सोमवार, 28 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की कहानी - दिल की दुनिया

दिल की दुनिया

मुझे यह अन्दाजा बिल्कुल नहीं था कि मैं बुढ़ापे में इतनी जल्दी ‘खिसक’ जाऊंगा। मैं तो ये सोचे बैठा था कि दांतों के दर्द और आंखों की कमजोरी से होता बुढ़ापा सबसे बाद में ‘भेजे’ तक पहुंचेगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। यह भी गजब है कि मैं अपने को भला-चंगा समझता हूं, लेकिन मुझे यह समझाया जाता है या ज्यादातर लोग मानते हैं कि मैं खिसक गया है।

कभी-कभी बुढ़ापे में पता नहीं क्यों, चीजें गड़बड़ाने लगती हैं। कहा जाता है कि बूढे शक्की होते हैं। यह सच है। कहा जाता है कि बूढ़े चटोरे होते हैं। यह भी सच है। कहा जाता है कि बूढों की काम-वासना उनकी आखों और जबान में आ जाती है। यह भी सच है। लेकिन बुढ़ापे में मेरे साथ हो हुआ, वह आम-तौर पर होता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम।

लोग कहते हैं कि बुढ़ापे में बहुत अजीब तरह से खिसका हूं। इसका सुबूत यह दिया जाता है कि मैं अखबार को उल्टा पढ़ने लगा हूं। उल्टा पढ़ने से मतलब यह नहीं कि पिछला पन्ना पहले और पहले का पन्ना आखिर में पढ़ता हूं। उल्टा पढ़ने का यह मतलब भी नहीं कि किसी घटना या सूचना आदि को उल्टा कर देता हूं। उदाहरण के लिए अगर खबर है कि सरकार ने अकाल पीड़ित जनता को सौ-करोड़ रुपए की सहायता देने का निश्चय किया है, तो मैं इस खबर को उल्टा कर देता हूं। पढ़ता हूं कि अकाल पीड़ित क्षेत्र की जनता ने सरकार को सौ करोड़ रुपयें की सहायता देने का निश्चय किया है। यह उल्टा-पुल्टा समझने और कहने की आदत शायद पुरानी है। बस, इतना हुआ है कि बुढ़ापे में थोड़ी बढ़ गई है। मैं पेशे के तौर पर अध्यापक हुआ करता था। छात्रों को जब भी पढ़ाता था, यह लगता था कि छात्र मुझे पढ़ा रहे हैं। और धीरे-धीरे छात्रों से मेरा अच्छा रिश्ता स्थपित हो गया था, क्योंकि मैं पास छात्रों को फेल और फेल छात्रों के पास मानने लगा था। मैं बुद्धिमान को मूर्ख और मूर्ख को बुद्धिमान कहता था। छात्र मेरी बातों के मर्म को समझते थे, लेकिन प्रधानाचार्य मुझसे बहुत नाराज रहता था। क्योंकि में उसे चपरासी और चपरासी को प्रधानाचार्य कहा करता था। एक बार स्कूल में एक नेता आए थे। मैंने नेता को जनता और जनता को नेता बोल दिया था। इस पर नेता ने मेरा तबादला एक दुर्गम स्थान के स्कूल में करा दिया था। पर यह सब मेरे लिए सरल था।

इसी दौरान मैंने सुबह का अखबार चौराहे पर जाकर पढ़ना शुरू कर दिया था। मैं खबरें पढ़ता था-‘प्रधानमंत्री ने ग्लानी के साथ कहा कि देश बहुत तेजी से पीछे जा रहा है।’ मेरी ये खबरें सुनकर लोग प्रसन्न हुआ करते थे। वे मुझसे तरह-तरह की खबरें पढ़वाते थे और देखना चाहते थे कि असली खबरों को अखबार वाले कैसे तोड़-मरोड़ कर छापते हैं। किसी ने मुझे यह सलाह भी दी थी मैं अपना अखबार शुरू कर लूं। लेकिन मेरे पास खबरें नहीं थी। मैं तो अखबारों की उल्टी खबरों से ही सीधी खबरें बनाता था।

एक दिन मैंने चौराहे पर खबर पढ़ी की रक्षा मंत्री ने देश से कहा कि कि देश पूरी तरह असुरक्षित है और विदेश से किसी प्रकार का ‘कोई खतराहैं। इस खबर के बाद मैंने दूसरी खबर पढ़ी कि प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि हम पड़ोसी देशों से अपनी सभी समस्याओं को लड़ाई-झगड़े द्वारा हल करना चाहते हैं। तीसरी खबर थी कि देश की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है। निर्यात घट रहा है, आयात बढ़ रहा है।

रोज की खबरें सुनाकर मैं अपने क्वार्टर में चादर ताने बेफिक्री की नींद सो रहा था कि अचानक किसी ने दरवाजे पर ठोकरें मारी। मैं उठ गया। दरवाजा खोला दो बाहर तो सफारी सूटधारी खड़े थे। उनमें से एक मुझे देखकर बोला-तुम देश के सबसे बड़े दुश्मन हो।

मैंने पढ़ा-तुम देश के सबसे बड़े मित्र हो।

वे बोले-तुम किस देश के एजेंट हो

मैंने पढ़ा-तुम किस देश के एजेंट नहीं हो

मैंने कहा-आप लोगों का अभारी हूं कि आप मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं।

-क्या मतलब उनमें से एक काफी चिढ़ गया।

- मैं आप लोगों का एहसानमंद हूं। मैंने भाषा का दूसरा रूप पेश किया। टीचर जो ठहरा।

-अबे होश में है कि नहीं वह बोला।

मैंने पढ़ा-जनाब आप पूरी तरह होश में है।

मैं क्या बोलता। सोचा बोलना खतरनाक है। गर्दन ‘हां’ में हिला दी। इस पर वह और गुस्से में गया।

-साले तू रात दिन-जनता को भड़काता रहता है।’’ वाह बोला।

मैंने पढ़ा-प्रिय भाई आप रात-दिन जनता को समझाते रहते हैं।

मैंने कहा-यह मेरा फर्ज है।’’

-क्या बोला’ वह दहाड़ा।

-भाई साहब, आप जो कह रहे हैं सच है। मैं बोला।

-तो तू मानता है,

-हां मानता हूं...आप मुझे बहुत सम्मान दे रहे हैं। मैंने कहा।

-तू तो जूते मारने लायक है।’’ वह बोला।

-आप मुझे क्यों सिर पर बैठकर इतना सम्मान दे रहे हैं। मेरे यह कहते ही वह मेरी तरफ झपटा और जोर का झापड़ मारा। मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि मैं अपने ढंग से इसका आलेख पढ़ चुका था।

-इसे ले चलो। वह बोला।

-इसके खिलाफ सुबूत दूसरे ने पूछा।

- यह अपने आप अपने खिलाफ सुबूत भी है और गवाह भी।

वे मुझे लेकर चल दिए। वे मुझे एक बड़े कमरे में ले गए, जहां तेज रौशनी थी। पर, मुझे लगा अंधेरा है। मैंने उनसे पूछा कि यहां अंधेरा क्यों कर रखा है वे बोले, अभी पता चल जाएगा कि यहा अंधेरा है या उजाला। उनमें से एक गया और कुछ अखबारों के बंडल ले आया और एक अखबार मुझे पकड़ाकर बोला-तुम अखबार उल्टा क्यों पढ़ते हो

-उल्टा तो आप लोग पढ़ते हैं। मैंने कहा।

-ये गलत है...तुम सीधे शब्द नहीं समझते क्या

-मैं सीधे ही शब्द समझता हूं। मैं बोला।

-पढ़ो, उन्होंने एक समाचार मेरे सामने कर दिया और पकड़कर सुनाया ‘राज्य विकास प्राधिकरण ने गरीबों के लिए ग्यारह हजार फ्लैट बनाए।’

-इस समाचार को पढ़ो’’ उनका सरदार, जो मुझे पीट चुका था, बोला।

-राज्य विनाश, प्राधिकरण को गरीबों ने ग्यारह हजार फ्लैट दिए। मैंने पढ़ा।

-देखा आपने उनमें से एक बोला।

-बस, अब सुबूत की जरूरत नहीं है...फिर भी तगड़ी दफा लगाने के लिए कुछ और प्रमाण जमा कर लो। वह बोला।

-चल पढ़ इसे-उनमें से एक ने अखबार सामने रख दिया। जिस पर हेडलाइन थी-माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।

दूसरा बोला-चल, इसे पढ़ दे।

-माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा...

-बस-बस...देख...संभलकर। उनमें से एक बोला।

-ओये...उल्लू के पठ्टे...उसे बोलने क्यों नहीं दिया उनके अधिकारी ने कहा और मुझसे बोला-‘कहो...जी...तुम कहो...’

-मुझे कोई टोक देता है, तो मैं कुछ नहीं बोलता।

- देखा...साला बच निकला...देशद्रोह में फंस जाता, तो मजा आता। उनका अधिकारी ने बोला।

चलो जी सीधे-सीधे सवाल पूछ लो और केस बन्द करो...वैसे भी इसका ‘एनकाउन्ट’ तो करना ही है। एक सफारी सूटधारी बोला।

-ठीक है...पूछो।

- कश्मीर...पर पूछ ले...नागालैंड पर सवाल कर...और नहीं तो...‘डेमोक्रेसिया’ पर पूछ ले। उनमें से एक बोला।

अभी ये बात हो ही रही थी कि एक और आदमी कमरे के अन्दर आया। उसे देखकर सब खड़े हो गए। वह आदमी मुस्कुरा रहा था। सब उसके सामने चूहा बने हुए थे। मैं समझ गया कि यह आदमी इन सबका अफसर ही है।

-सर, ये आदमी खतरनाक है। एक ने मेरी तरफ इशारा करके अफसस से कहा।

-देशद्रोही है। दूसरे ने कहा।

- माओवादी है। तीसरा बोला।

- आतंकवादी है। चौथा बोला।

साहब बोला-तुम सब बेवकूफ हो।

चारों ने कहा यस सर।

साहब बोला- तुम इसका ‘एनकान्टर’ करना चाहते हो

-नहीं सर...ट्रेन से कटकर मरेगा।

- पानी में डूबकर भी मर सकता है।

- तुम लोकतंत्र पर धब्बा हो। साहब बोला।

- क्यों सर वे बोले।

- अरें, अब भी इतने पिछड़े हो...जितना तुम्हारे पुरखे थे। साहब बोला।

-यस सर...वे बोले।

साहब ने मुझसे कहा-आप जा सकते हैं...आप धोखे से पकड़ लिए गए थे। आप आजाद हैं।

मैंने कहा-मैं कहां जाऊं

साहब बोला-आजाद हैं...ट्रेनें देश के कोने-कोने में जाती हैं। चाहें तो केरल के ‘बीच’ बहुत सुन्दर हैं...जहां आपको दिल चाहे...वहां जा सकते हैं। -मेरा दिल...मैं अपना दिल इधर-उधर तलाश करने लगा।

-क्या तलाश कर रहे हैं साहब बोला।

-अपना दिल। मैंने कहा।

-बहुत बड़ा देश है। कहीं न कहीं आपको मिल ही जाएगा।’’ साहब बोला।

-ठीक है...मैंने उठते हुए कहा-मैं खतरनाक तो नहीं हूं

साहब बोला-पहले दिल तलाश कर लीजिए। तब बताऊंगा।

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