शनिवार, 5 अप्रैल 2014

यशवंत कोठारी का व्यंग्य - चुनाव के विकट संकट

ताज़ा व्यंग्य

चुनाव के विकट संकट

यशवंत कोठारी

शंख नाद हो गया हे. रणभेरी बज गयी हे। बसंत के राजा कामदेव के जाते ही चुनाव देव कि सवारी जम्बू द्वीप में आगयी हे। यह समय चुनाव का टिकट कि मारामारी का हे। विकत भयंकर समय हे। दोस्त दुशमन हो रहे हे। दुशमन दोस्त बन रहे हे। पता नहीं चुनाव का ऊट किस करवट बैठेगा , बैठेगा या खड़ा ही रहेगा। बहुमत आएगा या गठबंधन होगा या मिड टर्म चुनाव होंगे। किसकी भेस पानी में जायेगी और कोण भेस कि पूँछ पकड़ कर वैतरणी को पार प् जायेगा। पार्टीवाले टिकट लेकर उम्मीदवारो के पीछे दौड़ रहे हे,हार कि चिंता में उम्मीदवार नयी पार्टी ढूँढ रहे हे. रूठे हुए को मनाने के लिए पार्टी के दिग्गज दौड़ रहे हे।

पार्टी बदलने से ले कर स्थान बदलने तक के संकट का सामना यह प्रजातान्त्रिक देश कर रहा हे. सब कुछ अज़ीब गड़मड़ हो रहा हे। चुनावी राजा बाजा बजा रहा हे और नक्कार खाने में मतदाता रुपी तूती आवाज कोई नहीं सुन रहा हे।टिकटों कि खरीदारी हो जाये तो मामला आगे बढे। आगे बढे तो जीत हर का समीकरण बने। जातिवाद  , पूंजीवाद के सहारे चुनाव जीतने का जुगाड़ हो। वेसे चुनाव एक राजनितिक जुआ हे जिसमे कोई नहीं जीतता सब हारते हे।

चुनाव का अर्थशास्त्र अत्यंत विचित्र हे। इस बार हर उम्मीदवार कम से कम दस करोड़ का जुआ खेलेगा ,और हार जाने पर माथे पर हाथ रख कर रोयेगा। । पार्टी का क्या हे इस बार नहीं तो अगली बार मगर बेचारे उम्मीदवार का क्या उसकी भेस तो गयी पानी में। आजका मतदाता ऐसा कि बीन बजते रहो और मत दाता मस्त पगुराते रहे। चुनाव के लड्डू जो खाये वो भी पछताए जो न खाये वो भी पछताये। चुनाव का नज़ारा विचित्र हे भयंकर हे।

भेड़ो से पूछा जा रहा हे कि तुम्हे कोण सा भेड़िया पसंद हे ,आपनी पसंद का भेड़िया चुन लो। फिर न कहना कि हमे खबर न थी। बकरिया बताएगी कि उन्हें किस जबड़े में जाना हे , ,चिड़ियों से पुछा जा रहा हे कि उनकी पसंद का बहेलिया कोण सा हे। मतदाता बतायेगा कि वो किस केहाथों हलाल होना चाएगा। वेसे भेड़िये जबड़े बहेलिये , कसाई सब जानते हे कि मांस अ स्वाद मीठा होता हे। इन भेड़ो बकरियो चिड़ियों ,मतदाताओ को चुनाव के बाद पूछता ही कोण हे। गली गली मेरोटे फिरते हे। चुनाव मेबजट लीला होती हे। रामलीला होती हे। रासलीला -शराब लीला भी होती हॅहुनव में सब अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग अलापते हे। पार्टिया समजती हे हम मतदाता को बेवकूफ बना रहे हे। मतदाता सोचता हे हम पार्टी को सबक सिखा देंगे। जादू , कमल,पंजा सब अपने अपने प्रयासो में लगे हुए हे। कवियो ने कविताई करना छोड़ कर नारे लिखने का कम शुरू कर दिया हे। कवी नारे लेकर पार्टी आफिस जाता हे यदि पार्टी जीत गई तो पद्मश्री नहीं तो छद्म श्री। व्यंग्यकारों ने पुराना मॉल निकल लिया हे, नए नए शीर्षक लगाकर संपादको कि टेबल पर ढेर करने में व्यस्त हो गए हे। वास्तव में देश में चुनाव आगये हे। ये चुनाव अनोखे हे, कही भेस हे कही डंडा हे, कही लाल बत्ती हे, कही कही तो रोने धोने कि लीला भी जरी हे।

पाठको चुनाव के इस दौर में जो लड़े सो महान जो नहीं लड़े सो भी महान। आसन्न चुनाव के विकत संकट जारी हे। प्रजातंत्र के लड्डू बर्फी का इंतज़ार हे। चुनाव के इस डोर में कार्यकर्ता खिड़की, दरवाजो छतो पर खड़े होकर चिल्ला रहे हे। बयानवीर बयानो के तीर छोड़ रहे हे। टीवी पर बहसे हो रही हे। टीवी के बाहर पत्रकार जुगाड़ बिठा रहे हे। पकडे जाने पर सफाई दे रहे हे। आसन्न चुनाव के विकत संकट जरी हे।

हे मतदाता इस बार बार पूरा न्याय करना।

० ० ०

यशवंत कोठारी ,  ८६, लक्मी नगर, ब्रह्मपुरी बहार , जयपुर-२

केम्प- डेन्वेर

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