रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - पढ़ोगे लिखोगे तो होगे खराब

पढ़ोगे लिखोगे तो होगे खराब

डॉ पांडेय का व्याख्यान जारी है, ‘‘डॉक्टर साहेब! गर्मियों में विशेषज्ञ मिलने मुश्किल हो जाते हैं....अरे शिमला या ‘नैनीताल हो तो कहिए मैं सैकड़ों विशेषज्ञ जमा कर जमा कर दूं लेकिन गर्मियों में दिल्ली...अरे भाईजी, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति वगैरा की बात तो छोड़ दो, छुटभइए नेता गर्मियों में राजधानी छोड़ देते हैं...अब जब पानी नहीं बरसेगा, यही समस्या रहेगी...अब देखोजी, हमें तो यही आदेश है कि विशेषज्ञों की मानों...तो हम पालन करते हैं...विश्व बैंक से हम लोगों ने दस करोंड़ मांगा था नए स्कूल खोलने के लिए। उन्होंने कहा दस करोड़ से पहले ‘ये’ और ‘ये’ और ‘ये’ कराएंगे। इसके लिए पांच करोड़ देंगे...फिर पाठ्यक्रम बदलने को इतना, फिर इतना...होते-होते सौ करोड़ हो गया है...चलो ठीक है, शिक्षा पर पैसा लग रहा है...पर समझ में कम ही आता हे। अब देखोगे, इन्हीें विशेषज्ञों ने बच्चों के बस्तों का वजन बढ़ाया फिर येई बोले, बच्चों की तो कमर टूटी जा रही है...जब सुनोजी विशेषज्ञ कये हैं हमारी शिक्षा चौहद्दी में कैद हो गई हैं। देखोजी, पहले स्कूल की चार दीवारें...फिर कहवें है क्लास रूम की चार दीवारें...पाठ्क्रम की चार दीवारें, अध्यापक की चार दीवरें...परीक्षा की चार दीवारी...अब बोलो...आदेश हो जाए तो तोड़ दी जावें सब दीवालें-’’

‘‘साढ़े दस बज रहा है।’’ डॉ सक्सेना बोले।

‘‘अरे डाक साहेब क्यों जल्दिया रहे हो...अभी न आए होंगें।’’ पैंतालीस अध्यापक, जिनमें आधी के करीब महिलाएं और लड़कियां। कुछ अध्यापक गंवार जैसे लग रहे थे और कुछ अध्यापिकाएं अच्छा-ख़ासा फैशन किए हुए थीं। इन सबके चेहरों पर एक असहज भाव था। ऐसा लगता था कि वे इस सबसे सहमत नहीं हैं जो हो रहा है या होने जा रहा है। डॉ. सक्सेना ने सोचा, ऐसा तो अक़सर ही होता है। जब बातचीत शुरू होगी तो विश्वास का रिश्ता बनता चला जाएगा और असहजता दूर हो जाएगी। डॉ. सक्सेना ने बहुत प्रभावशाली ढंग से अपनी बात शुरू की और मुद्दे के विभिन्न पक्षों को रेखांकित किया ताकि उन पर विस्तार से चर्चा हो सके। इन सब प्रयासों के बाद भी डॉ. सक्सेना को लगा कि सामने बैठे अध्यापकों-अध्यापिकाओं के चेहरे पर मजाक उड़ाने, उपहास करने, बोलने वाले को जोकर समझने के भाव आ गए हैं। कुछ जेरे-लब मुस्कुराने भी लगे। तीस साल पढ़ाने दुष्ट से दुष्ट छात्र को सीधा कर देने का दावा करने वाले डॉ. सक्सेना अपना चेहरा, जितना कठोर बना सकते थे, बना लिया। आवाज जितनी भारी कर सकते कर ली और बॉडी लेंग्वेज को जितना आक्रामण बना सकते थे बना लिया। लेकिन हैरत की बात यह कि सामने बैठे लोगों के चेहरों पर उपहास उड़ाने वाला भाव दिखाई देता रहा। एक अध्यापिका के चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे वह कुछ कहना चाहती है।

‘‘सर आप जो कुछ बता रहे हैं बहुत अच्छा है। पर हमारे काम का नहीं है’’ अध्यापिका बोली।

इस प्रतिक्रिया पर डॉ. सक्सेना को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन पी गए और बोले, ‘‘क्या समझ नहीं आ रहा’

‘‘नो सर...समझ में तो सब आ रहा है।’’

‘‘तब यह उपयोगी क्यों नहीं लग रहा है’ डॉ. सक्सेना ने पूछा और अध्यापकों को पूरी क्लास खुलकर मुस्कुराने लगी। डॉ. सक्सेना ने सोचा, क्या वे ‘थर्ड डिग्री’ में चले जाएं पर यह भी लगा के ये लड़के नहीं हैं, अध्यापक हैं, कहीं गड़बड़ न हो जाए।

‘‘सर, जहां बच्चे पढ़ना ही न चाहते हों वहां टीचर क्या कर सकता है’ एक प्रौढ़ अध्यापक ने गंभीरता से कहा और कुछ नौजवान अध्यापक हंस दिए। डॉ. सक्सेना का ख्ूान खौल गया। वे तुरन्त समझ गए कि ये साले मुझे...यानी डॉ. आर बी सक्सेना प्रोफेसर अध्यक्ष और पता नहीं कितनी राष्ट्रीय समितियों और दलों के सदस्य को उखाड़ना चाहते हैं, इनको शायद मालूम नहीं कि इनका सबसे बड़ा बॉस मुझे सर कहता है और पूरी बातचीत में सिर्फ ‘सर’ ही ‘सर’ करता रहता है।

‘‘ बच्चे पढ़ना नहीं चाहते या आप लोग पढ़ाना नहीं चाहते।’’ डॉ. सक्सेना ने पलटवार किया।

‘‘सर हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं...ईमानदारी से पढ़ाना चाहते हैं...पर वे नहीं पढ़ते।’’ एक लेटी टीचर बोली उसका बोलने का ढंग और चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सच बाल रही है और मजाक नहीं उड़ा रही है।

‘‘सर, आप ऐसे नहीं समझोगे...’’ एक ग्रामीण क्षेत्र का सा लगने वाला अध्यापक बोला, ‘ऐसे है जी कि हमारे स्कूलों में सबसे कमजोर वर्ग के बच्चे आवे हैं...

‘‘वरग नहीं वर्ग...’’किसी ने चुपके से कहा और पूरी क्लास हंसने लगी।

‘‘वही समझ लो जी...अपनी तो भाषा ऐसी है...तो जी...’’

‘‘ठीक है, ठीक है, बैठिए, मैं समझ गया’’

डॉ. सक्सेना ने अध्यापक को चुप कर दिया।

एक फैशनेबुल अध्यापिका बोलने लगी, ‘‘सर, हमारे स्कूल में मजदूरों, रेड़ी वालों, ठेले वालों, कामगारों, सफाई करने वालों, माली-धोबी परिवारों के बच्चे आते हैं। सर, हम उन्हें वह सब सिखाते हैं जो आम तौर पर बच्चों के मां-बाप सिखा देते हैं। इन्हें बैठना तक नहीं आता। खाना नहीं आता। इन्हें हम सिखाते हैं कि देखो सबके सामने नाक में उंगली डालकर...।’’ पूरी क्लास हंसने लगी।

‘‘तो फिर बताइए। सर...’

‘‘तो पढ़ाने में क्या प्रॉब्लम है’

‘‘बच्चे रेगुलर स्कूल नहीं आते...लंच टाइम में आते हैं। स्कूल की तरफ से लंच मिलता है, वह खाते हैं और चले जाते हैं...कभी उनके परिवार वालों को इलाके में मजदूरी नहीं मिलती तो कहीं और चले जाते हैं...’’

‘‘अरे, ये सब बच्चों के साथ तो न होता होगा’ डॉ. सक्सेना ने उन्हें पकड़ा।

‘‘सर, ये समझ लो...बच्चा स्कूल में पांचवी तक पढ़ता है, पास होकर चला जाता है, पर क ख ग न तो पढ़ सकता है न लिख सकता है।’’

डॉ. सक्सेना को लगा, यह सफेद झूठ है और अगर कहीं ये सच है तो इससे बड़ा कोई सच नहीं हो सकता।

‘‘यह कैसे ‘पॉसिबल’ है’’ डॉ. सक्सेना की आवाज में विशेषज्ञों वाली ठनक आ गई।

‘‘सर इस तरह कि हम बच्चों को फेल नहीं कर सकते’

डॉ. सक्सेना को एक धक्का और लगा। यह कैसी पढ़ाई है और कैसा स्कूल है

‘‘क्या आपको ऐसा आदेश दिया गया है कि...’’

‘‘सर, लिखकर तो नहीं...पर मौखिक रूप से दिया ही गया है। तर्क यह है कि फेल होने पर लड़के पढ़ाई छोड़ देते हैं और...’’

‘‘तो स्कूल में कोई फेल नहीं होता’

‘‘यस सर...75 प्रतिशत हाजिरी जिसकी भी होती है उसे पास करना पड़ता है’’

एक कठिनाई डॉ. सक्सेना को यह लग रही थी कि बाचचीत स्कूल व्यवस्था पर केन्द्रित हो गई थी जबकि यहां उनका काम अच्छे शिक्षण पर भाषण देना था।

‘‘देखिए, ऐसा है कि आप लोग बच्चों की पढ़ाई में दिलचस्पी पैदा कराने के लिए कुछ तो कर ही सकते हैं।’’

‘‘क्यों नहीं...जरूर कुछ बच्चे पढ़ते भी हैं पर जब वे जानते हैं कि पढ़ने वाले और न पढ़ने वाले दोनों पास हो जाएंगे तो बस...’’

‘‘देखिए, मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि आप लोग हर हालत में अपनी ‘परफार्मेंस’ इम्प्रूव कर सकते हैं।’’

‘‘सर, कृप्या मेरी एक छोटी और बुनियादी बात पर विश्वास करें कि अगर...’’ उन्होंने दाढ़ी वाले अध्यापक की बात काट दी क्योंकि उन्हें मालूम है कि छोटी बुनियादी बातों का वह जवाब न दे पायेंगे।

‘‘देखिए समस्याएं तो होंगी ही...पर...’’

उनकी बात काटकर एक अध्यापिका बोली, ‘‘सर, आपने वह किताब देखी है जो हम पहले दर्जे के बच्चे को पढ़ाते हैं।’’ उसने किताब बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहला पाठ है रसोईघर...पहला वाक्य ‘फल खा’ जिन बच्चों को हम पढ़ाते हैं वे जानता ही नहीं कि फल क्या होता है’ अध्यापक ने कहा और बाकी सब हंसने लगे।

‘‘देखिए सर, यह रसोईघर का चित्र बना है...हमारे बच्चों ने तो गैस सिलेंडर, फ्रिज, बर्तन रखने की अलमारियां देखी तक नहीं होतीं...उनकी समझ में यह सब क्या आएगा...’

जब तक डॉ. सक्सेना जवाब देते, एक दूसरा सवाल उछला, ‘‘सर, जिस बच्चे को ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ न आता हो वह वाक्य कैसे पढ़ेगा या सीखेगा

’’

‘‘देखिए, इसे डायरेक्ट मैथेड कहते हैं।’’

‘‘वो ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ वाले सिस्टम में क्या खराबी थी’

‘‘अब देखिए, विशेषज्ञों को लगा कि नए मैथेड से...’’

‘‘सर मैथेड छोड़िए...ये देखिए मां का चित्र। सिलाई कर रही हैं।

पिताजी ऑफिस जा रहे हैं। हाथ में छाता और पोर्ट फोलियो है...हमारे स्कूल के बच्चे झुग्गी-झोंपड़ी मजदूर...’’

डॉ. सक्सेना उनकी बात काटकर बोले, ‘‘क्या नई किताबें बनाते समय विशेषज्ञों ने आप लोगों से या स्कूल के बच्चों से कोई बातचीत की थी।

‘‘नहीं।’’ चालीस आवाजें एक साथ आईं।

‘‘अब बताइए सर...हम क्या करें...गाज हमारे ही ऊपर गिरती हैं बच्चों को क्या ‘इनकरेज’ करें’

‘‘आप लोगे निजी तौर पर कुछ कर सकते हैं’

‘‘सर, हमारे स्कूल में सात सौ लड़के हैं। ग्यारह अध्यापक है। एक क्लास रूम में तीन क्लासें बैठती हैं। एक अध्यापक एक साथ तीन कक्षाओं को पढ़ाता है...’’

डॉ. सक्सेना को लगा जैसे वे आश्चर्य के समुद्र में डूबते चले जा रहे हैं...धीरे-धीरे अंधेरे में किसी बहुत बड़े समुद्री जहाज की तरह उनके अन्दर पानी भर रहा है और आत्मा धीरे-धीरे निकल रही है...यह क्या हो रहा है अध्यापक यह सिद्ध किए दे रहे हैं कि यह भी एक बड़े भारी षड्यंत्र का हिस्सा है।

‘‘देखिए यह स्थिति हर स्कूल में तो नहीं होंगी’डॉ. सक्सेना ने कहा।

‘‘हां सर, यह बात तो आपकी ठीक है।...ग्रामीण क्षेत्रों में जो स्कूल हैं...वहां यह स्थित है...शहरी क्षेत्रों में...

‘‘शहरी क्षेत्रों में बच्चे गैर-हाजिरी बहुत रहते हैं...’’

‘‘सर, दरअसल इनको पढ़ाना है तो पहले इनके मां-बाप को पढ़ाओ।’’ किसी चंचल अध्यापिका ने कहा और सब हंस पड़े।

‘‘हां जी, सौ की सीधी बात है।’’ किसी ने प्रतिक्रिया दी। डॉ. सक्सेना घबरा गए। फिर वही हो रहा है। ये लोग मुझे ‘डुबो’ रहे हैं उस पानी मे जहां मुर्गाबियां नहीं हैं...जहां पानी ही पानी है।

‘‘सर, बच्चों के मां-बाप को पढ़ाया जाए तो उन्हें खिलाएगा कौन’

‘‘सरकार खिलाए’ किसी अध्यापक ने कहा।

‘‘सरकार के पास इतना है’ किसी दूसरे अध्यापक ने कहा।

‘‘क्यों नहीं है’

‘‘अभी पढ़ा नहीं उद्योगप़तियों का ढाई करोड़ का कर्ज़ माफ़ कर दिया है सरकार ने...क्या कहते हैं। अंग्रेज़ी में बड़ा अच्छा नाम दिया है-नॉन रिंकवरिंग...’’

डॉ. सक्सेना ने घबराकर अध्यापक की बात काट दी, ‘‘ठहरिए...ये यहां डिस्कसन करने का मुद्दा नहीं है।’’ वे डर रहे थे कि डायरेक्टर साहब कहेंगे-क्यों जी आपको यहां मुर्गाबियों का शिकार करने के लिए बुलाया गया था और यहां तो शिकारियों का शिकार करने वाली बातें करने लगे। ‘‘अरे ये राजनीति गन्दी चीज़ है। छोड़िए इसको, केवल यह बताइए कि बच्चों की पढ़ाई को किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है।

‘‘सर अब बात निकल आई है तो कहने दीजिए सर...हमारे स्कूलों में हमारे अधिकारियों के बच्चे क्यों नहीं पढ़ते मंत्रियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं जाते।’’

डॉ. सक्सेना फिर विवश हो गए, ‘‘ठहरिए...ये बातें आप लोग अपने संगठनों में डिस्कस करे।’’

‘‘सर, हमारे संगठनों में यह कभी डिस्कस नहीं होता।’’

‘‘देखिए अब मैं आप लोगों से मनोवैज्ञानिक पक्षों पर बात करना चाहता हूं। बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक है कि हम उनके मनोविज्ञान को समझें...। हर बच्चे का अपना अलग मनोविज्ञान होता है...’’

अध्यापक आपस में बातें का रहे थे। महिला अध्यापिका बड़े सहज ढंग से खुसुर-पुसुर कर रही थीं। ऐसा लगता था जैसे वे इतवार के दिन जाड़ों की रेशमी धूम में बैठी स्वेटर बुन रही हों और बातें कर रही हों। पुरुष अध्यापकों के भी कर्ह गुट बन गए थे और सब बातों में लीन हो गए थे। एक दो अध्यापक बार-बार घड़ी देख रहे थे। डॉ. सक्सेना लगातार बिना रुके बोले जा रहे हैं।

कुछ देर बाद शोर का स्वरूप बदल गया। अब शोर ने छोटे-छोटे समूहों के आकार को तोड़ दिया और वह क्लासव्यापी हो गया और उन्हें लगा कि बोल भी नहीं पाएंगे।

‘‘आप लोग क्या बातें कर रहे हैं’ उन्होेंने पूछा।

‘‘सर, हमारी क्लास एक बजे समाप्त होगी।’’

‘‘हां, मुझसे आपके डायरेक्टर ने यही कहा है कि एक बजे तक मैं आपको लेक्चर देता रहूं।’’

‘‘सर, उसके बाद हमारी हाजिरी होगी।’’

‘‘ठीक है।’’

‘‘नहीं सर...ठीक कैसे है...एक बजे तो क्लास खत्म हो जाती है। हमें चले जाना है। एक बजे अगर हाजिरी होगी तो पन्द्रह मिनट तो हाजिरी में लग जाएंगें।’’ एक महिला अध्यापिका बोली।

‘‘तो फिर’’

‘‘हमारी हाजिरी पौन बजे होनी चाहिए ताकि हम ठीक एक बजे छुट्टी पा सकें।’’

‘‘दस-पन्द्रह मिनट से क्या फर्क पड़ता है।’’ डॉ. सक्सेना ने कहा।

‘‘मेरी बस छूट जाएगी...फिर एक घंटे बाद बस है...घर पहुंचते-पहुंचतेतीन बज जाएंगे। उन्हें खाना देना है। बंटी को स्कूल बस से लेना है, रोटी डालना है...उन्हें गरम रोटी ही देती हूं। दाल में छोंक भी नहीं लगाई है...’’ महिला बोलती रही।...

एक पुरुष अध्यापक ने कहा, ‘‘वैसे भी सिद्धान्त की बात है...यदि एक बजे छुट्टी होनी है तो एक ही बजे होनी चाहिए।’’

‘‘मुझे तो नजफगढ़ जाना है...देर हो जाती है तो अंधेरा हो जाता है...क्रिमनल एरिया पड़ता है...कुछ हो गया तो...’’लड़की चुप हो गई।

‘‘हाज़िरी पौन बजे ही होनी चाहिए।’’ एक दादा क़िस्म के अध्यापक ने धमकी भरे अंदाज में कहा।

‘‘सर, लेडीज की प्रॉब्लम को कोई नहीं समझता...मैं तो खैर मैरीड हूं...बच्चे बस्ते लिये घर के बाहर ‘बेट’ कर रहे होंगे...चाबी पड़ोस में देने के लिए ‘वो’ मना करते हैं...सर जो लेडी टीचर मैरीड नहीं हैं उनके घरों में भी कुछ तो है ही है सर..’’

‘‘सर, हम लड़कियां देर से घर पहुंचे तो हजार तरह की बातें होने लगती हैं।’’

डॉ. सक्सेना को लगा कि इस समय संसार बड़ा और जरूरी काम यही है कि इन लोगों की पन्द्रह मिनट पहले हाजिरी हो जाए ताकि ये ठीक एक बजे स्कूल से निक़ल सकें। उन्होंने डायरेक्टर पांडेय जी को बुलाया वे रजिस्टर लेकर आए।

रजिस्टार जैसे ही मेज पर रखा गया, यह लगा गंदे चिपचिपे मैले मिठाई बांधने वाले कपड़े पर मक्खियों ने हमला बोल दिया हो। ऐसी काँय-काँय, भाँय-भाँय होने लगी कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

डॉ. सक्सेना थके-हारे और कुछ अपमानित भी डायरेक्टर के कमरे में जहां कूलर चल रहा था, आ गए। डॉ. पांडेय को पता नहीं कैसे मालूम हो गया क्लास में मेरे साथ क्या हुआ है।

‘‘अब देखो जी, हम तो इन्हें ‘बेस्ट ट्रेनर’ देते हैं...अब इनकी जिम्मेदारी है कि कुछ सीखते हैं या नहीं।’’

डॉ. सक्सेना डॉ. पांडेय से कहना चाहते थे कि, यार पांडेय क्या तुम्हें हक़ीक़त में कुछ नही मालूम या तुम सब जानते हो डॉ. पांडेय क्या तुम्हें मालूम कि एक से सौ तक सब उलट-पुलट गया है।

वह यह सब सोच रहे थे और डॉ. पांडेय पता नहीं कैसे समझ गए कि उनके पास सीधे और छोटे सवाल हैं। डॉ. पांडेय वही करने लगे जो डॉ. सक्सेना क्लासरूम में कर रहे थे। यानी बिना रुके, लगातार बोलने लगे ताकि सवाल पूछने का मौका न मिले। डॉ. पांडेय लगातार बोल रहे हैं, वे सांस ही नहीं ले रहे, ‘‘अब जी ये तो दूसरा दिन है...तीस दिन चलना है वर्कशॉप...फिर रिपोर्ट बनेगी, वर्ल्ड बैंक को जाएगी...बाइस सेंटर बनाए गए हैं। हर सेंटर में सौ के करीब टीचर हैं...’’भाषण देते-देते ही उन्होंने डॉ. सक्सेना की तरफ एक ‘लिफाफा बढ़ाया। उन्होंने ‘लिफाफा’ जेब में रख लिया। डॉ. पांडेय बोले जा रहे हैं...।

डॉ. सक्सेना दरवाजे के बाहर देख रहे हैं, शिक्षक स्कूल से बाहर निकल रहे हैं...फिर लगा कि न तो ये शिक्षक हैं, न वह ट्रेनर हैं, न डॉ. पांडेय निदेशक हैं, न ये स्कूल है। डॉ. सक्सेना को हैरत हुई कि वह इतने रहस्यवादी कैसे बन गए। पर अच्छा लगा...।

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