मनोज 'आजिज़' की लघुकथा

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(लघुकथा)

जाति 

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         -- मनोज 'आजिज़'

स्कूल में जातिगत आरक्षण के तहत छात्रों के लिए मुफ्त किताबें देने की बात कही गई । कई अभिभावक आये, आवेदन दिए और जांचोपरांत सभी को किताबें दी गईं । अमन भी कोशिश करने लगा पर पिता की ड्यूटी और माँ की नासाज़ तबीयत के चलते काम बन नहीं रहा था । खुद कई बार जाकर अपने वर्ग-शिक्षक से कहा पर विशेष आग्रह और ध्यान बटोर नहीं पाया । 

तीन-चार दिन पर अमन की माँ स्कूल गई । शिक्षक से मिली और आवेदन दी । आवेदन देने के साथ ही अमन की माँ कह पड़ी-- मैडम, जाति से ऊँचे हैं तो क्या हुआ, कमाई से तो गरीब ही हैं । तीन साल में अमन को कितना कुछ दे पाये हैं, ये तो आप लोगों से छुपा नहीं है । हम लोगों को जो कहिए, अमन को किताब दिला दीजिए, मैडम । आप जो भी मानिये, हम लोग तो गरीबी को ही अपनी जाति मानते हैं ।

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3 टिप्पणियाँ "मनोज 'आजिज़' की लघुकथा"

  1. लघुकथा अच्छी है पर किसी जाति को आरक्षण इसलिए दिया जाता है क्युकि उस जाति पर कई प्रकार के अत्याचार किये गए .

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  2. मनोज, आपने एक गंभीर विषय उठाया है और इस लघुकथा के माध्यम से मानवता को विशेष जगह दी है । जाति-धर्म-प्रान्त-भाषा आदि की संकीर्णता मानवतावादी होकर ही ख़त्म होगी । आपको बधाई !

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  3. मनोज, आपने एक गंभीर विषय उठाया है और इस लघुकथा के माध्यम से मानवता को विशेष जगह दी है । जाति-धर्म-प्रान्त-भाषा आदि की संकीर्णता मानवतावादी होकर ही ख़त्म होगी । आपको बधाई !

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