मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

कुबेर सिंह साहू का लघु व्यंग्य - स्वतंत्र हो गए हैं

स्वतंत्र हो गए हैं

उस दिन मंदिर चौक पर फिर वही घटना घटी। विपरीत दिशा से दो मोटरसायकिले तेज रफ्तार से दौड़ती, लहरातीं-बलखातीं और लोगों के मन में दहशत पैदा करती आईं और बीच चौराहे पर खड़ी हो गईं। दोनों पर दो-दो युवक सवार थे। चारों युवक गप्पबाजी करने लगे। उनके हावभाव से ऐसा तो बिलकुल नहीं लगता था कि चौराहे से जुड़ने वाली चारों सड़कों पर जाम ट्रैफिक उन्हें दिख रही होगी। परेशान लोगों की निगाहें ट्रैफिक पुलिस को ढूँढने लगी जो अभी तक बड़ी मुस्तैदी से अपना काम कर रही थी। पुलिस कहीं नजर नहीं आई।

जब रहा नहीं गया, भीड़ में से एक युवक बाहर आया। स्कूल के जमाने में गुरूजी की बताई बातें कि अन्याय सहना भी अन्याय करने के बराबर होती हैं, सत्यमेव जयते आदि शायद उसके मस्तिष्क से डिलीट नहीं हुई होगी; उसने उन युवकों के हरकतों का शालीनता पूर्वक विरोध किया। बदले में कई भद्दी-भद्दी गालियाँ और दो-चार घूँसे खाई। उसे उम्मीद रही होगी कि इतनी भीड़ में कोई तो होगा जो उसका पक्ष लेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उसी भीड़ में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की नन्दी नामक वाहन भी फँसी हुई थी। माता पार्वती से यह अन्याय देखी नहीं गई। उसने भोलेनाथ से कहा - ’’आश्चर्य है, भोलेनाथ! ऐसा अन्याय देखकर, आप भी मौन हैं?’’

भोलेनाथ ने कहा - ’’देवी! शांत हो जाओ। इन लड़कों के बारे में आप नहीं जानती हैं, इसीलिये ऐसा कह रही हैं। वो जो लाल कुरता वाला है न, मंत्री पुत्र है; काला वाला यंत्री पुत्र, खाकी वाला संत्री पुत्र और रंगबिरंगा वाला कंत्री पुत्र है। देखा नहीं, उस लड़के की क्या गत बनाई है इन लोगों ने। मुझे आत्महत्या करने के लिये उकसाओ मत देवी।’’

माता देवी ने कहा - ’’भगवन! अब तक तंबाकू-गुटखा खाकर पचासों लोग हमारे चेहरों पर थूँक चुके हैं, रांग साईड से आकर सैकड़ों लोग हमारी नंदी को ठोंक चुके हैं कहीं भी जाओ शोर-शराबे से कान फटा जाता है। आखिर हो क्या गया है यहाँ के लोगों को?’’

भोलेनाथ ने कहा - ’’कुछ नहीं हुआ है देवी! स्वतंत्र हो गए हैं।’’

000 कुबेर सिंह साहू

व्याख्याता,

शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला

वार्ड 28, कन्हारपुरी, राजनांदगाँव (छ.ग.)

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