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May 2014
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विद्यासागर नौटियाल के उपन्यासों में पहाड़ी परिवेश

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(विद्यासागर नौटियाल)

उपन्यास आधुनिक जीवन की जटिलताओं को समग्रता से प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। साहित्यकार समाज में रहते हुए अपनी आँखें बन्द नहीं करता। समाज की विसंगतियाँ उसके कोमल हृदय को प्रभावित करती हैं और उसकी अभिव्यक्ति भी अनिवार्य रूप से वह करता है। उपन्यास का फलक विस्तृत होने के कारण इन विसंगतियों का सम्पूर्ण चित्र उतारने का अवसर उपन्यासकार को मिलता है। यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास में समाज को उसके यथार्थ रूप में देखा जा सकता है।

नौटियाल जी ने अपने सभी उपन्यासों में टिहरी गढ़वाल को केन्द्र में रखकर कथा वस्तु का निर्माण किया है। वे नई कहानी दौर के साहित्यकार थे, उन्होने गढ़वाल के विषय में लिखकर साहित्य में अपनी पहचान को सुरक्षित रखा है। गढ़वाल की यथार्थ तस्वीर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर इन्होंने गढ़वाल की सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं से पाठकों को परिचित कराया है। पहाड़ को आम-जन के बीच में उपस्थित कर पहाड़ के अनेक आदर्शों को साहित्य में कलमबद्ध कर नौटियाल ने सराहनीय कार्य किया है। पहाड़ों पर बसने वाले आम-जन की पीड़ा, टोने-टोटके, अंधविश्वास तथा पूंजीपति वर्ग द्वारा आम-आदमी का शोषण, अत्याचार आदि का नौटियाल ने यथार्थ वर्णन अपने सभी उपन्यासों में किया है।

नौटियाल जी ऐसे प्रतिभाशाली उपन्यासकार थे, जिन्होंने गढ़वाल का, उसके परिवेश का, लोगों के आपसी संबंधो का, उनके खान-पान का गहन अध्ययन किया था। नौटियाल जी गढ़वाल के दुखों से घबराए नहीं उन्होंने उन सभी दुखों का डटकर विरोध किया। राजनैतिक जीवन हो या सामाजिक या साहित्य जीवन हो। वे कभी किसी बात से विचलित नहीं हुए और एक सच्चे कलम के योद्धा बन विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेते रहें। उन्होने गढ़वाल का कोना-कोना घूम रखा था। वहाँ पर बसने वाले लोगों की पीड़ा को भली-प्रकार समझा था। वे जीवन भर उन्हीं की पीड़ाओं को दूर करने में कटिबद्ध रहे। चाहे राजनैतिक क्षेत्र हो या साहित्यिक क्षेत्र हो, वे गढ़वाल के भोले-भाले, असहाय और निरीह प्राणियों पर किए गए शोषण का मुखर विरोध करते रहे।

नौटियाल जी अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में भी अपनी लेखनी द्वारा तत्कालीन सरकार का ध्यान गढ़वाल तथा वहाँ पर बसे आम-जनों की समस्याओं की ओर आकर्षित करते रहे। वे गरीब, मजदूर, भूमिहर किसानों तथा अधिकारों से वंचित आम-नागरिकों को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्नशील थे। सामंती सरकार के विरोध के कारण इनके परिवार को भी तत्कालीन सामंती सरकार ने अनेक कष्टों को झेलने के लिए मजबूर किया, परन्तु नौटियाल जी सभी आघातों को हृदय पर झेलते हुए अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर रहें। तत्कालीन सामंती सरकार द्वारा किए गए अत्याचारों ने इन्हें कभी दुर्बल नहीं बनने दिया और न ही दुखों को अपने जीवन का अभिशाप बनने दिया, बल्कि इन्हीं दुखों से प्रेरणा लेकर नौटियाल जी किसी लौह पुरुष की भाँति-सबलतापूर्वक दुखों का बोझ झेलते रहे और उससे शक्ति प्राप्त करते रहे। इनका साहित्य एक साथ पहाड़ी जीवन और मनुष्य की खोखली प्रवृत्तियों का यथार्थ चित्रण करता है, जिसमें कथा तत्व में अत्यंत सूक्ष्म और कुशाग्र बुद्धि की पकड़ है, जो वास्तविकता की प्रतिछाया है। नौटियाल ने हमेशा पहाड़ को आदमी से जोड़कर देखा है। उनके जीवन में पहाड़ और आदमी का घनिष्ठ संबंध रहा है। वे पहाड़ के बिना आदमी को और आदमी के बिना पहाड़ को अस्तित्वहीन मानते थे। वह स्वयं भी स्वीकार करते हैं कि- "जिस रचना में आदमी मौजूद नहीं उस पहाड़ से मेरा कोई संबंध नहीं"

पहाड़ पर जीने की कोशिश में घोर संघर्षों से जुटे लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। ये लोग खेत-खलिहानों में गाँव में तथा सरकारी दफ्तरों में हर जगह शोषण और जुल्म के शिकार है। नौटियाल ने साँस लेने को तरसते इन्हीं लोगों की व्यथा को अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। जिन संघर्षों से पहाड़ का मनुष्य जूझ रहा है उन संघर्षों में सोच-विचारकर या योजनाबद्ध तरीके से शामिल होने की किसी को फुर्सत नहीं है। राजनेता या उच्च अधिकारी दिन-रात लूट-खसोट और भ्रष्टाचार में लिप्त है। वे योजना बनाकर पत्रकारों के सामने दिखावटी वृक्षारोपण करने के लिए पहले से खोदे गए गड्ढों के अंदर अपने कर-कमलों को ले जाने का ढोंग करते फिरते हैं। नौटियाल जी के उपन्यासों में ऐसी अनेक समस्याओं की भरमार है, जिसमें केवल आम-आदमी ही पिसता नजर आता है। यह आम-आदमी इनके उपन्यासों में तो पहाड़ का है। परन्तु उसके जन-जीवन, उसके दुःख-दर्द, और उस पर हुए शोषण एवं अत्याचार की गूंज समस्त भारत देश में सुनाई देती है। यह उत्पीड़न किसी एक राज्य विशेष के पूंजीपतियों द्वारा नहीं बल्कि समस्त देश में यह उत्पीड़न की लहर आज भी चल रही है। स्वरूप भले ही बदल गया हो परन्तु उत्पीड़न आज भी भारतीय समाज में चरम पर देखा जा सकता है।

नौटियाल जी के उपन्यासों में कथा वस्तु हो या चरित्र सृष्टि। संवाद प्रस्तुति हो या वातावरण निर्मित। भाषा शिल्प हो या जीवन आदर्श सभी औपान्यासिक तत्वों में गढ़वाल का जीता-जागता संसार बसता है। सामंती व्यवस्था हो या सूदखोरी, पूँजीपति हो या निर्धन किसान, शोषक हो या शोषित, सम्पन्न वर्ग हो या विपन्न वर्ग, सवर्ण हो या अवर्ण, पुरुष हो या स्त्री आदि सभी को केन्द्र में रखकर लेखक ने गढ़वाल की सुन्दर, सजीव एवं यथार्थ झाँकी प्रस्तुत की है।

नौटियाल जी का प्रथम उपन्यास सन् 1959 ई. में ‘उलझे रिश्ते’ नाम से प्रकाशित हुआ। लगभग (35) पैंतीस वर्षों के अन्तराल में उनके दो उपन्यास ‘भीम अकेला’ (1944) एवं ‘सूरज सबका’ है (1997) में प्रकाशित हुआ। इन उपन्यासों में पहाड़ी जीवन के कटु यथार्थ के साथ-साथ उत्तराखण्ड के इतिहास और संस्कृति का भी अंकन हुआ है। उनका चौथा उपन्यास ‘उत्तर बायां है’ है। पाँचवा उपन्यास झुण्ड से बिछुड़ा छठा उपन्यास ‘यमुना के बागी बेटे’ है। इस उपन्यास की कथा भी टिहरी गढ़वाल में जन-विद्रोह की घटी सत्य घटनाओं पर आधारित है। इनका सातवाँ और अन्तिम उपन्यास ‘स्वर्ग दद्दा! पाणि-पाणि’ है।

सामंती व्यवस्था का ऐसा ज्वलन्त प्रश्न नौटियाल ने उपरोक्त उपन्यासों में किया है, जो प्राचीन होकर भी प्राचीन नहीं है अपितु आधुनिक युग में भी नवीन बना हुआ है। लेखक ने सामंती व्यवस्था के कुचक्र को स्वयं अपने समय में देखा है, भोगा है, उसकी पीड़ा को अनुभव किया है तथा आम लोगों को सामंती व्यवस्था की पीड़ा को सहते देखा है, उस पीड़ा से छटपटाते देखा है और उनकी छटपटाहट को महसूस किया है। इसी कारण लेखक की रूचि अपने कथा लेखन में गढ़वाल तथा गढ़वाल की तत्कालीन सामंती व्यवस्था को उजागर करने में रही है। वे एक सच्चे यथार्थवादी उपन्यासकार है, उन्होंने अपने उपन्यासों का आज के युग से बोध कराया है।

उपन्यास के तत्वों में कथावस्तु का विशेष योगदान होता है। उपन्यास की सफलता बहुत कुछ कथावस्तु पर ही निर्भर होती है। कथावस्तु में उपन्यासकार द्वारा जो वस्तु दी हुई होती है, वह इस तरह से विन्यस्त होती है कि उसमें कार्य-कारणशृंखला हो तथा वे एक-दूसरे से असंबद्ध प्रतीत न हो। कथावस्तु की गतिशीलता के लिए उपन्यासकार अनेक शैलियों का उपयोग करता है। वर्णनात्मक शैली के माध्यम से वह तटस्थ रहकर कथा कहता है तो संवाद शैली में पात्रों के पारस्परिक कथन से कथा को आगे बढ़ाता है। कहीं-कहीं पर वह पात्रों के मनोविश्लेषण के लिए पत्र शैली, डायरी शैली आदि का प्रयोग भी करता है। कथावस्तु में रोचकता, मौलिकता, गतिशीलता और कौतूहल का रहस्य भी आवश्यक माना गया है। नौटियाल के उपन्यासों की कथावस्तु में उपरोक्त विशेषताएँ परिलक्षित होती है।

नौटियाल के प्रथम उपन्यास ‘उलझे रिश्ते’ की कथावस्तु में भी अन्य उपन्यासों की तरह मौलिकता, रोचकता, गतिशीलता और कौतूहल का पुट है, परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि काफी प्रयत्न के बाद भी लेखक का यह उपन्यास उपलब्ध नहीं हो पाया है। लेखक ने इस विषय में स्वयं मुझे बताया था कि- वह उपन्यास रूपसी प्रकाशन से छपा था। उसकी कोई प्रति अब उपलब्ध नही है। टिहरी स्थित लेखक के घर से किसी जासूस ने जानबूझकर उसे गायब किया था। ऐसा लेखक को सदैव सन्देह रहा है। उपन्यास की कथा ऐसी थी कि अपनी पढ़ाई समाप्त कर, विश्वविद्यालय छोड़ने के दस साल बाद एक नौजवान के मन में छात्र जीवन के अपने मित्रों के हालात को जानने की जिज्ञासा होती है। प्रत्येक मित्र से उसके संबंध अलग-अलग किस्म के थे। उनमें से कुछ को वह उनके असली नाम से पुकारने के बजाए, अपने द्वारा या मित्र मंडली के द्वारा दिए गए नामों से संबोधित करता था। कोई रूदिन था, कोई बजारोव। उन्हीं सभी घटनाओं का उपयोग करते हुए वह उन सभी को पत्र भेजता था। अधिकांश पत्र वापिस लौट आते थे। डेड लैटर की इस टिप्पणी के साथ कि पाने वाले का पता नहीं लग रहा है। असली बात जो लेखक दर्शाना चाहता है, वह यह थी कि वे समाज में खो गए हैं। वापिस लौट आए वे पत्र मूल रूप में उपन्यास में दिए गए हैं। कुछ पत्रों के उत्तर प्राप्त होते हैं। वे उत्तर भी शामिल कर दिए गए हैं। वे उत्तर कुछ-कुछ खुलासा करते हैं कि मूल पत्र, जिसका जवाब लिखा जा रहा है, में क्या कुछ लिखा गया होगा। विश्वविद्यालय के छात्र जीवन पर आधारित यह अनुपलब्ध उपन्यास है।

‘भीम अकेला’ उपन्यास में लेखक ने गढ़वाल के ग्रामीण यथार्थ का चित्र प्रस्तुत किया है। चार दिन में हम यदि अवध अंचल से परिचय पाते हैं तो ‘भीम अकेला’ में दो दिन की यात्रा से। विद्यासागर नौटियाल तब उत्तर प्रदेश विधान सभा के विधायक थे, उन्हें पता चला कि अमर शहीद ‘मौलाराम’ की पत्नी ‘सूरमा देवी’ जिसने अपने अंधेपन के बावजूद अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है, उनकी पेंशन किसी गलत प्रवादों के कारण रोक ली गई हैं। इस घटना से नौटियाल उद्धेलित हो उठे- "इस संस्मरण के लिखे जाने के बाद शहीद मौलाराम की विधवा के साथ प्रदेश के शासन द्वारा किया गया हृदयहीन घर्णित व्यवहार लगातार मेरे मन में चोटे मारता रहा। मैं ‘सूरमा देवी’ को एक जीवित शहीद मानता आया हूँ। शासन के नाम लिखी उसकी चिट्ठी एक दस्तावेज है। यह अंधी वीरांगना समाज के कुल जहर को घोल-घोल कर पी गई है। महाशिव रात्रि के दिन मैं उसकी गाथा लिखने बैठा हूँ। गरल पीकर शिव नीलकण्ठ हो गए, ‘सतुरी’ (सूरमा देवी) अंधी। सतुरी की यह कथा ‘भीम अकेला’ का उपसंहार है।"

विद्यासागर नौटियाल इसी पूरे तथ्य को जानने के लिए ‘भरदार’ भ्रमण की योजना बनाते हैं। लेकिन इस यात्रा में एक-एक कर अनेक अनुभव लेखक को प्राप्त हुए हैं। कैसे बोलता हुआ पहाड़ अपनी पूरी अंर्तज्वाला के साथ हमारे सामने आ जाता है। रास्ते में तमाम लोग मिलते हैं और उनके सुख-दुःख और विवशताओं की एक लड़ी सी बनती जाती है। किसी से जरा भी हालचाल लेखक ने पूछा तो उसकी बातों में पहाड़ का दर्द बोलने लगता है। पहाड़ की गरीबी, नौजवानों की बेरोजगारी, बस और यातायात की समस्याएं और पीने के पानी की समस्या। समस्याओं का कोई अंत ही नहीं है और ऐसे में कोई आलू छील-कर उसे कच्चा ही सेब की तरह खाता दिखाई देता है तो हैरानी नहीं होती। भूख क्या नहीं कराती है। इसी के बीच पहाड़ के उस शिक्षक की भी व्यथा-कथा है, जो पत्थर पर पत्थर जोड़कर हनुमान की पूँछ की तरह आसन बनाए बैठा अपने बच्चों को पढ़ा रहा है और बच्चे जिस टाट पर बैठै हैं और पढ़ रहे हैं, उसे वे अपने-अपने घरों से लाए हैं।

‘तेजसिंह’ जैसा जीवित शहीद अपनी पेंशन के लिए जगह-जगह ठोकर खा रहा हो, या किसी स्वतन्त्रता प्रेमी की विधवा की पेंशन सिर्फ इसलिए रोक ली जाए कि उसने देवर से विवाह कर बच्चे पैदा कर लिए हैं और अपना तिल-तिल जलाने वाले इन जीवित शहीदों के दर्द को लोग महसूस करना ही बन्द कर दे तो यह पूरे देश के लिए कलंक है। तकनीकी खाना पूर्ति में उलझा प्रशासन यह बात नहीं समझ पाता। विद्यासागर नौटियाल ‘भीम अकेला’ के दो दिन की पहाड़ की यात्रा के ब्याज से हमारी इसी सोई हुई आत्मा को झिंझोड़ते है। कथावस्तु में बड़े अर्थपूर्ण ढंग से भीम की कहानी पिरोई गई है, जिसे पांडव राक्षस को सोंपकर आगे बढ़ जाते है। भीम राक्षस को मारकर बच निकलता है, लेकिन भीतर ही भीतर दहल भी जाता है। अकेले में अपने आप से कुछ बड़बड़ाता रहता है। यह दैन्य अवस्था में अकेला मशहूर भीम हमारे आज के शहीदों की दैन्य अवस्था का सही प्रतीक है। ‘सूरज सबका है’ लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है। इसका मूल कथ्य गढ़वाल के बनने से मिटने तक की घटना है। उपन्यास का शरीर ऐतिहासिक है, यथार्थ की रक्षा करते हुए उपन्यास को मोहकता प्रदान की गई है। लेखक ने इतिहास को आधुनिक दृष्टि से देखा है और उसका विवरण लोक जीवन में व्याप्त लोक कथाओं, वार्ताओं और गानों की शैली में प्रस्तुत किया है।

कथा की शुरूआत सन् 1804-15 में गढ़वाल पर गोरखों के आक्रमण से होती है, जो बीच-बीच में ‘क्लेश’ की तरह आती है। सोनी गाँव की दादी की जीवेष्णा, गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में रानी कर्णावती के साहस, बुद्धिचातुर्य, दिल्ली की मुगल सल्तनत के मनसबदार नवाजत खाँ की मूर्खतापूर्ण लोलुपता, ईस्ट इंडिया कम्पनी की धूर्तता से गुजरते हुए, आजाद भारत के शुरुआती दिनों में परगनाधिकारी देवीदत्त की सहृदयता को लक्षित करते हुए सोनी गाँव पर ही समाप्त हो जाती है।

140 पृष्ठों का यह उपन्यास 31 खण्डों में विभक्त है। यह उपन्यास दो सौ वर्षों के गढ़वाल के इतिहास की कथा कहता है। इस उपन्यास में वीर पराक्रमी भड़ है। साहसी और पराक्रमी गढ़वाल के सपूत है। रानी कर्णावती और अनेकानेक जुआरू लोग है। उपन्यास में एक नन्हीं बालिका ‘छुन्ना’ भी है जो दादी के घर घुसना चाहती है। दादी का घर सोनी गाँव में है जो गढ़वाल इलाके में आता है, जिसकी राजधानी श्रीनगर है। इस नगर में ‘रानी कर्णावती’ अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए शासन कर रही है। अपनी कुटिल चाल से शाही मुगल सेना को धूल चटा देती है। इस प्रकार यह उपन्यास रेल की पटरी सा, या तानेपुर के दो तारों सा समानान्तर कथानक सृजन का सोपन बनाए हुए हैं। एक में अंगुली रखे तो दूसरा तार तरंगित हो जाता है घटनाओं का मर्म खुल जाता है। कर्णावती और शाही मुगल सेना का द्वंद एवं गढ़वाली परिवेश इसका जीवंत आख्यान यह उपन्यास उपस्थित करता है। यह उपन्यास अपने अद्वितीय कथानक में निहित प्रतीकों के माध्यम से जीवन जगत की संघर्षमय पड़ताल कराता हुआ, उस सत्य की और इशारा करता है, जिससे हम विमुख होते जा रहे हैं। वह सत्य अपने देव समाज के प्रति प्रतिबद्धता है।

‘उत्तर बायां है’ लेखक का चौथा और महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह हिमाच्छदित पर्वतशृंगों पर बेहद कठिन और दुर्दांत परिस्थितियों में जीवन यापन करने वाले निरीह पालसियों और भेड़पालकों तथा घुमन्तु गूजरों की कहानी है जो भारत की आजादी की आधी सदी बाद भी आज तक उपेक्षित है। गरीबी, अशिक्षा, बेबसी और कदम-कदम पर ठगे जाना ही उनके जीवन का प्रयाय बन चुका है। समुंद्र से हजारों फुट ऊपर बीहड़ बुग्यालों (चरागाहों) में रहने वाले, प्राकृतिक आपदाओं से पस्त गरीब सैलानी गूजर, गडरिये और किसानों की अतरंग कथा, जो एक और निरन्तर प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों से जूझते रहते हैं तथा हिंसक पशुओं की दाढ में दबे और दूसरी और इन पशुओं से भी खूंखार, नरभक्षी सरकारी मुलाजिमों, हाकिम-हुक्कामों और कोर्ट-कचहरी के दरिंदों के कठिन पाटों में पिसते हुए जी रहे हैं।

उपन्यास की कथावस्तु को लेखक ने इस तरह पिरोया है कि उपन्यास में आने वाले ज्वलनशील विस्फोटक यह बताते हैं कि शायद कोई फर्क नहीं आया है, पराधीन भारत के ‘होरी’, धनिया, गोबर, सिलिया, भोला (गोदान) और आज के रिखू, सदरू, करणू (उत्तर बायां है) की जिन्दगी में। शायद यह और बदतर हुई है। जहाँ करणू को ग्राम प्रधान का आलू भरा बोरा ढोने से इन्कार कर देने पर ‘मिलावटी दूध’ बेचने के फर्जी अपराध में जेल की सजा हो जाती है।

उपन्यास की कथावस्तु किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित न होकर टिहरी गढ़वाल के पूरे पहाड़ी जन-जीवन की कथा बन गई है। पर्वत शिखरों के पास बसा भेड़पालकों के सैंतीस घरों का गाँव ‘चाँदी’ है। जहाँ से ये ऊँचे, दुर्गम बुग्यालों (चरागाहों) पर अपनी भेड़ बकरियों को चराने ले जाते हैं। तेज हवाओं बर्फबारी और बारिश के बीच तंबू लगाकर कई-कई दिन वहीं टिकते हैं। भैंस पालक घुमन्तू गूजर भी अपनी भैंसों को चराने यहीं लाते हैं और विषम मौसम का सामना करते हुए अपने अस्थाई डेरे डोलते हैं। इनकी तुलना में घाटी के गाँव ‘रेमासी’ के लोग है जो सिर्फ खेती करते हैं और अपेक्षाकृत सुविधाओं का जीवन जीते हैं। गाय भैंसें तो उन्होंने पालना छोड़ ही दिया है। भेड़ों को लेकर, जंगलों के रास्ते चरागाहों में जाते सदरू, करणू या हुकम अथवा घास काटने जाती या लकड़ी बीनती उनकी बहुओं छछरी या भांभरी को बाघों, जंगली रीछों और सूअरों से उतना खतरा नहीं है जितना मैदानों में कार्यरत प्रशासनिक मशीनरी से है।

‘झुण्ड से बिछुड़ा’ उपन्यास पर्वतीय जनजीवन की त्रासदी को बड़े ही विश्वसनीय ढंग से उजागर करता है। विशेषकर गढ़वाली ग्रामीणों के संघर्ष और उनकी जिजीविषा को लेखक ने तमाम प्रचलित मिथकों, किंवदन्तियों, रूढियों और अंधविश्वासों को सामने रखते हुए एक नई कथाशैली और प्रविधि के साथ उपन्यास में प्रस्तुत किया है यह उपन्यास अपने आप में नये जीवन के द्वार खोलने जैसा है। 104 पृष्ठों का यह उपन्यास एक लघु उपन्यास है, लेकिन इसमें अनेक प्रसंग ऐसे आए हैं, जिससे यह उपन्यास अपना विस्तृत आकार ग्रहण कर लेता है। कथा के केन्द्र में जहाँ ‘शान्ति’ नामक निरूपाय और निस्सहाय एक पहाड़ी महिला है, जिसे अपनी भोली गाय के प्रति अथाह प्यार है, तो दूसरी ओर एक भयानक बाघ है, जिसके रूप में मानों काल ही जंगल में घूमता रहता है। लेखक को जंगल के स्वभाव और बाघ के स्वभाव की ऐसी सूक्ष्म जानकारी है कि आश्चर्य होता है। पूरे उपन्यास में एक रूपक भी कथा के समानान्तर चलता रहता है। उस जंगल राज में बाघ के हमले किस-किस रूप में होते है, इसको लेखक भली-भाँति जानता है। श्रीधर जैसे पात्र ही मानों बाघ बनकर घूम रहे हों जो भोले-भाले प्राणियों को हर तरह से अपना शिकार बनाने के लिए सदा सचेत रहते हैं।

उपन्यास की मुख्य कहानी के आस-पास फैला पहाड़ी जीवन तो उपन्यास में आता ही है, बाघ के आतंक से लोगों को सुरक्षा देते पात्रों का दुर्दम्य साहस भी लेखक ने चित्रित किया है। वहाँ के आम जन के जीवन में बाघ एक पहाड़ी मिथक भी है और हकीकत भी। लेखक ने प्रस्तुत उपन्यास की कथा को प्रतीकात्मक शैली मे चित्रित किया है। सत्ता और नौकरशाही के आतंक को जिस तरह उपन्यास की विषय वस्तु के साथ लेखक ने पिरोया है, उससे यह कृति इन सभी गुंथित जीवन प्रसंगों का जीवंत पाठ बन जाती है। लेखक ने वर्तमान सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की सच्चाई को उजागर किया है, तो जनमानस में व्याप्त गाय के प्रति धार्मिक विश्वास का अंकन भी सहज रूप में हुआ है।

‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास का मूल स्रोत सन् 1930 के आस-पास टिहरी गढ़वाल रियासत में जन विद्रोह की आग से उत्पन्न सामंत की छोटी-बड़ी क्रूरता, यातना और यंत्रण की घटनाएँ हैं। नौटियाल जी अधिकांशतः उन एतिहासिक घटनाओं में कथा-सूत्र खोजते थे, जो इतिहास की पुस्तकों के बाहर समाज की वाचिक परंपरा में प्रवाहमान है। संघर्ष की चिंगारी इनमें भरपूर होती है। इन्हीं चिंगारियों में भविष्य की रोशनी के विधुत चिन्ह निहित होते है, जो किरणों की तरह खिलकर बाहर आ पड़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा में है। प्रस्तुत उपन्यास की कथा जन-विद्रोह की घटी सच्ची घटनाओं पर आधारित है।

सन् 1930 ई. में घटित तिलाड़ी कांड की चिंगारी के विधुत कणों को ‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास में संगठित किया गया है। तिलाड़ी कांड तत्कालीन सामंती व्यवस्था की सबसे क्रूर घटना है। अंग्रेजी राज के चापलूस राजा के चापलूस दीवान ने हक की लड़ाई लड़ने वालों को यमुना नदी और पहड़ियों के बीच घेरकर मौत के घाट उतार दिया था। राजा और दरबारियों के शोषण से संघर्ष करते कर्मठ आदिवासियों की लड़ाई की जड़ें एक और पौराणिक काल की शांतनु कथा और ऋषि पत्नी ‘रेणुका’ के मानसिक द्वंद तक जाती है तो दूसरी ओर समूचे आज को अपनी जद में लेती जान पड़ती है। टिहरी रियासत के राजा नरेन्द्र शाह को अचानक नई राजधानी बनाने की जिद सवाद हुई। उनके मस्तिष्क में एक ऐसी राजधानी की कल्पना थी, जो पूरी तरह चाँक-चौबंध हो, जहाँ गरीब की आह सुनाई न पड़े। उन्होंने प्राकृतिक सुषमा से भरपूर ‘ओड़ाथली’ को उसके लिए चुना। वे चाहते थे कि राजधानी में अंग्रेज बहादुर के अलावा कोई न पधार सके। उसी तरह जैसे आज चमचमाते नगरों की शोभा झुग्गी-झोपड़ी और ठेले वालों से खराब होती है। इसी घटना ने जन संघर्ष का बीज जनता में रोप दिया था। यह उपन्यास विस्मृत क्रान्ति कथा की आवृति भर नहीं है यह एक दस्तावेज है, जो राजशाही में फँसी जनता की दुःख भरी दास्ताँ को व्यक्त करता है। विद्यासागर नौटियाल का यह उपन्यास 128 पृष्ठों का एक लघु उपन्यास है। आकार में छोटा होते हुए भी इस उपन्यास का फलक विस्तृत है।

‘स्वर्ग दद्दा! पाणि, पाणि’ नौटियाल का अन्तिम उपन्यास है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखक जल, जंगल और जमीन से जुड़ी चिंताओं को वृहत आयाम देते हैं। यह जन आंदोलनों की जरूरतों को रंखांकित करने वाला उपन्यास है। यह उपन्यास उस समय का एक ऐसा प्रतिरोध है जहाँ आज मेहनतकश, श्रमशील वर्ग से उसका हक ही नहीं छीना जा रहा है बल्कि उसके इतिहास को विस्मृत भी किया जा रहा है।

पहाड़, जंगल और जमीन से जुड़े लोग उसके कण-कण से जिस तरह प्रेम करते हैं, उसके ठीक विपरित सत्ता और शासन से सटे लोग बाजार की शक्ति से संचालित होकर उसके हर एक कण से अधिकाधिक लाभ खसोटना चाहते हैं। लोभ-लाभ के इस खेल में लिप्त सत्ता और बाजार के दलाल भूखे भेड़ियों से भी अधिक हिंसक और खतरनाक है। यह दलाल वर्ग सदाबहार देवदार और उसके छोटे-छोटे जलश्रोत ही नष्ट नहीं करता, अपितु सम्पूर्ण गंगा उद्गम पर ही पानी पीकर नदियों में सिर्फ जहर प्रवाहित करना चाहता है। प्रस्तुत उपन्यास की कथा जितनी रोचक और पठनीय है, उतनी ही बहस तलब भी। वरिष्ठ लेखक नौटियाल की अद्भूत लेखकीय क्षमता का परिणाम है कि पहाड़ की लोक कथा से शुरू हुआ ‘स्वर्ग दद्दा! पाणि-पाणि’ पर्यावरण की चिंताओं को लेकर भी आज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास बन गया है।

नौटियाल जी के सभी उपन्यासों की कथा वस्तु टिहरी गढ़वाल के आमजन की पीड़ा और छटपटाहट की यथार्थ कहानी हैं लेखक ने पहाड़ को ही केन्द्र में रखकर कथानक का समायोजन किया है। उनके उपन्यासों में वर्णित चरित्र टिहरी गढ़वाल के आसपास के ही जीवन्त चरित्र है। लेखक ने घटना और परिस्थिति के अनुरूप पात्रों का संजीव अंकन किया है। उनके उपन्यासों की मूल संवेदना करूणा है। वे अपने उपन्यासों द्वारा एक विशिष्ट दर्शन प्रतिफलित करना चाहते हैं। नौटियाल के उपन्यासों में संवाद कहीं भी बोझिल एवं नीरस नहीं हैं। यद्यपि उपन्यासों में कहीं-कहीं दीर्घ संवाद भी आ गए हैं, परन्तु वे घटना को स्पष्ट करने के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। अधिकतर लघु संवाद ही उनके उपन्यासों में दृष्टिगत होते हैं। वातावरण निर्माण में लेखक का कला-कौशल सराहनीय है। लेखक ने घटना को ध्यान में रखकर ही वातावरण को उपस्थित किया है। उन्होंने गम्भीर तथा भावात्मक सभी प्रकार का वातावरण चित्रित किया है। नौटियाल जी ने उपन्यासों को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए वस्तु, चरित्र चित्रण, संवाद, वातावरण भाषा एवं शिल्प सभी का सजीव एवं यथार्थ अंकन प्रस्तुत किया है।

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(डॉ. मुकेश कुमार - समीक्षक)

चुनी हुई कविताएँ

कवि द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताएँ
डॉ. नरेश अग्रवाल

  सर्वाधिकार सुरक्षित - डॉ. नरेश अग्रवाल
इस ‘ई-पुस्तक’ का प्रकाशन डॉ. नरेश अग्रवाल द्वारा स्वंय किया गया है तथा पुस्तक के रुप में प्रकाशन-राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, राजस्थान द्वारा किया गया है।
प्रकाशन वर्ष सन् 2014

राजस्थानी ग्रन्थागार
सोजती गेट,
जोधपुर, राजस्थान

डॉ. नरेश अग्रवाल-एक परिचय
‘‘नरेश का मिजाज एक चिन्तक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।’’ - इंडिया टुडे

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1 सितम्बर 1960 को जमशेदपुर में जन्म। 
अब तक स्तरीय साहित्यिक कविताओं की 6 पुस्तकों का प्रकाशन तथा शिक्षा सम्बन्धित 6 पुस्तकों का प्रकाशन। साहित्य जगत में रचित पुस्तकों को अच्छी ख्याति प्राप्त। ‘इंडिया टुडे’ एवं ‘आउटलुक’ जैसी पत्रिकाओं में भी इनकी समीक्षाएँ एवं कविताएँ छपी हैं। देश की सर्वोच्च साहित्यिक पत्रिका ‘आलोचना’ में भी इनकी कविताओं को स्थान मिला। लगभग सारी स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

‘मरुधर’ रंगीन द्विमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन पिछले चार वर्षों से लगातार कर रहे हैं, जो आर्ट पेपर पर छपती है।

सन् 2014 में सूक्तियों पर ‘सूक्ति-सागर’ नाम से एक पुस्तक लिखी, जो भारतवर्ष में संभवतः यह पहला प्रयास होगा जब किसी लेखक द्वारा स्तरीय 1000 सूक्तियाँ हिन्दी भाषा में लिखी गयी।

‘हिंदी सेवी सम्मान’, ‘समाज रत्न’ सम्मान, अक्षर-कुंभ सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित।

पौधों की बोनसाई विद्या में पूर्ण रुप से पारंगत तथा हजारों र्दुलभ पौधे इनके संग्रह में शामिल। बोनसाई में अनेक पुरस्कार मिले।

शतरंज, ज्योतिष, हस्त रेखा एवं होम्योपैथी में कई साल तक विस्तृत अध्ययन।
लगभग 5000 पुस्तकें इनके निजी पुस्तकालय में संग्रहीत हैं।

फोटोग्राफी विद्या में पूर्ण रुप से दक्ष तथा अपने भ्रमण के दौरान हजारों तस्वीर का संग्रह इनके बेवसाईट पर उपलब्ध हैं। यात्रा के बेहद शौकीन तथा अनगिनत जगहों की यात्रा की।
सम्पर्क -
रेखी मेन्शन, 8 डायगनल रोड, बिटुपुर, जमशेदपुर-831001
ई. मेल - smcjsr77@gmail.com
बेवसाईट : www.nareshagarwala.com


 

आत्मकथन


जब तक शब्द अक्षर थे वे चुपचाप थे, परन्तु जब वे चित्र बने, चलने लगे। एक सधी हुई कलम से सारा काव्य चित्रमय हो जाता है। घटनाएँ काल्पनिक न होकर एक जीती-जागती प्रस्तुति बन जाती हैं। वे सारे प्रतीक और उपमाएँ अपने पंख फड़फड़ाने लगती हैं, और जब समाप्त होता है कथन तो लगता है कुछ रहस्यमय उतर आया है हृदय में, वह भी बिना अनुमति के। इसी तरह के अनुभवों से सरोकार हो पाठक का, यही सोचकर इन कविताओं की रचना की गयी है।
अन्त में बस इतना कहना चाहूँगा-
लोग उलझे रहेंगे।
शताब्दी के नये-नये कारनामों में
हर दिन नयी चीजें उपलब्ध होंगी
उनके हाथों में
फिर भी मेरी कविताओं,
तुम्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ेगा,
रखा जाएगा हाथों में जब भी तुम्हें
अँगुलियाँ पन्ने पलटने लगेंगी।
-डॉ. नरेश अग्रवाल

पूर्व लिखित पुस्तकों पर सम्मतियाँ

‘‘नरेश का मिजाज एक चिन्तक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।’’
- इंडिया टुडे

‘‘सब कुछ को सलीके से छिपाकर वे अपने पाठक को सरल से सरल भाषा में दृश्य-दर-दृश्य, कुछ अनसुने, अनदेखे और अनजाने को सुनने, देखने और जानने के लिये उकसाते हैं। इसलिए उस मर्म और तत्त्व को ढूँढ़ते हुए, वहाँ तक पहुँचने की प्रक्रिया में वे पाठक को खोजकर पाने के सुख से सुखी कर देना चाहते हैं। उसे अपने ढंग से अपने लिए पाकर पाठक के मन में उसके विस्तार और उसके प्रदर्शन की सबसे ज्यादा सम्भावना बनती है।’’
लीलाधर जगूड़ी
(पद्मश्री एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित)

‘‘ये कविताएँ ह्रदय का उद्गार हैं, ह्रदय की बात है। प्रभविणु कविचित्त पर जीवन के प्रसंगों ने जो तरंगें उत्पन्न की, उनकी अक्षत अभिव्यक्ति सरल-सुगम भाषा में कवि का अभीष्ट है। ये जीवन-प्रसंग जाने-पहचाने, रोज-ब-रोज के होते हुए भी एक विस्तृत सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत होकर नया अर्थ ग्रहण करते हैं।’’
- अरुण कमल, कवि एवं सम्पादक

‘‘नये घर में प्रवेश, नये घर में प्रवेश नहीं, कवि का अपनी अन्तश्चेतना की चौखटों को पारकर अपने आप को पाने, खोजने का प्रयत्न हे। गहन आत्मविश्लेाणात्मक है कवि की दृष्टि। दुनिया के सारे कुएँ से लेकर-कई कविताएँ।’’
          -चित्रा मुद्गल, उपन्यासकार

‘‘श्री नरेश अग्रवाल की इन कविताओं में समय और परिवेश के प्रति कवि की विनम्रता आकर्षित करती है। इनमें किसी प्रकार का भावुक आवेश या आक्रामक उबाल नहीं है, न अनुभव और भाषा की स्फीति। अभिव्यक्ति का यह अनुशासन इन कविताओं को प्रौढ़ और चिन्तनपरक बनाता है।’’
-श्री विश्वनाथ तिवारी
कवि एवं सम्पादक, दस्तावेज

‘‘आपकी सृजनात्मकता ने नये धरातलों को स्पर्श किया है। अपने आसपास के जीवन से यह संलग्नता इनकी एक विशिट पहचान बनाती है। संवेदनात्मक गहराई में डूबी हुई इन कविताओं को पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आपकी मार्मिकता मन को छूती है।’’
   - विजय कुमार, कवि एवं आलोचक

‘‘आपकी प्रकृति आधारित कविताएँ भी मात्र दृश्यचित्र नहीं हैं, उनमें मन बोलता है। कश्मीर को आपने सैरगाह की जगह संवेदना बनाया है। अगर इन पुस्तकों  का वितरण ठीक प्रकार से किया जाए तो ये समाज के लिये उपयोगी सिद्ध होंगी।’’
- ममता कालिया, साहित्यकार

‘‘आपकी कविताओं में बड़ी सहजता है। अनुभवों का निर्व्याज आवेग है। बड़ी आत्मीय स्वतः स्फूर्तता है।’’
- विजेन्द्र, कवि एवं सम्पादक


श्री नरेश अग्रवाल को वह दृष्टि प्राप्त है, जिस पैनी दृष्टि से कोई अपने चतुर्दिक का पर्यवेक्षण कर पाता है।

-श्रवण कुमार गोस्वामी
पूर्व सदस्य, हिन्दी सलाहकार समिति
गृह मन्त्रालय, भारत सरकार

विषय-सूची


खुशियाँ    12
चित्रकार    13
हर आने वाली मुसीबत    14
दादी जी के लिए    15
नियंत्रण    16
दुनिया के सारे कुएँ     17
सब कुछ मौन है    18
बच्चे    19
मैं सोचता हूँ    20
विदाई    21
कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा ऋण    22
छत    23
मनाली में    24
तुम्हारे न रहने पर    25
डूबती हुई नाव    26
पगडंडी     27
पूजा के बाद    28
खिलाड़ी    30
तुम्हारा संगीत    30
एक दुर्घटना के बाद    31
आग    32
अवसर    33
जो मिला है मुझे    34
आज सचमुच लगा    35
नये घर में प्रवेश                           36-37
यहाँ के दृश्य    38
यह लालटेन    39
परीक्षाफल    40
डूबते हुए जहाज में प्रेम    41
फूल    42
डर पैदा करना    43
समुद्र तट पर    44
तुम्हारा न रहना    45
मैं भूल गया हूँ    46
अंतिम संस्कार    47-48
अत्मीयता    49
लोहा बन गया हूँ मैं    50
विडम्बना    51
चित्र    52
एक संगीत समारोह में    53
बैण्डबाजे वाले    54
पिंजड़ा    55
प्रकाश    56
इस बार                                 57-58
मकान                                  59-60
पार्क में एक दिन    61
युद्ध    62
मजदूर के घर कबूतर     63
शब्द    64
मेरे दोस्त    65
हक    66
शोर    67
चिट्ठियाँ    68
यहाँ की दुनिया    69
पिता के लिए प्रार्थना                           70-71
मुलाकात के बाद    72
सेल्समैन    73-74
अनुभूतियाँ    75
तुम्हारी थकान    76
गेहूँ के दाने    77
आधुनिकता    78
डायरी में    79
रेगिस्तान    80
आवरण    81
कबूतर    82
पत्नी के जन्म दिन पर    83
घटित होती हुई साँझ    84
प्रशंसा    85
विश्वास    86
काँटा    87
हाथ    88
नफरत    89
समुद्र के किनारे    90
सृजन रुकता नही     91
कीड़े    92
टोपी    93
पिता के लिए    94-95
किताब    96


खुशियाँ

मुझे थोड़ी सी खुशियाँ मिलती हैं
और मैं वापस आ जाता हूँ काम पर
जबकि पानी की खुशियों से घास उभरने लगती है
और नदियाँ भरी हों, तो नाव चल पड़ती है दूर-दूर तक।

वहीं सुखद आवाजें तालियों की
प्रेरित करती है नर्तक को मोहक मुद्राओं में थिरकने को
और चाँद सबसे खूबसूरत दिखाई देता है
करवा चौथ के दिन चुनरी से सजी सुहागनों को

हर शादी पर घोड़े भी दूल्हे बन जाते हैं
और बड़ा भाई बेहद खुश होता है
छोटे को अपनी कमीज पहने नाचते देखकर

एक थके हुए आदमी को खुशी देती है उसकी पत्नी
घर के दरवाजे के बाहर इंतजार करती हुई
और वैसी हर चीज हमें खुशी देती है
जिसे स्वीकारते हैं हम प्यार से।


 


चित्रकार

मैं तेज प्रकाश की आभा से
लौटकर छाया में पड़े कंकड़ पर जाता हूँ
वह भी अंधकार में जीवित है
उसकी कठोरता साकार हुई है इस रचना में
कोमल पत्ते मकई के
जैसे इतने नाजुक कि वे गिर जाएँगे
फिर भी उन्हें कोई सँभाले हुए है
कहाँ से धूप आती है और कहाँ होती है छाया
उस चित्रकार को सब कुछ पता होगा
वह उस झोपड़ी से निकलता है
और प्रवेश कर जाता है बड़े ड्राइंग रूम में
देखो इस घास की चादर को
उसने कितनी सुन्दर बनाई है
उस कीमती कालीन से भी कहीं अधिक मनमोहक।


 

 

 


हर आने वाली मुसीबत

उसकी गतिविधियाँ
असामान्य होती हैं
दूर से पहचानना
बहुत मुश्किल होता है
या तो वह कोई बाढ़ होती है
या तो कोई तूफान
या फिर अचानक आई गन्ध

वह अपने आप
अपना द्वार खोलती है और
बिना इजाजत प्रवेश कर जाती है

फिर भागते रहो
घंटों छुपते रहो इससे
जब तक वह दूर नहीं चली जाती
हमारे मन से

बचा रह जाता है
उसके दुबारा लौट आने का भय।


 

दादी जी के लिए

तुम नहीं हो
फिर भी हमें लगता है
तुम यहीं कहीं हो

कभी घड़े के पानी की तरह
उतरती हो हमारे गले में
कभी अन्न का स्वाद बनकर
शान्त करती हो हमारी भूख

दीये की लौ की तरह
जलती हो हमारी पूजा में
फूलों की सुगन्ध बनकर
बसती हो हमारी प्रार्थना में

एक आभास की तरह
जिन्दा हो हमारी रग-रग में
हवा की तरह मौजूद हो
हमारे हर दुःख-सुख में

तुम यहीं कहीं
बसी हुई हो हमारे दिल में
जैसे मौजूद थे हम कभी
तुम्हारी कोख में ।ु

नियंत्रण

जिन रातों में हमने उत्सव मनाए
फिर उसी रात को देखकर हम डर गए
जीवन संचारित होता है जहाँ से
अपार प्रफुल्लता लाते हुए
जब असंचालित हो जाता है
कच्चे अनुभवों के छोर से
ये विपत्तियाँ  ही तो हैं।
कमरे के भीतर गमलों में
ढेरों फूल कभी नहीं आएँगे
एक दिन मिट्टी ही खा जाएगी
उनकी सड़ी-गली डालियाँ।
बहादुर योद्धा तलवार से नहीं
अपने पराक्रम से जीतते हैं
और बिना तलवार के भी
वे उतने ही पराक्रमी हैं।
सारे नियंत्रण को ताकत चाहिए
और वो मैं ढूंढ़ता हूँ अपने आप में
कहाँ है वो? कैसे उसे संचालित करूँ?
कभी हार नहीं मानता किसी का भी जीवन
वह उसे बचाए रखने के लिए पूरे प्रयत्न करता है
और मैं अपनी ताकत के सारे स्रोत ढूंढक़र
फिर से बलिष्ठ हो जाता हूँ।

दुनिया के सारे कुएँ

मँडरा रहा है यह सूरज
अपना प्रबल प्रकाश लिये
मेरे घर की चारों ओर
उसके प्रवेश के लिए
काफी है एक छोटा सा सूराख ही
और जिन्दगी
जो भी अर्जित किया है मैंने
उसे बाहर निकाल देने के लिए
काफी होगा एक सूराख ही
और प्रशंसनीय है यह तालाब
मिट्टी में बने हजार छिद्रों के बावजूद
बचाये रखता है अपनी अस्मिता
और वंदनीय हो तुम दुनिया के सारे कुओं 
पाताल से भी खींचकर सारा जल
बुझा देते हो प्यास हर प्राणी  की ।

 

 

 


सब कुछ मौन है
 
सुन्दर दृश्यों, चूमता हूँ मैं तुम्हें
और तुम खत्म नहीं होते कभी
थक जाता हूँ मैं
खत्म हो जाते हैं मेरे चुम्बन
कुहासा खोलता है दृश्य पर दृश्य
जैसे हम उनके पास जा रहे हों, लगातार
सारी खिड़कियाँ खुल गयी हैं मन की
इनमें सब कुछ समा लेने की इच्छा जागृत
कोई तेज घुड़सवार आ रहा है मेरी तरफ
और बड़ी मुश्किल से संभालता हूँ मैं अपने आपको
इस ऊबड़-खाबड़ जमीन से।
यहाँ पत्थरों में अभी भी हल्की बर्फ जमी हुई है
भेड़ों के लिए आजाद दुनिया, हरे-भरे मैदान की
गड़ेरिया अपनी पुरानी वेष-भूषा में टहलता हुआ
करता है आँखों से मुझे मौन सलाम
और सब कुछ मौन है यहाँ
फिर भी मुझसे बातें करता हुआ लगातार
 
 

 

 

बच्चे

बच्चे लाइन में चलना नहीं चाहते
बच्चे नहीं जानते यह सुरक्षा का नियम है
बच्चे लाइनें तोड़ देते हैं
वे खेलना चाहते हैं मनपसंद बच्चों के साथ।
बच्चों के लिए कोई थकान नहीं,
न ही कोई दूरी है
दायरा है दूर-दूर तक देखने का
वे खेलते समय पाठ याद नहीं रखते
भूल जाते हैं पढ़ाई भी कुछ होती है
बच्चे मासूम उगते हुए अंकुर या छोटे से वृक्ष
अभी इतने कच्चे कि हवा से लथ-पथ
इनके चेहरे याद नहीं रहते
जैसे सभी अपने हों और एक जैसे
और उनकी खुशियाँ समा लेने के लिए
कितना छोटा पड़ जाता है यह भूखंड।

 

 

 


मैं सोचता हूं

मैं सोचता हूँ सभी का समय कीमती रहा
सभी का अपना-अपना महत्व था
और सभी में अच्छी संभावनाएँ थीं,
छोटी सी रेत से भी भवनों का निर्माण हो जाता है
और सागर का सारा पानी दरअसल बूंद ही तो है।
 
रास्ते के इन पत्थरों को
मैंने कभी ठुकराया नहीं था
इन्हें नहीं समझ पाने के कारण
इनसे ठोकर खाई थी
और वे बड़े-बड़े आलीशान महल
अपने ढहते स्वरूप में भी
आधुनिकता को चुनौती दे रहे हैं
और उनका ऐतिहासिक स्वरूप आज भी जिंदा है।


 

 

 


विदाई

एक पत्थर जो पड़ा है वर्षों से वहीं का वहीं
कभी विदा नहीं होता जलधारा के साथ
और एक दिन हार मान लेती है नदी
ना ही कभी विदा होते हैं उर्वरक धरती से
चाहे कितनी ही फसलें उगाई और काट दी जाती रहें,
तुम जो मेरे सीने से निकलती हुई धड़कन हो
जो एक दिन दो से तीन हुई थी
जहां भी रहोगी, कहीं की भी यात्रा करती हुई
फिर से लौट कर आओगी
नाव की तरह अपने तट पर
और हम फिर से मिलकर एक हो जाएँगे
और बातें करेंगे हमेशा की तरह
उन्हीं पुरानी कुर्सियों पर बैठ कर।

 

 

 

 

 

कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा ऋण

रात जिसने दिखाये थे
हमें  सुनहरे सपने
किसी अजनबी प्रदेश के
कैसे लौटा पायेंगे
उसकी स्वर्णिम रोशनी

कैसे लौटा पायेंगे
चाँद-सूरज को उनकी चमक
समय को बीती हुई उम्र
फूलों को खुशबू
झरनों को पानी और
लोगों को उनका  प्यार

कैसे लौटा पायेंगे
खेतों को फसल
मिट्टी को स्वाद
पौधों को उनके फल

ऐ धरती तुम्हीं बताओ
कैसे चुका पायेंगे
तुम्हारा इतना सारा ऋण ।


छत
 
इन्हें भी चाव है स्थिरता का
और शौक कि लोग आयें बैठें-टहलें उसमें कुछ देर
उपयोग किया जाए उसका अच्छी तरह से।
नीचे भी दीवारों से घिरी खोखली नहीं है यह
क्षमता है इसमें सब कुछ समा लेने की
चाहे बिस्तर, मेज या रसोई का सामान
और कैसी भी छत हो इस दुनिया की
अपने ऊपर धूप सहती है
और नीचे देती है छाँव,
अपनी आखिरी उम्र तक
जिस दिन उजड़ती है यह
उस दिन महसूस होता है
कितना बड़ा आकाश ढोती थी
यह अपने सिर पर।


 

 

 


मनाली में
 
ये सेब के पेड़ कितने अजनबी हैं मेरे लिए
हमेशा सेब से रिश्ता मेरा
आज ये पेड़ बिलकुल मेरे पास
हाथ बढ़ाऊँ और तोड़ लूँ
लेकिन इन्हें तोड़ूँगा नहीं
फिर इन सूने पेड़ों को,
खूबसूरत कौन कहेगा।
 

 

 

 

 

 

 

 


तुम्हारे न रहने पर

थोड़ा-थोड़ा करके
सचमुच हमने पूरा खो दिया तुम्हें
पछतावा है हमें
तुम्हें खोते देखकर भी
कुछ भी नहीं कर पाये हम,
अब हमारी आँखें सूनी हैं,
जिन्हें नहीं भर सकतीं
असंख्य तारों की रोशनी भी
और न ही है कोई हवा
मौजूद इस दुनिया में
जो महसूस करा सके
उपस्थिति तुम्हारी,
एक भार जो दबाये रखता था
हर पल हमारे प्रेम के अंग
उठ गया है, तुम्हारे न रहने से
अब कितने हल्के हो गये हैं हम
तिनके की तरह पानी में बहते हुए ।


 

 

डूबती हुई नाव

नाव चोट खा गयी है
लगता है, डूब जाएगी
पानी धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा है
दर्द से हिलती है नाव
पानी खून का प्यासा हो गया है
डर से सबके शरीर पत्थर
अब कुछ नहीं हो सकता है
एक ही सत्य है मौत
और मौत बढ़ रही है
बिना किसी शस्त्र के
कितनी आसानी से
छीन रही है प्राण
पानी भर रहा है
साँस की जगह
और दया दिखाई नहीं देती है
दूर-दूर तक ।

 

 

 

पगडंडी

जहाँ से सड़क खत्म होती है
वहाँ से शुरू होता है
यह सँकरा रास्ता
बना है जो कई वर्षों में
पाँवों की ठोकरें खाने के बाद,
इस पर घास नहीं उगती
न ही होते हैं लैम्पपोस्ट
सिर्फ भरी होती हैं खुशियाँ
लोगों  के  घर  लौटने की !


 

 

 

 

 

 


पूजा के बाद
 
पूजा के बाद हमसे कहा गया
हम विसर्जित कर दें
जलते हुए दीयों को नदी के जल में
ऐसा ही किया हम सबने।
सैकड़ों दीये बहते हुए जा रहे थे एक साथ
अलग-अलग कतार में।
वे आगे बढ़ रहे थे
जैसे रात्रि के मुँह को थोड़ा-थोड़ा खोल रहे हों, प्रकाश से
इस तरह से मीलों की यात्रा तय की होगी इन्होंने
प्रत्येक किनारे को थोड़ी-थोड़ी रोशनी दी होगी
बुझने से पहले।
इनके प्रस्थान के साथ-साथ
हम सबने आँखें मूंद ली थीं
और इन सारे दीयों की रोशनी को
एक प्रकाश पुंज की तरह महसूस किया था
हमने अपने भीतर।

 

 

 

खिलाड़ी

गजब सा खेल है यह
इसमें खिलाड़ी हवा में गुलाटी लगाता है
फिर सीधे पाँव खड़ा हो जाता है डंडे की तरह
बेहद कठिन है यह
इसलिए लोग खड़े हैं इसे देखने
रोमांच जाग पड़ता है सबों के शरीर में
कई बार तो लगता है
वह ठीक से नहीं कर पाएगा इस खेल को
तुड़वा बैठेगा अपनी हड्डियाँ
और गिर जाएगा कमर के बल टेढ़ा होकर
लेकिन सबकी इच्छा है
वह कभी गिरे नहीं
खेल उसका चलता रहे।
साँस रुक जाती है लोगों की
जब वह लगभग जमीन छूने को होता है
और जमीन छूते ही वापस शुरू कर देता है
अपने खेल को
आनंद उतर आता है दर्शकों में
सभी थोड़े-थोड़े रुपये उसे दे देते हैं
हालाँकि वह किसी से कुछ नहीं माँगता
सिर्फ सारा ध्यान केंद्रित करता है खेल में।

तुम्हारा संगीत

कितने सारे पहाड़ देख लिए मैंने
कितनी ही नदियाँ
और संगीत बड़े-बड़े वादकों का
फिर भी सुनता हूँ जब
तुम्हारी ढोलक की थपथपाती मधुर आवाज
लगता है जैसे मैं जाग गया,
जाग गया हो चंद्रमा
इसके दोनों छोर के हिलने से।
सिर्फ मैं नहीं सुन रहा हूँ इस आवाज को
सभी सुन रहे हैं इस आवाज को
जहाँ तक जाती होगी यह
सभी के कान तुम्हारी तरफ
जैसे तुम उनमें एक शक्ति का संचार कर रहे हो
भर रहे हो धड़कन धीमी-धीमी
पारे के आगे बढ़ने जैसी।
तुम बार-बार बजाओ
मैं निकलता जा रहा हूँ दूर तुमसे
पूरी तरह ओझल
फिर भी  तुम्हारे स्वर मुझे थपथपा रहे
जाग्रत कर रहे हैं मुझे अब तक।


एक दुर्घटना के बाद

अनाज के दाने निकाल लेने के बाद
हल्की हो जाती हैं फसलें
बचा-खुचा मवेशियों के लिए या आग तापने के लिए,
सूरज के डूब जाने के बाद
नष्ट हो जाता है रंग किसी भी भूखंड का
तापमान गिरा और कठिन हो गयी सर्दभरी रात।
इस रात की तहस-नहस भरी जिन्दगी में
कहाँ पर ठौर मिल सकता है,
मालूम नहीं है उन्हें
वे अकेले नहीं हैं, वे बहुत सारे लोग हैं एक साथ
जो अभी-अभी यहाँ पहुँचे हैं
उन्हें न तालाब की चिन्ता है न ही पेड़ देखने का मन,
सब की एक ही चिंता है
कि अगर उनकी खुशियाँ बचेंगी भी तो
न जाने वे किस तरह की होंगी।

 

 

 


आग

चीजों के राख में बदल जाने के बाद
कुछ भी मालूम नहीं होता
इसका पिछला स्वरूप क्या था
और आग जलती है बिना भेद-भाव के
प्राप्त करती है अपनी खुराक नरम चीजों से
और पकड़ने को बढ़ती है सख्ती की ओर
लेकिन कितनी आसानी से बाँध लेते हैं इसे
छोटे से मिट्टी के दीये भी, अपने आकार में
जबकि सूरज की आग की हमें परवाह नहीं
ना ही डर है चाँद-सितारों से
क्योंकि ये दूरस्थ मित्र हैं हमारे
रोटी की तरह हमारा पोषण करते हुए
और वह आग बेहद डरावनी हो सकती है कल
जो अभी बंद है किसी माचिस की डिबिया में
और जिसे शैतानी हाथ ढूंढ़ रहे हैं घुप्प अंधेरे में।

 

 

 


अवसर

चील बहुत फुर्तीली है
आँखें उसकी तीव्र है
बखूबी देख लेती है शिकार को
बहुत दूर से
लेकिन तुम्हारे हिस्से में एक लाभ है
वो बहुत दूर है
जल्दी झपट्टा मारने का
पहला अवसर, तुम्हारे पास है।

 

 

 

 

 

 

 


जो मिला है मुझे

उपदेश कभी खत्म नहीं होंगे
वे दीवारों से जड़े हुए
मुझे हमेशा निहारते रहेंगे,
जब मुझमें अपने को बदलने की जरूरत थी
उस वक्त उन्हें मैं पढ़ता चला गया
बाकी समय बाकी चीजों के पीछे भागता रहा,
अत्यधिक प्रयत्न करने के बाद भी
थकता नहीं हूँ
कुछ न कुछ हासिल करने की चाह।
जो मिला है मुझे
जिससे सम्मानित महसूस करता हूँ
गिरा देता हूँ सारी चीजों को एक दिन
अपने दर्पण में फिर से अपनी शक्ल देखता हूँ
बस इतना काफी नहीं है
इन बिखरी चीजों को भी सजा कर रखना है
वे सुन्दर-सुन्दर किताबें
वे यश की प्राप्ति के प्रतीक
कल सभी के लिए होंगे
और मैं अकेला नहीं हूँ कभी भी।

 


आज सचमुच लगा

आज सचमुच लगा,
मेरे बीमार पिता को
एकदम से मेरी जरूरत है
वे धीरे-धीरे बोल रहे थे
बहुत कम विश्वास था
उन्हें ठीक होने का
जितना भी जिया, संतुष्ट थे उससे
लेकिन एक खालीपन था चेहरे पर
लगता था, प्यार ही भर सकता है जिसे
मैंने धीरे-धीरे हाथ बढ़ाया
अपना हाथ उनके हाथ में लिया
फिर कंधे पर फेरा हाथ
और आखिर में हाथ सिर पर रखकर
बच्चों की तरह प्यार किया
उन्होंने मुझे देखा
थोड़ी अच्छी तरह से
शायद उन्हें लगा,
अभी जीने के कुछ ये ही कारण बचे हैं
उन्हें जीना चाहिए
वे कुछ नहीं बोले
तेजी से आँख मूँदकर
मुँह फेर लिया ।

नये घर में प्रवेश

वर्षों से ताला बन्द था
उस नये घर में
कोई सुयोग नहीं बन रहा था
यहाँ रहने का
आज किसी शुभ हवा ने
दस्तक दी और खुल गये इसके द्वार
देखता हूँ, बढ़ रहा है
इसमें रहने को छोटा-सा परिवार
माता-पिता-बच्चों सहित
साथ में दादा-दादी
सभी खुश हैं
आज पहली बार खाना बनेगा
इसके रसोई घर में
छोंकन से महकेगा सारा घर
कुछ बचा-खुचा नसीब होगा
आस-पास के कुत्तों और पक्षियों को भी
कुछ पेड़-पौधे भी लगाये जाएँगे
साथ में तुलसी घर भी होगा आँगन में
पिछवाड़े में होंगे स्कूटर और साइकिल
और एक कोने में स्थापित होंगी
ईश्वर की कुछ मूर्तियाँ ।
कुछ ऊँचे स्वर भी सुनाई देंगे
कभी-कभार दादा के
जो बतायेंगे   
अभी घर की सारी सुरक्षा का भार
उन्हीं के सिर पर है।

 

 

 

 

 

 

 

 


यहाँ के दृश्य
 
यहाँ दृश्य टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरे हुए हैं
एक-एक कण सभी को समर्पित
थोड़े से बादल हटते हैं
दृश्य कुछ और हो जाता है
हवा चलती है जैसे हम सभी को
एक साथ समेट लेने को
मन में इच्छा होती है वैसी आँखें मिल जाएँ
जो सब कुछ ले जाएँ अपनी झोली में।
थोड़ी सी तस्वीरें खींची हुई मेरे पास
एक पेड़ की डालियों जितनी भर
और यहाँ तो हर क्षण
कहीं भी जा सकते हैं आप दूर-दूर तक
वो भी पलक झपकाये बिना
और भूल जाते हैं हम
किस दुल्हन का मुखड़ा ढूंढ़ रहे हैं हम यहाँ।
 
 

 

 


यह लालटेन

सभी सोये हुए हैं
केवल जाग रही है
एक छोटी-सी लालटेन
रत्ती भर है प्रकाश जिसका
घर में पड़े अनाज जितना
बचाने के लिए जिसे
पहरा दे रही है यह
रातभर!

 

 

 

 

 

 

 


परीक्षाफल

वह बच्चा
पिछड़ा हुआ बच्चा
चील की तरह भागा
अपना परीक्षाफल लेकर
अपनी माँ के पास
एक बार माँ बहुत खुश हुई
उसके अच्छे अंक देखकर
फिर तुरंत उदास
किताबें खरीदकर देने के लिए
पैसे नहीं थे उसके पास।

 

 

 

 

 

 


डूबते हुए जहाज में प्रेम

जहाज डूबने को था
हमने देह से अधिक
प्रेम को बचाना चाहा
जब सारे लोग भाग रहे थे
हम प्रेम में थे मग्न
हमारा प्रेम सिलसिलेवार चलता रहा
जो बच सके, वे बच गये
जो नहीं बच पाये, वे नहीं बच पाये
उनमें हम दोनों भी थे
दोनों हाथ हमारे मिले हुए थे
साथ ही कन्धे से कन्धा
और मन से मन
भय कहीं नहीं था
पानी हमें झाँक रहा था
और हम एक-दूसरे को।

 

 

 


फूल

खामोश हरियाली के बीच
पर्वतनुमा इस जगह में
एक शांत कब्र ढकी हुई फूलों से
बार-बार निगाह जाती है उन पर
लगता है चेहरा शव का हमेशा ढका रहे
केवल फूल ही फूल दिखलाई दें,
सारे दुखों को ढक लेते हैं फूल
फूल ही हैं वे जिनकी तरफ आँखें दौड़ती हैं,
इनके ही भार से हल्का हो जाता है
किसी के भी छोड़ जाने का दुख।

 

 

 

 

 

 


डर पैदा करना

केवल उगते या डूबते हुए सूर्य को ही
देखा जा सकता है नंगी आँखों से
फिर उसके बाद नहीं
और जानता हूँ
हाथी नहीं सुनेंगे
बात किन्हीं तलवारों की
ले जाया जा सकता है उन्हें दूर-दूर तक
सिर्फ सुई की नोक  के सहारे ही,
इसलिये सोचता हूँ,
डर पैदा करना भी एक कला है।

 

 

 

 

 

 


समुद्र तट पर

इतने लोगों की भीड़
इनके साथ रहूँ या साथ छोड़ दूँ?
मैं अकेला समुद्र तट पर
एक मात्र कुर्सी पर भी कर सकता हूँ विश्राम
चारों तरफ जल, जैसे नहीं हो कुछ इसके सिवा
अगर कुछ है तो मैं ही हूं इतना भर ही।
इस सुबह की धूप में कोई मजाक नहीं करता
न ही चढ़ता है किसी पेय का नशा
आँखें ढूँढ़ती रहती हैं रंग-बिरंगी बोटें
और यात्री उन पर आते-जाते हुए।
हर छोटा बच्चा रेत से घर बनाना चाहता है
जैसे यह हमारी पैदाइशी ख्वाहिश
और भाग रहे हैं जो मछलियों के पीछे
जाल उनके पंजों की तरह हिलते हुए
पूरे बाजार में समुद्री खाद्य पदार्थ टँगे हुए
जैसे चित्रित करते हों सूखे समुद्र को।
कितना कुछ है यहाँ
और मैं देखता भर हूँ सिर्फ समुद्र की लहरों को
लहरें मेरे पास आती हुई, मुझसे दूर जाती हुई
मुझे अपने पास आने का प्रलोभन देती हुई।


तुम्हारा न रहना

तुम्हारे अनगिनत बिम्ब
झाँकते हैं मेरी ओर
अपने हजार हाथों से दस्तक देते हुए
और उलझन में रहता हूँ
कैसे उन्हें प्रवेश दूँ
जबकि जानता हूँ
वे आयेंगे नहीं भीतर
केवल झाँकते रहेंगे बाहर से
तुम्हारा पास न रहना
इसी तरह का आभास देता है मुझे हर पल ।

 

 

 

 

 

 


मैं भूल गया हूँ

मैं भूल गया हूँ पृथ्वी तुम्हें
अब मेरे पाँव तुम पर नहीं पड़ते
तरस गयी हैं मेरी आँखें
तुम्हारी सुगंधित मिट्टी देखे बिना
दूर हो गया है यह सूर्य
दिखलाई नहीं देता मुझे
जिसका उदय और अस्त होना,
बैठा रहता हूँ घण्टों-घण्टों भर
इस व्यवसाय की कुर्सी में
और देखता रहता हूँ मेज को
जिससे उठकर कागज पर कागज
चिपकते जाते हैं मेरे चेहरे पर
और इस कलम से किये गये हस्ताक्षर
महसूस कराते हैं मेरी मौजूदगी भर।

 

 

 

 

अंतिम संस्कार

मैं गुजर रहा था
अपने चिरपरिचित मैदान से
एकाएक चीख सुनी
जो मेरे सबसे प्रिय पेड़ की थी

कुछ लोग खड़े थे
बड़ी-बड़ी कुल्हाड़ियाँ लिये
वे काट चुके थे इसके हाथ
अब पाँव भी काटने वाले थे

मैंने इशारे से उन्हें रोकना चाहा
वे रुके नहीं अपना काम करते रहे

मैंने फिर कहा माफ  करो इसे
अगली बार यह जरुर फल देगा
इसमें पत्ते भी आयेंगे और फूल भी
पथिक भी आराम करेंगे
चिडियाँ भी घोंसले बनायेंगी

न हीं वे माने और न ही रुके
केवल बुदबुदाते रहे-
मरे हुए का शोक करता है
कौन है यह आदमी?
क्या इसे अपना हिस्सा चाहिए?

आगे मैं कुछ बोलता
वे पहले ही बोल पड़े-

हम लोग लाश उठा रहे हैं
अंतिम संस्कार भी करा देंगे
तुम राख ले जाना

वे बहुत खुश थे
जोर-जोर से हँस रहे थे
जड़ें हिल रही थीं उनकी हँसी से,
कुल्हाड़ियाँ चमक रही थीं
और उखड़ने लगे थे
धरती से मेरे पाँव।

 

 

 

 


अत्मीयता

उसने कितनी आत्मीयता से कहा था,
आपने दावत देने का वादा किया था और नहीं आये
उसके  शब्दों में एक मीठा आग्रह था
साथ न बैठ पाने का सहज दुख
और वो जानती थी कि उसका हक मुझ पर कितना कम था
यह मुलाकात एक सुंदर दृश्य की तरह
और उसे सब कुछ भुला देना था।
उस दिन अचानक ही हम एक-दूसरे को अच्छे लगे थे
कोई कारण नहीं था बातें करने का
फिर भी हमारी उत्सुकता ने हमें मिला दिया
वह हँसी थी जैसे पहली बार में ही
अपना परिचय देने को इच्छुक हो
लेकिन मैंने पाया असीम था उसके पास देने को
बातों ही बातों में और अधिक जीवंत होती जा रही थी वो
कोई विवरण नहीं था उसके पास
किसी तरह का कोई स्पर्श भी नहीं
बस अपनी कोमल भावनाओं का इजहार
और मुश्किल हो रहा था मुझसे यह सब कुछ सहना
शायद इसलिए कहा था मैंने उससे
अलविदा! कल फिर मिलेंगे
और आज बस उससे क्षमा माँगने आया था।

लोहा बन गया हूँ मैं

सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई-खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूँ मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूँ मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हँसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूँ  मैं
झेलते-झेलते।


 

 

 

 

विडम्बना
 
यह विडम्बना थी कि
इन सुंदर दृश्यों को छोड़कर
वापस मुझे आना होता था
मेरे ठहराव में उतनी गहराई नहीं थी
कि स्थापित कर लेता मैं वहीं, अपने आपको
केवल उनके रंगों से रंगता अपने आपको
और धीरे-धीरे वापस लौटने पर
चढ़ जाते थे इन पर, दूसरे ही रंग।
फिर भी मैंने कभी सोचा नहीं
एक जगह चुपचाप रहना ही अच्छा होगा
बल्कि फिर से तलाशी दूसरी धरती
और पाया ये भी वैसे ही हैं
पृथ्वी के रंगीन टुकड़े।
जीवन सभी जगह पर रह सकता था
क्या तो कठोरता में या क्या तो तरलता में
और जहां दोनों थे
वहीं अद्भुत दृश्य बन सके
और हमें दोनों से तादात्म्य बैठाना था।
 

 

चित्र

चित्र से उठते हैं तरह-तरह के रंग
लाल-पीले, नीले-हरे
आकर खो जाते हैं हमारी आंखों में
फिर भी चित्रों से खत्म नहीं होता
कभी भी कोई रंग।
रंग अलग-अलग तरह के
कभी अपने हल्के स्पर्श से तो कभी गाढ़े स्पर्श से
चिपके रहते हैं,
चित्र में स्थित प्रकृति और जनजीवन से।
सभी चाहते हैं गाढ़े रंग अपने लिए
लेकिन चित्रकार चाहता है
मिले उन्हें रंग
उनके व्यक्तित्व के अनुसार ही,
जो उघाड़े उनका जीवन सघनता में।
अक्सर यादें रह जाती हैं अच्छी कलाकृतियों की
रंग तक भी याद आते रहते हैं
लेकिन जो अँगुलियाँ गुजर गयीं हजारों बार
इन पर ब्रश घुमाते हुए
कितना मुश्किल है समझ पाना
कौन सी भाषा में वे लिख गयीं
और सचमुच क्या कहना चाहती हैं वे?

एक संगीत समारोह में

शांति चारों ओर थी
और उसके संगीत के साथ परम शांति की ओर बढ़ते हम सभी
अगर शुरू के स्वरों से बाद में आने वाले शब्दों को
बाँध लें हम मन में,
तो संगीत को नृत्य के रूप में देखा जा सकता है यहाँ
यह संगीत अपनी लय में नृत्य करता हुआ
और उनकी आवाज, चेहरे और वाद्यों की धडक़न
जैसे हममें स्थित किसी सुप्त श्रोेता को पुकारने लगी हो
जो अब लगभग पूरी तरह से जाग गया था
और सुर-ताल में स्थित प्रखर तेज का आलिंगन करने लगा था
हम स्थिर होकर भी महासमुद्र का गोता लगाते हुए,
कोई चुप नहीं यहाँ
सभी एक ही मंच को आलिंगनबद्ध किए हुए।

 

 

 

 

बैण्डबाजे वाले

आधी रात में
बैण्डबाजे वाले
लौट रहे हैं
वापस अपने घर
अन्धकार के पुल को
पार करते
जिसके एक छोर पर
खड़ी है उनकी दुखभरी जिन्दगी
और दूसरे छोर पर
सजी-धजी दुनिया!

 


 

 

 

 

पिंजड़ा

सचमुच पिंजड़े के बाहर
कितनी आजाद है दुनिया
और इसके भीतर कितनी तंग
फासला दोनों के बीच है
बस हाथ बढ़ाओ और
छू लेने जितना
फिर भी लग जायेगी
सारी जिन्दगी इस पंछी को
इसे पार करने में भी।

 

 

 

 

 

 

प्रकाश

हर अँधेरे की भूख
कि उसे केवल प्रकाश चाहिए।
अपने अंतिम क्षणों तक भी
आँखें मूँदना नहीं चाहता कोई
प्रकाश हमें थोड़ा सा मिला
यही हमारा दुख है।
मेरी सारी गतिविधियों में शामिल है प्रकाश
यह मेरे साथ उठता और बैठता हुआ।
चाहे कितना भी अँधेरा क्यों न हो जाए
गुम हो जाएँ सारी बत्तियाँ
एक अंधकार चारों ओर जैसे पानी के नीचे हम दबे हुए
फिर भी हम तड़पेंगे आँखें खोलने के लिए
मैं इसी तड़प को देखता हूँ दिन-रात
कुछ है जो मेरे भीतर
जो अपना मार्ग ढूंढ़ता है
और ये शब्द उसी के माध्यम से
अपनी आँखें खोलते हैं कागज पर।

 

 

इस बार

इस बार अपने स्वभाव के विपरीत
बहुत जल्दीबाजी की तुमने
हाथ छुड़ाया और चले गये
थोड़ा सा भी समय नहीं दिया
जी भर के देखने का
और बातें करने का,
कितनी चीजें थीं हमारे पास
दिखाना चाहते थे तुम्हें
एक ाुभ दिन
सब वैसी की वैसी रह गयी
एक उँचाई की ओर बढ़ रहे थे हम,
जहाँ से पुकारना चाहते थे तुम्हें
अपना हाथ हिलाते हुए,
अब उसे सुनने वाला कोई नहीं है
इसलिए हार गये हैं हम
हमारे सारे गर्व चूर हो गये हैं
और अब हम धरती पर हैं।

कहा था एक दिन तुमने
सभी को इसी तरह जाना होता है
बिलकुल खाली हाथ
लेकिन कितना सारा प्रेम
छोड़़कर गये हो तुम
और रेखाएँ तुम्हारे हाथ की
अब भी भाग्य बनकर
जी रही हैं हमारे साथ
और सारा कुछ देख लेने के बाद
तुम अब कहाँ हो


जान लेने की इच्छा बची है मन में केवल
और तुम्हारा ठीक से रहना ही
बहुत सारा सन्तोा  देता है हमें।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


मकान

ये अधूरे मकान लगभग पूरे होने वाले हैं
और जाड़े की सुबह में कितनी शांति है
थोड़े से लोग ही यहाँ काम कर रहे हैं
कई कमरे तो यूँ ही बंद
खूबसूरती की झलक अभी बहुत ही कम
दिन ज्यूँ-ज्यूँ बढ़ते जाएँगे
काम भी पूरे होते जाएँगे।
खाली जगह से इतना बड़ा निर्माण
और चांद को भी रोशनी बिखेरने के लिए
एक और नई जगह
बच्चे खुश हैं दौड़-दौड़कर खेलते हुए
अभी उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं
एक अच्छे भविष्य की ओर बढ़ता हुआ मकान
जैसे एक छोटी सी चीज को
बहुत अच्छी तरह से सजाया जा रहा है
हाथ की मेहँदी तो एक छोटा सा भाग होती है दुल्हन का
फिर भी इसके दरवाजे उतने ही महत्त्वपूर्ण
जिन पर पौधों की शाखाएँ झूलने लगी हैं
कुछ आगन्तुक गुजरते हैं पास से
इसे देखते हुए
कोई सम्मोहन उन्हें रोक लेता है
सभी थोड़ी-थोड़ी झलक लेते हैं
लम्बी हो या छोटी।
सारी थकान के बाद यह एक पड़ाव है
और कोई कैसे बढ़ता है सफलता की ओर
हर पल दिखला रहा है यह निर्माण। 
       

 

 

 

 

 

 

 


पार्क में एक दिन

इस पार्क में जमा होते जा रहे हैं लोग
कोई चुपचाप निहार रहा है
पौधों की हरियाली और फूलों को
कोई मग्न है कुर्सी पर बैठकर
प्रेम क्रीड़ा करने में,
कोई बढ़ रहा है आगे देखने की उत्सुकता लिए
कोई वहीं बैठ गया है घास पर
थोड़ी ठंडक का आनन्द लेने
कई बच्चे अलग-जगह पर हैं
झूला झूलते या दूसरे उपकरणों से खेलते हुए
सभी लोग फुर्सत में हैं, फिर भी व्यस्त।

अब थोड़ी देर में फव्वारे चालू होंगे
रंग-बिरंगे मन मोहते हुए
यही आखिरी खुशी होगी लोगों की
फिर लौटने लगेंगे वे वापस घर
कोई परिश्रम नहीं, फिर भी थके हुए।

 

 


युद्ध

फुर्तीले शरीर और शानदार घोड़े
दिशाओं में सिहरन पैदा करते हुए
एक इशारे से जंग की ओर दौड़ते हुए
और बिल्कुल साफ-सुथरी वेशभूषा लड़ाकों की
सभी की एक जैसी, वातावरण में प्राण फूँकती हुई
सभी एक जैसे कि एक गिरे तो
दूसरा ठीक उसी तरह से उठ खड़ा हो
वे दौड़ते हैं जैसे कोई भयानक आग को रोकने को
सभी तरफ आग ही आग
और यह शरीर से निकलती युद्ध की आग
प्राण ले लेती है अपनों के ही
युद्ध खत्म होने पर बच जाते हैं सिर्फ अवशेष,
थके हुए घोड़े और रोष से पीड़ित अधमरे लोग
किसी में कोई चमक नहीं
अब आँखें उन्हें देखने से भी कतराती हैं।

 

 

 


मजदूर के घर कबूतर

मेरे दादा मजदूर थे
लेकिन अपनी मर्जी के
वे साइकिल के पीछे
अनाज की बोरी रखकर
मुट्ठी भर-भर पूरे गाँव में बेचते थे
और थोड़े से पैसे लेकर
शाम को घर लौटते थे
और उस वक्त
कबूतर उनका इंतजार करते थे
जो बोरे को झाड़ने के बाद
बचा हुआ अन्न खाकर
पानी पीते
और उड़ जाते थे।
लोग कहते थे
यह कैसा प्रेम
मजदूर  के घर कबूतर
और मेरी दादी
सबकी नजरें चुराकर
हर सुबह थोड़ा-सा
अनाज बिखेर देती थी
जिसे खाकर वे चुपचाप
छत पर उड़ जाते थे।
दादा कभी नहीं समझ पाये
इस राज को
हमेशा की तरह
बोरों को झाड़-झाड़कर
अनाज बाँटते हुए
बहुत खुश होते थे वे ।

शब्द

सभी के साथ सलाह-मशविरा
कितनों का ही अनुभव सर आँखों पर
खून तक में उतर आता है एक अच्छी पुस्तक के प्रति प्यार
छोटे-छोटे बच्चे तक-
प्यार करते हैं नयी-नयी किताबों को
वे जिल्द चढ़ाकर रखते हैं सुरक्षित सभी को
इनमें लिखी एक-एक चीज का महत्त्व
और उत्तर ही उत्तर माँगते हैं सब पाठ।
जो कम पढ़े-लिखे हैं
उनकी दुनिया में थोड़े से शब्द हैं
फिर भी जीवन यापन तो हो ही जाता है,
मैं भी लिखता हूँ हर दिन थोड़े से शब्द
जो हैं मेरी आत्मा से निकले हुए
दूसरों से आत्मीय होने के लिए
वे ढूँढ़ते हैं लोगों के बीच उनके फुर्सत के क्षण।

 

 

 


मेरे दोस्त

बहुत सारे दोस्त रहे मेरे
कुछ उन कौओं की तरह थे
जो वक्त आने पर
शोर मचा सकते थे हित में मेरे
लेकिन भीतर से उतने ही कमजोर
हवा की थोड़ी-सी धमक से
उड़ जाया करते थे मुझे छोड़कर।
कुछ वैसे भी रहे
चील की तरह दूर से ही
मुझ पर दृष्टि जमाए हुए
जब भी मौका मिला
छीनकर ले गए खाना मेरा।
और कुछ थे बेहद ऊबाऊ
सुअर की थोथी नाक की तरह
हमेशा मुँह दिखलाते हुए
कुछ ही थे अच्छी बातें कहने वाले
कहकहे लगाने वाले थे ज्यादा
लेकिन सभी दोस्त ही तो थे
इसलिए गले लगाए रखना
जरूरी था उन्हें।


हक
 
प्रकृति की सुंदरता पर किसी का हक नहीं था
वो आजाद थी, इसलिए सुंदर थी
एक खूबसूरत चट्टान को तोडक़र
दो नहीं बनाया जा सकता
ना ही एक बकरी के जिस्म को दो।
इस धूप को कोई नहीं रोक सकता था
धीरे-धीरे यह छा जाती थी चारों तरफ
इसलिए इसके भी दो हिस्से नहीं हो सकते
और जो हिस्से सुंदर नहीं थे
वे लड़ाइयों के लिए पहले ही छोड़ दिये गये थे।

 

 

 

 

 

 


शोर

अलग-अलग
होता सबका शोर-
भीड़ का
रोने का
बहते पानी का और
गुस्से का
थक जाता जब
सारा शोर
शांति होती है
सबकी एक जैसी ही ।

 

 

 

 

 

 


चिट्ठियाँ

दूर से आती है चिट्ठियाँ
अपनों को और अधिक अपना बनाने के लिए
और दुनिया छोटे से कागज में सिमटकर
बैठ जाती है हृदय पर
पहला खत था यह बेटी का
मुझको लिखा हुआ
अपने सारे दुख-सुख का निचोड़
घूमता रहा कई दिनों तक मेरे मन में ।

 

 

 

 

 

 

 


यहाँ की दुनिया

बच्चा अभी-अभी स्कूल से लौटा है
खड़ा है किनारे पर
चेहरे पर भूख की रेखाएँ
और बाँहों में माँ के लिए तड़प।
माँ आ रही है झील के उस पार से
अपनी निजी नाव खेती हुई
चप्पू हिलाता है नाव को
हर पल वह दो कदम आगे बढ़ रही
बच्चा सामने है
दोनों की आँखें जुड़ी हुई
खुशी से हिलती है झील
हवा सरकती है धीरे-धीरे
किसी ने किसी को पुकारा नहीं
वे दोनों निकल चले आये ठीक समय पर
यही है यहाँ की दुनिया।

 

 

 


पिता के लिए प्रार्थना

मैं प्रतिदिन तेरे द्वार पर आता रहा
और निराश होकर लौटता रहा
इस आशा में कि एक दिन
तू जरूर मेरी तरफ देखेगा
और अपने सर्वव्यापी हाथों से
मेरे आँसू पोंछेगा
विदा करेगा मुझे
अपना दुर्लभ प्रसाद देकर
लेकिन मेरी आशा
रोज मेरे पिता की रुगण शैया
के आस-पास दम तोड़ती रही और
तुम्हारी धरती नाराज होकर रूठी रही
उन्हें पाँवों से खड़े होने का
सहारा तक नहीं मिला
अनगिनत दिन बीत गये
मैं ठीक से समझ भी नहीं पाया
कि तू मेरी परीक्षा ले रहा है या
यह कोई तेरा बहाना है
मुझे अपने पास बुलाने का
अगर तू मेरी प्रार्थना से
थोड़ा-सा भी खुश होता है
तो यह खुशी मेरे पिता के
चेहरे पर बिखेर दे

मेरी आँखें तेरी इस परम अनुकम्पा से
सन्तुष्ट हो जायेंगी।

 


 

 

 

 

 

 

 

मुलाकात के बाद

जब मैं चीजों को समझता हूँ
वे कभी सुव्यवस्थित दिखाई नहीं देतीं
सभी में रुखड़ापन उजागर होने लगता है
एक दिन सब कुछ सही हो जाएगा,
उम्मीद छोड़ देता हूँ इसकी।
मैं अब किसी से भी मिलकर
उतनी संतुष्टि से विदा नहीं हो सकता
कुछ न कुछ छूट ही जाएगा कहना
एक बार में खेत, खोद नहीं डालते हल
हर बीज को खुली मिट्टी और हवा चाहिए
मैं इसी तरह से खुलता हूँ
फिर ढक लेता हूँ अपने आपको
इस तरह से धीरे-धीरे वृहद हो जाता हूँ मैं
मैं यहाँ मौजूद हूँ और सबको प्यार बाँटता हूँ
इस तरह से मेरा हृदय हमेशा सक्रिय रहता है
हमारी इस मुलाकात के बाद थोड़े से हम स्थिर हुए
थोड़े से हम बदल गए।

 

 


सेल्समैन

वह कितना प्रभावहीन था
जब आया था मेरे पास
 
-देखते-देखते
तन गया था उसका पूरा शरीर
एक योद्धा की तरह
उसने रख दी थी नजरें मेरे चेहरे पर
मानो वह मेरा ही मुखौटा हो

-तर्कपूर्ण बातों से
कसता जा रहा था मुझे
एक शिकंजे में
वह वही बोल रहा था
जो मैं सुनना चाहता था
वह वही समझा रहा था
जो मैं समझना चाहता था

हाव-भाव सभी सतर्क थे
तत्पर थे पूरा करने के लिए
जो वह करना चाहता था
दौड़ रहा था आत्मविश्वास
उसके रग-रग में
जिसने पैदा कर दिया था

मुझमें ऐसा विश्वास
मानो वह मेरा बहुत
पुराना मित्र हो

उसके कपड़े-जूते चेहरे सब
चमकने लगे थे एक तेज से
जिनके आगे मैं झुकता
चला जा रहा था
जबरदस्ती नहीं, खुशी से

अंत में वह हँसा
मानो जीत लिया हो उसने
जो वह जीतना चाहता था

वह एक अच्छा
सेल्समैन था!

 

 

 

 

अनुभूतियाँ
 
सचमुच हमारी अनुभूतियाँ
नाव के चप्पू की तरह बदल जाती हैं हर पल
लगता है पानी सारे द्वार खोल रहा है खुशियों के
चीजें त्वरा के साथ आ रही हैं जा रही हैं
गाने की मधुर स्वर लहरियाँ गूँजती हुई रेडियो से
मानो ये झील के भीतर से ही आ रही हों
हम पानी के साथ बिलकुल साथ-साथ
और नाव को धीरे-धीरे बढ़ाता हुआ नाविक
मिला रहा है गाने के स्वर के साथ अपना स्वर
और हम खो चुके हैं पूरी तरह से,
यहाँ की सुन्दरता के साथ।
 


 

 

 

 

 

तुम्हारी थकान

इधर तुम काम बन्द करते हो
उधर सूरज अपनी रोशनी
चारों तरफ अँधेरा छा जाता है
और तुम्हारी थकान
जलने लगती है
एक मोमबत्ती की तरह!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गेहूँ के दाने

ये दाने गेहूँ के
जो अभी बन्द हैं
मेरी  मुट्ठी में
थोड़ी-सी चुभन देकर
हो जाते हैं शान्त
अगर जो ये होते
मिट्टी के भीतर
दिखला देते
मुझे ताकत अपनी ।

 

 

 

 

 

 

 

आधुनिकता

ये कितने ही अनजाने चेहरे
जिन्हें हम देखते हैं रोज
कितनी ही बार उनके पास से गुजरते हैं
कभी साथ भी बैठ जाते हैं
सफर में-
लेकिन हममें दूरियाँ हैं
नीचे से ऊपर तक की
दूरियाँ सपने और वास्तविकता जितनी।
सभी का मिलन संक्षिप्त होता है
टुकड़ों-टुकड़ों में बनते-बिखरते संबंध
और साँसों का प्रयास
कि जल्दी ही हम अपने काम पर पहुँचें।
किसी ने गिरे हुए आदमी की मदद की
यह उपकार थोड़ी देर में खत्म हुआ
और भूल गए लोग सारी गाथा।
एक कहानी से कुछ सबक लिया गया
फिर वो किताब खुली ही नहीं वर्षों तक।
दिन के उजाले कितना ही प्रकाशित कर दें
कितनी ही सारी चीजों को
आधुनिकता हमें बहुत कम देर ही
ठहरने देगी उस छोर तक।
प्यार से देखता हूँ एक पल इस तोते को
मुस्कान से वो चोंच खोल देता है
मेरी खुशी को वो देखे
उससे पहले ही मैं उससे दूर चला जाता हूँ।


डायरी में

आज चारों तरफ कितना खाली है
कहीं भी जा सकता हूँ मैं आसानी से
कितना तरल हो गया हूँ मैं
कि किसी लैम्प की रोशनी भी मुझे नहीं रोकती
न ही ये पैदल सवार या गाड़ियाँ
सभी से जैसे भिन्न हूँ मैं
सड़क पर पानी की तरह बहता हुआ
कोई खुशी छू चुकी थी मुझे कभी की
अब मुझे उसका पता चला,
एक नशा सा पूरे शरीर में
मन करता है इसे बस सँभाले रहूँ
इसी में डूबा रहूँ
रुकता हूँ तो बस सारे सोच बंद
सपनों की सवारी से बाहर आ गया हूँ जैसे
लिख सकता हूँ आज की रात मैं यही बात
सोने से पहले
अपनी इस डायरी के पन्ने में।

 

 


रेगिस्तान

रेगिस्तान हो या पथरीले पहाड़
हरियाली फूटकर बाहर आ जाती है
जैसे वे आत्मा के रंग ही हों
थोड़े-थोड़े हरे रंग भरे हुए यहाँ
जिन्हें कभी ओस नसीब नहीं होगी
न ही बारिश।
फिर भी ये धीरे-धीरे बढ़ते रहेंगे
चमकते रहेंगे हमारी आँखों में समाकर।
जीवन एक से निकलता है
समा जाता है दूसरे में
यहाँ सुनसान सी दुनिया
रेत में भी रेत के कण उड़ते हुए
थोड़े से लोग मौजूद
बाजार से ऐतिहासिक चीजें खरीदते हुए
यहाँ के बाजार कभी नहीं बदलेंगे
वे छोटी-छोटी चीजें ही हमेशा बेचेंगे
और मेरे हाथों में जो तस्वीरें हैं
इन पुरानें अवशेषों की
यह  इतिहास का एक पन्ना है
जिसे कागज में सुरक्षित
ले जा रहा हूँ वापस ।

आवरण

अचानक कोई जाग जाएगा
और देखेगा जो उसने खोया था
पा लिया है
और हर पायी हुई चीज को
रखना पड़ता है सुरक्षित अपने पास ही
और संचय  पुराने होते जाते हैं
समय उन्हें ढकते चला जाता है
आवरण पर आवरण
और जीवन के आवरणों से ढकी हुई चीजों से
किसी बहुमूल्य को निकाल  लेता हूँ एक दिन
सारी सफाई के बाद एक उत्तम खनिज
जीवन के किस रस में ढालना है इसे
अब यह हमारी बारी है।

 

 

 

 

 

कबूतर

तालाब सूख गये हैं गर्मी से
और ये कबूतर पानी भरी बाल्टी से
बुझा रहे हैं अपनी प्यास
अभी थोड़ी देर पहले ही
दाना खाया है इन्होंने
और उड़ रहे हैं मंदिर की चारों ओर ।

तपती धूप में चमकता है
मंदिर का गुम्बज
और कौओं के लिए
कोई भोजन नहीं यहाँ
ये कबूतर ही हमेशा दोस्त रहे मंदिरों के
कहीं न कहीं इनकी जगह है
दीवारों में रहने की
और ये सीधे-साधे पालतू,
हाथ की अँगुलियों तक पर
बैठाया जा सकता है इन्हें।

 

 


पत्नी के जन्म दिन पर

कविता न लिख पाया
जो लिखनी थी
आ गया पहले ही
तुम्हारा जन्मदिन
पूछता कहाँ है-
वह तोहफा
शब्दों से भरा
वाक्यों से सजा
थरथरा रहे
जिसे पाने हेतु
मेरे होठ
रोमांच जाग रहा
कौतूहल की माँद में
माँग भी चमक रही
चेहरा भी हुआ लाल
कहाँ है वह?
सुनकर तेरी बातें
आँखें मेरी झुक आयीं
कविता लगी
पंख फड़फड़ाने
किन्तु लिखूँ किस भाव से
जब सब कुछ
सौंप दिया है तुम्हें आज।   ु

घटित होती हुई साँझ

साँझ से पहले हमें वहाँ पहुँचना है
और देखेंगे हम सूर्यास्त।
यह किनारे की भूमि
जहाँ से धीरे-धीरे सागर में अस्त होता है सूरज,
बस आखिरी किरणों की झलक
नारियल के दो पेड़ों पर
जिनके बीचोंबीच से गुजरती हुई छोटी सी नाव।
हमारी हर पल दृष्टि नाव पर
मद्धिम होती जा रही है जिसकी झलक
बैठा हुआ आदमी उसमें
दिखाई देता है जैसे बिंदु पेंसिल का।
किरणों का गिरना और उठना लहरों पर
और लौटते हुए पक्षियों की परछाई का स्पर्श जल पर।
यहाँ से कितने सारे पक्षी उड़े
सबने वापसी दर्ज की लौटने की,
अंतिम पक्षी की उड़ान के साथ
अस्त होता हुआ सूरज
चारों तरफ अँधेरे की लकीरें
अपना काला रंग भरती हुई
और हमारी उत्सुकता खत्म हो चुकी है अब।


प्रशंसा

मैं कर सकता था प्रशंसा सबकी
एक बालू के कण से लेकर वृहद आकाश की
सब में हवा बनकर जिया था मैं
कहीं न कहीं इन सब में था मौजूद
क्योंकि जब भी बैठा था मैं इनके पास
पूरी तरह था इनका ही
और उनके ही कर्म बस शब्द थे मेरे
ये ही पैदा कर देते थे तरंगें मेरे मन में
जैसे तट के ही छोटे पत्थर नदी के जल में।

 

 

 

 

 

 

 

विश्वास

मुश्किलों से लड़ने के लिए
कोई अस्त्र नहीं है मेरे पास
अस्त्र के नाम पर
सिर्फ एक विश्वास है
हर लड़ाई में मैं
उसे ही बचाने की कोशिश करता हूँ
क्योंकि यही मुझे बचाये रखता है ।


 

 

 

 

 

 

 


काँटा

एक बार नहीं अनेक बार
वह घुसा है चोर की तरह
तालाब के शान्त पानी में
और देखते-देखते
चुराकर लाया है एक मछली
बहुत सारी मछलियों के झुण्ड से
फिर भी अनजान रहीं मछलियाँ
चुप रहीं मछलियाँ
थामा उसका हाथ हमेशा
कोई अपना प्रिय समझकर

 

 

 

 

 

 


हाथ

सभी संसर्ग जुड़ नहीं पाते
अगर ऐसा हो तो फिर ये अंगुलियाँ
अपना काम कैसे करेंगी।
मैं कभी-कभी मोहित हो जाता हूँ
आटा गूँधने की कला पर
जब सब कुछ एक साथ हो जाता है
जैसे सब कुछ एक में मिल गया हो
लेकिन आग उन्हें फिर से अलग करती है
हर रोटी का अपना स्वरूप
प्रत्येक के लिए अलग-अलग स्वाद।
मैं अजनबी नहीं हूँ किसी से
जिससे थोड़ी सी बात की वे मित्र हो गए
और मित्रता अपने आप खींच लेती है सबों को
दो हाथ टकराते हैं जीत के बाद
दोनों का अपना बल
और सब कुछ खुशी में परिवर्तित हो जाता है।

 

 

 

नफरत

फँसने के बाद जाल में
कितना ही छटपटा ले पक्षी
उसकी परेशानी हमेशा बनी रहेगी
और उड़ान छीन लेने वाले हाथों से
प्राप्त हुआ भोजन भी स्वीकार करना होगा।
जिसने हमें जल पिलाया
भूल जाते हैं हम उसके दिए सारे क्लेश
और जो सबसे मूल्यवान क्षण हैं खुशियों के
वे हमेशा हमारे भीतर हैं
बस हमें लाना है उन्हें
कोयल की आवाज की तरह होठों पर।
जल की शांति हमें अच्छी लगती है,
जब बहुत सारी चीजें प्रतिबिम्बित हो जाती हैं उसमें तब
लहरें नफरत करती हुई आगे बढ़ती हैं,
किनारे पर आकर टूट जाता है उनका दम्भ।
धीरे-धीरे सब कुछ शांत
चुपचाप जलती मोमबत्ती में
मेरे अक्षर हैं इस वक्त कितने सुरक्षित।

 

 

समुद्र के किनारे

कितने सारे पेड़ चाहिए नारियल के
इस प्रदेश को हरा-भरा दिखने के लिए
और बगल से, वेग से आगे बढ़ता पानी समुद्र का
जिस पर जलते हुए सूर्य की चिंगारी ठंडी होती हुई।
इस रेतीले तट पर निशान ही निशान लोगों के
जैसे सभी को पहचान दे सकती हो यह जगह।
हवा उठती है बार-बार लहरों की तरह
मेरे पंख हों तो मैं भी उड़ चलूँ।
चारों तरफ यात्री ही यात्री
और सामने सूचना पट पर लिखा है
खतरा है पानी के भीतर जाने से
और एकाएक अनुशासन को टटोलता हूँ
मैं अपने भीतर।
और यकीन करता हूँ कि
खुशियों के साथ इनका भी कुछ संबंध है।

 

 

 


सृजन रुकता नही

काफी तेज बारिश हुई है
लगा एक मुश्किल समय सामने है
फूलों की मुश्किल कि उन्हें धोने की जरूरत नहीं थी
और बेवजह उनके धुले चेहरे मुर्झाने लगे
इतना अधिक पानी कि पत्ते जरूर चमकने लगे।
सभी तरफ से घिरे बादल भी
रोशनी को नहीं रोक सकते
मैदान जल से भरे हुए
अब लोग क्या काम करें
वे चुपचाप थके हुए से
धूप का करते हुए इंतजार
गुलाब के काँटे बिलकुल धारदार
पत्तों की नोक तक दिखती है
पक्षियों के बिना सूना आकाश
फिर भी सृजन रुकता नहीं
घास में हरियाली पहले से अधिक असरदार।

 

 

 

कीड़े

जब कीड़े घुस जाएँ फल में
क्षीण हो जाता है उसका मूल्य
और जो मूल्यहीन है
फेंक दिया जाता है बाजार में।
हमने देर लगा दी
नष्ट होते हुए को देखने में
नाव में कब सुराख हुआ
मालूम ही नहीं पड़ा।
अपनी चलनी को बचाकर रखना है
तभी घुलेगी आटे की मिठास जीभ पर
जख्म हुए तो पाँव में वेदना की चुभन
और निहायत जरूरी है
लोहे के बक्से तक को मजबूत रखना
मधुमक्खी अपने डंक लेकर हमेशा सावधान है
सावधान है वह भीड़
जो बार-बार तालियाँ बजा रही
लेकिन उतने सावधान नहीं
इसे सुनने वाले लोग
कीड़े अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ेंगे।

 

टोपी

तरह-तरह की टोपियाँ
हमारे देश में
सबका एक ही काम
सिर ढकना
-नहीं एक और काम
विभाजित करना
लोगों को
अलग-अलग समुदायों में ।

 


 

 

 

 

 

 

पिता के लिए
हम उड़ेंगे एक दिन आकाश में
और माँग लायेंगे
देवताओं से
तुम्हारे लिए ढेर सारी खुशियाँ
रंग-बिरंगे सपने
और हँसता- खेलता स्वास्थ्य तुम्हारा
पिता फिर तुम मुस्कुराना
और तुम्हारी हँसी
बदल जायेगी हमारी हँसी में
जिसके बीच छुप जायेगा
हमारा अन्धकार तुम्हारे प्रकाश में
पिता इस प्रकाश के बीच
हमारे हृदय से झरेंगे
बहुत सारे श्रद्धा के फूल
नये-नये गीत प्रार्थना के
और प्रेम हमारा धूप की तरह
बिखरता जायेगा तुम्हारे चरणों में
तुम इन्हें देखो  और कुछ कहो
इससे पहले ही
हम खुशियों के आँसू बनकर
बस जायेंगे तुम्हारी आँखों में
तुम हँसो इससे पहले ही
हम मौजूद होंगे
कहीं न कहीं तुम्हारे होठों में
पिता तुम हमसे
कुछ कहो चाहे न कहो

हम मौजूद रहेंगे
हमेशा तुम्हारे साथ
एक साये की तरह ।

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किताब

अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद
एक किताब लिखी जाती है
अनगिनत सीढ़ियाँ उतरने के बाद
एक किताब समझी जाती है।

 

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-समाप्त-

पुस्तक समीक्षा - 

समीक्ष्य पुस्तक --सपनो के वातायन [कविता संग्रह \

कृतिकार --पद्मा मिश्रा

प्रकाशक -सारस्वत प्रकाशन

मुल्य -१२५ रु


नैसर्गिक मूल्यों की तलाश --सपनों के वातायन

कविता साहित्य की सर्वाधिक  एवं बहुचर्चित विधा रही है ,इसकी अनगिन परिभाषाएं की गई हैं ,कुछ भावकों ने इसके कलापक्ष को और कुछ ने भाव पक्ष को अधिक महत्त्व दिया है ,कविता में कला और भाव का संतुलित प्रयोग हो ,यह एक बहु मान्य सिद्धांत रहा है ,

मई विश्व हिंदी सम्मेलन ,सूरिनाम [दक्षिण अमेरिका ]गया था ,वहाँ भारतीय एवं विदेशी विद्वानों से भेंट हुई थी ,कुछ लोग कविता ,विशेषतया हिंदी कविता के वर्तमान स्वरूप से चिंतित थे उनकी चिंता का कारन था -कविता का गद्यनुमा हो जाना ,सपाटबयानी से कविता को अखबारी समाचार बना देना अश्लीलता की बढती प्रवृत्ति --और कविता को वाद विशेष का घोषणापत्र बना देना इत्यादि।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में कविता को केवल ''वाणी का अमृत ''कह कर ही नहीं रहा जा सकता ,--वह समाज का दर्पण भी है --संघर्ष का पाथेय  भी है ,पर साथ ही उसका उद्देश्य लोक मंगल भी होना चाहिए ,मानव कभी रोबोट नहीं बन सकता ,जब तक मानव है ,उसकी संवेदनाएं भी साथ रहेंगी ,और उसका नैसर्गिक सौन्दर्य बोध भी उसे यंत्र मानव बनाने से बचाता रहेगा ,आजके सन्दर्भ में पद्मा मिश्रा की कवितायेँ इन्ही मानवीय पक्षों और नैसर्गिक मूल्यों की तलाश में प्रयासरत हैं ,ये कवितायेँ जीवन के हर संघर्ष में -सुख दुःख -हर्ष ,विषाद - के पलों में संजीवनी हैं ,उर्जा हैं -हर निराशा के अंधकार में राह दिखाती रौशनी की तरह। +प्रस्तुत संग्रह में कुल ८८ कवितायेँ हैं -कुछ शीर्षक हैं -तुम छू लो ,राष्ट्र वन्दना ,बेटियां ,--धरती के भींगे अंतर में ,--यह दिया विश्वास का। ।'टिस्को तेरे नाम जिन्दगी ,--अक्षर कुम्भ से लौट कर ,आदि --स्पष्ट है ,कुछ कवितायेँ भाव प्रधान हैं ,-कुछ में यथार्थ मुखरित है ,कुछ कवयित्री के निजी अनुभवों आधारित हैं ,और इन रचनाओं में भाव वैविध्य है ,

कवयित्री जहाँ नैसर्गिक सुषमा से प्रभावित होती है ,वहीँ वर्तमान समाज की विद्रूपता का विरोध भी करती है ,उसकी भाषा भवनुगामिनी होने के कर्ण सहज सवेद्य हो उठती हैं ----''बीते कल की मनुहार लिए ,

स्वागत का आगत भर लिए

गुण गुण करता ,

गीतों में राग विराग लिए

बासंती  मन क्या गाता  है ?

पद्म में एक भावुक ,संवेदनशील ,मानवीय अनुभूतियों से युक्त ,विकास शील कवयित्री के सभी गुण विद्यमान हैं ,उच्च शिक्षा प्राप्त और साहित्य की सभी विधाओं से परिचित पद्मा छोटे छोटे बिम्बों और प्रतीकों द्वारा बहुत कुछ कह जाती है -

''दहलीज पर खड़ी ओउरत   क्या सोचती है ?--                                    नम आँखों सेनिहारती ,

आकाश का कोना कोना

उड़ने को आकुल -व्याकुल

पंख तौलती है -तलाशती है राहें -

मुक्ति के द्वार की ,

कभी कभी प्रेम नारी जीवन में एक पूरक रूप में सामने आता है --

तुम कोई गीत लिखो और मैगाऊँ 

तुम लिखो धूप -छाँव सी कोई कविता

औरमै शब्दों की रंगोली बनाऊं                               --

कुल मिलकर यह एक पठनीय व् संग्रहनीय कविता संग्रह है ,आशा है भविष्य में और अधिक भावपूर्ण जीवन से भरी हुई रचनाएँ कवयित्री की लेखनी से प्राप्त होंगी

मैं इस कृति का साहित्य जगत में स्वागत करता हूँ ,

 

-----डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

जमशेदपुर -१३ --संपर्क ---0657 237089



कवयित्री --पद्मा मिश्रा

 

जमशेदपुर -13

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साहित्यिक मूल्यवत्ता के निकष पर ’16 आने 16 लोग

-डाॅ. सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी.लिट्.

साहित्य की सभी विधाओं में जीवन सत्य की शब्दार्थमय अभिव्यक्ति समाहित होती है। जीवनी या जीवन चरित के रूप में लिखा गया साहित्य अतीत के अनुभव और वर्तमान के विकास का आलोक होता है। इसमें मनुष्य की जीवन दृष्टि विकसित करने की क्षमता होती है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने अपने साहित्यिक निबन्धों से तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के जीवनी-लेखन को समृद्ध किया है। सत्ता हमेशा साहित्यकार की स्वतंत्र चेतना को बाधित करती है पर प्रशासन में बैठकर भी अपनी अनुभूतियों को स्वतंत्र रूप में व्यक्त करना दुःसाध्य कार्य है। ऐसे में एक तरफ कृष्ण कुमार यादव प्रशासकीय अनुभवों से लेखकीय उर्जा सहेजते हैं तो दूसरी ओर उनके जीवन में साहित्य की उपस्थिति सदैव अन्र्तमन में एक शक्ति जगाती है। उनकी पुस्तक ‘’16 आने 16 लोग‘’ में संकलित 16 महान चरित्र नायकों की जीवनियाँ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषताओं के अधिकार पूर्ण विवेचन से समृद्ध हुई हैं । इन विवेचनों में मात्र जन्म और जीवन का परिचय ही नहीं है, अपितु इनमें तत्कालीन समय और समाज को प्रभावित करने वाले साहित्यिक अवदानों, चिन्तन को प्रेरणा देने वाले आत्मीय तत्वों तथा जिनके संबंध में लिखा जा रहा है, उनके निष्कर्षों, स्थापनाओं और मान्यताओं का प्रामाणिक विमर्श प्रस्तुत करना भी लेखक की दृष्टि में रहा है, जो साहित्यिक गुणवत्ता के निकष पर 16 आने खरा है।

‘’16 आने 16 लोग‘’ पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर 16 साहित्य-मनीषियों के सुन्दर चित्र हृदय को छू गये। वर्तमान में जब हम आत्मश्लाघा में डूबे हैं, ऐसे में साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्रों की पावन स्मृति मन को सांत्वना देती है कि अभी भी साहित्य के पुरोधाओं का स्मरण कर हम उनकी कृपा से ज्ञान के कुछ कण प्राप्त कर सकें। पुस्तक में समाहित अध्यायों के शीर्षक लाजवाब हैँ। कथ्य में, भाव भंगिमा में और मनीषियों के व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करने वाले। शीर्षक भर से ही तद्नुसार इन साहित्यकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व की झलक दिखाई देती है, जो पाठकों को इन लेखों को अंत तक पढ़ने के लिए विवश करते हैं।

इस संकलन का पहला निबन्ध है, ‘कवींद्र-रवींद्र और उनका विमर्श।इस विमर्श को लेखक ने बहुवस्तुस्पर्शी ज्ञान और कर्म के निकष पर सराहने का प्रयत्न किया है। उसके अनुसार भारतीय संस्कृति के शलाका पुरूषों में रवींद्र नाथ टैगोर का नाम प्रतिष्ठापरक रूप में अंकित है। साहित्यकार, संगीतकार, लेखक, कवि, नाटककार, संस्कृति कर्मी एवं भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता के अलावा उनकी छवि एक प्रयोगधर्मी और मानवतावादी की भी है। इस वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए इस लेख में गुरूदेव को आध्यात्म और दर्शन का विशिष्ट चिंतक माना गया है। तत्कालीन भारत के सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को प्रभावित करने वाले अनेक कार्यों का, उनके साहित्य का, उनके लिए अनेक देशी और विदेशी विद्वानों के कथनों का तथा उनकी स्थापनाओं का विस्तृत वर्णन बहुत ही रोचक शैली में, कृष्ण कुमार यादव ने किया है, जो उनकी लेखकीय प्रतिभा का प्रमाण है।

‘‘16 आने 16 लोग‘‘ में सामाजिक सरोकारों के कवि नागार्जुनको साहित्य और संवेदना का विलक्षण रचनाधर्मी मानते हुए कहा गया है कि वह अपने फक्कड़ मिजाज, यायावरी ठेठ लहजे, और बेलौस कविताई के लिए प्रसिद्ध थे। वह हमेशा लोक चेतना व संघर्ष के साथ चले और सदैव शोषित मानस का पक्ष लिया। इस निबन्ध में लेखक ने इस महान व्यक्तित्व को विश्लेषित करते हुए उनकी रचनाओं के संदर्भों से प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है कि उनमें राजनीति से लेकर समाज, प्रकृति, संस्कृति, व्यंग्य, दलित, किसान, आदिवासी, स्त्री आदि सभी तबकों और समस्याओं के लिए सह आनुभूतिक संवेदना के भाव व्याप्त थे।

महाप्राण निराला के अंतर्मन में करुणा का अपार-भाव तरंगायित था। प्राणिमात्र के प्रति उनकी सहृदयता का वर्णन करते हुए सोलह आने का सच लेखक कहता है कि निराला जितने हृदयवान कवि थे, उतने ही सुन्दर मानव भी थे। मनुष्यता का अपमान वे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वे गरीबों और शोषितों के प्रति काफी उदार व करूणामयी भावना रखते थे और दूसरों की सहायता के प्रति सदैव तत्पर रहते थे। इस लेख में निराला की शक्तिपूजा का भी उल्लेख किया गया है और छायावाद के प्रणेता के रूप में उनका स्मरण किया गया है।

प्रेमचंद के सामाजिक व साहित्यिक विमर्श के बहाने उनके जीवन के अंतरंग प्रसंगों का वर्णन करते हुए अनेक अधूरे संदर्भों को कृष्ण कुमार यादव ने अपने आलेख में लिखा है। वह कहते हैं कि प्रेमचंद का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और साम्प्रदायिक वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जिसमें समता सर्वोपरि हो। प्रेमचंद प्रगतिशील साहित्यकार थे। उनका कथा साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भी प्रासंगिक है।

’’16 आने 16 लोग’’ में समाहित इन निबंधों में युग प्रवृत्ति को परिवर्तित करने वाले प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय को अभिनव प्रयोगों का यायावर कहा गया है तथा उनके प्रदेय को साहित्येतिहास में महत्वपूर्ण बताया गया है। भागो नहीं दुनिया को बदलोका नारा देने वाले घुमक्क्ड़ साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यायन को चिंतन प्रधान लेखन का स्तंभ कहा है तथा उनके सांस्कृतिक प्रदेय को अविस्मरणीय बताते हुए तिब्बत से दुर्लभ साहित्यिक धरोहरों को भारत लाने का श्रेय भी दिया गया है।

इन निबन्धों में सृजन के रचनात्मक पुरोधा, सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित पत्रकार, अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी का स्मरण एक निर्भीक और निष्पक्ष साहित्यकार के रूप में किया गया है। अपने इस आलेख में कृष्ण कुमार यादव ने कहा है कि प्रताप के माध्यम से विद्यार्थी जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाइयाँ दी, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच से ही अंततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।

साहित्यकार और साहित्य के प्रखर और प्रमुख प्रणेताओं की कृतियों का तथा उनके जीवन प्रसंगों का परिचय कराते हुए प्रमुख रचनाकारों को इस पुस्तक के निबंधों में प्रमुखता से याद किया गया है। इनमें क्रान्तिधर्मी रचनात्मक बेचैनी के प्रतिनिधि कमलेश्वर, उत्तर आधुनिकता के पक्षधर मनोहर श्याम जोशी, साहित्य की अनुपम दीपशिखा अमृता प्रीतम, साझी विरासत की कड़ी कुर्रतुल ऐन हैदर, हरफनमौला कैफी आजमी, इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने वाले कुँवर नारायण एवं सदाबहार गीतकार नीरज का वर्णन साहित्यिक उपलब्धियों का परिचय कराते हुए बहुत ही सजीवता के साथ किया गया है। पाकिस्तान में पैदा हुए अहमद फराज का इंसानी ताल्लुक और कश्मीर की सूफी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि अब्दुल रहमान राही का साहित्यिक रचना संसार भी इस आयोजन का विषय बना है।

कृष्ण कुमार यादव ने अपने इन निबन्धों में 16 साहित्यकारों व विचारकों की जीवन वृतान्तिक स्थितियों के साथ ही उनके कृतित्व का समीक्षात्मक अवलोकन भी किया है। कदाचित उन्होंने इस तथ्य के आलोक में यह सृजन किया है कि कृति-कृतिकार की उपलब्धि है और प्रत्येक उपलब्धि जीवन वृत्त से विकसित होकर ही उसके अंग की पूर्ति करती है। इसीलिए इन लेखकीय संदर्भों में साहित्य के जीवन सापेक्ष्य सौन्दर्य का अवलोकन करते हुए मानवीय पक्षधरता के अनेक आयामों का शोध पूर्ण एवं गुणवत्तापरक अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है जो 16 आने सफल है।

इस पुस्तक के लेखन में कृष्ण कुमार यादव ने विभिन्न संदर्भों व घटनाओं को जोड़ते हुए उन्हें आज के समाज से भी जोड़ा है। इसे पढ़कर अनेक अधूरे संदर्भों से परिचय भी मिला और कृष्ण कुमार यादव की लेखन-क्षमता का विस्तार भी। प्रस्तुति और प्रयोग की दृष्टि से यह एक बेहद पठनीय और संग्रहणीय कृति है। मुद्रण भी आकर्षक एवं साफ-सुथरा है। अंततः 16 साहित्यकारों-मनीषियों के कृतित्व-व्यक्तित्व को सराहती यह पुस्तक वाकई काफी शोधपरक एवं दस्तावेजी संग्रह है।

 

पुस्तक - 16 आने 16 लोग

लेखक - कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001 kkyadav.t@gmail.com

पृष्ठ - 120/मूल्य - रू0 250/- संस्करण - प्रथम 2014

प्रकाशक - हिन्द युग्म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016

समीक्षक: डा0 सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी.लिट्., 119/501, सी-3, दर्शनपुरवा कानपुर-208012, मो0- 9839202423

ह तो हम पहले कह चुके हैं। गिरोहों के पीछे मत पड़ो। पर पुलिस वाले मानते कहाँ हैं। कहते हैं -'हम गिरोहों को पकङेगें। उनकी ऐसी -तैसी करके रख देंगे। देखते हैं कैसे बचते हैं बच्चू। 'गिरोह तो गिरोह है। समाज के खरपतवार। एक मिटता है ,दूसरा सक्रिय हो जाता है। पुलिस वालों की नाक के नीचे। थाने के सामने वारदात कर जाते हैं। वह भी सरेआम। पुलिस है कि अपनी पीठ थ पथपाती है ,'इलाके में शांति है। 'शांति तो थाने परिसर में रहती है। जहाँ लोग प्यार से हलाल होते हैं। उफ़ !तक नहीं करते।

हम लोकतान्त्रिक शैली में पहले भी कहते थे। अब भी कहते हैं। भविष्य में भी कहते रहेंगे की गिरोहों को फलने -फूलने दो। उनके पेट पर लात काहे मारते हो। साहब हमें गुप्त सूत्रों से पता है। पुलिस दुनियां के सामने उन्हें गिरफ्तार करती है। ठुकाई करती है पर वास्तव में उनसे ला भ का हिसाब बैठाती है।

यह बात तो सच है। हर नम्बर दो के काम के लिए पुलिस का सहयोग जरुरी है। ऐसे सहयोगियों का भी अपना एक गिरोह है ,जो गिरोहों को असामाजिक से सामाजिक होने का प्रमाण -पत्र देते हैं। साहब गिरोह चलना सहज काम नहीं है। बिलकुल फैक्टरी चलने जैसा है। आपके पास साहस ,क़ानून को खरीदने के लिए धन -बल। आतंक मचाने के लिए हथियार और टारगेट को स्कैन करने की क्षमता होनी चाहिए। इनमें भी प्रमोशन की व्यवस्था होती है पर खास बात यह है कि इनमें सामाजिक मतभेद प्रदाता आरक्षण लागू नहीं होता ,जिसके लिए संसद में पक्ष और विपक्ष में घमासान मचा है।

हर प्रगतिशील व्यवस्था के दो मायने होते हैं। लाभ -हानि की व्यवस्था। व्यवस्था की एक टांग पर कौन खड़ा हो सका है

गिरोहबाजी बड़ा रिस्की व्यवसाय है। किरन या गल्ला का धंधा नहीं है। माल नहीं बिक तो औने -पौने किसी को भी थमा दो। मगर गिरोह कौन खरीदेगा ?

साब गिरोहों का केवल आंतक पक्ष मत देखिये। हम तो यही कहेंगे कि उससे उत्पन्न लाभ भी देखिए। कहते हैं जहर जीवन भी देता तो मौत भी। वाही कुछ बात है गिरोहों की। देखिए साब ,आपकी औलाद परीक्षाओं में कई वर्षों तक लुढ़कती जाए तो आप क्या करेंगे। या तो औलाद का जीना हराम कर देंगे या सर पर हाथ रखकर बैठेंगे।

पर आप चिंता न करें। परीक्षा में सफलता हासिल करके रहेगी आपकी औलाद। बस आप परीक्षा में सफलता दिलाने वाले गिरोह से मधुर सम्बन्ध बनाइये।

साब आपको सफलता कैसी चाहिए ?फर्जी अंकसूची वाली या मुन्नाभाइयों की सहायता से वास्तविक अंकसूची। आजकल ऐसी ही अंकसूची ,जाति प्रमाण पत्र व् अन्य प्रमाण पत्रों का बोलबाला है।

इसी तरह एक गिरोह होता है लाइसेंस व परमिट बनाने वाला। आप सरकारी दफ्तरों में दर्जनों चप्पलें घिस चुके होते हैं। तब भी वहां के अधिकारी कर्� ��चारी आपको शक की नजर से देखते हैं। हम बताते हैं। आप बेवजह के पचड़े में न पड़े। लाइसेंस परमिट निर्माता दलाल से संपर्क साधिए। यार आज अपने पास इतना वक्त कहाँ हैं एक लाइसेंस या परमिट के लिए दफ्तर में कुंडली मारकर बातें रहे कि हम अपने कागजात लेकर ही जाएंगे। ध्यान रहे आपको वहां ऐसे हालत में कुत्ता सूघंने को न आएगा। तो कहे अपनी धुलवाने को सोचते हैं। काम के प्रति जो इज्जत आपको गिरोह देगा। वह और कोई नहीं।

हमने एक गिरोह ऐसा भी देखा है ,जो अफसर ,नेता व रईसजादों की सेवा के लिए बना है। गरम गोश्त का सफ्लायर। रातों को रंगीन व मदहोश बनाने वाला गिरोह। कैसा माल चाहिए। एक फोन कॉल। रेट-वेट तय करो। माल ठिकाने पर हाजिर। वाह कर उठेंगे आप भी अरब के शेखों की तरह।

हम गिरोहबाजों को समाजसेवक कहेंगे जो बड़े लोगों का माल लूटकर छोटे लोगों को सस्ते में सामान उपलब्ध कराता है। समाजवाद लाने का प्रयास। भेदभाव ऊंचनीच की दीवार यहाँ गिरती नजर आती है। वरना छोटे वर्गों के लिए आधुनिक बड़ी चीजें मात्र सपना होकर रह जाती।

पिछले सालों में चड्डी -बनियान गिरोह काफी सक्रिय रहा है पर हो सकता है आधुनिकता आने से इनके ड्रेस कोड बदल गए हों। जींस -टी शर्ट गिरोह हो गए हैं। आखिर देश की अर्थव्यवस्था ,शिक्षा,चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्रों में तो पाश्चात्य रंग बिखर रहा।

हम तो य ही कहेंगे की इन्हे कटु निगाहों से न निहारिये ,बल्कि सम्मान दीजिए। अगर ये न होते तो आप ही बताइये अपनी तरक्की के पथ पर बिखरे कांटे को किससे हटवाते। बताइये ?

--- सुनील कुमार ''सजल''

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अभी  हाथ में न्यूज़ पेपर लेकर बैठा ही था कि  दरवाज़ा जोर जोर से पीटने की आवाज़ आई, मैं समझ गया कि द्विवेदी जी आ गए हैं क्योंकि वही दरवाज़े पर इस तरह दस्तक देते हैं।  वो अलग बात है कि उनकी ऐसी खतरनाक दस्तक मेरे मन में दहशत भर देती है कि वे कहीं दरवाज़े सहित ही अंदर न आ जाएँ अतः मैं भाग कर दरवाजा खोलने के लिए उठा और दरवाज़े के  स्वतः खुलने से पहले ही उसे खोलने में कामयाब रहा।

दरवाज़ा खोलना था कि द्विवेदी जी ने राकेट के जैसे कमरे में प्रवेश किया और सोफे को हिरोशिमा समझ कर  उस पर परमाणु बम की तरह धम्म से गिर पड़े। मैंने दरवाज़ा बंद किया और उनके पास पहुंच कर ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए पूंछा, " कहिये कैसे आना हुआ द्विवेदी जी ?"

उन्होंने मेरे खिचड़ी नुमा इस साधारण से प्रश्न का  मटन कोरमानुमा स्वादिष्ट उत्तर देते हुए कहा, "अजी इधर से गुज़र रहे थे तो सोचा तुमसे मिलते चलें इसी बहाने कुछ गपशप हो जाएगी और चाय पानी भी हो जायेगा। "

अच्छे मेजबान का फ़र्ज़ अदा करते हुए मैं उनके चाय पानी और गपशप की  मांग पूरी करने में लग गया तब तक वो मेज पर रखे पेपर को उलट पलट कर अपनी पसंदीदा खबरे खोज कर पढ़ने लगे।

बहुत सी हेडलाइंस पर अपनी दिव्य दृष्टि दौड़ाते हुए वे एक हैडलाइन पर रुके, हैडलाइन  का शीर्षक था, "शौच को जाती किशोरी से हुआ बलात्कार।" उन्होंने इस खबर को बड़ी ही तन्मयता और रसास्वादन करते हुए पढ़ा और ऐसी ही अन्य खबरों को निपटाने के बाद पेपर एक तरफ रख दिया और चाय उठाकर सिप करते हुए मुझसे बोले, " देश की हालत बड़ी ख़राब है, क्या हो गया है लोगों को?"

मैं समझ गया कि चाय के साथ अब वे गपशप के मूड में हैं अतः सहयोग के लिए बात आगे बढ़ाते हुए बोला, " देश को क्या हुआ द्विवेदी जी?"

इतना पूछना था कि बस उन्होंने कश्मीर से कन्या कुमारी तक और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर तक देश की राजनीतिक व्यवस्था को अपने दस मिनट के भाषण में दही की तरह मथ दिया, जिसका मक्खन की तरह यह निष्कर्ष निकला कि देश की ऐसी दुर्दशा इसलिए है क्योंकि वे राजनेता नहीं हैं और परम्पराओं  व संस्कारों का महत्व ख़त्म होता जा रहा है। हालाँकि मैंने उनके इस प्रवचन का मात्र इतना ही निष्कर्ष निकाला कि उनकी राजनीतिक पिपासा जो पूरी न होने के कारण पीड़ा में बदल गयी, के कारण वे व्याकुल हैं।

उन्होंने कई छोटे मोटे चुनाव लड़े थे लेकिन वे हार गए, जबकि उनमें नेता वाले सारे गुण हैं।  वैसे तो एक नेता निर्गुण, निराकार,निर्विघ्न, निर्भीक और समस्त कलाओं से युक्त होता है लेकिन फिर भी कुछ गुण ऐसे होते हैं जो उसके सफल होने और महान बनने में आवश्यक होते है। जैसे एक अनुभवी नेता, अनुभवी बलात्कारी की तरह होता है जिस तरह एक अनुभवी बलात्कारी बलात्कार के समय अपने अनुभव के  दम पर पीड़िता से भी सहयोग प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार एक सफल अनुभवी नेता जनता के शोषण के समय उसका सहयोग प्राप्त कर लेता है।

एक सफल नेता का चरित्र रुपये के जैसा होता है जो डॉलर के मुकाबले गिरता ही जाता  है और साथ ही निज स्वार्थ के कारण सेंसेक्स की तरह संवेदनशील होता है जो अगर विदेशी बाजार को  छींक भी आ जाये तो चारो खाने चित्त हो जाता है और सबसे बड़ी बात देश में उसकी स्थिति पांच सौ के नोट के जैसी होती है जिसे हर कोई शक की नज़र से देखता है फिर कलेजे से लगा के रख लेता है।

इन सब गुणों के होते हुए भी द्विवेदी जी क्यों सफल नहीं हुए ये शोध का विषय है।  मैं इस शोध में व्यस्त ही था कि  उन्होंने मुझे झझकोरते हुए कहा, " अरे कहाँ खो गए भाई, चलो कहीं टहल के आते हैं "

उनके इस अनुरोध की चासनी में लिपटे आदेश के कारण मैं उनके साथ चल पड़ा।  हम लोग टहलते हुए शहर के एक पार्कनुमा ऐतिहासिक स्थल पर पहुँच कर वहां का नज़ारा लेने लगे, जहाँ की रमणीयता केवल प्राकृतिक वातावरण के कारण ही नहीं बल्कि वहां आने वाले नवयुवती व युवकों के कारण भी आकर्षक थी जो इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुंच कर,  खोह खंडहरों में घुसकर, झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुपकर एक दूसरे के भूगोल  को समझने में लगे रहते हैं।  कभी कभी तो भूगोल का प्रयोगात्मक ज्ञान लेने तक बात पहुँच जाती है अतः यह स्थान द्विवेदी जी को बहुत आकर्षक लगता है।  झाड़ियों के पीछे ऐसे ही रिसर्च वर्क में लगे एक जोड़े को  वे ध्यान से देखने  लगे जिससे उनकी आँखों पर हवस के लाल डोरे तैरने लगे, दृश्य का पूरा अवलोकन करने के बाद वो मेरी ओर पलटे फिर मैंने उनकी आँखों पर पड़े हवस के लाल डोरों को क्रोध के लाल डोरों में बदलते देखा जो शायद इसलिए था कि  वे उस  युवक की जगह क्यों नहीं हैं परन्तु अचानक उन्हें समाज पर ग़ुस्सा आ गया और मुझसे बाले, " देखो समाज कैसे विकृत होता जा  रहा है। स्त्रियां बेशर्म होती जा रही हैं।  उनमे लज्जा व शर्म ख़त्म होती जा रही है।  देश इसीलिए निश्तेज हो गया है क्योंकि यहाँ की स्त्रियों का सतीत्व समाप्त होता जा रहा है।"

उन्होंने आगे बताया की इस देश में फैले अनेक संक्रमण रोगों और बीमारियाँ जैसे- पीलिया, एनीमिया, हैजा, डायरिया, मलेरिया के कारण मौतें इसलिए हो रही हैं क्योंकि व्यक्ति संस्कारी नहीं हैं।

मुझे लगा की यदि ये बात सत्य है तो भारत सरकार को बिना मतलब इतना धन टीकों पर खर्च करने की क्या जरुरत है, अगर संस्कारों का टीका चल जाये तो समस्त परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।

वैसे भी हम भारतीय जन्म संस्कार से लेकर मृत्यु संस्कार और ऐसे ही हजारों संस्कारों और परम्पराओं से घिरे हुए हैं अतः ऐसा टीका लगवाने में किसी को कोई परेशानी नहीं होगी।

वैसे तो हमारा देश परम्पराओं और संस्कारों का धनी  है लेकिन द्विवेदी जी की बातों से मुझे लगा कि देश में संस्कारों और परम्पराओं की हो रही कमी को दूर करने के लिए इसका दूसरे देशो से आयात किया जाना चाहिए, जिसके लिए कुछ ख़ास करने की जरुरत नही है बस जो लोग संस्कारों और परम्पराओं को नहीं मानते हैं उन्हें इसी परम्पराओं के कोल्हू में पेर कर और उनके अंदर भरी मौलिकता तथा नवाचार की एक एक बूँद निचोड़ कर उसे  उन देशो में निर्यात किया जाये जहाँ मौलिकता और नवाचार की मांग है और उसके बदले संस्कारों और परंपराओं का आयात  किया जाना चाहिए और भविष्य में परम्पराओं की रक्षा के लिए नए विचारों पर बांध बनाना चाहिए जिससे संस्कार रुपी बिजली पैदा हो सके।

ख़ैर द्विवेदी जी मुझे परम्पराओं और संस्कारों के मजबूत संरक्षक दिखने लगे, जो इसकी रक्षा के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे थे।  मैंने उन्हें श्रद्धा भरी नज़र से देखा और उनके द्वारा किये गए बलिदानों को याद करने लगा।  जैसे परम्पराओं और संस्कारों की खातिर उन्होंने भाभी  जी को बच्चा पैदा करने वाली मशीन बना दिया जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो सके और आखिरकार छह बेटियों के बाद उन्हें ये सौभाग्य प्राप्त भी हुआ।  ऐसा इसलिए क्योंकि पुत्र और गुरु ये दोनों संस्कार के दो स्तम्भ हैं।  इनकी आवश्यकता बहुत से संस्कारों और परम्पराओं को पूर्ण करने में होती है। जैसे यदि पुत्र नहीं होगा तो अंतिम संस्कार कौन करेगा , गया हांड लेकर कौन जायेगा, मरने के बाद भी क्षुधा शांत करने के लिए श्राद्ध कौन करेगा और रही गुरु की बात तो प्रथम संस्कार से अंतिम संस्कार तक तो उसकी आवश्यकता है ही और वो गुरु ही है जो  ईश्वर के निवास स्थान से पहले पड़ने वाले भवसागर को पार कराने का ठेका लेता है।  दूसरे लोक में दिव्य व्यवस्था जैसे स्वर्ग में कैब्रे करती अप्सराओं का आनंद, सोमरस के आनंद की व्यवस्था गुरु के माध्यम से ही संभव है।

ऐसे ही विचारों में मग्न और द्विवेदी जी के अद्वितीय सांस्कृतिक व्याख्यानों को सुनता हुआ मैं घर आ गया।

द्विवेदी जी की दार्शनिक बातों के बारे में सोचते सोचते और पूरे दिन की हलचल व थकान के कारण मुझे नींद आ गयी।  फिर मैंने एक स्वप्न देखा जिसमें मेरी मृत्यु हो गयी है और देवदूत मुझे लेकर जा रहे हैं फिर उन्होंने फुटबॉल की तरह उठाकर मुझे भवसागर में फेंक दिया लेकिन वहां मैंने ईश्वर की एक विशेष कृपापात्र जानवर की पूँछ पकड़ ली जिसने मुझे वो सागर पार करा दिया उसके उस पार मैंने ईश्वर का निवास स्थान देखा।  मैंने देखा कि भगवान हजारों दलालों और लाखों दासों के बीच घिरा बैठा है। वहां सभी को उनके स्टेटस के हिसाब से आसन  प्राप्त है।

मैंने देखा कि ईश्वर के निकट बैठे एक देवता, जिसके हाथ में कई सारे रजिस्टर थे, ने कहा, " प्रभु इस रजिस्टर में पृथ्वी लोक के आय-व्यय का लेखा  जोखा है, आज्ञा हो तो पढ़कर सुनाऊँ !!"

ईश्वर ने आज्ञा दे दी, उसने पढ़ना शुरू किया, " प्रभु, लगातार व्यय बढ़ने और आय की प्राप्ति घटने के कारण 'भुगतान संतुलन' बिगड़ गया है।  इसके बहुत से कारण हैं जैसे बहुत से भक्त टैक्स चोरी करने लगे हैं, वे उतना चढ़ावा नहीं चढ़ाते जितना उनको चढ़ाना चाहिए और आज कल तो कुछ भक्त नकली सोना चांदी भी चढाने लगे हैं, प्रभु इसके कारण राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है। "

ईश्वर क्रोध में कांपने लगा और बहुत से सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों जैसे अंधे को आँख देने, निसन्तानों को संतान देना, कोढ़ियों को काया देना और निर्धनो को माया देने जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश दिया।

किसी  दूसरे देवता ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा ,"प्रभु , ये भारत वासी बड़े ही कृतघ्न(अहसानफरामोश) हैं, आपने हमेशा जन्म लेने के लिए यही स्थान चुना तथा इस देश में न जाने कितनी कल्याणकारी योजनाएं चलायीं, लेकिन कुछ दुष्ट भारतीय अब दास बनकर या भक्त बनकर नहीं रहना चाहते, वो हर चीज का क्रेडिट आपको नहीं देना चाहते, इन दुष्टों को अब दास बनकर रहना अच्छा नहीं लगता और दबी जुबान से ये स्वतंत्रता की बात करने लगे हैं आपकी पूजा पाठ को कर्म काण्ड कहने लगे हैं अतः प्रभु इससे पहले कि ये लोग आपके द्वारा स्थापित संस्कारों और परम्पराओं को पूरी तरह नकारना शुरू कर दें, आपके जो सचमुच भक्त और दास हैं उन्हें बहला फुसला लें, आप इन दुष्टों को उचित दंड दें। "

फिर एक अन्य देवता खड़ा होकर उत्तेजना में बोलने लगा, " प्रभु , भारतियों में परम्पराओं के बंधन शिथिल होते जा रहे  हैं, खान-पान में तो यह जातिगत बंधन समाप्त ही होने वाला है और अब ये लोग अंतरजातीय विवाह भी करने लगे हैं जबकि आपने सम्भुक का वध करके जातीय व्यवस्था की नींव को मजबूत किया था लेकिन अब ये आदर्श ख़त्म होते जा रहे हैं और प्रभु, सबसे बुरी बात ये है कि आपका डर कुछ मानवों के ह्रदय से समाप्त होने लगा है।  कुछ तार्किक लोग आपके अस्तित्व को तार्किकता और सार्थकता के मानदंडों पर तौलने लगे हैं जो शुभ संकेत नहीं हैं।"

फिर मैंने देखा कि ईश्वर क्रोध में सर्प की तरह फ़ुफ़कारने  लगा, स्वार्थ और क्रोध से भरे ईश्वर ने भयानक गर्जना की जिससे उसी समय मेरा ये भ्रम टूट गया कि ईश्वर निर्विकार अर्थात विकारों से रहित है, मुझे उसमे हजारों बुराइयां दिखने लगीं अतः मैं वहां से आगे बढ़ गया। मैं कुछ दूर आगे बढ़ा था की किसी की चीखने की आवाजें सुनाई पड़ने लगी, मैं भाग कर उस तरफ गया तो एक भयानक दृश्य देखा। वहां मैंने द्विवेदी जी और उन जैसे हजारों लोगों को देखा, इन सभी ने 'यथार्थ' को पकड़ रखा था, वस्त्रविहीन यथार्थ की चीखें निकल रही थीं फिर सभी ने उसे परम्पराओं के बिस्तर पर ज़बरदस्ती लिटा दिया और संस्कारों से यथार्थ के हाथ पैर बांध दिए फिर बारी बारी से यथार्थ का बलात्कार करने लगे। ये हृदयविदारक दृश्य देखकर मैं भाग खड़ा हुआ, मुझे खुद  में बहुत ही हीनता और लघुता की अनुभूति हो रही थी। मैं  एक जगह खड़े होकर अपनी उखड़ी हुई साँसे दुरुस्त करने लगा  तभी वहीं दूर मुझे फक्कड़, यायावर सा एक व्यक्ति दिखा जो मुझे देख कर हंस रहा था।  मैंने उस व्यक्ति को  पहचान लिया। ये वही व्यक्ति था जिसने छह  सौ वर्ष पहले ही खुद को  सभी बंधनो व आसक्तियों से मुक्त कर लिया था। वो  हँसते हुए बार बार एक ही बात दोहरा रहा था,

                                                "कर का मनका डार दे, मनका मनका फेर"

उसके बार बार यही दोहराने के कारण मैं बहुत ही विचलित हो उठा, मेरे अंदर छटपटाहट होने लगी और मेरी आँख खुल गयी मैं पसीने से नहाया हुआ था, मेरी धड़कन बहुत तेज चल रही थी फिर धीरे धीरे सब ठीक होने लगा लेकिन न जाने क्यों मन बहुत भारी है, न जाने क्यों वातावरण में ऑक्सीजन ख़त्म सी हो गयी है, ना जाने क्यों बंधनों से आज़ाद होने के लिए मन छटपटा रहा है, न जाने क्यों …???

                                                                          --- दीपक शर्मा 'सार्थक'

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