मंगलवार, 20 मई 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - सब कुछ सीखा हमने

सब कुछ सीखा हमने ......

होशियारी कहाँ सीखी जाती है ये हमें आज तक पता नहीं चला ?

यूँ तो हम हुनरमंद थे, धीरे-धीरे मन्द-हुनर के हो गये हैं।

हमारे फेंके पासे से सोलह-अट्ठारह से कम नहीं निकलते थे, न जाने क्यों एन वक्त पर, पडना बंद हो गए। बिसात धरी की धरी रह गई।

हमारे चारों तरफ हुजूम होता था। आठ –दस माइक से मुंह ढका रहता था। एक-एक शब्द निकलवाने के लिए मीडिया वाले खुद वेन लिए, हमारे कारवाँ के पीछे सुबहो-शाम भागते थे।

सुबह से देर रात तक मुलाकातियों का दौर चलता था।

हमने सब की सहूलियत को देखकर अलग-अलग टाइम स्लाट में अपनी दिनचर्या को बाँट रखा था। सुबह भजन कीर्तन,मंदिर –मस्जिद वालों से मुलाक़ात, फिर उदघाटन, फीता कटाई के आग्रहकर्ताओं से भेंट ....| लंच तक ट्रांसफर- पोस्टिंग आवेदकों की सुनवाई,यथा आग्रह उनके बॉस या मिनिस्ट्री को फोन ...| उसके बाद टेन्डर, ठेका लेने वालों से बातचीत, हिसाब-किताब।

नाली, चबूतरा,रोड,पानी बिजली जैसे अनावश्यक समस्याओं के लिए छोटी-छोटी समितियां, देखरेख में लगा दी जाती थी।

आप सोच सकते हैं ,हमारे छोटे से पांच साला मंत्री रूपी कार्यकाल में ,घर के सामने चाय-समोसे के टपरे की आमदनी इतनी थी,कि उसका दो मंजिला पक्का मकान तन गया।

आप अंदाजा लगा लो कितनी भीड़,कितने लोगों से हम बावस्ता होते रहे ?

जो हमारे दरबार चढा ,सब को सब कुछ, जी चाहा दिया|किसी से डायरेक्ट किसी चढोतरी की फरमाइश नहीं की। उस समय गदगद हुए चेहरों को देख के तो यूँ लगता था, कि लोग हमारे एहसान तले दबे हुए हैं। इनसे जब जो चाहो मांग सकते हो। ना नहीं करेंगे .....|

हम इलेक्शन में खड़े हुए। इन्हीं लोगों से इनके पास की सबसे तुच्छ चीज यानी व्होट , फकत अपने पक्ष में माँग बैठे। वे हमें न दिए। जाने कहाँ डाल आये। हमारी सुध न ली। जमानत तक नहीं बचा सके हम ....?

तीस –पैंतीस साल की हमारी मेहनत पर पानी फेर देने वाला करिश्मा किसी अजूबे से हमें कम नहीं लगा।

इस वक्त हम अकेले आत्म-चिंतन के दौर से गुजर रहे हैं। साथ बतियाने वाला एक भी हितैषी ,शुभचिंतक , जमीनी कार्यकर्ता सामने नहीं है।

चाय वाला मक्खियाँ मारने से बेहतर,कहीं और चला गया है।

हमे लगता है समय रहते हमे जरा सी होशियारी सीख लेनी थी ....?

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

10 blogger-facebook:

  1. उत्तर
    1. जोशी जी धन्यवाद।

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव8:25 pm

    सुशील भाई अति सुन्दर व्यंग एक सीधा सच्चा
    नेता जो कर्त्तव्य निष्ट तो है पर चालाक नहीं है
    लगभग इन्ही परिस्थितियों से गुज़रता है
    हमारी बधाई

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    उत्तर
    1. आपकी सोच से सहमत हूँ।

      हटाएं
  3. श्री श्रीवास्त्व्व जी आपकी परख और पहुच तीक्ष्ण है। व्यंग पर की गई टिप्पणी के लिए आभार।

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  4. सम -सामयिक और सुन्दर व्यंग्य के लिए ढेरों बधाईयाँ..होशियारी सीखना बड़ा ही टफ काम है..यह आम जन के बस की बात नहीं....प्रमोद यादव

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  5. सर्वश्री जोशी :व् अखिलेश जी; आपकी टिप्पणी सकारात्मक उर्जा का संचार करती हैं ।धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव9:36 am

      परस्पर निकटता के लिये संपर्क आवश्यक है कुछ भी लिखने और
      छपने के बाद यह उत्सुकता लेखक
      को जानने की रहती है कि उनकी रचना लोगोंको कैसी लगी पर लोग पढने और पसंद करने के बाद भी दो
      शब्द लिखने का कष्ट नहीं करते

      जहाँ तक मेरा प्रश्न है मैं स्वयं लेखक
      होने से ये मर्म समझता हूँ अतः बिना
      लाग लपेट फियर या फेवर पूरी इमानदारी से अपना मत देता हूँ कई बार ये टिप्पणियाँ कुछ लोगों को ठीक
      नहीं भी लग सकती पर व्यक्तिगत
      इमानदारी और हिम्मत से सटीक टिप्पणी देना मै अपना धर्म समझता हूँ
      आपको हमारी टिपण्णी अच्छी लगी तो इसका एक ही कारण था कि आपकी रचनाएँ सचमुच उच्चकोटि की दिल की गहराइयों को छूने वाली थीं
      मैं तो आपके और प्रमोदजी के व्यंग
      लेखन का अब पूर्ण प्रसंशक बन गया
      हूँ आप दोनों ही बहुत प्रतिभाशाली हैं

      हटाएं
  6. श्री अखिलेश जी लगता है आप को मेरी या श्री प्रमोद यादव के रचनाओं को पढ़ने की ट्यूनिंग मिल गई है |रचना आप तक सीधे पहुचती है |आप अपनी सदभावनाए :
    " इमानदारी और हिम्मत से सटीक टिप्पणी देना मै अपना धर्म समझता हूँ"
    जारी रखे |हमें अतीव प्रसन्नता होगी |

    आपका
    सुशील यादव

    उत्तर देंहटाएं

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