रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - धीरे से जाना बगियन में

धीरे से जाना बगियन में

पुलिस कमिश्नर (पुक) अपने आफिसर में बैठे थे और सामने फाइलें थीं। अचानक दरवाजा खुला और एक मालूमी, कामूली सिपाही अंदर आ गया ‘पुक’ की बड़ी हैरत हुई। उनके कमरे में इस तरह बिना इजाजत के तो डी.सी.पी. तक नहीं घुस सकते थे। पहले तो उन्होंने यही सोचा कि अपने पी.ए और ड्यूटी पर बैठने वाले सिपाहियों को ‘सस्पेंड’ कर देंगे ‘पुक’ इतना ही सोच पाये थे कि सिपाही सीधा आगे बढ़ा और उसने कुर्सी खींची। ‘पुक’ पर हैरत का पहाड़ टूट पड़ा लेकिन सिपाही कुर्सी पर आराम से बैठ गया। पहले तो ‘‘पुक’ को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने चश्मा उतार कर फिर लगाया। ध्यान से देखा। सिपाही उनसे बिना पूछे उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया था। क्या हकीकत में उन्हें पता चल भी पाया और कुछ शक भी रह गया।

सिपाही कुर्सी पर बैठ गया था और खामोश था। ‘पुक’ की तरफ लगातार देखे जा रहा था और ‘पुक’ उसकी तरफ। दोनों की आंखें चार होते हुए भी कुछ बेचारगी का सा अभ्यास होता था। अचानक ‘पुक’ संभले और अपनी आवाज पत्थर जैसी कड़ी काटों जैसी चुभने वाली बनाकर पूछा, ‘‘तुम किस थाने में हो’

‘‘त्रिलोकपुरी में।’’ वह इस तरह बोला जैसे अपनी पत्नी से कह रहा हो कि आज भी मुझे लौटने में देर हो जायेगी, तुम खाना खाकर सो जाना।

‘‘हूं।’’ ‘पुक’ ने उेस फिर ध्यान से देखा और सोचा कि वह कुछ कहेगा। पर वह खामोश रहा। ‘पुक’ ने घंटी का बटन दबाया। और बाहर घंटी इस तरह गूंजने लगी की सारी आवाजें उसमें दब गयीं और भागा-भागा पी.ए. अंदर गया।

पी.ए. ने सिपाही को ‘पुक’ के सामने कुर्सी पर बैठे देखा तो उसे लगा कि उसके पैरों को लकवा मार गया हो। उसकी बोलती बंद हो गयी।

‘‘तुम्हारा नाम क्या है’ ‘पुक’ ने सिपाही से पूछा।

‘‘सिपाही...’’

‘‘और’ ‘पुक’ समझ रहे थे कि वह सिपाही के बाद अपना नाम बतायेगा।

‘‘सिपाही’’ ने फिर उत्तर दिया।

‘‘सिपाही क्या’ ‘पुक’ ने पूछा।

‘‘सिपाही सिपाही, सिपाही बोला।

‘‘तुम्हारा कोई नाम तो होगा।’’ ‘पुक’ ने पूछा।

‘‘हां, हुआ करता था,’’ सिपाही उदासीनता से बोला।

‘‘हूं,’’ ‘पुक’ रुक कर सोचने लगे और फिर बोले, ‘‘क्या काम है यहां क्यों आये हो।’’

‘‘कोई काम नहीं है,’’ सिपाही बोला।

‘‘कोई काम नहीं है’ ‘पुक’ ने और अधिक गुस्से से पूछा।

‘‘जी, कोई काम नहीं है, वह बोला।

‘‘तो आये क्यों हो’

‘‘इधर से गुजर रहा था तो सोचा आपसे मिलता चलूं,’’ सिपाही ने जवाब दिय और ‘पुक’ को लगा कि पिघलता हुआ लावा उन आ गिरा हो।

अचानक पी.ए. की जबान खुली और वह ‘यस सर’ ‘यस सर’ ‘यस सर’ बोलने लगा...लगभग रटने लगा। ‘यस सर’ से ज्यादा वह कुछ न कह रहा था। जो बैक ग्राउंट म्यूजिक’ जैसा लग रहा था।

‘पुक’ ने फिर घंटी बजाई। वायरलेस खड़खड़ाये गये। फोन पर फोन बजे और त्रिलोकपूरी का डी.सी.पी., ए सी.पी. और थाना इंचार्ज किसी जिन्न या भूत की तरह ‘पुक’ के कमरे में आ गये। उन सबने सिपाही को ‘पुक’ के सामने बैठा देखा और दांतों तले उगलियां दबा ली। सिपाही का ‘पुक’ के सामने कुर्सी पर बैठ जाना भातीय दंड विधान की कौन-सी धारा के अंतर्गत जुर्म है, वे सब यही सोचने लगे।

‘‘सिपाही दीन दयाल खड़े हो जाओ,’’ त्रिलोकपुरी के थाना इंचार्ज ने आर्डर दिया और दीन दयाल खड़ा हो गया।

‘‘डी.सी.पी.’’ ‘पुक’ ने आदेश वाले स्वर में कहा।

‘‘यस सर’’ डी.सी.पी. ने एड़ियां बजाकर सैलूट किया।

‘‘दीन दयाल को मेंटल हास्पिटल ले जाओ।’’

‘‘यस सर’’ डी.सी.पी. ने जवाब दिया।

‘‘लेकिन मैं तो आपको मेंटल हास्पिटल ले जाने आया हूं’’ दीन दयाल ने ‘पुक’ से कहा और लगा जैसे सन्नाटा बम की तरह फट पड़ा हो। इतने बड़े जुर्म पर तो ‘पुक’ ही कोई बड़ा आदेश दे सकते हैं। ‘सबआडीनेट’ क्या बोलते। वे आदेश की प्रतीक्षा करते रहे।

‘‘तुम मुझे ‘मेंटल हास्पिटल’ ले जाना चाहते हो’ ‘पुक’ ने दीन दयाल से पूछा।

‘‘यस सर,’’ सिपाही दीन दयाल बोला।

‘‘चलो,’’ ‘पुक’ बोले।

‘पुक’ ने ड्राइवर के साथ दीन दयाल को बैठने के लिए कहा और खुद पिछला सीट पर बैठ गये। गाड़ी ‘साइरन’ बजाती और लाल बत्तियां चमकाती और क्रासिंग की रेड लाइटें ‘क्रास’ करती मेंटल हास्पिटल पहुंची। ‘पुक’ और दीन दयाल अस्पताल के अंदर पहुंचे। डॉक्टरों ने जो ये मंजर देखा तो सिर पीट लिए। अस्पताल के सबसे बड़े डाक्टर ने ‘पुक’ को भरती करने से इन्कार कर दिया।

‘पुक’ को लेकर दीन दयाल दूसरे डॉक्टर मेंटल हास्पिटल’ में गया जो केवल वी.आई.पी. लोगों के लिए था। वहां भी डाक्टरों ने ‘पुक’ को देखकर यही कहा कि उनकी ‘भर्ती’ करने की आवश्यकता नहीं है उनके बाद दीन दयाल ‘पुक’ को लेकर वी.वी.आई.पी, मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों के लिए बने मेंटल हास्पिटल में ले गया। वहां के प्रधान डाक्टर ने ‘पुक’ को देखा और कहा, ‘‘नहीं, इन्हें भरती नहीं किया जा सकता।’’

‘‘क्यों’’ दीन दयाल ने पूछा।

‘‘इनको जरूरत नहीं है।’’

‘’क्यों’ दीन दयाल ने पूछा।

‘‘मेंटल अस्पताल को हम मंत्रालयों, सचिवालयों, निदेशालयों, हेड क्वाटरो में नहीं बदल सकते,’’ उसने साफ-साफ इनकार कर दिया।

दीन दयाल ‘पुक’ को वापस पुलिस मुख्यालय लाया। उन्हें उनकी कुर्सी पर बैठा कर वह स्वयं ‘जनता मेंटल हास्पिटल’ में जाकर भर्ती हो गया।

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