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पुस्तक समीक्षा - 16 आने 16 लोग

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साहित्यिक मूल्यवत्ता के निकष पर ’16 आने 16 लोग

-डाॅ. सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी.लिट्.

साहित्य की सभी विधाओं में जीवन सत्य की शब्दार्थमय अभिव्यक्ति समाहित होती है। जीवनी या जीवन चरित के रूप में लिखा गया साहित्य अतीत के अनुभव और वर्तमान के विकास का आलोक होता है। इसमें मनुष्य की जीवन दृष्टि विकसित करने की क्षमता होती है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने अपने साहित्यिक निबन्धों से तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के जीवनी-लेखन को समृद्ध किया है। सत्ता हमेशा साहित्यकार की स्वतंत्र चेतना को बाधित करती है पर प्रशासन में बैठकर भी अपनी अनुभूतियों को स्वतंत्र रूप में व्यक्त करना दुःसाध्य कार्य है। ऐसे में एक तरफ कृष्ण कुमार यादव प्रशासकीय अनुभवों से लेखकीय उर्जा सहेजते हैं तो दूसरी ओर उनके जीवन में साहित्य की उपस्थिति सदैव अन्र्तमन में एक शक्ति जगाती है। उनकी पुस्तक ‘’16 आने 16 लोग‘’ में संकलित 16 महान चरित्र नायकों की जीवनियाँ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषताओं के अधिकार पूर्ण विवेचन से समृद्ध हुई हैं । इन विवेचनों में मात्र जन्म और जीवन का परिचय ही नहीं है, अपितु इनमें तत्कालीन समय और समाज को प्रभावित करने वाले साहित्यिक अवदानों, चिन्तन को प्रेरणा देने वाले आत्मीय तत्वों तथा जिनके संबंध में लिखा जा रहा है, उनके निष्कर्षों, स्थापनाओं और मान्यताओं का प्रामाणिक विमर्श प्रस्तुत करना भी लेखक की दृष्टि में रहा है, जो साहित्यिक गुणवत्ता के निकष पर 16 आने खरा है।

‘’16 आने 16 लोग‘’ पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर 16 साहित्य-मनीषियों के सुन्दर चित्र हृदय को छू गये। वर्तमान में जब हम आत्मश्लाघा में डूबे हैं, ऐसे में साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्रों की पावन स्मृति मन को सांत्वना देती है कि अभी भी साहित्य के पुरोधाओं का स्मरण कर हम उनकी कृपा से ज्ञान के कुछ कण प्राप्त कर सकें। पुस्तक में समाहित अध्यायों के शीर्षक लाजवाब हैँ। कथ्य में, भाव भंगिमा में और मनीषियों के व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करने वाले। शीर्षक भर से ही तद्नुसार इन साहित्यकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व की झलक दिखाई देती है, जो पाठकों को इन लेखों को अंत तक पढ़ने के लिए विवश करते हैं।

इस संकलन का पहला निबन्ध है, ‘कवींद्र-रवींद्र और उनका विमर्श।इस विमर्श को लेखक ने बहुवस्तुस्पर्शी ज्ञान और कर्म के निकष पर सराहने का प्रयत्न किया है। उसके अनुसार भारतीय संस्कृति के शलाका पुरूषों में रवींद्र नाथ टैगोर का नाम प्रतिष्ठापरक रूप में अंकित है। साहित्यकार, संगीतकार, लेखक, कवि, नाटककार, संस्कृति कर्मी एवं भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता के अलावा उनकी छवि एक प्रयोगधर्मी और मानवतावादी की भी है। इस वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए इस लेख में गुरूदेव को आध्यात्म और दर्शन का विशिष्ट चिंतक माना गया है। तत्कालीन भारत के सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को प्रभावित करने वाले अनेक कार्यों का, उनके साहित्य का, उनके लिए अनेक देशी और विदेशी विद्वानों के कथनों का तथा उनकी स्थापनाओं का विस्तृत वर्णन बहुत ही रोचक शैली में, कृष्ण कुमार यादव ने किया है, जो उनकी लेखकीय प्रतिभा का प्रमाण है।

‘‘16 आने 16 लोग‘‘ में सामाजिक सरोकारों के कवि नागार्जुनको साहित्य और संवेदना का विलक्षण रचनाधर्मी मानते हुए कहा गया है कि वह अपने फक्कड़ मिजाज, यायावरी ठेठ लहजे, और बेलौस कविताई के लिए प्रसिद्ध थे। वह हमेशा लोक चेतना व संघर्ष के साथ चले और सदैव शोषित मानस का पक्ष लिया। इस निबन्ध में लेखक ने इस महान व्यक्तित्व को विश्लेषित करते हुए उनकी रचनाओं के संदर्भों से प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है कि उनमें राजनीति से लेकर समाज, प्रकृति, संस्कृति, व्यंग्य, दलित, किसान, आदिवासी, स्त्री आदि सभी तबकों और समस्याओं के लिए सह आनुभूतिक संवेदना के भाव व्याप्त थे।

महाप्राण निराला के अंतर्मन में करुणा का अपार-भाव तरंगायित था। प्राणिमात्र के प्रति उनकी सहृदयता का वर्णन करते हुए सोलह आने का सच लेखक कहता है कि निराला जितने हृदयवान कवि थे, उतने ही सुन्दर मानव भी थे। मनुष्यता का अपमान वे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वे गरीबों और शोषितों के प्रति काफी उदार व करूणामयी भावना रखते थे और दूसरों की सहायता के प्रति सदैव तत्पर रहते थे। इस लेख में निराला की शक्तिपूजा का भी उल्लेख किया गया है और छायावाद के प्रणेता के रूप में उनका स्मरण किया गया है।

प्रेमचंद के सामाजिक व साहित्यिक विमर्श के बहाने उनके जीवन के अंतरंग प्रसंगों का वर्णन करते हुए अनेक अधूरे संदर्भों को कृष्ण कुमार यादव ने अपने आलेख में लिखा है। वह कहते हैं कि प्रेमचंद का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और साम्प्रदायिक वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण था, जिसमें समता सर्वोपरि हो। प्रेमचंद प्रगतिशील साहित्यकार थे। उनका कथा साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भी प्रासंगिक है।

’’16 आने 16 लोग’’ में समाहित इन निबंधों में युग प्रवृत्ति को परिवर्तित करने वाले प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय को अभिनव प्रयोगों का यायावर कहा गया है तथा उनके प्रदेय को साहित्येतिहास में महत्वपूर्ण बताया गया है। भागो नहीं दुनिया को बदलोका नारा देने वाले घुमक्क्ड़ साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यायन को चिंतन प्रधान लेखन का स्तंभ कहा है तथा उनके सांस्कृतिक प्रदेय को अविस्मरणीय बताते हुए तिब्बत से दुर्लभ साहित्यिक धरोहरों को भारत लाने का श्रेय भी दिया गया है।

इन निबन्धों में सृजन के रचनात्मक पुरोधा, सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित पत्रकार, अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी का स्मरण एक निर्भीक और निष्पक्ष साहित्यकार के रूप में किया गया है। अपने इस आलेख में कृष्ण कुमार यादव ने कहा है कि प्रताप के माध्यम से विद्यार्थी जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाइयाँ दी, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच से ही अंततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।

साहित्यकार और साहित्य के प्रखर और प्रमुख प्रणेताओं की कृतियों का तथा उनके जीवन प्रसंगों का परिचय कराते हुए प्रमुख रचनाकारों को इस पुस्तक के निबंधों में प्रमुखता से याद किया गया है। इनमें क्रान्तिधर्मी रचनात्मक बेचैनी के प्रतिनिधि कमलेश्वर, उत्तर आधुनिकता के पक्षधर मनोहर श्याम जोशी, साहित्य की अनुपम दीपशिखा अमृता प्रीतम, साझी विरासत की कड़ी कुर्रतुल ऐन हैदर, हरफनमौला कैफी आजमी, इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने वाले कुँवर नारायण एवं सदाबहार गीतकार नीरज का वर्णन साहित्यिक उपलब्धियों का परिचय कराते हुए बहुत ही सजीवता के साथ किया गया है। पाकिस्तान में पैदा हुए अहमद फराज का इंसानी ताल्लुक और कश्मीर की सूफी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवि अब्दुल रहमान राही का साहित्यिक रचना संसार भी इस आयोजन का विषय बना है।

कृष्ण कुमार यादव ने अपने इन निबन्धों में 16 साहित्यकारों व विचारकों की जीवन वृतान्तिक स्थितियों के साथ ही उनके कृतित्व का समीक्षात्मक अवलोकन भी किया है। कदाचित उन्होंने इस तथ्य के आलोक में यह सृजन किया है कि कृति-कृतिकार की उपलब्धि है और प्रत्येक उपलब्धि जीवन वृत्त से विकसित होकर ही उसके अंग की पूर्ति करती है। इसीलिए इन लेखकीय संदर्भों में साहित्य के जीवन सापेक्ष्य सौन्दर्य का अवलोकन करते हुए मानवीय पक्षधरता के अनेक आयामों का शोध पूर्ण एवं गुणवत्तापरक अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है जो 16 आने सफल है।

इस पुस्तक के लेखन में कृष्ण कुमार यादव ने विभिन्न संदर्भों व घटनाओं को जोड़ते हुए उन्हें आज के समाज से भी जोड़ा है। इसे पढ़कर अनेक अधूरे संदर्भों से परिचय भी मिला और कृष्ण कुमार यादव की लेखन-क्षमता का विस्तार भी। प्रस्तुति और प्रयोग की दृष्टि से यह एक बेहद पठनीय और संग्रहणीय कृति है। मुद्रण भी आकर्षक एवं साफ-सुथरा है। अंततः 16 साहित्यकारों-मनीषियों के कृतित्व-व्यक्तित्व को सराहती यह पुस्तक वाकई काफी शोधपरक एवं दस्तावेजी संग्रह है।

 

पुस्तक - 16 आने 16 लोग

लेखक - कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001 kkyadav.t@gmail.com

पृष्ठ - 120/मूल्य - रू0 250/- संस्करण - प्रथम 2014

प्रकाशक - हिन्द युग्म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016

समीक्षक: डा0 सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी.लिट्., 119/501, सी-3, दर्शनपुरवा कानपुर-208012, मो0- 9839202423

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