रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - खूंटा

खूंटा

राजधानी की लगभग सभी साहित्यिक गतिविधियों के साक्षी, साहित्यिक सेमीनारों और गोष्ठियों के नियमित वक्ता, आलोचना, कविता और कथा-साहित्य के भावी व्यक्तित्व, कहानी के ठहराव, कविता की वापसी और आलोचना के निष्प्राण होने की चिंता में आधे से ज्यादा घुल गए, स्थापित साहित्यकारों की सृजानात्मक तथा व्यक्तिगत समस्याओं में रुचि लेने वाले, व्यवसायिक तथा अव्यावसायिक पत्रिकाओं के दफ्तरों के पर्यटक श्री साहित्येश्वर इस वक्त अपने कमरे में सो रहे हैं। बिहार का एक शहर जब उनकी साहित्यिक आकांक्षाओं और उम्मीदों के बोझ से चरमराने लगा और जब स्थानीय साहित्यकारों की जलन-कुढ़न बर्दाश्त से बाहर हो गई तो श्री साहित्येश्वर ने शहर के कॉफीहाउस में घोषणा की कि वे दिल्ली जा रहे हैं, क्योंकि आजकल हिंदी साहित्य की सेवा वहीं हो रही है और वे किसी भी कीमत पर यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि उनके हाथ लगाये बिना हिंदी साहित्य, जो दरिद्र है, पिछड़ा हुआ है। सामंती और मध्यवर्गीय संस्कारों से ग्रस्त है उनका उद्धार हो जाए। अपना बक्सा उठाया और शहर के स्टेशन पर वे आए तो आशा के विपरीत उन्हें छोड़ने स्थानीय साहित्यकारों में कोई नहीं आया था। उन्हें स्थानीय साहित्यकारों की क्षुद्रता पर गुस्सा आया और बेचैनी से दिल्ली जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करते रहे। आज जब वे अपने दिल्ली प्रस्थान की बात सोचते हैं, तो आत्मविश्वास के भाव से न केवल खुद सराबोर हो जाते हैं, बल्कि आसपास बैठे हुए लोगों तक को उन पर होने वाली बारिश का आभास हो जाता है।

अपने शहर में उनका घर है, पत्नी और बच्चे हैं, अच्छी-खासी जमीन है और अच्छा-खासा सम्मान है, जिसे उन्होंने साहित्य की भेंट चढ़ा दिया है। जाहिर है कहां साहित्य कर्म और कहां एक बच्चे को बगल में दबाए पिता के फर्ज निभाने की विवशता। पत्नी से उन्होंने साफ कह दिया है कि वे महान साहित्यकार बनने के लिए पैदा हुए हैं और ऐसा करके वे दिखा देंगे। हो सकता है यह उनकी मृत्यु के बाद, जैसा कि मुक्तिबोध के साथ हुआ। या ऐसा भी सकता कि यह उनके जीवनकाल ही में हो जाए, जैसा की अज्ञेय के साथ हुआ। वे पसंद दूसरा रास्ता ही करेंगे, पर यह होगा अवश्य। सभी साहित्यकारों की पत्नियों ने अपने पतियों के महान साहित्यकार बन जाने की प्रक्रिया में मर्जी या विवश्ता से हाथ बंटाया है। उनकी पत्नी को भी यह करना पड़ेगा।

साहित्येश्वर इस वक्त अपने कमरे में सो रहे हैं। उनके सिरहाने मुक्तिबोध बैठे बीड़ी पी-पीकर धुंआ छोड़ रहे हैं। उनके तकिए के नीचे निराला बैठे गोश्त पका रहे हैं, प्रसाद ‘कामायनी’ लिख रहे हैं, प्रेमचन्द्र अपने ग्रामीण पात्रों के साथ जमीदारी व्यवस्था के तोड़ दिए जाने की जबरदस्त वकालत कर रहे हैं। अज्ञेय हवाई जहाज से उतर रहे हैं। जैनेन्द्र एक बाल पकड़े बैठे हैं, जिसकी खाल निकाल देने की चिंता उन्हे सता रही है। ‘भैसा-गाड़ी’ चली जा रही है। ‘चित्रलेखा’ मदिरा के नशे में चूर चित्रगुप्त की ओर अधखुली आंखों से देख रही है। ‘नई कहानी’ का आंदोलन पड़ा कराह रहा है। साठोत्तरी कहानी और नई कविता के प्रवर्तक बैठे गप्पें मार रहे हैं। जनवादी कहानी अंगड़ाई ले रही है। कहने का मतलब यह कि साहित्येश्वर सो रहे हैं और पूरा हिंदी साहित्य या कहें हिन्दी साहित्य की परंपरा या कहें हिंदी की पुस्तकें उनके बिस्तर पर इधर-उधर खुली पड़ी है। रैक में रखी हैं। स्टूल पर धरी हैं। चारों ओर साहित्य-ही-साहित्य है। या कहें जो कुछ है वह साहित्य ही है, साहित्य के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इसमें साहित्येश्वर भी शामिल हैं। उनकी दुबली-पतली पांच फिट की काया, माथे पर बिखरे हुए बाल, खादी, आश्रम से खरीदा गया कुर्ता और करोलबाग से खरीदी गई पैंट और लाजपतनगर से खरीदी गई चप्पल, सब साहित्यमय हैं। क्यों न हों जब हर चीज का इतिहास एक बड़ी साहित्यिक घटना से जुड़ा हुआ है-देखिए यह चप्पल मैंने उस गोष्ठी में जाने से पहले खरीदी थी, जिसमें सुधीश पचौरी और कर्णसिंह चौहान ने नई कहानी की पेटी बुर्जूआ रोमानी प्रवृत्तियां की धज्जियां बिखेर दी थीं। यह कुर्ता मैंने सर्वेश्वरजी के घर से लौटते हुए खरीदा था, और यह पेन, यह तो बड़ा ऐतिहासिक है इसे मैंने उस वक्त खरीदा था जब अज्ञेयजी से मिलने जा रहा था। तब ही रास्ते में प्रयाग शुक्ल मिले थे और उन्होंने मुझसे कहा था-भाई साहित्येश्वरजी, आप कभी घर क्यो नहीं आते और यह डायरी यह मुझे राजेन्द्र यादव ने दी थी। देखिऐ पहले पृष्ठ पर उनका नाम भी लिखा हुआ है। हुआ यह कि मैं दरियागंज में ‘दिनमान’ गया था, वहां से उठा तो राधाकृष्ण में बैठ गया, उस जमाने में वहां सुरेश सलिल हुआ करते थे, नहीं,-नहीं सुरेश सलिल तो जा चुके थे। उस समय वहां सौमित्र मोहन थे। नहीं, नहीं वे जा चुके थे। मैंने किसी के साथ बैठकर चाय पी थी और फिर वहां से याद आया तो ‘नेशनल’ होता हुआ ‘अक्षर’ गया था। राजेन्द्र यादव बैठे लंच कर रहे थे। बोले-साहित्येश्वर आओ, कुछ खाओ मैंने कहा-राजेन्द्र यादव बैठे लंच कर रहे थे। बोले-साहित्येश्वर आओ, कुछ खाओ। मैंने कहा-राजेन्द्रजी, आपके बारे में तो सुना था कि आप खाने को किसी से नहीं पूछते। राजेन्द्र जी ने एक ठहाका लगाकर कहा था, यार सुना तो तुमने ठीक ही है, पर तुमसे तो पूछ रहा हूं। खैर एक प्लेट में फल रखे थे। राजेन्द्रजी ने उसमें रखा एक मात्र सेब खुद उठाकर अमरूद मेरी तरफ बढ़ा दिए।

साहित्येश्वर इस वक्त सो रहे हैं। दोपाहर में इस तरह सोना उनके लिए अजूबा है, क्योंकि दोपाहर उनके काम का समय होता है। जब वे अपने अभियान पर निकलते हैं, बस पकड़कर सीधे आई.टी.ओ. पर उतरते हैं। ‘सांध्य टाइम्स’ के दफ्तर विष्णु नागर और इब्बार रबी से मिलते हैं। कभी-कभी जब मौका मिलता है एक-आध साहित्यिक विचार या खबर का आदान-प्रदान हो जाता है। वहां से टहलते-टहलते दरियागंज आते हैं। प्रकाशन जगत से लेखक का जीवंत संपर्क होना चाहिए। उस उसूल को मानने वाले साहित्येश्वर सरस्वती प्रकाशन में धुसते हैं। ‘राधाकृष्ण’ से होते ‘नेशनल’ में एक नजर मारते, ‘अक्षर’ में जाकर बैठ जाते हैं। वहां से उठते हैं तो ‘राजकमल’ में आस्थानाजी और कृषकजी के पास ठहरकर दम लेते हैं, और वहां से टहलते-टहलते ‘सारिका’ के दफ्तर में पहुंचते हैं। ‘आप क्या लिख रहे हैं यह सवाल बड़ी शालीनता, जिज्ञासा और उत्साह से पूछते वे ‘सारिका’ से ‘दिनमान’ निकल जाते हैं। और आप क्या लिख रहे है यदि साहित्येश्वरजी से कोईपूछ लेता है तो उनहे चेहरे पर ऐसे भाव आते हैं, जैसे जीवन सफल हो गये हो। राजधानी मे, बिहार के एक साधारण शहर से आए कर्मठ निष्ठावान, ईमानदार साहित्यकार के लिए अपने-आपको साहित्यकार मनवा लेना हंसी-खेल नहीं है!

महीने में दो दिन उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लिए सुरक्षित रख छोड़े हैं। वहां का माहौल उन्हें पसंद है। एक साथ इतना क्रान्तिवादी, इतना भव्य तथा रोमांटिक! उन्होंने रोमांटिक रेवोल्यूशनरी होने का सही अर्थ यहीं आकर समझा है। उनके जीवन की एक यह भी सबसे बड़ी इच्छा है कि वे ‘जवाहरलाल’ में दाखिल हो जाएं, लेकिन हिंदुस्तान में चूंकि ऐसे विश्वविद्यालय बहुत कम हैं इसलिए आपा-धापी भी खूब है और अभी तक वे इतना आपा-धापी नहीं सीख सके हैं।

साहित्येश्वर हर साल दो दौरे करते हैं। यह उन दौंरो के अतिरिक्त हैं जो साहित्यिक सम्मेलनों, गाष्ठियों आदि के लिए होते हैं। गर्मियों शुरू होने पर वे दिल्ली से पूरब की ओर प्रस्थान करते हैं। पहला पड़ाव इलाहाबाद होता है-हिन्दी साहित्य की भूतपूर्व राजधानी। वहां वे भैरवप्रसाद गुप्त से लेकर उपेन्द्रनाथ अश्क तक से मिलते हैं। मिलने के बारे में उनका नियम है-सबसे मिलें। पता नहीं कब किससे क्या काम पड़ जाए। इलाहाबाद में एक-दो सप्ताह बिताने के बाद वे हिंदी साहित्य की दूसरी भूतपूर्व राजधानी काशी चले आते हैं। वहां भी वे सबसे मिलते हैं। और अगला पड़ाव पटना में पड़ता है। पटना से मुजफ्फरपुर और दिल्ली वापसी। वापसी लखनऊ होते हुए होती, क्योंकि इतने बड़े हिन्दी प्रदेश की राजधानी कैसे छोड़ी जा सकती है। दिल्ली वापस लौटने पर वे प्रसन्न दिखाई देते हैं। अब उनकी बातचीत में एक वाक्य और जुड़ जाता है। ‘आपको’ इलाहाबाद में मार्कडेयजी पूछ रहे थे। ‘‘आपको बनारस में काशीनाथ सिंह पूछ रहे थे।’’ आपको लखनऊ में मंगलेश डबराल पूछ रहे थे। ‘‘आपको पटना में कुमाररेन्द्र पारसनाथ सिंह पूछ रहे थे।’’ इसी तरह लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, पटना और मुजफ्फरपुर के साहित्यकारों को दिल्ली के साहित्यकार उनके माध्यम से पूछते हैं।

साहित्येश्वर दूसरा दौरा मध्यप्रदेश का करते हैं। यह दौरा दो ही चार साल हुए, शुरू हुआ है। जब से भोपाल हिन्दी प्रदेशों की सांस्कृतिक राजधानी हुआ है, उस समय से उन्हें लगने लगा है कि भोपाल की उपेक्षा करना ठीक नहीं है। वैसे वे यह भी मानते हैं कि भोपाल में लेखकों की तुलना में प्रकाशकों से मिलने के अवसर अधिक मिलते हैं। बहरहाल जो कुछ भी हो, वे साल में एक बार भोपाल का दौरा करते हैं और वहां भी दिल्ली के साहित्यकार उनके माध्यम से भोपाल के साहित्यकारों की खैर-खबर लेते हैं। और वापसी पर वे भोपाल के साहित्यकारों का अभिवादन दिल्ली के लेखकों को पहुंचा देते हैं। वे साहित्यिक सूचनाओं के आदान-प्रदान का भार सहर्ष उठाते हैं। जैसे नंदनजी कह रहे थे कि आपकी कहानी अभी तक नहीं आई। असद जैदी ने आपसे कहलाया है कि फोटोग्राफ अभी तक नहीं मिला, प्रकाशक परेशान हो रहा है। संदेशों के महत्त्व के साथ ही साथ संदेशवाहक का महत्त्वभी आंका जाता है और साहित्येश्वर इससे वंचित नहीं होना चाहते। उन्हें कोई इसे वंचित करना भी नहीं चाहता।

जैसा कि हम सभी उठाते हैं, साहित्येश्वरजी भी निंदा से भरपूर आनंद उठाते हैं लेकिन निंदा वे किसी की करते नहीं। किसी एक साहित्यकार द्वारा किसी दूसरे साहित्यकार की, की गई निंदा से भरपूर मजा उठाते है और उसे आगे बढ़ा देते, ठीक उसी श्रद्धा के साथ जैसे कामना पूरी होने पर संतोषी माता के भक्त पर्चे छपवाकर बंटवा देते हैं। जिनमें अंत में लिखा होता है कि यदि पर्चा पढ़ने वाले ने इसी तरह के पांच सौ पर्चे छपवाकर न बंटवा दिए तो उसके घर में आग लग जाएगी। साहित्येश्वर अपने घर को पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहते हैं और हमेशा पर्चे छपवा देते हैं। अपने इस तरह फर्ज पूरे करने वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जनकपूरी तक का रास्ता जून की भयानक दोपहरी में तय करते हैं सआदतपुर से नवीनशाहदरा की जनवरी की सर्द सुबह में पहुंच सकते हैं। एक बार दो, साहित्यकारों में, जैसा कि होता है, गाली-गलौज और फिर मार-पीट हो गई। कितने बड़े सौभाग्य की बात थी कि इस ऐतिहासिक महत्त्व की घटना के एकमात्र साक्षी साहित्येश्वर थे। उन्हे लगा कि हिंदी-साहित्य के इतिहास में वे कभी माफ ने किए जाएंगे, यदि वे इस घटना की सूचना तत्काल किसी और को नहीं देते। इसलिए वे दोनों साहित्यकारों को एक-दूसरे का मुंह नोचता छोड़कर तुरंत बस स्टॉप आए और सबसे पहले आने वाली बस पर चढ़ गए।

उन्हें लगता है, हो न हो वे एक दिन महान साहित्यकार हो जाएंगे और उसके बाद उन पर शोध-कार्य होगा। इसलिए उन्हें शोध-कार्य करने वालों की सुविधा का अभी से बडा़ ध्यान है। वे अपने लिखे पत्रों की प्रतिलिपियांअपनी फाइल में रखते हैं और मौका लगने पर सुना भी देते हैं। वे अपने फटे पुराने कपड़े और जूते फेंकते नहीं, क्योंकि एक समय ऐसा आएगा जब शोध करने वालों या राष्ट्रीय संग्रहालय को इन चीजों की जरूरत होगी। यही कारण है कि अपने हस्ताक्षर वे हर जगह काफी सोच-समझकर और अपने ही कलम से करते हैं। लेकिन अभी वे कहते यही हैं कि वे संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें संघर्ष शब्द बहुत पसंद है। कई बार सोचा कि वे अपना उपनाम संघर्ष रख लें, पर अभी तक वे यह नहीं तय कर पाए हैं कि साहित्य की कौन-सी विद्या उनकी रचनात्मक क्षमता को संजो पाने की क्षमता रखती है। जब वे नए-नए दिल्ली आए तो कविता करते थे, पर कविता के क्षेत्र में बड़ी गुटबंदी है। उन्हें किसी ने पूछा नहीं। वे कहानी लिखने लगे। इस बीच एक साहित्यकार मित्र ने, जो उनकी तरह संघर्ष कर रहे थे, बताया कि साहित्येश्वर, यह जमाना खूंटे का है। पहले अपना खूटां तलाश करो, तब कामयाब होगे। आज के सारे सफल साहित्यकारों ने यही किया है। साहित्येश्वर गांव के सीधे-सादे आदमी होने के नाते इस प्रतीक को बड़ी गहराई से समझ गए और उन्होंने खूंटे की तलाश शुरू कर दी, लेकिन खूंटा कैसे पकड़ा जाए, आजकल इसमें भी प्रतियोगिता है। साहित्येश्वर गांव के सीधे-सादे आदमी होने के नाते इस प्रतीक को बड़ी गइराई से समझ गए और उन्होंने खूंटे की तलाश शुरू कर दी, लेकिन खूंटा कैसे पकड़ा जाए आजकल इसमें भी प्रतियोगिता है। साहित्य-सेवा वाला नुस्खा भी फेल हो चुका है। अब किसी खूंटे से कहो कि जी मैं साहित्य-सेवा वाला नुस्खा भी फेल हो चुका है। अब किसी खूंटे से कहो कि जी मैं साहित्य-सेवा करना चाहता हूं। या साहित्य सेवा कर रहा हूं, तो वह चौंककर देखता है। जैसे आप सरकारी खरीद में उसकी किताब की जगह अपनी किताब भिड़वा देने की ताक में हों। जैसे आप उसकी विदेश-यात्रा या पुरस्कार को अनैतिक रूप में हड़प कर जाने के चक्कर में हों। इसलिए साहित्येश्वर ने काफी सोच-विचार के बाद तय किया कि वे आलोचक हो जाएंगे। वैसे भी आलोचना के क्षेत्र में कम लोग हैं। फिर आलोचक की जरूरत कवि, कहानीकार, नाटककार सभी को होती है। इस बहाने आप खूंटों से मिल सकते हैं। जी, मैं नई कहानी पर एक पुस्तक लिख रहा हूं। आप चूंकि नई कहानी आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं, इसलिए आपसे कुछ बात करना चाहता हूं यह सुनने के बाद मोटे-से-मोटा खूंटा ही क्यो न हो, रस्सी बांधने को नहीं तो कम से कम पास आने की इजाजत तो दे देगा। इसलिए साहित्येश्वर आलोचक बन गए। दो वर्ष आलोचक के रूप में खूंटा तलाश करते-करते आखिर उनको एक खूंटा मिल गया। खूंटा बहुत पुराना था, जर्जर था, सीधा गड़ा भी नहीं था। जीवन की पचास-पचपन से ज्यादा बहारें देख चुका था, उसकी मार्केट डाउन थी, पर था खूंटा और साहित्येश्वर को पूरी आशा थी कि इस खूंटे के सहारे वे कभी तंदुरुस्त खूंटा भी खोज लेंगे। इसलिए संतोष धन को सर्वोतम स्वीकारते हुए उन्होंने सब्र किया। खूंटा हालांकि जर्जर हो चुका था, पर उसे जानवर बांधने का पुराना शौक था, इसलिए उसने साहित्येश्वर की रस्सी लेकर अटका ली। साहित्येश्वर खूंटे से उसके कार्यालय से मिलने लगे। नुस्खा साक्षात्कार वाला काम आ गया था, पर कार्यालय में अधिक बातचीत का समय नहीं मिल पाता था। खूंटे ने एक दिन स्वयं कहा, ‘‘साहित्येश्वर, आप कल घर क्यों नहीं आ जाते।’’

साहित्येश्वर खूंटे के घर जाने लगे, लेकिन एक दुविधा में पड़ गये। लागों को बताए बिना उन्हें चैन नहीं था कि वे खूंटे के घर जाते हैं और बता देने पर यह डर भी था कि लोग उस खूंटे से उनका पत्ता न कटवा दें। लेकिन खूटें के यहां जाते हैं और बताते किसी को नहीं, यह संभव न था। साहित्येश्वरजी ने जी कड़ा करे कहना शुरू कर दिया कि वे खूंटे के यहां जाते हैं। लोगों ने सुना और जैसी कि वस्तुस्थिति है कि साहित्येश्वरजी के शत्रुओं की तादाद ज्यादा है तो शत्रुओं ने अफवाहे फैलाना शुरू कर दिया। साहित्येश्वरजी एक ओर तो यह प्रयास करते रहे कि पहले तो अफवाह खूंटे तक न पहुंचे और यदि पहुंचे भी तो उनका स्पष्टीकरण पहले पहुंचा हुआ हो। तीसरी ओर वे यह प्रयास कर रहे थे कि उनके खूंटे के पास कोई ऐसा आदमी न पहुंच जाए, जो उनकी बत्ती गुल कर देने पर तुला हुआ हो, इसलिए साहित्येश्वर खूंटे से हर उस आदमी की बुराई करने लगे जो उनकी नजर में उनका पत्ता साफ करके खूंटे तक पहुंचने का प्रया कर सकता था। खूंटा क्योंकि कानों का कच्चा था, इसलिए उसने इनकी बात को ठीक समझा और विरोधी मुंह टापते रह गए। दिल्ली आने के बाद साहित्येश्वर एक बात अच्छी तरह समझ गए थे कि लेखक कोई मरियल घोड़े की तरह दिखने वाला निरीह प्राणी नहीं होता। उनकी भाव-भंगिमाएं छोटे शहर के लेखकों वाली थीं, जिनका उन्होंने छोड़ने की भरपूर कोशिश की और अततः वे महानगरीय लेखकों जैसी बातचीत ही नहीं करने लगे, बल्कि चाल-ढाल और कपड़े-लत्ते भी वैसे ही अपना लिए। पहले उनकी चाल में सतर्कता, भय, संकोच का आभास होता था, पर अब उनकी चाल में मस्ती, लापरवाही, फक्कड़पन और आत्मविश्वास है। उन्होंने कुर्त्ता-पाजामा कब का उतार फेंका है। अब वे जीन पहनते हैं, रंगीन बुशर्ट और पैरों में कोल्हापुरी चप्पलें। हेयर स्टाइल में कस्बातीपन नहीं रहा। अब उनके बड़े-बड़े बाल हैं। जो कभी-कभी माथे पर आ जाते हैं, जिन्हें वे एक हलका-सा झटका देकर पीछे कर देते हैं।

उन्हें बड़ा दुःख है कि उनकी पीढ़ी के साहित्यकारों में वह ईमानदारी, लगन और निष्ठा नहीं है, जो पिछली पीढ़ियों के पास थी। अपनी पीढ़ी के प्रत्येक सफल साहित्यकार की सफतला का राज उन्हें मालूम है। ‘अरे वह, उसने तो भाई साहब सोची-समझी स्कीम के तहत सब कुछ किया है। पहले यह था, फिर वहां गया फिर लाभ देखकर यह काम किया, बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में रचनाएं छपवाता रहा, फिर अमुक जी को पकड़ लिया और आज देखिएं-स्थापित!’

साहित्येश्वर अन्य विद्वानों की तरह किताबों की चोरी की चोरी नहीं समझते हैं। वे ऐसे अवसर कम ही छोड़ते हैं। उनके अनुसार हेमिंग्वे किताबें चुराता कई बार पकड़ा गया और लार्ड बायरन तो कई बार किताबें चुराने के जुर्म में सजा तक काट आया था। फिर लाइब्रेरी से किताबे चुराना इस सड़ी-गड़ी व्यवस्था पर एक करारी चोट है जो श्रमजीवी जनता का शोषण कर रही हैं। किताबें चुराने वाले मसले को वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं से जोड़ देते हैं। दो-एक बार पकड़े भी गए हैं और राजधानी की हर लाइब्रेरी में नियमित रूप से जाते हैं। कहते हैं, अब एक लेख के लिए अस्सी रुपये की किताब कौन खरीदे निगाह बचाकर, जिसका मौका बाथरूम में आसानी से मिल जाता है, वे किताब को हलाल कर डालते हैं। अगली-पिछली टांगें अपने लिए रख लेते हैं और धड़ छोड़कर चल देते हैं।

साहित्येश्वर के व्यक्तित्व से जलने वाले लोगों को भी कमी नहीं है। सारे उभरते हुए साहित्यकार उनसे अपने लिए सबसे बड़ा खतरा महसूस करते हैं। उन्हीं में सुरेश और अमित हैं, जो नियमित रूप से साहित्येश्वरजी को नीचा दिखाने की बात सोचते और करते हैं। हर गोष्ठी में साहित्येश्वरजी की स्थापना का खंडन करते हैं। और चाहते हैं, खूंटे से उनका नाता टूट जाए। एक दिन अमित उनके पास आया और बोला कि कुछ लोग मिलकर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं, आप भी उसमें पर्चा पढ़े। साहित्येश्वर बोले, ‘‘पर्चा पढ़ना तो थोड़ा कठिन हो जाएगा। मैं अपने विचार कुछ शब्दों में सामने रख दूंगा।’’

बात तय हो गई। साहित्येश्वर इसे चुनौती मान रहे थे। वास्तव में थी भी चुनौती। बहरहाल गोष्ठी में पांच साहित्यकार आए जिनमें से दो वक्ता थे-एक सुरेशजी और दूसरे साहित्येश्वरजी। अमित गोष्ठी का संचालन कर रहा था। गोष्ठी प्रारंभ हुई और उसमें सुरेशजी पहले बोलने खड़े हो गए। विषय था-‘रचना और रचनाकार के अंतसंबन्धों के विशेष संदर्भ में बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रचलित साहित्यिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि में तत्कालीन राजनैतिक आर्थिक संबंधों की व्याख्या’। विषय गंभीर भी था और विचारोत्तेजक भी। सुरेशजी काफी जमकर बोले और सभी लोग गंभीरता से सुनते रहे। उनके बाद साहित्येश्वरजी का नंबर था। साहित्येश्वरजी के बोलना शुरू करने से पहले ही सुरेशजी ने कहा कि वे एक आवश्यक काम से जा रहे हैं और थैला उठाकर बाहर निकल गए। अमित ने मुस्कराकर कुछ अपपमानित करने वाले अंदाज में साहित्येश्वरजी की तरफ देखा और उन्हें अपने विचार सामने रखने के लिए आमंत्रित किया। साहित्येश्वरजी समझ गए कि उनका अपमान किया जा रहा है और वे तड़प गए। बोले, ‘‘गोष्ठी समाप्त हो जाने की घोषणा कर दी जाए। मैं नहीं बोलूंगा।’’

अमित, ‘‘क्यो क्या बात हो गई भाई साहित्येश्वर!’’ इस भोलेपन पर साहित्येश्वर जी का पारा काफी ऊपर चढ़ चुका था। तड़पकर बोले, ‘‘चुतिया बनाने की हद होती है। आप लोग अपने-आपको साहित्यिकार कहते हैं’

अमित, ‘‘आखिर बात क्या है।

‘‘बात अपने विचार डेढ़ घंटे पेलकर चल दिए। मैं कोई चूतिया का पट्ठा हूं।’’

‘‘कुछ और तो नहीं पेला। आप चालू हो जाएं।’’

‘‘क्यों आप बच्चों जैसी बात कर रहे हैं। मैं उनके द्वारा उठाए गए कुछ सवालों के जवाब उन्हें देना चाहते था, और वे उठकर नवाबों की तरह चल दिए।’’

‘‘हम लोग आपके सवालों के जवाब नहीं दे सकते’ अमित ने ुिर मुस्कराकर पूछा। अब साहित्येश्वरजी का चेहरा लाल हो गया था। उन्होंने सोचा कि रुक गए जो जरूर झगड़ा होगा। झगड़ा हो गया तो पिटेंगे। इसलिए सीधे उठे।

‘‘मैं इस गोष्ठी को बहिष्कार करता हूं।’’

‘‘इसका मतलब है, आप लोकतांत्रिक तरीके से काम ही नहीं कर सकते’अमित ने कहा।

‘‘लोकतंत्र’ साहित्येश्वर कांपने लगे। यह घटिया लौंडा मुझे लोकतंत्र पढ़ा रहा है। वे गुस्से से आग-बबुला हो गए। उनका चेहरा और सुर्ख हो गया और सांस तेज चलने लगी। ‘‘बताऊं लोकतंत्र क्या होता है’ वे आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़े ही थे कि बत्ती चली गई। अंधेरे में दोनों लोगों की जुबान खूब चलने लगी।

इस अनुभव के बाद साहित्येश्वरजी ने सुरेश-अमित गुट से बोलना बंद कर दिया था। वे नहीं चाहते थे कि इन लोगों के बीच समय नष्ट किया जाए। लेकिन क्या कीजिए, इस घटना के तीन-चार महीने बाद प्रेमचन्द्र जन्म शताब्दी समारोह मनाया जाने लगा। कुछ ऐसा संयोग है कि हर साल,या एक दो साल के बाद किसी न किसी महान साहित्यकार की जन्म या मरण की कोई न कोई ऐसी महत्त्वपूर्ण तारीख निकल आती है कि पेशेवर सेमीनार आयोजित करने वाले बगलें बजाने लगते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कमेटियां बनती हैं, फिर राष्ट्रीय स्तर की कमेंटियां बनती हैं, फिर प्रांतीय स्तर, शहर कस्बे स्तर की कमेटियां बनती हैं, फिर कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं, शिक्षा मंत्राालय विशेष बजट पास करता है, प्रांतीय सरकारें पैसा देती हैं। विभिन्न संस्थान पैसा देते हैं, इस तरह पूरा राष्ट्र और कुछ साबित कर पाने की क्षमता रखता हो या ना रखता हो, यह जरूर साबित कर देता है कि हम लोग स्वर्गीय लेखकों की जन्म या मरण शताब्दियां मानने में निपूण हैं। जिस शौक हो पैदा हो जाए और सौ साल प्रतीक्षा करे।

प्रेमचन्द्र जन्म शताब्दी मनाए जाने के उल्लास में साहित्येश्वर अपने खूंटे से अधिक मिलने लगे थे। खूंटे के पास कुछ योजनाएं थीं, जिन्हें वह दूसरे खूंटों से मिलकर कार्यान्वित करना चाहता था। इस सिलसिले में भाग-दौड़ कर रहे थे। साहित्येश्वर। उन्हें मजा आ रहा था औ आंखें भी खुलती जा रही थीं कि खूंटों का सिलसिला बहुत दूर तक फैला हुआ है। वे अपने खूंटा किसी और के खूंटे से बंधे हैं। उनका खूंटा किसी और के खूंटे से बंधा है। वह खूंटा भी किसी और खूंटे से बंधा है। कहने का मतलब यह है कि खूंटो ेका एक अंतहीन सिलसिला है। जो गालिब की तमन्ना के जंगल की तरह अनंत है, निस्सीम है, अखंड है। साहित्येश्वर एक-एक खूंटे के वास जाते रहे। उन्होंने यह सोचा कि उनका खूंटा दरअसल दूसरे खूटों की तुलना में कुछ नहीं है। क्यों न वह उस खूंटे को पकड़ लें, जिसे उनका खूंटा पकड़े हुए है। फिर साहित्येश्वरजी को लगा कि उनहे खूंटे का खूंटा भी किसी अन्य खूंटे से बंधा है, यह सिलसिला अंततः काफी दूर तक जाता था और साहित्येश्वरजी इस विशुद्ध आध्यात्मिकता के चक्कर में पड़कर काफी परेशान हो गए थे। इस बीच अपने खूंटे पर लिखी उनकी किताब छप गई थी और वह अगले खूंटे तक पहुचने का एक अच्छा माध्यम थी। वे अगले खूंटे तक जाने का प्रयास करने लगे। उन्हें विश्वास था कि प्रेमचन्द्र जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित होने वाले सेमीनार में उन्हें संयोजक तो बनाया ही जाएगा। श्री साहित्येश्वर के इन इरादों का इल्म खूंटे को हो गया और उसने ऐसी चाल चली कि साहित्येश्वर जी मुंह के बल गिरे। संयोजक होने क्या, उन्हें पेपर तक पढ़ने के लिए नहीं कहा गया। उनका खूंटा ही उनसे नाराज हो गया था। अब साहित्येश्वरजी को यही चिंता सताए जा रही थी कि अगला खूंटा कैसे पकड़ा जाए। प्रेमचन्द जन्म शताब्दी बीती जा रही थी। हजारों सेमीनारों-गोष्ठियों विचार मंचों के हो जाने के बावजूद उन्हें बोलने को अवसर नहीं मिल पाया था। इससे बड़ा पाप क्या हो सकता है उनके व्यक्तित्व में कटुता बढ़ती जा रही थी। उन्होंने एक दिन कमरे में लेटे-लेटे बड़ी बहादुरी के दो फैसले किए। पहला, यह कि अब वे स्वयं खूंटा बनकर दिखा देंगे। जब स्वयं छोटा खूंटा बन जाएंगे तो खूंटे चाहेंगे कि वे उनके पास आएं। छोटा खूंटा बनने के लिए उन्होंने एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई। पत्रिका का संपादक जाहिर है साहित्येश्वरजी के अलावा कौन हो सकता है लेकिन परामर्श-मंडल में वे खूंटों के नाम डाल सकते हैं और उन्हीं में से कोई अच्छा खूंटा चुन सकते हैं। पूरा रास्ता साफ नजर आने लगा। श्री साहित्येश्वर संपादक....पत्रिका का नाम चूंकि अभी तक तय नहीं हुआ था इसलिए वे इतना ही सोच पाए और उस रात काफी देर तक उन्हें नींद नहीं आई।

लेकिन एक समस्या थी। वह यह कि खूंटा बनने या पत्रिका निकालने के लिए दो-चार आदमियों को जुटाना तो जरूरी है ही। ये लोग कहां से मिलेंगे अमित-सुरेश गुट के अलावा उन्हें ऐेसे लोग न दिखाई दिए। साहित्येश्वरजी की किताब आ जाने के बाद अमित-सुरेश गुट भी उन्हें कुछ सम्मान देने लगा था और उन लोगों के प्रति साहित्येश्वरजी के मन में जो कटुता थी, काफी कम हो चुकी थी। अमित-सुरेश गुट को भी प्रेमचंद जन्म शताब्दी के अवसर पर मुंह की खानी पड़ी थी, इसलिए साहित्येश्वरजी को पूरी आशा थ कि लोहा गरम है और ढाला जा सकता है।

साहित्येश्वरजी कॉफी को दो प्यालियां पी चुके थे। शनिवार का दिन था और कॉफी-हाउस मे साहित्यकारों के जत्थे घूमते, कॉफी पीते दिखाई दे रहे थे साहित्येश्वर अमित को तलाश कर रहे थे। आखिरकार अमित आ गया। उसने झोला कंधे पर टांग रखा था और सिगरेट के लंबे-लंबे कश ले रहा था। साहित्येश्वरजी ने उसे अपने टेबुल पर बुलाया, ‘‘कॉफी पिओगे’

अमित को थोड़ा आश्चर्य हुआ। फिर भी कहा, ‘‘ठीक है।’’

कॉफी आ गई। साहित्येश्वरजी ने दो-चार इधर-उधर की बातें करने के बाद पूछा, ‘‘प्रेमचन्द्र जन्म शताब्दी वर्ष भी समाप्त हो रहा है। मैं कहता हूं क्या ठोस काम हुआ’

‘‘ठोस काम आरे साहित्येश्वरजी सब फ्रॉड। जो लोग ईमानदार हैं। कुछ कहन चाहते हैं, उनके पास पहुंच नहीं है। जिनके पास पहुंच है वे हरामखोर हैं।’’

‘‘यार, लेकिन इस तरह तो काम नहीं चलेगा।’’

‘‘कौन कहता है चलेगा।’’

‘‘तो मिल-जुलकर कुछ किया जाए’

‘‘बिलकुल किया जाए। हम युवा लोग अपना-अपना राग अलापते रहेंगे तो कुछ न होगा।’’

‘‘फिर कुछ सुझाव दो।’’

‘‘हम लोग बिना किसी सरकारी सहायता के, अपने ढंग से प्रेमचंद जन्म शताब्दी मनाएं।’’

‘‘आइडिया तो अच्छा है।’’

‘‘कोई दिखावा नहीं, कोई फूं-फां नहीं। सादगी से। आपका एक भाषण हो जाएं चंद दोस्त मिल-जुल बैठ जाऐं फिर उसकी रपट अखबारों में छपवाई जा सकती है।’’ साहित्येश्वरजी को आइडिया पसंद आया। महत्त्व खबर छपने का होगा। उनका नाम प्रमुख वक्ता के रूप में छपेगा। गोष्ठी चाहे जितनी छोटी हो, उससे क्या अंतर पड़ता है। रपट में यह थोड़ी लिखा जाएगा कि गोष्ठी में दस थे या दस हजार।

‘‘लेकिन रखोगे कहां’

‘‘कहीं भी रख लेते हैं। किसी दोस्त के घर पर रख लेते हैं। दिखावा तो करना नही है।’’

बात साहित्येश्वर को पसंद आई।

‘‘आपका भाषण हो जाए। फिर चाय पानी हो जाए। आप उससे पहले प्रेमचंद के लिए मल्यार्पण कर दें।’’

‘‘भाई मैं आपसी एकता बनाए रखने के लिए कुछ भी कर देने पर तैयार हूं।’’ उन्होंने इस तरह कहा जैसे प्रेमचंद पर भाषण देना और माल्यार्पण करना कोई कानूनी अपराध हो (जैसे कि नमक कानून तोड़ना था) और एकता के लिए साहित्येश्वरजी कड़ी से कड़ी सजा भुगतने के लिए तैयार हों।

‘‘बात इतनी जल्दी बन जाएगी, इसकी उम्मीद साहित्येश्वरजी को नहीं थी। कमरे पर आकर वे काफी देर तक गुनगुनाते रहे। प्रेमचंद पर कुछ पढ़ने की भी कोशिश की। अपनी पत्नी को एक पत्र डाला, जिसमें होने वाली गोष्ठी में अपने प्रमुख वक्ता होने की बात लिखी। फिर शहर में छूट गए अपने एक मित्र को भी इसी आशय का पत्र लिखा। दोनों पत्रों पर पते लिखकर वे सो गए। पत्नी को वह यह लिखना नहीं भूले थे कि उक्त गोष्ठी में करीब पचास रुपया खर्च हो जाएगा, जो उन्हें किसी न किसी तरह जल्दी भेज दिया जाए। एक दिन इसी गोष्ठी का कार्यक्रम तय करने के लिए अमित और सुरेश उनके कमरे पर आए। साहित्येश्वरजी ने चाय पिलाई। खूब अच्छी बातचीत होती रही। चलते सामय अमित ने कहा कि साहित्येश्वरजी, हम लोग सोच रहे हैं कि मित्र के घर में गोष्ठी हो पाना संभव नहीं है, क्योंकि आपको सुनने के लिए इतने लोग इच्छुक हैं कि किसी छोटे कमरे में समा नहीं पाएंगे। क्यों न विठ्ठल भाई पटेल हाउस में एक कमरा किराये पर ले लिया जाए, ताकि सब लोग ठीक से बैठ सकें। वहां कुछ पत्रकार भी आ सकते हैं। चाय की व्यवस्था वहां हो जाती है। सौ पचास के खर्च से बचने के लिए गोष्ठी असफल हो जाए तो अच्छा न होगा।

खैर साहित्येश्वरजी इस बात पर तैयार हो गए। उन्होंने उसी रात पत्नी को फिर पत्र लिखा और सौ रुपया भेजने की मांग की। वे मन-ही-मन खुश थे। उन्हें आश्चर्य था कि अमित और सुरेश में इतना उत्साह कहां से आ गया है। ‘पहले लौडे थे, अब सीख गए हैं,’ यह तय करके वे मन ही मन हंसे और प्रेमचंद पर अपना पेपर तैयार करने में जुट गए।

तीन दिन के बाद सुरेशजी आए और बोले कि बड़ा अच्छा रहेगा यदि गोष्ठी के बारे में ‘नवभारत टाइम्स’ के आज के कार्यक्रम कॉलम में सूचना छपवा दी जाए। विचार साहित्येश्वरजी को ठीक लगा। वे तैयार हो गए। फिर सुरेशजी ने कहा, ‘‘विश्वविद्यालयों के नोटिस बोर्डो पर यदि पर्चे लिखकर लगा दिए जाएं तो और अच्छा हो।’’ साहित्येश्वरजी इस बात पर भी तैयार हो गए। अब वे और गंभीरता से अपना पर्चा लिखने में डूब चुके थे।

गोष्ठी होने में जब एक सप्ताह रह गया तो अमित ने सुझाव रखा कि क्यों न निमंत्रण-पत्र छपवा लिए जाएं, मित्र साहित्यकारों को भेजे जा सकते हैं। छपवाने में कोई ज्यादा खर्च भी नहीं आएगा। साहित्येश्वरजी ने सोचा कि यदि निमंत्रण-पत्र छप जाते हैं तो वे उन्हें अन्य शहरों के साहित्यकारों के पास भी भेज सकते हैं। कुछ सोचकर वे इस बात भी तैयार हो गए। निमंत्रण-पत्र का ‘मैटर’ तैयार किया गया और अकत उेसलेकर तुरंत प्रेस चला गया। बात यहीं टि जाती तो ठीक थी, पर हुआ ऐसा कि गोष्ठी होने से तीन दिन पहले साहित्येश्वरजी के वास अमित और सुरेश दोनों आए और इधर-उधर की बातचीत के बाद अमित ने कहा, ‘‘साहित्येश्वरजी, आपकी गोष्ठी में जैसा कि अनुमान है, उससे ज्यादा ही लोग आ जाएंगे। और पचास आदमियों के बैठने लायक जगह ठीक नहीं रहेगी।’’

‘‘फिर’ साहित्येश्वरजी ने चिंतित होकर पूछा।

‘‘हमारे ख्याल से कमानी-हॉल किराए पर ले लिया जाए। वहां सब लोग ठीक से आ जाएंगे। और जगह भी अच्छी है।

‘‘कमानी हॉल का नाम सुनते ही साहित्येश्वरजी को कुछ अजीब सा लगा। उसका तो किराया ही कई हजार रुपये होगा। हजार-पांच सौ लोगों के बैठने की जगह है। वहां तो दूतावासों या बड़े-बड़े संगठनों के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं उसे लोग महीनों पहले से तो बुक कराते हैं यह सब सोचने के बाद साहित्येश्वरजी को अचानक लगा कि ये दोंनों मिलकर उन्हें उल्लू बना रहे हैं। उन्होंने बिगड़कर कहा, ‘‘मजाक करते हैं आप लोग’

‘‘क्यों मज़ाक की क्या बात है’ अमित ने कहा और हंस दिया।

अब तो साहित्येश्वरजी पूरी बात समझ गए। इस बारे में उन्हें शुरू से ही बेवकूफ बनाया जा रहा था। उनका खून खौलने लगा।

‘‘हम लोग तो सोच रहे थे जैसे सिनेमा के बोर्ड लगते हैं, वैसा एक बोर्ड आपकी गोष्ठी का लगवा दें’’ सुरेशजी बोले।

शताब्दियों का मरा हुआ गुस्सा साहित्येश्वरजी के रोएं-रोएं से फूटने लगा। वे पहले कुछ क्षण तक कांपते रहे और फिर उन्हें लगा कि शरीर के अंदर एक ऐसी थरथरी शुरू हो गई है जो शायद कभी न खत्म होगी। पहले उनके कान जलने लगे और फिर पूरा चेहरा लाल हो गया। उन्हें लगा कि अब यदि उन्होंने गुस्सा बर्दाश्त किया तो कहीं हार्ट-फेल न हो जए। सांस तेज-तेज चलने लगी और उसी के साथ दिल की धड़कन इतनी तेज हो गई कि उसे वे ही नहीं, अमित और सुरेशजी तक सुन रहे हैं। इस समय साहित्येश्वरजी यदि तानाशाह होते निश्चित रूप से इन दोनों को किसी कंसंट्रेशन कैंप में बंद करा देते। यदि वे मध्ययुगीन सामंत होते तो निश्चित रूप से इन दोनों को हाथी के पैरों से कुचलवा देते या कोल्हू में पिरवा देते या भूखे शेर के पिजड़े में डलवा देते। यदि वे आदिमानव होते तो इस समय इन दोनों को भूनकर खा जाते। यदि वे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर होते तो इन दोनों की इतने रहस्यात्मक ढंग से हत्या हो जाती कि पूरे संसार के गुप्तचर मिलकर भी पता नहीं लगा पाते। यदि वे स्थानीय गुंडे होते तो इसी समय इन दोनों को एक-एक चाकू लग चुका होता। लेकिन अफसोस कि साहित्येश्वरजी साहित्यकार हैं और साहित्यकार का धर्म कलम चलाना है, इसलिए साहित्येश्वजी अपने जेब में लगा कलम टटोलने लगे। उनके माथे पर पसीने की बूं आ रही थीं। जो उन्हें खून से ज्यादा महंगी पड़ी थीं। उन्होंने जेब में हाथ डालकर रूमाल निकाला और माथे पर से खून पोंछ डाला। उन्हें लगा रहा था कि अब एक कदम भी आगे बढ़ाना संभव नहीं है। जहां जिस हालत में जैसे खड़े हैं, वैसे ही खड़े रह जाएंगे। उनकी नसें इतनी तन गई हैं कि कहीं ब्रेन-हैमरेज न हो जाए। उनकी पलकें नहीं झपक रहीं थीं और उन्हें आज पता चला था कि आंखों में खून उतर आने वाले मुहावरे का क्या अर्थ है। उन्हें पास और दूर से आने वाली आवाजें नहीं सुनाई दे रही थीं। उन्हें आगे कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। वे अमित और सुरेश की शक्ल तक नहीं देख पा रहे हैं। उन्हें पास और दूर से आने वाली आवाजें नहीं सुनाई दे रही थीं उन्हें आगे कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। वे अमित और सुरेश की शक्ल तक नहीं देख पा रहे थे। बस केवल उनके दिमाग में कोई भयानक आवाज में खून....खून....खून...खून चीखे जा रहा था। हत्या...हत्या...हत्याकी आवाजें उन्हें उठती सुनाई पड़ रही थीं। धीरे-धीरे उनकी उंगलियां सिमटने लगीं और मुट्ठी की शक्त मे एक-दूसरे से जुड़ गईं और मुट्ठियों में कई हजार हॉर्स-पॉवर की शक्ति आ गई। उन्हें लगा कि ये घूंसे जिसके भी पड़ जाएंगे वह तत्काल नरकवासी हो जाएगा। उन्हें स्वयं नहीं मालूम था कि उनके अंदर इतनी शक्ति है। अमित और सुरेश कुछ बके जा रहे थे, पर उनकी बात या शक्ल वे नहीं देख सकते थे। साहित्येश्वरजी को इस तरह ‘ट्रांस’ में खड़े देखकर उन दोनों को यह समझते देर नहीं लगी कि मामला काफी गंभीर है। उन दोनों ने कुछ देर तक देखा फिर वे ज्वालामुखी के फटने की ताब न लाकर खिसक लिए। साहित्येश्वरजी सिर से पैर तक जल रहे थे।

सामान्य होते-होते उन्हें बहुत समय लगा, पर फिर भी उन्हें लगातारा लगता था कि तीसरा विश्व-युद्ध हो चुका हैं। चारों ओर जले हुए मकान, लोगों की लाशों के ढेर और टूटी-फूटी तोपों, टूटे हुए टैंकों, हवाई जहाजों और एटमी धमाको से झुलसी हुई धरती पर वे अकेले खड़े हैं। चारो तरफ धुआं ही धुआं हैं धुआं जब धीरे-धीरे छटने लगा तो उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य महान साहित्यकार बनना दिखाई पड़ा पुराने खूंटे से वे टूट चुके थे। नया खूंटा अभी तक खोज न पाए थे। उन्हें अंधेरा ही अंधेरा दिखाई पड़ने लगा। एक दिन सोचा, चलो बिहार लौट चलें। फिर अपने आपको धिक्कारा, ‘अरे मूर्ख, क्यों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है। दिल्ली में जो ख्याति मिलेगी,वह राष्ट्रीय स्तर की होगी। बिहार के साधारण-से शहर में जो ख्याति मिलेगी, वह मोहल्ला स्तर की होगी। तू यहीं रह जा और संघर्ष कर। तुझे तो अब दिल्ली छोड़कर पटना तक जाना नहीं सूट करेगा।’

बहुत उदास, निराश, थके और टूटे हुए-से वे एक शाम अपने पुराने खूंटे के घर पहुंच गए। खूंटे के पास तीन-चार महीने बाद गए थे। कहां ये हाल था कि रोज शाम खूंटे के घर हाजिरी बजाया करते थे, बेगार करते थे और दूसरे लोगों पर रौब झाड़ते थे कि खूंटा उनको बेटे की तरह समझता है। बहरहाल पहुंचे। उनको देखते ही खूंटे ने उपेक्षा से उनकी तरफ देखा। उन्होंने सहन किया। गर्दन झुका ली और खड़े रहे।

‘‘कहिए साहित्येश्वर....’’खूंटे ने अधूरा वाक्य बोला कि पूरा खुद करो। खूंटे की आवाज में व्यंग्य, उपहास, उपेक्षा का भाव था

‘‘जी मैं बीमारी...’’

खूंटा उनकी बात काटकर बोला, ‘‘अब तो स्वस्थ हैं’

‘‘जी हां, अब बिलकुल स्वस्थ हूं,’’ वे बोले।

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