शनिवार, 19 अप्रैल 2014

सुशांत सुप्रिय की कहानी - क़लम

     # क़लम
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                                                   --- सुशांत सुप्रिय
श्विन-कार्तिक के महीनों में हल्की ठंड हो जाती है । पहाड़ों पर बर्फ गिरने का असर पूरे उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों पर पड़ता है । इन दिनों मैदानी इलाक़ों में हल्की बारिश होते ही जाड़ा आ जाता है ।
         इन्हीं दिनों में दशहरा , दुर्गा पूजा , धनतेरस और दीपावली मनाई जाती है । रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं । देवी दुर्गा की ख़ूबसूरत प्रतिमाएँ
पण्डालों में सजी होती हैं । नए बर्तनों , कंदीलों , दीयों और पटाखों का मौसम होता है ।
        तब मैं सोलह साल का था और पिता उन्चास के । वे बीमार थे । उन्हें दूसरी बार दिल का दौरा पड़ा था । कुछ दिन अस्पताल में रह कर वे घर लौटे ही थे कि बाथरूम में गिर गए थे । कूल्हे में चोट लगी थी । डाॅक्टर आ कर देख गया था । दवाइयाँ बढ़ गई थीं । जब मैं रबड़ के बैग में गरम पानी भर कर उनके चोट की जगह को सेंकता तो वे दर्द से कराह उठते ।
        जैसे लहरें तट पर आ कर कमज़ोर पड़ जाती हैं, पिता दुबले और कमज़ोर हो गए थे । उनकी गर्दन और हाथों की सारी फूली नसें साफ़-साफ़ दिखाई देती थीं । उनके हाथ रह-रह कर काँपते थे और रहते-रहते उन्हें स्मृति-भ्रंश हो जाता कि हम उनके बच्चे न हो कर उनके विद्यार्थी थे जिन्हें वे विश्वविद्यालय में पढ़ाया करते थे ।
        मैं अपने जीवन में उनकी जगह ख़ाली पाने की आशंका से भी डरता था । मैं चाहता था कि वे हमेशा मेरे साथ रहें । उनका साथ मुझे सम्बल प्रदान  करता था । वह स्नेह का बंधन था जो पिता और मुझे एक-दूसरे की ओर खींचता था । स्नेह में चुम्बकीय खिंचाव होता है । उनके न रहने की कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठता । एक भयावह ख़ालीपन का दैत्य मुझे खाने को दौड़ता । पिता जैसे बहती हुई नदी में स्थिर एक द्वीप
थे । और वह द्वीप ही हमारी दुनिया थी ।
       उस दिन पिता ने मुझे बुलाया । उनकी स्मृति के ताल पर जमी काई हट गई थी और उनकी आँखों में पहचान का सूरज जगमगा रहा था । बाहर हल्की बारिश होने लगी थी और खिड़की से फुहारें भीतर आ रही थीं । पिता धीमे स्वर में निराला का गीत ' अरे
वर्ष के हर्ष , बरस तू बरस-बरस रसधार, पार ले चल तू मुझको ...' गुनगुनाने लगे । हम दोनों कई साल पीछे चले गए जब मैं छोटा बच्चा था और पिता बारिश के मौसम में मुझे गोद में उठा कर मुक्त स्वर में यह गीत गाते थे ।
       फिर उन्होंने ' श्री रामचंद्र कृपालु भजुमन हरण भव भय दारुणं ' वाली स्तुति सुनने की इच्छा व्यक्त की । यह उनकी प्रिय वंदना थी । मैं उनके सिरहाने बैठ गया और पाठ करने लगा । उनके चेहरे पर एक असीम शांति फैल गई थी । अचानक दर्द की एक गाँठ उन्हें शूल-सी चुभी होगी क्योंकि उनके गले से एक अजीब कराह निकली ।
       यह एक ऐसी हृदय-विदारक आवाज़ थी कि पल भर के लिए हवा जैसे थम-सी गई होगी, बाहर नदी का बहता जल रुक-सा गया होगा , पूजा-घर में जलता दीया बुझ-सा गया होगा ।
       मैं डर गया और फफक-फफक कर रोने लगा । " पिताजी, आप मुझे छोड़ कर कभी मत जाइएगा ..."
       असह्य दर्द के बीच भी उन्होंने मुस्करा कर कहा था -- " धत् पगले ! मैं कहाँ जाऊँगा ? जा ताक पर से मेरी क़लम ले आ । "
       क़लम अपने हाथों में ले कर वे उसे प्यार से देखते रहे । फिर उन्होंने वह क़लम
मेरे हाथों में थमा दी और प्यार से मेरे गाल थपथपाते हुए कहा -- " अरे बुद्धू रोता क्यों है ? जब मैं नहीं रहूँगा , तब भी हूँगा मैं तेरी क़लम में कविता-कहानी बन कर । जैसे मुझ में बचे हुए हैं मेरे पिता और अपने बच्चों में बचा रहेगा तू , वैसे ही बचा रहूँगा मैं तुम में जाने के बाद भी ।" बोलते-बोलते उनकी साँस फूल गई ।
       उस रात मैं देर तक उनकी छाया में बैठा रहा । उनके पैर दबाता रहा । उनका
माथा सहलाता रहा । वे चुप थे किंतु उनकी आँखें जैसे बोल रही थीं -- बेटा , अपना
ख़याल रखना । रोज़ नहाया करना । समय पर खाना खाना । समय पर सोना ।
और डट कर पढ़ना...
       रात में ठंड बढ़ गई थी । ऊँची पहाड़ियों पर शायद हिमपात हुआ था । पिता को कम्बल ओढ़ा कर मैं बगल वाले कमरे में सोने चला गया । नींद में मुझे अजीब से डरावने सपने आते रहे ।
       सुबह तड़के ही घर के लोग रोने लगे । मैं चौंक कर उठा । सब विलाप कर रहे थे । पिता रात में ही चल बसे थे । जो हाथ मुझे आशीष देते थे , जो होठ मेरा माथा चूमते थे,
वे ठंडे, निष्प्राण पड़े थे ।
        पिता चले गए ।
       उनकी दी गई क़लम से मैंने ढेरों कविताएँ लिखीं , कहानियाँ लिखीं । वह केवल एक क़लम नहीं थी , विद्यादान था , विरासत थी , धरोहर थी । वह एक पिता का दिया आशीर्वाद था । एक पिता का दिया प्रोत्साहन था । एक पिता का दिखाया सन्मार्ग था ।
वह पिछली पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को थमायी गई मशाल थी । क़लम अपने-आप में कुछ नहीं होती ।जिन हाथों ने उसे आपकी उँगलियों में थमाया होता है, वह उनकी निशानी होती है । उसमें उनकी स्मृति बसती है ।
       जब मेरा बेटा बड़ा होगा, मैं यह क़लम उसे थमा दूँगा ।
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                                # कॉपीराइट : लेखक
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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
 
         बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,
         नई दिल्ली - 110055
ई-मेल: sushant1968@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. पिता के महत्व को लेखक ने बखूबी बताया है .

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    उत्तर
    1. शुक्रिया , सुनीता जी ।

      हटाएं

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