रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - मैं और पद्मश्री

मैं और पद्मश्री

उन्हें देखकर मैं सकते में आ गया। काला चूड़ीदार पजामा, काला कुर्त्ता, काले जूते, काली जैकेट, गले में एक सफेद कश्मीरी शॉल और ऊपर से गंजा चमकता हुआ सिर जिसके तीन तरफ बालों की झालर। चेहरे पर यह भाव कि देखा बड़े लोगों की तरह में निर्लिप्त हूं। देखो मैं इतना महान हो गया हूं कि सबसे ऊपर उठ गया हूं। उनके चेहरे पर संतोष का एक अजीब-सा भाव है जो बेफिक्री से घुल-मिल रहा है। उन्होंने कहीं पढ़ा होगा कि बड़प्पन की एक पहचान विनम्रता भी है। इसी वजह से उन्होंने अपने चेहरे और शरीर को विनम्र बना दिया हे। यह विनम्रता कभी-कभी नृत्य की किसी मुद्रा से मिलने लगती है।

राजधानी के एक फाइव स्टार होटल का जगमगाता वैंक्वेट हॉल उन लोगों से खचाखच भरा है जो कला और संस्कृति के नामवर हैं। मित्र हॉल में दाखिल हुए और लोगों को इस तरह देखा जैसे सब उनके बच्चे हों लेकिन बच्चों के प्रति भी उनके अन्दर विन्रमता का भाव है। उन्होंने हाथ जोड़ दिए। वे सबके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। यानी वे किसी एक को नमस्ते कर रहे हैं। सबको, सभी को, सारे लोगों को, सारे देश, सारे संसार को नमस्ते कर रहे हैं। इनके इर्द-गिर्द दो-चार ऐसे लोग हैं जो उनकी महानता को बढ़ाने का काम अपने गन्दे, फूहड़ और आक्रमक स्वरूप से कर रहे हैं। दरअसल इन लोगों को मित्र शायद इसी कारण लाए हैं कि उन्हें देखकर लोग मित्र की महानता वाली विनम्र मुद्रा के प्रति अधिक आकर्षित हो सकें। मित्र इस तरह मुस्करा रहे हैं जैसे मोनालीजा और साधू-सन्यासियों की मुस्कराहट को मिलाकर उसमें राजनेताओं की मुस्कराहट की छोंक लगा दी गई हो। वो हाथ भी इसी शालीनता से उठा रहे हैं। जैसे बैले डांसर रहे हों। नपे-तुले दो-चार कदम बढ़ाते वे मजे से केन्द्र में आ गए। फोटोग्राफर और टी.वी. न्यूज वाले उन्हें न जानने के बावजूद ये समझ गए कि वे अतिविशिष्ट हैं।

और उनका छायांकन करने लगे। वे निर्लिप्त भाव से पूरे मजमे को देखते रहे।

मित्र के पास एक दो विशिष्ट लोग आते और वे इन लोगों से संक्षिप्त नपी-तुली सधी बातें इस तरह करते जैसे समाचार वाचक समाचार पढ़ता है। ऊंचे अधिकारी, मंत्रीगण, सांस्कृतिक जगत के माफिया, जनसम्पर्क जब के जुगलबंदों को, मिश्र को प्रथामिकता देता दिखाई पड़े। दो-चार अनाड़ी-शनाड़ी जो पास आ जाते उन्हें भी वे आर्शिवाद वाली मुद्रा में देखते और निगाहें तोते की तरह जल्दी से किसी और की तरफ फेर लेते। पार्टी में लगभग सभी लोग पी रहे हैं पर मित्र के हाथ में जाम नहीं है। उन्हें कई लोगों ने ‘जाम’ ऑफर किए पर मित्र ने सहजता और शालीनता से मना हर दिया। गला खराब होने का बहाना किया। दवा खाने की बात की। ‘मैं नहीं लेता’ जैसी बातें कहीं। धन्यवाद कहकर टाला। मुस्कराकर मना किया। निगाहों-निगाहों में समझाया। कभी मुंह बिचकाया, कभी कन्धों को झटका देकर मना कर दिया। मैं जानता हूं कि मित्र साला घड़ा भर शराब पी जाता है और डकार तक नहीं लेता। मैं आगे बढ़ा और मित्र के पास आ गया। मित्र से आंखें मिलीं। मेरी आंखों में पुराने परिचय की झलक थी। मित्र की आंखों ने सन्देश दिया कि पुराने परिचय को भूल जाओ। वैसे मैं तुम्हें जानता हूं लेकिन तुम्हारी आंखों में मेरे साथ सामूहिक रूप से किए गए पापों की जो छाया है उसे निकाल फेंको। मैंने उनका सन्देश लिया और उसे अस्वीकार कर दिया। मैंने आगे बढ़कर अपना हाथ बढ़ाया। मित्र थोड़ा सटपटाए। उन्होंने कश्मीरी शॉल के अन्दर से अपना, मरे हुए सफेद चूहे जैसा ठंडा हाथ निकाला और करीब दो इंच आगे बढ़ा दिया। मैं उनके कुत्तेपन को अच्छी तरह समझ रहा था। मैंने जोर से हाथ मिलाया। मित्र की आंखों में फिर वहीं भाव आ गया कि ये सब क्या कर रहे हो। पुरानी बातें पुरानी पड़ चुकी हैं।

‘‘कैसे हो यार...बहुत दिनों बाद दिखाई दिए।’’ मैंने चुटकी ली। मित्र इस तरह बहुत शालीन ढंग से हंसे जैसे कोई औपचारिक सवाल पूछा हो।

‘‘आप कैसे हैं...इतने समय बाद मिलकर प्रसन्नता हुई।’’ वे सधे हुए लहजे में बोले।

‘‘पी क्यों नहीं रहे’ मैंने अपना गिलास दिखाते हुए कहा-‘‘क्या घर से कोटा पूरा करके आए हो’

मित्र की आंखों में भाव आया कि साले...क्यों मेरे महिमा मंडित स्वरूप को चौपट करना चाहता है। मैं समझ गया। सोचा वजह तो पूछ ही लूं कि क्या बात है

मैंने धीरे बात से पूछा, ‘‘क्या बात है’

‘‘बात’ वे भी फुसफुसाए।

‘‘हां यार ये सब...क्या चक्कर है’

‘‘तुम अखबार भी नहीं पढ़ते क्या’

‘‘यार पढ़ लेता हूं...लेकिन...’’

वे बात काटकर बोले, ‘‘पिछले हफ्ते मुझे पद्मश्री की उपाधि मिली है।’’

‘‘ओहो...तो ये बात है...ये बताओ क्या जुगत भिड़ाई थी...तुम्हारे ऊपर तो लड़की भगा ले जाने का मामला अब तक चल रहा है और वो मांट्रियाल केस...वो भी तो अखबारों में छपा था।’’

किस्सा यह है कि एक समय वो आया था जब मित्र ने कामयाबी का पहला पाठ पढ़ा था और धर्म और संस्कृति को एक दूसरे का पर्याय मानने लगे थे। इसी फलसफे के तहत उन्होंने मांट्रियाल वाले मन्दिर में पुजारी का पद प्राप्त कर लिया था। मन्दिर आधुनिक था। शहर रोमांटिक था। खाने-पीने की रेल-पेल थी। दूध मक्खन ही नहीं हर तरह का कच्चा-पक्का मांस इफरात में उपलब्ध था। मित्र पर चरबी चढ़ने लगी और और सोचने-समझने की ताकत एक मूलभूत इच्छा में दब गई। मन्दिर में नित्य दर्शन देने वाली एक सुन्दर महिला को मित्र ने ऐसे सन्देश किए कि ‘आना हो जो तुमको आ जाओ। ऐसे में अभी शादाब हैं हम।’ सन्देश सही तरह प्रेषित हुआ क्योंकि सौभाग्य से प्रषित करने वाला टेलीविजन का उद्घोषक नहीं था। सुन्दर महिला आई और मित्र ने सभी तरह के भगवानों के साक्ष्य में उसके साथ वही किया जो रांझा हीर के साथ और फरहाद शीरी के साथ करना चाहता था। पर हमारे मित्र को यह न मालूम था कि मन्दिर की प्रबन्धक कमेटी ने भगवानों की रक्षा करने के लिए क्लोज सर्किट टी.वी कैमरे गुप्त स्थानों पर स्थापित करा दिए हैं जो केवल भगवानों का ही नहीं भक्तों का भी छायांकन करते रहते हैं। खैर तो यह मुफ्त में बनी ब्लू फिल्म जब मन्दिर के प्रबन्धकों ने देखी तो पहले उनके मुंह में पानी आ गया कि इस मुफ्त बनी बलू फिल्म को अच्छे दामों में बेचकर कोई पुण्य कार्य किया जा सकता है लेकिन बाद में जाने क्या सोचकर उन्होंने मित्र पर पुलिस केस कर दिया। अब नुक्ता यहां आकर टिका कि यदि महिला यह कह दे कि यह उसकी सहमति से हुआ था तो मित्र बच सकते हैं, अन्यथा जेल जाएंगे। महिला परित्यक्ता थी पर पति से बड़ी चीज यानी ‘ग्रीन कार्ड’ था उसके पास परित्यक्ता से मित्र ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद महिला को पता चला कि मित्र ने भगवानों के साक्ष्य में उसके साथ जो कुछ किया था वह मित्र के लिए कोई नई बात न थी और मित्र सीधी लकीर पर नहीं बल्कि कांटों भरे रास्ते पर चलना पसन्द करते हैं। इसके कारण मित्र स्वतंत्र हो गए और स्वदेश आ गए जहां उन्होंने केन्द्रीय कला संस्थान में अध्यापन शुरू कर दिया। अध्यापन के साथ-साथ उससे पहले कला संस्थान में कमाल किया। मित्र ने दो हाथों से बीस हाथों का काम किया था। दो आंखों से वह सब देख लिया जो शंकर जी तीसरी आंख से भी नहीं देख पाए थे।

दो पैरों को चार पहियों की गाड़ी की तरह इस्तेमाल किया था। राष्ट्रीय कला केन्द्र में हर आदमी एक-दूसरे के खून का प्यासा हो गया था लेकिन हर आदमी मित्र को अपना सबसे बड़ा शुभचिन्तक समझने लगा था। मित्र लोगों को भिड़ाकर व मरवाकर एक सीधे रास्ते पर बढ़ता चला गया। मंत्रालय से लेकर सचिवालय तक के रास्ते के जर्रे-जर्रे से उसने दोस्ती गांठ ली। हर कीमत पर, हर तरह और हर वक्त उसके दिमाग में एक ही बात थी-वह यह कि उसका रास्ता साफ होता चला जाए।

मित्र के चेहरे पर तूफान वर्पा हो गया। वे लाल पीले काले गुलाबी हरे नीले होने लगे। उनकी समझ में कुछ नहीं आया तो वो मुझे अनदेखा करके आगे बढ़ गए। आगे बढ़ते ही उनके चेहरे की मुद्रा फिर महानता वाली बन गई।

जब-जब कोई मंत्री दाखिल होता तो रौशनियां ज्यादा जगमगा जातीं। इधर-उधर खड़े लोगों की पोजीशन बदल जाती। मित्र अब भी केन्द्र के करीब हैं। मैं इस जुगत में था कि फिर उनके पास पहुंच जाऊं और पद्मश्री पाने का नुस्खा पूछ लूं। इसका मौका कुछ देर से लगा। मैं फिर उनके सामने आ गया। वे कन्नी काटना चाहते थे लेकिन मैं भी बेशमों की तरह अड़ कर खड़ा हो गया।

‘‘आप कभी घर आइए न...वहीं बातें होंगी।’’ वे बचकर निकलने के लिए मुड़े और मैं तेजी से फिर उनके सामने आ गया।

‘‘मैंने आपसे कहा न’’...उन्होंने मुझे घूरकर देखा। मैं हंस दिया। सोचा अब ये साला अपने असली रंग में आ रहा है।

‘‘यहीं बताओं।’’

‘‘क्या’

‘‘गोटियां कैसे फिट की थीं’

‘‘क्या बकवास है...’’

‘‘नहीं यार प्लीज बता दो।’’

‘‘क्या करोगे’

‘‘कुछ नहीं।’’

‘‘तो क्यों पूछ रहे हो...यह अश्लील है।’’

‘‘क्या’

उनके चेहरे पर खीज और असहाय होने का भाव आया। फिर वे अपनी विशिष्ट गति की तुलना में तेजी से एक तरफ निकल गए और किसी महत्त्वपूर्ण लगने वाले आदमी से बातचीत करने लगे।

मैं कटी पतंग की तरह लहराने लगा। इतने में एक पुराना पापी और मिल गया। साला कभी कैमरामैन हुआ करता था। पी-पी कर अपना धन्धा चौपट कर लिया। आजकल लिवर सिरोसिस का मरीज है। उसकी दवा करता है लेकिन दारू नहीं छोड़ी है यानी दवा-दारू साथ-साथ चल रही है।

‘‘अबे शांत तू यहां कहां’

‘‘मैं...मैं तो यार गंजे पद्मश्री के साथ आया हूं।’’

‘‘अब पद्मश्री तो साला लिफ्ट ही नहीं मार रहा।’’

‘‘यहां वो हम लोगों से बात नहीं करेगा। मुझे इसी शर्त पर साथ लाया है...जब जाने लगेगा तो होटल के बाहर ही मुझे गाड़ी पर बिठाएगा...’’

‘‘शांतू एक बात बता...ये साले गंजे को पद्मश्री कैसे मिली’

‘‘छोड़ यार मुझे पीेने दे।’’

‘‘बात भी दे यार...’’

‘‘अरे ये भी कोई ‘सीक्रेट’ है क्या...सब जानते हैं।’’

‘‘अबे मैं नहीं जानता न।’’

गंजे पद्मश्री ने मुझे और शांतू को साथ-साथ देखा और उसके चेहरे के भाव बदल गए। उसने आंखों ही आंखों में शांतू को कोई इशारा किया और शांतू मेरे पास से ऐसे गायब हो गया जैेसे मैं ‘एड्स’ का मरीज होऊं।

दूर मुझे गीता शर्मा दिखाई दी। राष्ट्रीय कला संस्थान की अभिनेत्री। वाह, तो सब पुराने-पुराने लोग आज ही मिलने थे। मैं गीता की तरफ कुछ लड़खड़ाते हुए बढ़ने लगा। गीता और गंजे पद्मश्री के बीच कभी बड़े रोचक सम्बन्ध थे। जितने रोचक थे उतने ही सार्वजनिक भी हो गए थे। गीता को पद्मश्री पढ़ाते थे। गीता वास्तव में सुन्दर थी। पद्मश्री ने दूसरी लड़कियों पर आजमाए नुस्खे गीता पर इस्तेमाल किए तो फेल होते चले गए। फिर एक दिन या रात रिहर्सल के दौरान दोनों अकेले थे। पद्मश्री गीता को अपने जीवन की दुःख भरी कहानी सुनाने लगे। कहानी सुनाते-सुनाते रोने लगे। बस नुस्खा काम कर गया। पर जल्द ही गीता को पता चला कि पद्मश्री जितनी अच्छी तरह अभिनय के बारे में नहीं जानते उससे अच्छी तरह लड़कियां फंसाने के लिए अभिनय करते हैं।

मैं गीता के पास आ गया।

‘‘तुम्हें कैसा लगा’

‘‘क्या’

‘‘गंजे को पद्मश्री मिल गई है।’’

‘‘बहुत अच्छा...मैंने तो उन्हें congratulate किया था।’’

‘‘मतलब आजकल’

‘‘मतलब क्या आजकल मैं राष्ट्रीय कला केन्द्र की एक ब्रांच लंदन में खोलने जा रही हूं...समझे’

‘‘सब समझ गया।’’ पद्मश्री राष्ट्रीय कला केन्द्र का अध्यक्ष है।

रात के अंधेरे में फाइव स्टार के बाहर मैं और शांतू खड़े थे। गंजे पद्मश्री की कार वहां शांतू को लेने के लिए रुकी तो मैं भी सामने आ गया। गंजा पद्मश्री मुस्कराया और मुझे अपने साथ बिठा लिया। वह शालीनता से बोला-‘‘तुम शायद समझ नहीं रहे। जब से मुझे पद्मश्री मिली है तब से अपने आपको फूल जैसा हल्का महसूस करने लगा हूं। मैं चलता हूं तो लगता है पानी पर चल रहा हूं। मैं खाता हूं तो लगता है कि सूंघ रहा हूं। मैं दूसरों को देखता हूं तो छाया जैसे लगते हैं। अपने ही एक हाथ से दूसरे को छूकर मैं गद्गद हो जाता हूं। लगता है खुशी मेरे अन्दर से फूटी पड़ रही हो। मैं तुम्हें क्या बताऊं...मैं अब मैं नहीं रहा, मैं पद्मश्री हो गया हूं।’’

यह बोले जा रहा था। शराब ज्यादा और फोकट की वर लेने की वजह से मेरे दिमाग ने सोचना और कानों ने सुनना बन्द कर दिया था पर मुझे यह लगा रहा था कि मैं, मैं ही हूं।

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