शनिवार, 19 अप्रैल 2014

पुस्तक समीक्षा : बूँद-बूँद अहसास (काव्य संग्रह)

समीक्षा

बूँद बूँद अहसाह (काव्य संग़्रह)

डॉ. मालिनी गौतम की दिल को छू जाने वाली पुस्तक ‘बूँद-बूँद अहसास’ को देखने का अवसर मिला। इस पुस्तक में चालीस मनमोहक कविताएँ हैं। ये कविताएँ क्या हैं, लगता है जैसे दिल की चालीस धड़कनें हैं, मन के चालीस दृष्टिकोणों का आत्मकथ्य है या फिर बुद्धि की चालीस परतों से निकला सारगर्भित सत्य है। एक हथेली पर रखा हुआ समाज और उसको देखती हुई पारखी आँखें और फिर उन अहसासात को लिखते हाथ-----बस यही है पुस्तक ! यही है कविताओं का सार और यही है विदूषी कवयित्री का दिल को छूने वाला कारनामा !!

जीवन का पक्ष जैसे स्वयं मुखरित है। हर्ष है इसमें, उल्लास है, वेदना है, पीड़ा है, कहीं स्नेह से लबरेज़ अनुभूति है, तो कहीं नयनों से छलकते हर्ष के आँसू हैं तो कहीं वही आँसू पीड़ा की तीव्रता को प्रदर्शित करते नायक बन जाते हैं। समाज को लें, तो समाज की धड़कनें, इन कविताओं में बोलती हैं, आँखें समाज को निहारतीं हैं, ह्रदय समाज के भावों, विचारों या कार्यकलापों को दर्शाता आइना बन जाता है । प्रकृति को लें तो इन कविताओं में शरद की ठंडक है, गर्मी का अहसास है, तो वर्षा का स्नेह भरा चुम्बन है। जीवन की रूपरेखा, इस से बढ़कर और क्या होगी कि पढ़ते जाइये और कविता के हर पक्ष को अपने अंत:करण में उतारते जाइये। सारे काव्यों में कवयित्री कहीं प्रकृति का अंग प्रतीत होती हैं, तो कहीं समाज की सार्थकता का अनूठा अंग ! कहीं मानवता का स्पर्श प्रतीत होती हैं तो कहीं समाज के ह्रदय की धड़कनें । यह श्रेष्ठता उन को बहुत सारे लोगों से आगे ले जाती है। एक बार पुस्तक पढ़ना शुरू कर दीजिये, फिर पढ़ना बन्द करने को दिल ही नहीं करता। पाठक मंत्र मुग्ध सा बस पढ़ते जाता है। कमाल की सृजनात्मकता है । कमाल की निरंतरता है। कहीं भावों तथा विचारों का मिलन है तो कहीं प्रवाह तथा सार्थकता का चरम बिन्दु है।

पुस्तक की पहली कविता, ‘एक पाती जीवनदात्री के नाम’ में विदूषी कवयित्री जैसे माँ की स्वयं श्वास बन जाना चाहती है, उसकी धड़कन बन जाना चाहती है और जैसे अंतर की ध्वनी फूट पड़ती है :-

तुम फिर क्यों नहीं बुला लेतीं

मुझे अपने पास........?

कवयित्री जीवन से भी मुंह नहीं मोड़ती और जीवन के हर मोड़ को अपनाना चाहती है। वह न अंधकार से डरती है ,न प्रकाश से रोमांचित होती है। वह तो जीवन का हर पक्ष निहारना चाहती है और उसी का अंश बन जाना चाहती है। कभी वह जिन्दगी को ‘गर्म तवे पर छन्न से गिरती पानी की बूँद’ की तरह महसूस करती है तो कभी ‘किसी परदानशीं’ की आँखें बन जाना चाहती है। शायद किसी किनारे की तलाश हो, शायद प्रेम तथा स्नेह की प्रतीक्षा हो:- और शायद यही कारण है कि वह अपनी याद को पुकार उठती है:-- याद/चली आती है/बिन बुलाये मेहमान की तरह !

चाहे कितना ही आगे बढ ले, कवयित्री समाज को भूल नहीं पाती। कभी बचपन, गरीबी तथा असमर्थता को दर्शाती है तो कभी ‘नकाब’ के नाम से समाज के कोमल अंग को याद कर लेती है। यह कोमल अंग आधुनिकता की धरती पर खड़ा है। यह पौराणिक चेष्टा नहीं है। यही कारण है कि स्वयं सब कुछ जानते हुए कवयित्री के साहस की प्रशंसा में सिर झुक जाता है:-

कि नही चलेगी वह/किसी राम के बताये हुए पथ पर

या फिर:-

कर लिया है उसने निश्चय/कि वह स्वयं ही मारेगी/अपने हिस्से के स्वर्ण मृग को !

कवयित्री स्वयं सोचते-सोचते जब भावुक हो जाती है तो उसे लगता है जैसे वह जिस से बात करना चाहती है, वह सामने हो कर भी सामने नहीं है। एक निष्ठुरता सी दिखती है वहाँ :

प्रीत का हर पल था मेरे लिये/एक इबादत!/तुम आगे बढ़ते गये/उसे अपने पैरों तले रौंद....

यही हमारा समाज है। प्रत्येक क़दम सोच समझ कर रखते हैं परंतु फिर भी हम जो चाहते हैं, वह नहीं मिलता। समाज तथा मानव-मन की यह तस्वीर ही कवयित्री को श्रेष्ठता प्रदान करती है। ‘तलाश’ में कितना बड़ा सत्य दिखलाया गया है:

मैं तुम्हे ढूँढती रही/ताजमहल के गुम्बदों में/अजंता की गुफाओं में/साँची के स्तूपों में

कवयित्री स्त्री का यथार्थ भी सामने रखती हैं:

क्योंकि देवियाँ भी क्या कभी बोलती हैं?/वे तो त्याग, समर्पण, प्रेम/

और सहनशीलता की मूर्ति होतीं हैं!

स्त्री का चित्रण आगे और भी निखर कर आया है। ‘लड़की” नामक कविता में जैसे स्त्री के मन में उठते भाव, दबे या दबते भाव, पत्थर सी बनी भावनाएँ, सिमटती सी संवेदनाएँ बार-बार पाठक को उद्वेलित कर जाती हैं। स्त्री का चित्रण कभी स्त्री के कंधों पर रखा गया है, कभी ‘लड़की’ की नाजुक हथेलियों पर तो कभी माँ के स्नेह भरे आँचल पर ! कवयित्री हर जगह सफल रही हैं । स्वयं स्त्री होते हुए, उनने स्त्री को जागरुकता का सन्देश बार-बार दिया है। स्त्री का प्रेम, उसकी ममता, उसके रिश्ते ,उसका स्नेह तथा स्त्री का प्रेम, उसकी ममता, उसके रिश्ते ,उसका स्नेह तथा आदर, साजन से मिलने की आशा, वेदना-पीड़ा तथा सपनों की हक़ीक़त को दर्शाने में कवयित्री ने कहीं भी शब्दों की कंजूसी नहीं की है । यही कारण है कि वह कितने विश्वास से कह गई हैं:-

जब-जब गहराई में दबे बीज को/मिलेगी हवा, मिट्टी, पानी और/

अनुकूल वातावरण/हरी कोंपलें फिर से फूटेगीं...........

पुस्तक की सारी कविताएँ ह्रदय से निकली संवेदनाएँ प्रतीत होती हैं। बादल की तरह कभी दर्द, वेदना या टीस उमड़-घुमड कर आती है तो कभी बादलों में प्रकाश की किरण भी दिखती है शर्माती सी, मगर बादलों में घिरी, बादलों में डरी सी----- परंतु फिर भी कवयित्री का प्रयास प्रशंसा का अधिकारी है। यह उनके अहसास का मजमूआँ है जो बूँद-बूँद कर एकत्रित हुआ है और हर पाठक को प्रभावित करता है। पूरी काव्य कृति में उपमुक्ता, सरसता, स्वाभाविकता, सजीवता के गुण एक साथ मिलते हैं। कठिन शब्दों से बचा गया है। भाषा में प्रवाह है। व्याकरण के प्रति निष्ठा दिखाई गई है। कविताएँ समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं । इसलिये उनमें हर्ष-विषाद, जन्म-मृत्यु, हिताहित, उत्कंठा आदि तत्व जागरूक हैं। जिजीविषा की प्रबल अभिलाषा ही जैसे उनके मूल आधार में है। उपयोगितावाद, नैतिकतावाद तथा सौन्दर्यवाद स्थान स्थान पर दृष्टिगोचर होता है। लक्ष्यार्थ, व्यंग्यार्थ तथा मुख्यार्थ साक्षात वैचारिकता का धरातल प्रस्तुत करते हैं। हमारी शुभकामनाएँ कवयित्री के साथ हैं आशा है भविष्य में भी हमें उनसे श्रेष्ठ तथा लाभप्रद साहित्यिक कृतियाँ मिलती रहेगीं ।

बैकुठंनाथ

 

पुस्तक का नाम- बूँद-बूँद अहसास (काव्य-संग्रह)

लेखिका- डॉ. मालिनी गौतम

प्रकाशन-अयन प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य-70 रूपये

प्रथम संस्करण-2014

 

समीक्षक

बैकुठंनाथ

 

बोपल, अहमदाबाद-380058

गुजरात

मो.09725602734

4 blogger-facebook:

  1. कवयित्री मालिनी गौतम के काव्य संग्रह' बून्द बून्द अहसास 'पर बैकुंठनाथ की समीक्षा अच्छी थी काव्य संग्रह के लिए मालिनी जी को बहुत बहुत बधाई .

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  2. बहुत-बहुत धन्यवाद सुनीता जी !

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  3. बूंद-बूंद अहसास ....... जैसे आहिस्ता-आहिस्ता वारिश का पानी परकोलेट होता जा रहा हो धरती में और तृप्त होती जा रही हो धरती । बॉर्बी डॉल को बधाई :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. बूँद-बूँद अहसास ..............जैसे आहिस्ता-आहिस्ता वारिश का पानी परकोलेट होता जा रहा हो धरती के भीतर ........और तृप्त होती जा रही हो धरती । बधाई ! बॉर्बी डॉल जी !

    उत्तर देंहटाएं

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