा था। शुक्र करो कि मुझे अपने लाड़ले की लाश मिल गई है। कुछ लोगों को तो उनके बेटों, बेटियों की लाश नहीं मिल पाई है। जिन्होंने मेरे बेटे को मारा है बहुत नरम दिल लोग थे। इतनी इंसानियत कौन दिखाता है आजकल।

बूढ़े बाप की आंखों में यादों का जुगनू जगमगा गया। जब यह पेट मे था-जो आज कन्धे पर है-तो इसकी मां ने, जो आंगन लीप रही है कहा था-‘‘सुनो जी आज काम से लौटते समय एक-दो मीटर कपड़ा लेते आना।’

-‘‘क्यों’

-‘‘ये पहनेगा क्या’वह अपने पेट की तरफ देखकर शरमा गई थी।

...बूढ़े पिता ने यादों के जुगनू को उड़ा दिया। अभी तो दो बेटे और एक बेटी हैं।

...उन्होंने हमारी आंखों के आंसू भी छीन लिए।

...ये कौन हैं जो तमाम लाशों के चारों तरफ सिर झुकाए बैठे हैं और खामोशी में अपने को घोल रहे हैं।

अब गिनती करना भी छोड़ दिया गया है। क्या फर्क पड़ता है, न मारने वाले की आंख में आंसू आता है और मरने वाले के रिश्तेदार ही होते हैं। सबने मान लिया है, जान लिया है, समझ-बूझ लिया है।

-ये पानी मांगने गए थे।

-ये बिजली मांगने गए थे।

-और इधर...पता नहीं कितनी लाशें पड़ी हैं।

-वे इंसाफ मांगने गए थे।

-क्यों मार दिया

-बहुत बड़ा जुर्म किया है।

बूढ़ा पिता कन्धे पर जवान बेटे की लाश उठाए खड़ा है। उसकी मां आंगन लीप रही है। लगता है दसियों साल बीत गए हैं और यह दृश्य ठहर गया है जैसे पहाड़...जैसे नदियां...बूढ़े पिता को जुगनू परेशान कर रहे हैं...ये बूढ़ी औरत जो आंगन लीप रही है दरअसल जादूगरनी है। ये आधा किला चावल और चार-पांच आलू से ऐसा खाने बनाना जानती है जिससे चार बच्चों और बाप का पेट भर जाता है। उसका पेट तो हमेशा भरा ही रहता है।

...ये औरत...जादूगरनी है...बच्चे ही नहीं...न जाने क्या-क्या पैदा कर लेती है...यादों के जुगनू उड़ने लगे...

बूढ़ी औरत लिपाई करती रही। धीरे-धीरे जमीने सूखती रही। लोग जमा होते रहे। बूढ़ा पिता जवान बेटे की लाश कन्धे पर रखे खड़ा रहा। सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा।

दो भाई कहीं से कुछ फूल ले आए। उन्होंने फूल एक कोने में रख दिए और अपने पिता की तरफ देखा। बड़े भाई की लाश से खून की बूंदें टपक-टपक कर जमीन पर गिर रही थीं और बूढ़े बाप का कन्धा पूरा गीला हो गया था लेकिन वह थका नहीं था। दोनों बेटे बाप के कन्धे को देख रहे थे और सोच रहे थे उन्हें भी एक दिन इसी तरह यहां आना होगा। बहन झाडू देगी...मां लिपाई...

-ये अस्पताल के सामने पड़े थे...वहां से लाए गए।

-ये खेती-बाड़ी कर रहे थे।

-और ये

-ये...ये कुछ नहीं कर रहे थे।

-और ये...

-ये गैस...से...

-और ये

-ये बेकार थे...बेकार।

बूढ़ा आगे बढ़ा, बुढ़िया ने उसकी मदद करनी चाही पर बूढ़े ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। दोनों लड़कों ने भी पिता के कन्धे से बड़े भाई की लाश को उतारने में मदद करनी चाही लेकिन बूढ़े ने मना कर दिया। लड़की अपने बूढ़े पिता की मदद की गरज से पीछे हट गई।

बूढ़े ने बहुत धीरे-धीरे एक-एक क्षण लेते हुए; बहुत आहिस्ता-आहिस्ता अपने जवान बेटे की लाश को जमीन को तरफ लाना शुरू किया। पहले पीठ...फिर सिर...फिर टांगें...बुशर्ट खून में तर है।

-नाक से भी खून निकल रहा है।

-ये कैसे मरा एक आवाज आई

-क्या करोगे पूछकर बूढ़ा बोला।

-क्या हुआ था

-सब एक ही बात है...नतीजा एक ही निकलता है...

सब खामोश हो गए।

भाइयों ने अपने बड़े भाई का डिग्री लेते हुए ‘कन्वोकेशन’ में लिया गया चित्र सामने रख दिया। बहन ने फूल चेहरे के इधर-उधर रख दिए। बूढ़ी मां लगातार जवान बेटे का चेहरा देखती रही...बिलकुल पत्थर की मूर्ति की तरह।

बूढ़ा पिता लड़खड़ाकर खड़ा हो गया और हवा में हाथ हिलाने लगा जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। फिर लोग वहां से हट गए। लाश का सिर बुढ़िया ने अपनी गोद में ले लिया। माथे पर से खून में सने बाल हआए और चूम लिया। उसके होंठों पर बेटे का खून लग गया। बूढ़े ने एक अजीब तरह की भयानक और दर्द में डूबी चीख मारी...पूरे आंगन में जुगनू चमकने लगे...हर तरफ जुगनू ही जुगनू...सब कुछ जुगनुओं के बीच खो गया...एक किलकारी एक जुगनू...धरती पर पहला कदम...एक जुगनू...गुलाबी होंठों से पहला उच्चारित शब्द एक जुगनू...स्कूल का बस्ता...टिफिन...सपना...जुगनू...जुगनुओं के बीच एक जीवन उभरा...एक पूरा जीवन...लोगों का जीवन...और जुगनुओं मं डूब गया...मां की सिसकियां से जुगनू लिपटे रहे। बाप हवा में हाथ उठाए विपत्तियों को देखता रहा...भाई और बहन जुगनुओं में खोते चले गए...आसमान का रंग फिर बदलने लगा...धीरे-धीरे एक करुण आवाज धरती से आती सुनाई देने लगी...अस्पष्ट आवाज साफ होती चली गई...करुण स्वर उभरा...ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी...जो शहीद हुए...।

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