शनिवार, 5 अप्रैल 2014

वर्षा ठाकुर की कहानी - बोस साहब और उनका घोड़ा

बोस साहब और उनका घोड़ा

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बोस साहब और उनका घोड़ा निरंतर चलते रहते थे, दुश्मनों का संहार करने के लिए ।

सोलह साल पहले बोस साहब इस प्लांट में ट्रेनी इंजीनियर बनकर आये थे, और तभी उन्होंने ये घोड़ा खरीदा था, बजाज चेतक। कहने को स्कूटर था, पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में उसने बोस साहब को जितना सहयोग दिया था उतना राणा प्रताप के घोड़े ने भी नहीं दिया था । अब भी उसकी हुंकार से बोस साहब के शत्रु सहम जाते थे।

ऐसा नहीं था कि बोस साहब ऑफिस में तलवार लेकर घूमते थे। वो तो एक बहुत ही शरीफ और ईमानदार इंजीनियर थे जो प्लांट के विद्युत् वितरण विभाग में कार्यरत थे। दिन भर में उनके मुँह से जितने शब्द निकलते उतने तो बाकी लोगों को सिर्फ डकार लेने में लग जाते थे। जो लोग उन्हें बीस साल से जानते थे वो भी उन्हें करीब से जानने का दावा नहीं कर सकते थे, क्योंकि बोस साहब साढ़े आठ बजे प्लांट में घुसते थे और घोड़ा लेकर दुश्मनों का संहार करने चल पड़ते थे। हर वो समस्या जो प्लांट के विद्युत् वितरण में बाधक होती थी बोस साहब का दुश्मन कहलाती थी। बड़े से बड़ा ट्रांसफार्मर हो या छोटे से छोटा फ्यूज, बोस साहब का हाथ लगते ही ठीक हो जाते थे। इसलिए बोस साहब दिन भर घोड़ा लेकर दुश्मनों का संहार करते रहते थे तब जाके प्लांट को पूरा दिन बिजली मिलती रहती थी।

लेकिन बोस साहब के विभाग की एक समस्या थी कि इक्के दुक्के आदमी ही पूरे विभाग को सम्भाले हुए थे। बाकी लोग ऊपर के साहब लोगों की चाटुकारिता में वक़्त गुजारते थे, और इस कारण उनका प्रमोशन बिना किसी रुकावट होता रहता था। दूसरी तरफ वो इक्के दुक्के लोग जिनमें हमारे बोस साहब भी शामिल थे, दिन भर साइट पर बिजली के दुश्मनों से लड़ने की वजह से इन सब ज़रूरी कामों के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते थे। इसका नतीजा ये होता था कि बड़े साहब लोगों को लगता था कि विद्युत् वितरण विभाग तो शर्माजी और मिश्राजी ही चला रहे हैं, बाकी लोग तो सिर्फ घोड़े पे सवार होकर घूमते रहते हैं। और इस कारण बोस साहब बाकी लोगों से तीन चार साल पीछे चल रहे होते थे।

यूँ तो बोस साहब को इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं रहता था और वो अपना काम ज़ारी रखते थे, पर एक दो प्रमोशन रुक जाने के बाद मिसेस बोस ने उन्हें आइना दिखाना शुरू कर दिया था और याद दिलाना शुरू कर दिया था कि उनके भी बीवी बच्चे हैं जिनपर थोड़ा अधिक वक़्त गुजारने का वक़्त आ गया है । बोस साहब जितने संजीदा काम के लिए थे उतने ही घर की जिम्मेदारियों के लिए भी , पर दिक्कत ये थी कि उन्हें सिर्फ जिम्मेदारियों से प्यार था , ज़िन्दगी के ऐशो आराम और हँसी मज़ाक वगैरह से नहीं, और इसीलिए बोस साहब ने अपनी पत्नी की बात पूरे गौर से सुनी , और निश्चय किया कि अब से वो ज़िन्दगी की खुशियों से अपने परिवार को वंचित नहीं रखेंगे। फिर उन्होंने डायरी निकाली और सप्ताह में एक दिन बाहर रेस्टोरेंट में खाने और एक मूवी देखने के लिए मार्क कर दिया। इन सबमें बोस साहब की भूमिका गाड़ी निकालने, बीवी बच्चों को जगह तक पहुँचाने, वेटर को बुलाने, बिल अदा करने और फिर वापस घर पहुँचाने की रहती थी, और अंत में उन्हें सुकून मिलता था कि उन्होंने परिवार को खुश रखने वाली ज़िम्मेदारी निभा ली।

लेकिन फिर दूसरी दिक्कत आनी तब शुरू हुई जब शर्माजी और मिश्राजी अपने परिवार को समर और विंटर वैकेशंस में यहाँ वहाँ लेके जाने लगे और उनके बच्चे क्लास में बढ़ चढ़ के उसका बखान करने लगे । इसलिए बोस साहब ने अपनी डायरी निकाली और साल में दो बार एक एक हफ्ते की छुट्टी मार्क कर दी , एक बार हिल स्टेशन के लिए और एक बार साउथ के लिए। इनमें बोस साहब की भूमिका फैसिलिटेटर की रहती थी, बीच बीच में मिसेस बोस उन्हें गॉगल्स पहनाके कहीं खड़ा कर देती थीं और फ़ोटो ले लेती थीं।

इस तरह थोडा मेहनत करके बोस साहब ने काम के साथ साथ घर परिवार को खुश रखना सीख लिया था ।

लेकिन एक चीज़ थी बोस साहब की ज़िन्दगी में जिसे खुश रखने के लिए उन्हें डायरी नहीं खोलनी पड़ती थी। बोस साहब का घोड़ा। सोलह साल के सफ़र में उसने बोस साहब को जितना सुकून दिया था उतना तो शर्माजी और मिश्राजी की सैन्ट्रो नहीं दे पायी थीं । यूँ तो बोस साहब के साथ अन्य लोगों ने भी उस ज़माने में बजाज चेतक ली थी (और कोई चारा भी नहीं था ) लेकिन धीरे धीरे चेतकों की संख्या इतनी कम हो गयी कि वो लुप्त होने की कगार पर आ गए थे और तब बोस साहब के चेतक ने कमान सम्भाली, और अकेला मैदान में डटा रहा । ऐसा लगता था मानो बोस साहब और चेतक निरंतर एक जंग लड़ रहे हों, बिजली के दुश्मनों के खिलाफ। और इस जंग ने बोस साहब और चेतक को एक दूसरे का पूरक बना दिया था। एक के बिना दूसरा अधूरा लगता था। जिस दिन बोस साहब किसी कारणवश चेतक को छोड़ अपनी मारुती में प्लांट आते थे, उस दिन वो लोगों को दिखकर भी नहीं दिखते थे। और मिस्टर सहाय कहीं बिजली गुल होने पर शर्माजी और मिश्राजी को फ़ोन लगाते थे जो कि गोल चौक के मार्किट में सब्जी ले रहे होते थे और फिर पता चलता था कि बिजली आ चुकी थी, लेकिन कैसे??

इस तरह बोस साहब और उनका घोड़ा निरंतर चलते रहते थे, बिजली के दुश्मनों का संहार करने के लिए।

और फिर जब बोस साहब के बच्चे बड़े हो गए और उन्हें पापा के साथ पुराने घोड़े पर बैठने में शर्म आने लगी तो उन्होंने सुझाव दिया कि इसे बेचकर बाइक या स्कूटी खरीद ली जाये। कम से कम किक तो नहीं मारना पड़ेगा। यह सुझाव सुनकर बोस साहब काफी देर तक बच्चों को देखते रहे , मानो कुछ पूछना चाहते हों (तुम लोग मेरे ही बच्चे हो न?)। फिर उन्हें परिवार की खुशियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का ख्याल आया, और जिम्मेदारी से बोस साहब कभी नहीं भागते थे। इसलिए उन्होंने चेतक को अस्तबल से निकाला और पास के गेराज में ले गए जहाँ शर्माजी और मिश्राजी ने अपने अपने चेतकों का बलिदान दिया था । कहते हैं उस दिन बोस साहब का घोड़ा रोया था। उसका पेट्रोल टैंक रास्ते भर लीक हुआ था और जब गेराज के मालिक ने उसकी कीमत आंकने ने लिए उसे चलाना चाहा तो वो उनके पैरों से किक स्टार्ट ही नहीं हुआ। बोस साहब हैरान थे , ये वही चेतक था जो सोलह साल से उनका साथ दे रहा था। तो क्या चेतक भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहता था!

उसके बाद कभी बोस साहब ने कभी चेतक को अपने से दूर करने की कोशिश नहीं की। हाँ घरवालों के लिए स्कूटी खरीदवा दी थी, बैंगनी रंग की। बड़े जिम्मेदार थे बोस साहब।

उस दिन के बाद उन्हें अहसास हो गया था कि इस संसार में जहाँ इंसान की खुद की समझ किसी पश्चिम के बहाव में बह चली थी और उसकी संवेदनशीलता पर विलासिता का झाड़ू लग गया था ऐसे में वो तिरस्कृत हुई संवेदना पत्थरों में जा बसी थी और इसीलिये सोलह साल पुराने अपने स्कूटर में उन्हें एक साँस लेता और माछ भात खाता हमसाया दिखायी देता था , उनके सुख दुःख का साथी, बिजली के दुश्मनों के खिलाफ उनके युद्ध में उनका सारथी।

और भी कई पत्थर थे, जिनमें वक़्त के साथ बोस साहब को जान दिखने लगी थी। उनके स्विचयार्ड के बड़े छोटे ट्रांसफार्मर जिनके अंदर का तेल गर्मी के साथ फैलता था और सर्दी से साथ सिकुड़ता था, लगता था मानो सांस ले रहे हो और बोस साहब को मौसम का हाल बता रहे हों कि साहब ठण्ड आ गयी है, थोडा तेल डलवा देना हमारी टंकी में। या फिर हवा के दाब से चलने वाले वो सर्किट ब्रेकर्स , उनकी भी फरमाइशें रहती थी बोस साहब से , मोटर आवाज कर रही है , फ़िल्टर गन्दा हो गया है, साँस लेते नहीं बनता। और बोस साहब उनकी फरमाइशें पूरी करते रहते थे। बदले में उनके वे साथी हमेशा के लिए उनके वफादार हो जाते थे। कभी बोस साहब छुट्टी पर होते (सालाना एक हफ्ते वाली ) और शर्माजी या मिश्राजी उनके स्विचयार्ड में उनके साथियों के साथ छेड़छाड़ करते तो उन्हें बिजली का झटका सा महसूस होता था। बेचारे परेशान हो जाते, इंसुलेशन तो ठीक है, अर्थिंग भी ठीक है, फिर ये झटका कैसा?? ये बोस साहब का झटका है, ट्रांसफार्मर धीरे से बुदबुदाता।

इस तरह बोस साहब की एक अलग ही दुनिया बन गयी थी जहाँ वो जिम्मेदारियों के बीच भी खुश रहते और दुश्मनों के खिलाफ अपने घोड़े पर सवार जंग पर निकले रहते। जंग का परिणाम ये रहता कि मिस्टर सहाय साल में दो हफ्ता छोड़कर बाकी वक़्त सुकून की नींद सो रहे होते।

लेकिन वो सुकून की नींद कभी कभी बहुत भारी साबित होती , क्योंकि बोस साहब की यूँ तो बहुत न्यूनतम फरमाइशें होती थीं लेकिन वो भी अगर पूरी नहीं होती थी तो फिर बोस साहब का ज्वालामुखी फटता था, और उसके गर्द से कई कई दिन मिस्टर सहाय का दम घुटता रहता था।

ऐसे ज्वालामुखी पिछले कुछ वर्षों में अधिकाँश फटे थे जब इतनी जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी बोस साहब के प्रमोशन में अड़ंगे आ जाते थे या फिर तब जब बोस साहब का सालाना एक हफ्ते वाला छुट्टी का प्लान बनकर तैयार होता था और तब मिस्टर सहाय उन्हें छुट्टी कैंसिल करने के लिए कह देते थे, क्योंकि मिश्राजी या शर्माजी भी उसी वक़्त छुट्टी पर जा रहे होते थे।

और आज सुबह जब मिस्टर सहाय ने अखबार में अपनी राशि देखी तो उसमें किसी सुप्त ज्वालामुखी के फटने की सम्भावना जतायी गयी थी।

मिसेस बोस ने सुबह उठकर पूजा की और भगवान से आशीर्वाद माँगा। कल शाम को पड़ोस में मिसेस चटर्जी से पता चला था कि आज उनके पति की प्रमोशन लिस्ट निकलने वाली थी। बोस साहब खुद कभी ये सब बातें नहीं बताते थे।

हमेशा की तरह बोस साहब सुबह से नदारद थे, अपने घोड़े के साथ किसी अज्ञात जंग में। मिस्टर सहाय रह रह के भगवान से दुआ मांगते थे कि इस बार बोस साहब का प्रमोशन हो जाय। मिस्टर सहाय अपनी तरफ से पूरा जोर लगा देते थे अपनी सुकून की नींद का क़र्ज़ अदा करने के लिए, पर मामला ऊपर जाकर फँस जाता था।

दस बजे जी एम साहब का फ़ोन आया , बोस साहब का नाम प्रमोशन लिस्ट में नहीं था।

थोड़ी देर में बोस साहब भी उनके रूम में पहुँच गए। मिस्टर सहाय का दम घुटना शुरू हो चुका था। लगभग आधे घंटे ज्वालामुखी फटा। मिस्टर सहाय निरीह से सब सुन रहे थे। उनके हाथ में कुछ नही था , पर सुकून की नींद का क़र्ज़ चुकाने का शायद यही रास्ता बचा था ।

इस बीच मिस्टर सहाय का फ़ोन बजा।

रोलिंग मिल में पॉवर फेल हो गया था। शर्माजी और मिश्राजी किसी विशेषातिथि की आवभगत में प्लांट से बाहर निकले थे। आज तो बोस साहब को भी किसी काम के लिए नहीं बोला जा सकता था।

मिस्टर सहाय कमरे में लगे बाथरूम में घुस गए, ज्वालामुखी के गर्द में साँस लेना मुश्किल हो रहा था। मुँह में पानी मारा। फ़ोन पर फ़ोन बज रहे थे। मिस्टर सहाय बहुत असहाय महसूस कर रहे थे।

बाहर निकले तो देखा कमरा खाली था । बोस साहब और उनका घोड़ा निकल चुके थे, बिजली के दुश्मनों का संहार करने के लिए।

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  1. बोस साहब में कमाल का धीरज था . बहुत ही कर्तव्यनिष्ट थे साथ ही परिवार का भी ध्यान रखते थे सबसे अच्छा वर्षा जी की कहानी में जो महसूस किया कि उन्होंने निर्जीव स्कूटर को सजीव रूप में इसतेमाल किया .

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