रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - मछलियां

मछलियां

वे एक ही समय में एक ही आदमी से बात करते हुए अपने तेवर बदलते रहने में माहिर हैं जैसे इसी वक्त अपने घर ठहरे हुए क्षेत्र के एम. पी. से पहले खुशामदी अन्दाज में उन्होंने यह बात कहीं कि पार्टी में ए. पी. महोदय की स्थिति इतनी मजबूत है कि वे किसी भी समय मंत्री बनाये जा सकते हैं। उनकी बात सुनका एम. पी. खुश हो हुए। इसलिए नहीं कि वे मंत्री बनाये जा सकते हैं, बल्कि इसलिए कि उनके चुनाव क्षेत्र में लोगों को यह नहीं मालूम है कि पार्टी में उनकी स्थति कितनी खराब हो गई है। फिर अभय सिंह ने तेवर बदले, माथे पर लकीरें पड़ी, चिंता जगी, आंखें लाल हुई, क्रोध आया; फिर उन्होंने जरा कड़ी आवाज में एम. पी. से कहा कि चुनाव क्षेत्र की हालत खराब है और अगल चुनाव में वोट लेना टेढ़ी खीर होगा, क्योंकि क्षेत्र के अधिकारी अपने निजी स्वार्थो के लिए लड़ रहे हैं और जनता की उपेक्षा हो रही है। एम. पी. यह जानकर चिंतित हो गये। उनके चेहरे पर भाव आया कि देखो कैसे नादान लोग हैं, नश्वर संसार के माया-मोह में फंस गये। अभय सिंह को एम. पी. साहब के चेहरे का यह भाव पसंद नहीं आया। वे बोले, ‘‘अफसरों के कान न उमेठे गये तो हाहाकरा मच जायेगा।’’ एम. पी. बात सुनकर हलका-सा मुस्कराये जैसे उनके सामने भरी अदालत में एक-एक सरकारी अफसर को बुलाया जा रहा है और अभय सिंह उनके कान उमेठ-उमेठकर उन्हें आगे चलता कर रहे हैं। लेकिन एम. पी. साहब अपनी मुस्कराहट पी गये और बोले ‘‘किया क्या जाये’’

अभय सिंह यही बात सुनना चाहते थे। उन्होंने मधुर अन्दाज में कहा, ‘‘श्रीमान जी, ये सरकारी अफसर थाली के बैगन होते हैं। थाली आप सही दिशा में घुसा दें तो उधर ही लुढ़क जायेंगे। ‘‘एम. पी. साहब झुंझला गये। सुबह-सुबह चाय की लगातार गर्म-गर्म तीन प्यालियां पीने के बावजूद उन्हें पेट से किसी चीज के बाहर निकलने का दबाव नहीं महसूस हो रहा था। उन्हें शक था कि आज का दिन फिर खराब हो जायेगा। ऐसी स्थिति में वे पहेलियां नहीं बूझना चाहते थे। ‘अरे तो बताओ न के जवाब में अभय सिंह बोले, ‘‘कमिश्नर साहब दौरा करा दीजिए। सब ठीक हो जायेंगे।’’ एम. पी. ने उनकी तरफ देखा जैसे कह रहे हों, अबे उल्लू इतनी सी बात के लिए यह सब कहने की क्या जरूरत थी। सीधे-सीधे कह देते कि जिले के अफसरों पर चड्ढी गांठने की रानें मचल रही हैं।

‘‘तो ये कौन-सी मुश्किल बात है। अगले महीने लो....’’ कहते-कहते एम. पी. साहब बाथरूम की तरफ दौड़े और अभय सिंह सोचने लगे, अभी थोड़ी देर में और मिलने वाले आ जायेंगे। फिर बात न हो पायेगी। इसी वक्त इस साले के पेट में हूक उठने को थी। अब यह तो हो नहीं सकता कि वे बाथरूम के दरवाजे से मुंह लगाकर खड़े हो जायें और एम. पी. साहब से कमिश्नर के बुलाने का कार्यक्रम तय करने लगें। वे वेचैनी से उठे और बाथरूम के सामने टहलने लगे। उन्हीं को मालूम था कि कमिश्नर का आना उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है।

एक घंटा पैतालीस मिनट आठ सेकेण्ड बाद एम.पी. साहब बाहर निकले। इस बीच उन्होंने नौकर से कह दिया था कि आने वालों को बाहर बरामदे में बैठाया जाये। तार के तार और बेतार के तार खटखटाये गये और कमिश्नर साहब के आने का कार्यक्रम तय हो गया।

अभय सिंह सरकारी राजनीतिज्ञ नहीं थे, फिर सुखी थे। वे पचड़े में पड़े बिना, कोई पद प्राप्त किये बिना, दिक्कतें उठाये बिना अपना काम निकाल लेना जानते थे। उन्होंने सन् बावन से लेकर पिछले चुनाव तक कांग्रेस के उम्मदीवारों को सपोर्ट किया था। पिछले चुनाव में जनता का रंग एक रात उन्हें ऐसा दिखाई दिया कि वे कांग्रेस के उम्मीदवार से पिछले दस सालों के सम्बन्ध तथा कांग्रेस पार्टी से चालीस सालों के पारिवारिक संबन्धों को छोड़-छाड़, तोड़-ताड़ जनता के आदमी हो गये। यानी अन्तरात्मा की आवाज को उन्होंने सही वक्त पर पहचान लिया और उन्हें उतनी बेशर्मी दिखाने की जरूरत महसूस न हुई जितनी उनके दूसरे दोस्तों को बाद में हुई।

वे चुनाव में कभी खड़े न हुए थे और खड़ा होना भी नहीं चाहते थे। लेकिनहर चुनाव में उनकी पूछ होती थी। उनके घर के सामने जीपें खड़ी रहती थीं। उनके बरामदे में झंडे और पोस्टरों के गट्ठर पड़े रहते थे। उनकी कोठी के कंपाउण्ड में शामयाना लग जाता था और पूड़ी तलने के लिए कढ़ाव चढ़जाता था। उन्हें यह हुनर अच्छी तरह मालूम था कि अपने को किसी दूसरे बड़े आदमी से किसी तीसरे बड़े आदमी का खास आदमी कैसे मनवा लिया जाये।

उन्होंने दो धुरे पकड़ लिये थे। एम. पी. यह समझता था कि ‘जनता’ पर इनका बहुत असर है और ‘जनता’ समझती थी कि एम. पी. पर इनका बहुत असर है। ऐसा मौका कभी नहीं आता था कि ये तीनों आमने सामने हों।

वे लाग-लपेट पसन्द नहीं करते। जनता से उन्होंने साफ कह दिया है कि सरकारी अफसर घूस लेते हैं और उनसे कोई काम घूस दिये बिना नहीं चल सकता। सरकारी अफसरों से उन्होंने कह रखा है कि वे घूस नहीं देते, क्योंकि घूस देना पाप है। जनता के कामों से जब वे दिल्ली जाते हैं तो बात पहले ही साफ कर देते हैं, ‘‘देखो मिनिस्टर का मामला है। दिल्ली में हों, न हों। हों भी, तो मेरे नौकर तो हैं नहीं मुलाकात हो पायें, न हो पाये। हो सकता है हफ्ता लग जाये, हो सकता है पन्द्रह दिन। इन्हीं दिनों मेरे सेशन में चार केस लगे हैं। सौ रुपये रोज का नुकसान मैं उठा नहीं सकता। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या अब अगर तुम ले चलना चाहो तो मैं चल सकता हूं। इसलिए कि कभी यह न कह सको कि मेरा काम नहीं किया।’’और भी दिल्ली के उनके महीने-दो-महीने में एक-आध चक्कर लग ही जाते थे।

एम.पी. नाश्ता वगैरा करके ‘जाति तोड़ो’ सम्मेलन की अध्यक्षता करने गये तो अभय सिंह ने कमिश्नर साहब के दौरे और उससे जिले के अधिकारियों पर पड़ने वाले प्रभाव पर सोचना शुरू कर दिया। पिछले दिनो डी. एम नयाआ गया है। अभी तक यूनीवर्सिटी की हवा में है। इतना ‘अनसोशल’ है कि क्लब तक नहीं आता। एस. पी. यादव हैं और जिले के यादवों का गुट उसे छापे बैठा है। डी.पी.ओ. हरिजन है। और सिर्फ हरिजनों को पैसा लुटाते रहते हैं। पूरा का पूरा माहौल खराब है। और अभय सिंह को तीन बड़े-छोटे काम निकालते हैं। गफूर ठेके दार को जी. टी. रोड का ठेका मिला। उसने नम्बर चार का माल आधिशासी अभियन्ता से पूछकर लगाया, लेकिन रामरतन ठेकेदार के कहने-सुनने पर अभय सिंह ने अधिशासी अभियन्ता का तबादला करा दिया और अब नया अभियन्ता ठेकेदार अब्दुल गफूर को जेल भिजवा देने पर तुला हुआ है। रामरतन ठेकेदार ने उसकी मुट्ठी गरम जो कर दी है। अब्दुल गफूर यह जानता था कि पुराने अधिशासी अभियन्ता का तबादला अभय सिंह ने कराया था। वह सीधा अभय सिंह के पास आया और बोला, ‘‘भाई साहब, इज्जत जा रही है। पैसे का मोह नहीं है। आपके सुन्दर नगर वाले प्लाट पर बंगला बनेगा। बस, बचा लीजिए। रामरतन ठेकेदार ने सिर्फ मुट्ठी गरम की थी। अब्दुल गफूर शरीफ आदमी है। लेकिन नया अधिशासी अभियन्ता उनकी बात क्यों मानने लगा’ बिन्दू का भाई डाके में फंस गया है। अभी शिनाख्त नहीं हुई है। चौरस का दारोगा पांच हजार मांगता है। यह तो बड़ी रकम है। पुलिस वालों का दिमाग खराब हो जाएगा और थानेदार के पास जाना उनकी बेइज्जती थी।

बच्चों के स्कूल के प्रिसिपल ने पहले एक मास्टर की रोज शाम की ड्यूटी अभय सिंह के घर लगा दी थी। बच्चों को पढ़ाया जाता था। पिछले कई महीनों से कोई नहीं आया। बच्चे बर्बाद हो रहे हैं। प्रिंसिपल से यह थोड़े ही कह सकते हैं कि किसी मास्टर को बच्चे पढ़ाने भेज दिया करो। काम सिर्फ कहने से नहीं होते, वह अच्छी तरह जानते हैं।

वे बाहर से घर के अन्दर चले आये और सीधे पलंग पर लेट गये। लेटे-लेटे पत्नी को चाय बना लाने का आदेश दिया। पत्नी चाय की प्याली लायी तो उन्होंने पत्नी की तरफ गौर से देखा। अब कुछ नहीं रह गया है। उन्हें लगा, पत्नी पर जो कुछ पैसा उठ रहा है वह उसके योग्य बिलकुल नहीं बची है। वे चाय की चुस्कियां लेने लगे। पत्नी सामने बैठ गयी। उन्होंने पत्नी को माचिस और सिगरेट लाने को कहा। पत्नी को कई साल हुए गठिया हो गया था। वह घुटनों पर दोनों हाथ रखे देर तक जोर लगाती रही और फिर उठ खड़ी हुई। माचिस और सिगरेट लाकर दी। सिगरेट का लंबा कश लेकर उन्हें याद आया कि अभी तक दवा नहीं पी है। उन्होंने पत्नी को दवा लाने को कहा। पत्नी फिर उठी और दवा ले आई।

नाश्ते पर उन्होंने दे अंडे, दो टोस्ट, मक्खन की एक टिकिया और एक गिलास दूध लिया। बच्चों ने चार-चार टोस्ट और दूध पिया। पत्नी ने टोस्ट चाय में डुबो कर खाए। जब नाश्ता खत्म होने वाला था तो उन्होंने संयत आवाज में सबको सूचित किया, ‘‘कमिश्नर साहब आ रहे हैं। हमारे घर पर लंच लेंगे।’’

‘‘अच्छा, कमिश्नर साहब...’’

‘‘तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। कमिश्नर साहब और मैं इलाहाबाद में एक ही हॉस्टल में थे...’’

‘‘खाना-वाना...’’

‘‘सब कुछ मालूम हो जाएगा।’’ वे मेज़ से उठ गए और बच्चे ‘‘कमिश्नर साहब आ रहे हैं, कमिश्नर साहब आ रहे हैं,’’ का शोर मचाते स्कूल चले गए।

वह उठकर बाहरी बैठक में आए। घड़ी देखी। अब तक एम.पी. साहब ने डी.एम. को कमिश्नर के आने वाली बात बता दी होगी। डी.एम. अपने ऑफिस में होंगे। एम.पी. हरिजन कल्याण समिति की बैठक में।

उन्होंने डी.एम. का फोन मिलाया।

‘‘जी नमस्ते हुजूर... मैं अभय सिंह...’’

‘‘कहिए मिस्टर...।’’

‘‘कृपा है जी... वह एम.पी. साहब ने कमिश्नर साहब...’’

‘‘जी हां, जी हां, पता चल गया है। कुछ...’’

‘‘अजी साहब, मैं तो बचना चाहता था। लेकिन एम.पी. साहब का अनुरोध टाल न सका। जबकि कमिश्नर यानी अपने दत्त साहब मेरे हॉस्टल फेलो...’’

‘‘अच्छा, वाह... तो पुरानी...’’

‘‘अजी उनकी शादी में एक गवाह मैं भी था,’’ अभय सिंह जानते थे कि कलक्टर की हिहम्मत कमिश्नर से यह पूछने की नहीं हो सकती कि आपकी शादी में कौन-कौन गवाह थे।

‘‘यह तो हमारा सौभाग्य है अभय सिंह जी...।’’ कलक्टर की आवाज पिघलने लगी।

‘‘एक निवेदन है आपसे...।’’

‘‘कहिए, कहिए...।’’

‘‘बड़ी सुविधा हो जाएगी यदि आप ज़िले के अन्य अधिकारियों को सूचित कर दें कि कमिश्नर...।’’

‘‘अभी लीजिए, अभी...।’’

‘‘धन्यवाद, तो आपके बिना...’’

‘‘हां, मैं तो जरूर ही हूंगा।’’

टेलीफोन का चोगा खकर वे कुर्सी पर अराम से लेट गए। ज़िले के सभी अधिकारियों को सूचना मिलते-मिलते एक घंटा तो लग ही जएगा।

‘‘इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स को वे जनते नहीं थे। लेकिन उन्होंने उसके ऑफिस फोन मिलाया।

‘‘अभय सिंह, कौन अभय सिंह’

अभय सिंह इस अपमानजनक सवाल पर बिगड़े नहीं। आवाज को और नम्र बनाकर बोले, ‘‘मैं आपके ही श्हर का एक समाजसेवी हूं। अगले महीने की सतरह तारीख को कमिश्नर महोदय मेरे निमंत्रण पर पधार रहे हैं। दोपहर का भोजन मेरे ही साथ करेंगे। ज़िले के अधिकारियोसे भी मिलेंगे... आपसे निवेदनहै कि आप भी मेरे साथ भोजन करें... जी हां... इसके अतिरिक्त यदि उचित हो तो मॉडल स्कूल से पचास कुर्सियों की व्यवस्था करा दें... जो किराया होगा, मैं दे दूंगा...।’’

‘‘किराया कुर्सियां आपको मिल जाएंगे, पर किराए पर नहीं...।’’

‘‘क्षमा चाहता हूं। मुझे ऐसी ही सूचना मिली थी कि प्रिंसिपल महोदय किराए पर... नहीं-नहीं, मुझे उससे क्या सरोकार। आप कृपया प्रिंसिपल साहब को फोन कर दें कि मैं उनसे संपर्क करूंगा।’’

‘‘मैं अभी उसे फोन करता हूं।’’

‘‘धन्यवाद।’’

उन्होंने फोन रख दिया। कुर्सियां तो आ ही जाएंगी। उन्हें असली चिंता तो मास्टर की है। बच्चों का समय बर्बाद होता है।

एक घंटे से ज़्यादा समय हो चुका था। उन्होंने नौकर को आवाज देकर कहा कि बिंदू को बुला लाए। नौकर चला गया। उन्होंने एम.पी. को फोन मिलाया।

‘‘...अजी बस पीछे पड़ गए एम.पी. साहब... कमिश्नर तुम्हारा दोस्त है, तुम्हारे ही यहां ठहरेगा... मैंने कहा भुगतेंगे साहब... दोस्ती में हज़ार-दो हज़ार का खून ही सही... भाई, वैसे तो सब बंदोेबस्त हो गया है, मछली नहीं मिल रही है। आप आप चौरसिया थाने के एस.ओ. को भेज दें।’’

‘‘बिल्कुल अभय सिंह जी, यह तो सरकारी काम हो गया है...।’’

अगला नम्बर अधिशासी अभियन्ता का था, वह आफिस में नहीं मिला। अभय सिंह ने उसे मोटी-सी गाली दी। घर फोन मिलाया। वहां मिल गया।

‘‘ जी हां कहिए,’’ उसकी आवाज में अकड़ थी।

‘‘कमिश्नर साहब।’’

‘‘जी मुझे पता चल गया है, जरूर....।’’

‘‘एक बात बिशेष है....।’’

‘‘बताइए।’’

‘‘जनता पार्टी के कुछ कार्यकर्त्ता आपके संबंध में कमिश्नर को एक ज्ञापन देना चाहता हैं...।’’

‘‘ज्ञापन....

‘‘हां जी, पता नहीं....मैं तो...सोचा आपके पहले बता दूं।’’

‘‘लेकिन कोई कारण’

‘‘अजी कारण से इस देश में क्या काम होता हे’

‘‘फिर’ अधिशासी अभियन्ता की आवाज में लोच आ गयी।

‘‘अगर आप कहें....तो मैं जनता पार्टी की जिला शाखा के अध्यक्ष तलवार से बात करूं...तलवारजी मेरी बात काट नहीं सकते। बीस साल की दोस्ती हैं...लेकिन मुझे क्या मतलब...।’’

‘‘नहीं, नहीं अभय सिंह जी।’’

‘‘मैं तो यह सोच रहा था किसी का नुकसान....’’

‘‘ठीक है, कृपा है आपकी...’’

‘‘एक कष्ट देना था...था।’’

‘‘कहिए।’’

‘‘अब्दुल गफूर...।’’

‘‘उस संबन्ध में मैं मजबूर हूं।’’

‘‘आप प्रयत्न कीजिए। रास्ता तो भगवान निकालेगा। जरूरी बात है। इज्जतदार आदमी है।’’

‘‘अच्छा....आप।’’

‘‘जी हां...बड़ी कृपा होगी...तलवारजी को मै पक्का कर लूंगा, लेकिन...।’’

उन्होंने लेकिन, पर फोन बंद कर दिया। वे जानते थे कि हर पार्टी में उनके कुछ आदमी ऐसे हैं जो किसी भी तरह का ज्ञापन दे और रोक सकते हैं। वे मुस्कराये। माथे पर हाथ फेरा और अपने मित्र डी. ए. ओ को फोन मिलाया।

‘‘अरे यार...मुझे तो मुर्गे वाली नहीं, मुर्गी वाली दावत दो...याद है अभय बाबू कचड़ी खेड़ा की वह रात....जब कैंप लगा था...।’’

‘‘अर्जी सब याद है...तुम इस पार्टी में आना जरूर...और यार, मैं सामान की लिस्ट गिरधर लाल मनोहर लाल के यहां भिजवा रहा हूं, तुम बड़े बाबू से फोन करा दो।’’

‘‘अभी लो, अभी लो।’’

दो-चार और वाक्य बोलकर वे लिस्ट बनाने लगे। बीस किलो डालडा, बीस किलो चीनी, दस किलो सूजी,....लिस्ट बढ़ती चली गई और वे उसे बढ़ाते चले गए।

शाम होते-होते बिन्दू आया। बिन्दू को उन्होंने बता दिया कि तीन हजार पर काम तय हुआ है। बिन्दू के पास डकैती की कमाई थी। वह तैयार हो गया।

उनकी गणना के अनुसार चौरसिया एक एस.ओ. उसी समय आया, जब बिन्दू बरामदे में बैठा था। दोनों की मुठभेड़ हो गई। दोनों एक-दूसरे को पहचानते थे।

एस.ओ. ने एड़ियां बजाकर अभयजी को प्रणाम किया। उन्होंने उसे बैठने को कहा, ‘‘बैठो भाई, बैठो।’’

‘‘जी, साहब का फोन गया था।’’

‘‘अरे, भाई, तुम्हारे साहब, यानी अपने पूत्तू बाबू से मैंने कई बार कहा कि किसी चीज की जरूरत नहीं है। मछली रह गयी है, इसका इंतजाम भी हो ही जायेगा। लेकिन पीछे पड़ गये। आखिर तुमको कष्ट उठाना पड़ा।’’

‘‘कष्ट की क्या बात जी, हम तो आप ही के बच्चे हैं।’’

अभय मुद्रा में हंसते हुए वे बोले, ‘‘कहो, कोई तकलीफ तो नहीं है’

‘‘न पूछिये सर, जो है सिफारिश लिये चला आता है। छोड़ दो तो फंसो, न छोड़ो तो फंसो।’’

‘‘यही बात मैंनें मुख्यमंत्री जी से कह दी तो बगलें झांकने लगे। जबाब हो तो दें न मैंने कहा, सारे भ्रष्टाचार के जिम्मेदार सरकारी अफसर हैं...तो क्या वहां से हटना चाहते हो’

‘‘ऐसा हो जाए तो कल्याण हो जाए सर...आप जानते हैं डिप्टी मिनिस्टर के चुनाव क्षेत्र का थाना है...रोज़ एक न एक फसाद खड़ा है।’’

‘‘तो कहां भिजवा दें... पुत्तू बाबू से कहूंगा....ईमानदार आदमी की तकलीफ नहीं देखी जाती....बोलो....मऊपुर करा दूं’

‘‘ एस.ओ. जानता था कि मऊपुर के थाने में पांचों उंगलियां घर में रहती हैं कोई पूछने-पाछने वाला नहीं है।

‘‘अरे भाई मज़े की बात यह है कि तुम्हारे एस. पी. साहब यानी हमारे पुत्तू बाबू भी अपना तबादला कराना चाहते हैं। ससुराल से काफी दूर पड़ गये हैं न...कह रहे थे कमिश्नर से कहकर आजमगढ़ के आसपास करा दूं...,’’ अभय सिंह इस तरह हंसे जैसे किसी बच्चे ने प्यारी शरारत कर दी हो। फिर बोले, ‘‘तो भाई मैं उनसे कहूंगा पहले तुम्हारा तबादला कर दें....फिर मैं कमिश्नर...’’वे फिर हंसने लगे।

एस.ओ. ने हाथ जोड़ दिये। इस काम के लिए वह एस. पी. आफिस के बड़े बाबू को पांच हजार रुपये तक देने को तैयार था।

‘‘अच्छा सुनो...’’वे जैसे बेखयाली में बोले ‘‘तुम्हारे क्षेत्र में हमारा एक आदमी बिन्दू रहता है...बड़ा शरीफ आदमी है, उसके भाई को लोगों ने डाके में फांस दिया है...क्या बताऊं, बड़ा दुःख होता है....बेकसूर आदमी...।’’

‘‘अभी तो शिनाख्त तो नहीं हुई है, सर।’’

‘‘अरे भाई, मुझे क्या मालूम, क्या हुआ है और क्या नहीं हुआ। मैं तो यह मान बैठा हूं कि उसे फांसी हो जायेगी...छोटे-छोटे बच्चे...।’’

‘‘नहीं जी, यह कैसे हो सकता है।’’

‘‘भाई बेकसूर आदमी है। बाल-बच्चे भूखे मर जायेंगे।’’

‘‘नहीं जी, यह कैसे हो सकता है। आपका आदमी मेरा आदमी...।’’

‘‘नहीं भाई, नहीं, कानून को अपने हाथ में न लेना। कानून तो धर्म से ज्यादा पवित्र है। बस यदि कुछ...।’’

‘‘आप चिन्ता न करें, सर...दस साल से पुलिस की नौकरी में...।’’

‘‘हां, भाई, वह तो है ही...’’

‘‘सो सर मछली...’’

‘‘नहीं भाई, मछलियां,’’ वे हंसने लगे।

‘‘जी सर, मछलियां।’’

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