बुधवार, 23 अप्रैल 2014

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथा - छोटा कबाड़ी

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बच्चा कबाड़ खरीदने की आस में हर इतवार मेरे घर के दरवाजे पर दस्तक देता . इस इतवार भी दी .

" आज फुर्सत नहीं है , अगले इतवार आना ." मैंने कहा .

अगले इतवार सुबह - सुबह ही उसने फिर अपनी ड्यूटी बजाई. मैं चाय की चुस्कियों के बीच अखबार की सुर्ख़ियों में खोया हुआ था . उसमें आया खलल मुझे अच्छा नहीं लगा . मैंने झिड़कते हुए अगले इतवार के लिए टरका दिया .

उसने ललचाई मुद्रा के साथ मुझ पर अपनी मजबूर दृष्टि दौड़ाई और चला गया . मुझे उस पर तरस तो आया पर अखबारी सुर्ख़ियों के बीच मैं उसे शीघ्र ही भूल गया .

व्यस्तताओं की सर्पटी दौड़ में तीसरा इतवार आते भी देर नहीं लगी ..

मैंने अखबार सामने रखकर अपनी आँखों पर चश्मा चढ़ाया ही था कि उस छोटे कबाड़ी की महीन पर ऊचीं आवाज ने मेरा चश्मा उतरवा दिया . वह छोटा कबाड़ी मेरे सामने खड़ा था .," बाबू जी , दीजिये न अखबार की रद्दी , अब्बू ने कहा है औरों से पचास पैसे फालतू रेट लगा लेना ."

" कौन अब्बू ...?"

" जी शफीक कबाड़ी . वही तो मेरे अब्बु हैं . आप अपने अखबार की रद्दी उनको ही तो देते हैं ."

" अच्छा तो तू शफीक का साहबजादा है , ....?"

".........................................................!"

उसे लगा कि उसका मजाक बनाया जा रहा है .

" अरे ऐसे क्या टुकुर - टुकुर देख रहा है , पूँछ ही तो रहा हूँ ? " मैंने सोचा कि तैश में कहीं कुछ उल्टा - सीधा बोल गया तो मेरी बेइज्जती हो जाएगी और इसका कुछ नहीं बिगड़ेगा .

" बाबू जी ! साहबजादा कहकर मेरा मजाक काहे को बना रहे हैं , अब्बू की नजर में ,मैं सिर्फ कमाई का एक जरिया हुँ , आपके घर की रद्दी जैसा ."

मैंने उसे हैरत से देखा तो उसने सोचा कि मैं उससे कुछ और सुनना हुँ.

" हाँ , बाबू जी ! रद्दी आप जैसों के घरों से मिलती है और मुझे मेरे अब्बू को मेरी अम्मी ने दिया है , वो न होतीं तो मैं भी न होता . "

" मैं तुझे निरा गंवार समझ रहा था , तू तो बड़ा अव्वल निकला भाई ."

" बाबू जी ! अब कुछ काम की बात भी कर लीजिए न .मेरे पीछे मेरे जैसे पाँच और भी हैं जो पुश्ते वाली झुग्गी में हंगामा कर रहे होंगे क्योंकि छठवें के लिए अब्बू के साथ मेरी अम्मी तीन दिन से सरकारी अस्पताल में बैठी है ."

मैं अखबारी खबरों के बासीपन को भूल गया . मेरी सारी तन्द्रा इस जीवित खुलासे पर केंद्रित हो गयी .

" बाबू जी , आज तो अखबार दे ही दो . दो पैसे कमाऊँगा , तभी उन पांचो के लिए रेहड़ी वाले से रात की बची ब्रियानी को सस्ते में खरीदूंगा और तब उनके पेट का हंगामा शांत होगा ."

अब मैं उसे टरका नहीं सकता था .

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

 

, साहिबाबाद ( गाजिआबाद ) ऊ .प्र .Pin 201005,


. E.Mail arorask1951@yahoo.com

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