रविवार, 13 अप्रैल 2014

राजीव आनंद की लघुकथाएँ

बदलते सोच

पति की एक दुर्घटना में मृत्‍यु के बाद विधवा हुई आशा के ससुरवालों का सोचने का नजरिया ही बदल गया․ वही सास जो नयी-नयी दुल्‍हन बनकर आयी आशा को सुशील और भाग्‍यशाली बहू कहती थी, वही ननद जो आशा को बड़ी बहन की तरह मानती थी, आज सास बेटे को खा जाने वाली और ननद भैया को निगल जाने वाली कहने लगी थी․

पिताजी जो बहू को बेटी कहा करते थे, बेटे की मृत्‍यु के बाद कहने लगे थे कि मैंने तो पहले ही कहा था कि देवगण के लड़के का राक्षसगण की कन्‍या के साथ विवाह विध्‍वंसकारी होता है पर मेरी किसी ने सूनी ही नही ंतो अब भूगतो․

साल भर पहले आशा का विवाह पायलट पति शशि से हुआ था․ विमान दुर्घटना में शशि की मौत हो गयी․ एक साल तक ससुरवालों के नजरों में भाग्‍यशाली बनी रही आशा अब शशि के माता-पिता, नाते-रिश्‍तेदारों एवं पड़ोसी के नजरों में शशि के वायुयान दुर्घटना में हुई मृत्‍यु की दोषी मानी जा रही थी․ मृत्‍यु पर मनुष्‍य का जोर नहीं इसे जानते हुए भी कोई समझने को तैयार नहीं था․

आशा के टूट कर बिखरते सपने, पति को खोने का गम किसी को भी दिखलाई नहीं पड़ रहा था․ आशा डबडबाई आंखों से ससुरवालों के बदलते सोच की मूक दर्शक बनी हुई थी․

श्रेय

निर्मला अपनी विधवा हुई सहेली सपना से सब्‍जी की दूकान पर पूछ रही थी, सपना तुम्‍हारे बेटे-बहू के कारनामों के तो चर्चे पूरे मोहल्‍ले में हैं, सूना है वे लोग तुम्‍हें बड़ी दुख देते हैं, कैसे बर्दाश्‍त करती हो सपना ?

सपना कुछ दार्शनिक अंदाज में निर्मला को जवाब दिया, अरी नहीं निर्मला, बेटे-बहू मेरे लिए रोज नयी-नयी मुसीबतें खड़ी करते रहते हैं, मैं मुसीबतों से इस बुढ़ापे में जुझती अपने पति के नहीं रहने का गम भूल जाती हॅूं․ अगर मेरे बेटे-बहू भी मुझसे प्‍यार करते, मेरा सम्‍मान करते, तो सच कहती हॅूं निर्मला मुझे हर वक्‍त अपने पति की याद आती रहती लेकिन बेटे-बहू के डांट-फटकार और नफरत के कारण मैं दुख के उस संमदर में डूब जाती हॅूं जहां पति के खो जाने का गम एक कतरा के समान लगता है और इसका श्रेय मेरे बेटे-बहू को ही जाता है․

निर्मला जवाब सुन कर निरूतर हो गयी थी․

बेरहम

शायद गाय बीमार थी इसलिए सड़क पार करते-करते बीच सड़क पर ही गिर गयी थी․ आने-जाने वालों की भीड़ सड़क के दोनों तरफ लग रही थी․

गाय को न उठते देख एक बेरहम कार चालक ने गाय के पांव पर चक्‍का चढ़ा दिया, गाय दर्द से कराहती किसी तरह लड़खड़ाती उठी और सड़क के किनारे धम्‍म से गिर पड़ी․

सड़क साफ हो चुका था, आने-जाने वाले फर्राटे से अपने-अपने गंतव्‍य की ओर बढ़ गए थे․ गाय सड़क के किनारे पड़ी अपनी डबडबाई आंखों से सबकुछ देख रही थी․

गाय शायद यह समझ नहीं सकी कि आज सड़क पर पड़े आदमी को उठाने की किसी को फुर्सत नहीं है वह तो फिर भी जानवर है․

राजीव आनंद

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  1. लेखक ने तीनो लघुकथा में समाप्त होती सवेदना के विषय में बताया है 'बदलते सोच 'में विधवा बहू को ताने देना ,दूसरी लघुकथा में विधवा महिला को उसके बेटे बहू के दवरा प्रताड़ित करना जिसे वह महज़ इसलिए अच्छा मानती है कि इससे वह अपने पति के जाने के गम को भुला पाती है' बेरहम 'लघुकथा में घायल गाय के माद्यम से बताया कि जब घायल इंसानो के लिए किसी को चिंता नहीं तो उसके लिए क्या होगी .

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव12:27 pm

    राजीवजी आपकी तीनो ही लग्जू कथाएँ हमें मानव मन
    की उथल पुथल और संघर्षों से साक्षात्कार कराती है
    जहाँ निर्दोष बहू अचानक हुयी पति की मौत और समाज
    में उसके प्रति बदलते व्यवहार की दोहरी पीड़ा झेल रही
    है वहीँ दूसरी कहानी में बूढी सास को बहू बेटा द्वारा तिरस्कार और अपमान को झेलने के लिये के सिवा कोई
    रास्ता नहीं था वो पड़ोसिन से क्या कहती तीसरी कहानी
    भी मार्मिक है बीमार गाय के प्रति हमारा व्योहार तमाम
    सवाल पैदा कार्य है क्या सचमुच हम सभ्य और मनुष्य
    कहलाने योग्य है
    आपकी तीनो ही कहानियाँ गागर में सागर है बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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