सोमवार, 26 मई 2014

पखवाड़े की कविताएँ

गुमनाम पिथौरागढ़ी

------------------------------------------
जीने का हिसाब लाया है
हाथ में वो नकाब लाया है

अब तो साइन करो भी नेताजी
ठेके  वाला कबाब लाया है

मौलवी पण्डे सब फसादी हैं
इक नमाजी गुलाब लाया है

बेच के बेटी की अस्मत को भी
देख घर में शराब लाया है

देखो झोली फ़कीर की यारों
जमुना गंगा चिनाब लाया है

चैन अमन लूटने की खातिर ही
दुष्ट पापी कसाब लाया है

छोडो गुमनाम तीरगी को तुम
ये उजाला जवाब लाया है
------------------------------------------

 

सुशांत सुप्रिय

   १. स्पर्श
                            ------------

धूल भरी पुरानी किताब के
उस पन्ने में
बरसों की गहरी नींद सोया
एक नायक जाग जाता है
जब एक बच्चे की मासूम उँगलियाँ
लाइब्रेरी में खोलती हैं वह पन्ना
जहाँ एक पीला पड़ चुका
बुक-मार्क पड़ा था

उस नाज़ुक स्पर्श के मद्धिम उजाले में
बरसों से रुकी हुई एक अधूरी कहानी
फिर चल निकलती है
पूरी होने के लिए

पृष्ठों की दुनिया के सभी पात्र
फिर से जीवंत हो जाते हैं
अपनी देह पर उग आए
खर-पतवार हटा कर

जैसे किसी भोले-भाले स्पर्श से
मुक्त हो कर उड़ने के लिए
फिर से जाग जाते हैं
पत्थर बन गए सभी शापित देव-दूत
जैसे जाग जाती है
हर कथा की अहिल्या
अपने राम का स्पर्श पा कर

                        ------------०------------

                          २. हाँ , मैं प्यार करता हूँ
                         -----------------------------

ओ प्रिये

मैं तुम्हारी आँखों में बसे
दूर कहीं के
गुमसुम-खोयेपन से
प्यार करता हूँ

मैं घाव पर पड़ी
पपड़ी-सी
तुम्हारी उदास मुस्कान से
प्यार करता हूँ

मैं उन लमहों से प्यार करता हूँ
जब बंद कमरे की खुली खिड़की से
हम दोनों इकट्ठे-अकेले
अपने हिस्से का आकाश नाप रहे होते हैं

हाँ, मैं उन अनाम पलों से भी
प्यार करता हूँ जब
तुम्हारे अंक में
अपना मुँह छिपाए
ख़ालीपन से ग्रस्त मैं
किसी अबूझ लिपि के
टूटे हुए अक्षर-सा
महसूस करता हूँ
जबकि तुम
नहींपन के किनारों में उलझी हुई
यहीं कहीं की होते हुए भी
कहीं नहीं की लगती हो

                       ------------०-----------

                        ३. चुप्पी
                       -------------

पापा , ये बच्चे लाल-बत्ती पर
गाड़ियों के शीशे
क्यों साफ़ करते हैं

पापा , ये बच्चे
अच्छे कपड़े
क्यों नहीं पहनते

पापा, ये बच्चे
स्कूल क्यों नहीं
जाते

पापा, ये बच्चे
बच्चे नहीं हैं
क्या ?

                         ------------०------------

                           ४. अंतर
                         ---------------

संगमरमर और
महँगे विदेशी टाइल्स से बना
आलीशान मकान
तुम्हारे लिए घर है
जबकि मैं
हवा-सा यायावर हूँ

नर्म-मुलायम गद्दों पर
सो जाना
तुम्हारे लिए
घर आना है
जबकि
नए क्षितिज की
तलाश में
खो जाना
मेरे लिए
घर आना है

                       ------------०------------

                         ५. उल्टा-पुल्टा
                         -------------------

मैं परीक्षा पास करता हूँ
मुझे डिग्री मिल जाती है
मैं इंटरव्यू देने जाता हूँ
मुझे नौकरी मिल जाती है

और तब जा कर
मुझे पता चलता है
कि दरअसल
नौकरी ने मुझे पा लिया है
---.

1. लौटना
                           ---------------

बरसों बाद लौटा हूँ
अपने बचपन के स्कूल में
जहाँ बरसों पुराने किसी क्लास-रूम में से
झाँक रहा है
स्कूल-बैग उठाए
एक जाना-पहचाना बच्चा

ब्लैक-बोर्ड पर लिखे धुँधले अक्षर
धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं
मैदान में क्रिकेट खेलते
बच्चों के फ़्रीज़ हो चुके चेहरे
फिर से जीवंत होने लगे हैं
सुनहरे फ़्रेम वाले चश्मे के पीछे से
ताक रही हैं दो अनुभवी आँखें
हाथों में चाक पकड़े

अपने ज़हन के जाले झाड़कर
मैं उठ खड़ा होता हूँ

लॉन में वह शर्मीला पेड़
अब भी वहीं है
जिस की छाल पर
एक वासंती दिन
दो मासूमों ने कुरेद दिए थे
दिल की तस्वीर के इर्द-गिर्द
अपने-अपने उत्सुक नाम

समय की भिंची मुट्ठियाँ
धीरे-धीरे खुल रही हैं
स्मृतियों के आईने में एक बच्चा
अपना जीवन सँवार रहा है...

इसी तरह कई जगहों पर
कई बार लौटते हैं हम
उस अंतिम लौटने से पहले

                          ------------०------------

                           2. माँ
                          ----------

इस धरती पर
अपने शहर में मैं
एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में
एक छोटे-से शब्द-सा आया था

वह उपन्यास
एक ऊँचा पहाड़ था
मैं जिसकी तलहटी में बसा
एक छोटा-सा गाँव था

वह उपन्यास
एक लंबी नदी था
मैं जिसके बीच में स्थित
एक सिमटा हुआ द्वीप था

वह उपन्यास
पूजा के समय बजता हुआ
एक ओजस्वी शंख था
मैं जिसकी ध्वनि-तरंग का
हज़ारवाँ हिस्सा था

हालाँकि वह उपन्यास
विधाता की लेखनी से उपजी
एक सशक्त रचना थी
आलोचकों ने उसे
कभी नहीं सराहा
जीवन के इतिहास में
उसका उल्लेख तक नहीं हुआ

आख़िर क्या वजह है कि
हम और आप
जिन महान् उपन्यासों के
शब्द बनकर
इस धरती पर आए
उन उपन्यासों को
कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला ?

                             ------------०------------
 
                              3. एक ठहरी हुई उम्र
                             --------------------------
                                                             
मैं था तब इक्कीस का
और वह थी अठारह की

हाथी-दाँत-सा उजला था उसका मन
और मैं चाहता था
बाँध लेना उसकी छाया को भी

लपट भरा एक फूल थी वह
और मैं चाहता था
उस की ख़ुशबू की आँच में जल जाना

मैं था तब इक्कीस का
और वह थी अठारह की
जब एक दिन असमय ही
सड़क-दुर्घटना में चल बसी वह
रह गई वह अठारह की ही
सदा के लिए

आज हूँ मैं छियालीस का
पर वह अब भी है अठारह की ही

मेरी आँखों में अटका
एक अनमोल आँसू है वह
मेरी वाणी में बंद
एक सुरीला गीत है वह
मेरी मिट्टी में बची रह गई
एक हरी जड़ है वह
मेरी स्मृति के मंदिर में मौजूद
एक देवी-प्रतिमा है वह

आज हूँ मैं छियालीस का
पर वह अब भी है अठारह की ही

उसकी ठहरी हुई उम्र की स्मृति को
हर पल जी रहा हूँ मैं

                         -------------०-------------
 
                          4. हर बार
                         ---------------

हर बार
अपनी तड़पती छाया को
अकेला छोड़ कर
लौट आता हूँ मैं
जहाँ झूठ है , फ़रेब है , बेईमानी है , धोखा है --
हर बार अपने अस्तित्व को खींच कर
ले आता हूँ दर्द के इस पार
जैसे-तैसे एक नई शुरुआत करने

कुछ नए पल चुरा कर
फिर से जीने की कोशिश में
हर बार ढहता हूँ , बिखरता हूँ

किंतु हर हत्या के बाद
वहीं से जी उठता हूँ
जहाँ से मारा गया था
जहाँ से तोड़ा गया था
वहीं से घास की नई पत्ती-सा
फिर से उग आता हूँ

शिकार किए जाने के बाद भी
हर बार एक नई चिड़िया बन जाता हूँ
एक नया आकाश नापने के लिए ...


सुशांत सुप्रिय
       
        नई दिल्ली - 110055
ई-मेल: sushant1968@gmail.com
0000000

बच्चन पाठक सलिल

कामनाओं का संसार 
कामनाओं से भरा संसार यह,
हर किसी के अंतर में लहरा  रहा,
-अभिलाषाओं  का महा सागर ,
लोग सपने बुनते हैं ,
सभी सपने नहीं होते पूरे ,
फिर स्वप्न द्रष्टा सिर धुनते हैं,
हिंसा  तांडव हो रहा चारो ओर -
सभी क्षुब्ध हैं,सुन रहे हैं शोर,
फिर कभी कभी अपना सुर भी मिलाते हैं,
भीड़ और प्रतिहिंसा के सहभागी बन जाते हैं,
वे कहते -प्रेम व् शांति आज बेमानी हैं,
ये जन साधारण को  भटकाते  हैं ,
शब्द केवल शोषकों की कहानी है,
जब चारों ओर फैली हो घृणा की ज्वाला,
क्यों मिलाते हो इसमें नफरत की हाला ,
हम छींटेंगे एक मुट्ठी बीज प्रेम के,
वे पल्लवित और पुष्पित होंगे,
की मानवता में आएगा उल्लास ,
प्रेम की पौध शुद्ध करेगी पर्यावरण ,
प्रेम मय  होंगे धरती और गगन,,
नहीं होगा फिर विश्व का विनाश  !
-0000000000000


 

सुशील यादव


1...सुर्खाब का ‘पर’
नसीब में कहाँ था, सुर्खाब का ‘पर’ कभी
जिसे  समझते, खुशनुमा मंजर कभी

गुनाह को रहमदिल मेंरे माफ कर देना
मकतल गिर  छूटा  कहीं, खंजर कभी  

हमें हैरत हुई इन  ‘शीशों’ को देख के 
तराशा हुआ  मिल गया , पत्थर कभी
 
नहीं खेल! किस्मत.; जहाँ में है आसा 
लकीर खिच, कब रुका है समुंदर कभी

तुझे टूट कर चाहने का इनाम ये
तलाश करते हैं, खुद को अन्दर कभी

शहंशाह मिटते हैं बस  आन पे साहब 
झुका के सर, जिया है क्या, अकबर कभी ?

 

 

 

2....बेवफा तुझको कहूँ
मै रुठ गया अगर  ,सूना घर न रह जाये
ढूढने मशगूल मुझको ,शहर न रह जाये ....
तुम न चाहो ,हसी ख़्वाब की ,तरह मुझको
टूटने का फिर, कहीं अब डर न रह जाये
एक सवाल अजीब, मेरे सामने यूँ  आया 
बेवफा तुझको कहूँ तो कसर न रह जाये

वो निभाने चार दिन वादा कुछ अगर कर ले
जनम –जनम  ‘सुशील’     बंन्ध कर   न रह जाये ..?

3......सोए बाजार में, जागते लोग

पर कटे से कबूतर ये पाले नहीं जाते
जर्द से खत तुम्हारे सम्हाले नहीं जाते

देख लो साब ,यादो में रख लो, बसा के अब  
सोए बाजार में, जागते लोग, ढाले नहीं जाते

कर नहीं पाए समझौते हम, आदतों अपनी
कोशिशें ,बंदिशें कल पे टाले नहीं जाते

जिस्म का जख्म तो, भर जाता कभी शायद
ये जो शामिल ,तहे दिल है ,छाले नहीं जाते

 

4......दोस्ती का हक

दोस्ती का यूँ  हक वो अदा कर चला गया
मुझको बेसबब, मुझ से जुदा कर चला गया

कुछ दिनों से रूठा था, न जाने ,कही कश्ती 
याद के गहरे  समुंदर, डुबा कर चला गया

चाहत ये उसकी, सुकरात सा, जहर वो पिये
मयकदे, आब-दाना , उठा कर चला गया

तोड़ लिए थे चमन के उसने फूल, सब खुदा
पतझड को आँख अपनी ,दिखा कर चला गया  

उंगली थाम चलता इशारों मेरे कभी
आज मुझको नसीहत थमा कर चला गया

कर कहाँ पाए, खुद की तलाश, गज दो जमी
नाखुदा ये हकीकत ,बता कर चला गया

 


5.....साये की फिकर रखना

धूप में निकले ,साये की फिकर रखना
मोम सा मन पिघले, मन पे नजर रखना

मंजिल जानिब दो चार तो, कदम  चलो
फिर पलट कहीं ,मील का पत्थर रखना

हाथो लोग लिये , इल्जाम के पत्थर
क्यूँ  नुमाइश , शीशे का घर रखना

मन भीतर मिल जाए, ‘यकीन’ उजाला
दिए उम्मीद के, क्या इधर-उधर रखना

 

6.......ख्वाब में जो समाया रहा...

नींद में ,ख्वाब में जो समाया रहा बरसो
एक अजनबी, दिल- दिमाग छाया रहा बरसो   

लोग घर को सजाने, नहीं, क्या-क्या करते
वो मुस्कान लिए, घर को, सजाया रहा बरसो  

खामुशी का सबब, था यकीनन यही इतना 
एक मर्ज समझ उसको , छुपाया रहा बरसों

लिख के रखता, किसी नाम को, हर घड़ी माथे 
दाग  वो ‘दामन’ लगा , मिटाया रहा बरसो

देख उन्हें , सब्ज-शजर,चन्दन, गुमा होता
खुश्बुओ से, फक्र से,नहाया रहा बरसों

जिनको दहलीज पे तवज्जो  न दिए हों  लेकिन
यूँ ही ताबीज सा हरदम उसे , लगाया रहा बरसो     

मोड वो जिस जगह हुए , जंग, आपसी शिकवे
मोड वो ‘नफरतों’ का मिलाया रहा बरसों

कायदे का कभी, तू निशाना, इस तरह बन 
नाम उसके खत लिखे,  छुपाया रहा बरसो
 
थी तम्मना हमें ,जो कभी खुल के हंसे
बात वो हंस लिए,जो रुलाया  रहा बरसो
 
अब नही निकलते, बेसबब हद से बाहर हम
एक  तडफ को तहेदिल, लगाया रहा बरसों


7......जले जंगल में

होठ सीकर चुप्पियों में जीता रहा आदमी
दर्द आंसू , जहर खून  पीता रहा आदमी

तुम ज़रा  दाग पर दामन बदलने की सोचते
दाग-वाली, कमीजों को  सीता रहा आदमी

जल उठे जंगलों में उम्मीदों के परिंदे कहाँ
सावन दहाड़ता खूब चीता रहा आदमी

काट ले बेसबब , बेमतलब उनको, बारहा
महज उदघाटनों का ये, फीता रहा आदमी

साफ नीयत, पढ़ो तो, किताबें कभी ,संयम की
हर सफा के तह कुरान- गीता रहा आदमी


8......पत्थर के शहर में ...

शहर में  घूम के देखा ,मुस्कान न पाए हम
पत्थर दिखी हवेली ,एक मकान न पाए हम

मिली, नाजुक बदन लड़की ,दिखा शिकन में चेहरा 
क्या उसने कहा रुक के, पहचान न पाए हम

कतर के रख, दिया जैसे,अभी परिंदों के ‘पर’   
उन्मुक्त ! बन गगन पंन्छी , उड़ान न पाए हम

अँधेरे तीर हम भी तो  चला लेते ,मगर
सब अस्त्र था, हमें हासिल  ,कमान न पाए हम
  
हमारी पूछ परख में शायद रही हो कमी 
रुठ के, वापस हो लौटे ,मेहमान  न पाए हम

०००
9......सूरत कुछ अपनी सी लगी..

कद से बढता रहा, जब कभी साया इन दिनों
पाँव को,  अँधकार तरफ, बढाया इन दिनों

नीयत पे तुम रख न पाए, शक  की ज़रा सी सुई
जहर पी,  खुद दवा और को  पिलाया इन  दिनों 

टूटती कब भला  खामुशी उनकी बारहा
सामने आकर, कहाँ किसी ने हिलाया इन दिनों

वो नहीं रेस का, दौड़ता घोड़ा, कि जिसको
हो इशारा, औ दौड़ा हिन्-हिनाया इन दिनों

सूरत कुछ अपनी सी लगी, जिसको देख के
मन कभी रो लिया, कुछ छटपटाया इन  दिनों 


10.....रूठे हुए उजाले...

चेहरे  में हंसी, पाँव में  छाले देखो
इस बस्ती से अब, रूठे हुए उजाले देखो

जो लिखा करते स्वर्णिम अक्षर आजादी
वो महीन शब्द लिखें, अक्षर  काले देखो 

आने की अब, किस उम्मीद में, रह पाते हम
सौगंधों के लगा दिए जहाँ ,ताले देखो 

समुंदर से ,डर के आजकल; रहता हूँ इतना  
नेक नीयत का तिनका, अगर  बचा ले देखो

मजहब –मजहब अब  बांटने वाले हमको
हो न हो घर तेरा  शाप के  हवाले देखो

००००

11......जर्जर रिश्तों का पुल...
कोई वजह, या बात कुछ पर्वत नुमा नहीं  
जर्जर रिश्तों का पुल यहाँ , अब  दरर्मिया नहीं

आदत मेरी ,मैं बोलता ,हूँ जरुरतों से कम
सोच मगर किसी मायने में बेजुबां  नही

अब जिंदगी का बोझ लिए थक सा गया बहुत
ये अलग बात कि ये ,उम्र को भी गुमा नहीं 

मौसम बहारों के हर कहीं ढूंढता फिरा
अब के ,शरारत को बची कुछ ,तितलियां नहीं

खामोश, ये परचम किस जश्न का फहर गया
गुजरा महीनों, जीत  का जब , कारवां नहीं

अब हमपे तुम करते, यकीन सुशील कितना
हाथो लकीर जब हम  पे ही  महरबा नहीं

सूरत-शकल जाने क्यों लगती बुरी हमें
सीरत के माफिक साफ-सुथरा आइना नहीं

 

12.....जहाँ खौफ  का मंजर नहीं है....

दर्द ,तूफां, जहाँ खौफ  का मंजर नहीं है
लाख समझो ‘जन्नत’ पर मेरा घर नहीं है

दी जिसे नाम की चमक, जिसे जी भर तराशा
चाह से  निखर पाता , ये वो पत्थर नहीं है

वो जिसे समझते,हम महज हाथ की लकीरें
है अता की हुई रसीद बस , मुक्कदर नहीं है

000000000000


कु. संस्कृता मिश्रा


१-
मन ! क्यूँ इतने नीरव से हो

घनी धूप के आघातों में
साथ त्यागती बरसातों में
शुष्क विटप पर छाँव खोजते
किसी विहग के दुख-रव से हो

मन ! क्यूँ इतने नीरव से हो

आया एक पवन का झटका
शाखा से भू पर ला पटका
सुबह सूर्य से नज़र लड़ाए
साँझ मिटे उस पल्लव से हो

मन ! क्यूँ इतने नीरव से हो

स्वप्नों ने नव गेह सजाये
झंझा ने पल भर में ढहाये
खँडहर में ही गृह-प्रवेश के
गए मनाये उत्सव से हो

मन ! क्यूँ इतने नीरव से हो


२-
ने कीचड़ में तलवे हैं, जड़ें लेकिन जमानी हैं...
ये पौधों को कहाँ मालूम, क्या ये बागबानी है...

हज़ारों जंग लड़कर ये तरक्की मैंने पाई है...
मगर खुन्नस समझती है किसी की मेहरबानी है...

बहुत मीठे शहद सा कुछ, यहाँ की रुत में महका है...
न जाने किस तरफ़ से डंक लेकर घात आनी है...

इन्हीं हाथों ने तिल तिल कर, ये सब कुछ बनाया है...
इन्हीं हाथों से हर दौलत किसी को सौंप जानी है...

बुलन्दी मिल भी जाएगी मुझे भीखों में लेकिन इस...
बुलन्दी से पहले मुझे इज्ज़त कमानी है...

ये कुर्सी मेज़ कितने ही नये तुमने सजाये हैं...
तुम्हें महफूज़ रखती है, वो छत कितनी पुरानी है...

कभी बीवी के पाँवों की तरफ़ देखो तो समझोगे...
सजी उसके महावर से तुम्हारी ज़िन्दगानी है
00000000000000

 

सीताराम पटेल

हमारा भारत महान
गरमी ऋतु, चले लू सन सन।
खरबूज तरबूज, खाइए सब जन जन॥
आम का रस, पीएं सब सरस।
पीएं सब गन्‍ना रस, उर्जा मिलेगा नस नस॥
दोपहरियां, करता रांय रांय।
झींगुरों की झिंगझिंग, कर रहा है सांय सांय॥
बबूल वन, किसान काला तन।
खोद रहा मूंगफली, सूरज उठा रहा फण॥
तालाब सूखा, सभी प्राणी है रूखा।
जलजीव मर रहे, तप्‍त सारा संसार दिखा॥
चीं चीं चिडि़या, मर रही उढि़या।
तरसती पीने पानी, जल रखे हम बढि़या॥
प्‍यासा है पानी, पहुंचता आकाश।
पुकारता प्‍यास प्‍यास, नदी खोई होशोहवास॥
पेड़ों की छाया, बहुत मजा पाया।
धूप में कर सफर, तेरे नीचे मानव आया॥
पसीना रूप, चिलचिलाती धूप।
तेज हुआ धड़कन, अनोखा लगे अपरूप॥
ककड़ी खीरा, पीएंगे जलजीरा।
नहाएंगे सदानीरा, कहलाएंगे बलबीरा॥
आग का गोला, अंगारा बरसना।
अंगारों पर चलना, दोपहर में निकलना॥
कीचड़ भरा, पंक से लथपथ।
डबरा में डूबे भैंसा, पंकपथ है पंकपथ॥
सुबह शाम, बच्‍चे सब तैरते।
खुशी में डुबा तालाब, कीचड़ पानी उछलते॥
पैदल यात्री, बाड़ सब उजाड़।
सफर में भीड़भाड़, छाया खोज रहा है झाड़॥
कूलर पंखा, चलते हरदम।
फिर भी नहीं है चैन, पल नहीं मारने दम॥
भागम भाग, कहां रहे हैं भाग।
हड़बड़ी गड़बड़ी, पता नहीं फिर भी भाग॥
प्‍यासा परिन्‍दा, पशु रहे हैं मर।
सूरज ढाता कहर, आग का उठाता लहर॥

अनार आम, गरमी देना थाम।
संगीत सुनाता साम, डुबोना न अपना नाम॥
जलता तन, तन बदन पीड़ा।
झुलझता है बदन, काट खाता है अग्‍नि कीड़ा॥
गांव शहर, उगल रहा आग।
औद्‌यागिक है विकास, या विनाश मानव जाग॥
आतंकवाद, भारत व्‍यवहार।
अपनों को रहा मार, सांप्रदायिता भ्रश्‍टाचार॥
मां की ममता, दुनिया में अपार।
देती है हमेशा प्‍यार, भारत माता को स्‍वीकार॥
अपना देश, सर्व धर्म का राग।
कौन इसको झोंकता,  द्वेश नफरत की आग॥
एकता गान, हम सब समान।
आओ मिलकर गाएं, हमारा भारत महान॥
                               
0000000000

राजेन्द्र भाटिया

‘‘टैंशन (परिभाषा, कारण व समाधान)''

प्राब्‍लम जब बने उलझन, होता है तब टैंशन।
जो हो रहा है, और होना चाहिए, में का फर्क, जब व्‍यक्‍ति को करे बेचैन,
होता है तब समस्‍या का जन्‍म, और शुरू होता है तब टैंशन।
जब समस्‍या हो व्‍यक्‍ति के बस में,
तब हो सकता है खतम, टैंशन।
पर जब समस्‍या न हो व्‍यक्‍ति के बस में,
और निर्भर हो दूसरों के सहयोग पर,
तब वक्‍त लग सकता है, दूर करने में टैंशन।
जब समस्‍या किसी भी व्‍यक्‍ति के बस में ना हो।
तब सिर्फ ईश्‍वर की प्रार्थना ही, दूर कर सकती है टैंशन।
समय पर समस्‍या को दूर ना करने पर भी, होता है टैंशन,
जितनी पुरानी समस्‍या, उतना बड़ा होता है टैंशन।
समस्‍या को टालने की बजाए, इसे फेस कर,
दूर करने में होता है खत्‍म टैंशन।
समस्‍या को सही समझना जरूरी है,
ताकि उचित प्रयासों से खत्‍म हो टैंशन,
अगर समस्‍या को सही समझने में हो काई कनफ्‍यूजन,
तब लिखकर समस्‍या को बयां करें, फिर पढ़े, कनफ्‍यूजन दूर करें,
जल्‍द होगा खत्‍म तब टैंशन,
यही है, प्रोवन जापानी तरीका, खत्‍म करने का टैंशन।
    चाहतें यदि जरूरतों से ज्‍यादा हों,
    तब लेता है जन्‍म टैंशन।
व्‍यक्‍तिगत जरूरतों को, करें हम कम,
घए जाएगा तब टैंशन।
    सच का पकड़े रहे दामन,
नहीं रहेगा, तब टैंशन,
अच्‍छी हैल्‍थ से होता है, अच्‍छे विचारों का जन्‍म,
हैल्‍थ पर भी पूरा हो ध्‍यान, व्‍यायाम का हो जीवन में उचित ध्‍यान,
नहीं होगा तब टैंशन।
    कठिन परिस्‍थिति में भी, रखे चेहरे पर मुस्‍कान,
आसान होगा तब टैंशन का समाधान।
वाणी पर रखो पूरा नियंत्रण, जब हो टैंशन,
नहीं बढ़ेगा तब टैंशन।
    अपने हितकारी को, खुलकर बताएं टैंशन,
सलाह और सहयोग से, करें खत्‍म टैंशन।
विषय के विशेषज्ञों की जरूरत ले सलाह, और करें इसका पूरा पालन,
जल्‍द खत्‍म होगा तुम्‍हारा टैंशन।


    बचे औंरो की करने से आलोचना,
यदि चाहते हो दूर रहे टैंशन।
औरों के अच्‍छे काम व गुणों का, खुले दिल से करो एप्रीसिएशन,
नहीं पनपेगा तब कोई टैंशन।
    यदि कर दे तुम्‍हारा कोई नुकसान,
तो तुरंत क्रोध की बजाए, करो विश्‍लेषण,
और खोजों कारण एवं इन्‍टेशन,
यदि इन्‍टेशन ना हो दूसरे का तुम्‍हें करने का नुकसान,
तो हो सके तो कर-दो उसे माफ,
दो उचित ज्ञान, ताकि ना हो सके दोबारा नुकसान,
तो धैर्य से उसे समझाओं, और दोबारा ना हो सके नुकसान,
इसका करो इतमिनान,
हो सके तो दूसरे के इन्‍टेशन का कारण ढूंढो,
और करो उस कारण का भी निदान,
ताकि वो बने तुम्‍हारा हितैषी, और ना करे कोई नुकसान,
और यदि सभी प्रयत्‍न हो जाए विफल, तो उस व्‍यक्‍ति से कर लो अपने को दूर,
या फिर, उसके बुरे इरादों का करो मुंह तोड़ जवाबे ऐलान,
लड़ाई का भी हो रास्‍ता कानूनन,
ताकि आ ना सके कोई अनड्‌यू टैंशन।
रिश्‍तों में ना पड़े दरार,
निभा ना सको, करो मत ऐसा इकरार,
रखो मत ज्‍यादा किसी से एक्‍सपेक्‍टेशन,
चाहते हो यदि ना पनपे टैंशन।


रचयिताः राजेन्‍द्र भाटिया
जयपुर-302004
000000000000000


 

मंजुल भटनागर

मरती हुई अपेक्षाये 
डूबकती आशाओं के बीच
नारें आक्षेप
भ्रमित करते हैं
सैकड़ों बार बोले गए
गूंजते रहें हैं ,दिलो दिमाग में .

अजब मेला है
हर कोई खेल रहा
चुनावी शतरंजी पत्तें ...
नुक्कड़ पर, चाय के कुल्ल्हड़ पर
नुकीले पंजों पर .

आदिम होती भाषा
एक भूखा फुटपाथ पर
गूंगा बन हाथ फैला रहा है
नेता  का स्वाभिमान टकरा रहा है
क़ानूनी किताबों में छिपे कायदे
असहाय ,ताक रहें है.

चुनाव का चम्बल
एक ही हमाम के
व्यभिचार ,झूठ, दंगल
स्वाभिमान गर्व की कुर्बानी
हर भ्रष्ट नेता की जीत पर
हारती है राजधानी .
00000000000000


 

पद्मा मिश्रा


तुम्हारी याद आती है --[३]
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
तुम्हारा गाँव ,गलियां ,देहरी छत सा बड़ा आंगन
हवा में गूंजती वो आरती की जोत वाली धुन,
वो 'माँ 'की आरती गाना ,वो श्रद्धा से भरी आँखें ,
फिजां में तैरते वो श्लोक सारे याद आते हैं ,
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
तुम्हारे हाथ जो बुनते ,उलझते ऊन के धागे ,
न उलझी जिन्दगी की डोर ,,ममता से भरी आँखें ,
तुम्हारे मौन में डूबे नयन माँ ,याद आते हैं .
शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
कभी हमने नहीं जानी थीं सुख दुःख-सी बड़ी बातें,
कहाँ ढलता है दिन ,और कौन सारी रात जगता है ,
कभी दुःख की नहीं ओढ़ी,जरा भी हमने परछाईं ,
तुमने सुख सदा बांटे ,दुखों की चोट खुद खाई ,
तुम्हारे स्नेह के अनमोल  पल , माँ,याद आते हैं
  शहर में अजनबी हूँ ,माँ !तुम्हारी याद आती है ,
---पद्मा मिश्रा -जमशेदपुर
0000000000000


 

अनुपमा तिवाड़ी

रिश्‍ते

प्‍याज़ की पर्त से
होते हैं, रिश्‍ते।
प्‍याज़ का हर पर्त से रिश्‍ता
अलग तरह का।
कोई दूसरी पर्त नहीं
पहली - सी।
प्‍याज़ दिखता है
कितना सख्‍त
पर, वो तो प्‍याज़
होता ही नहीं।
पर्त दर, पर्त ही
बनाती हैं, उसे प्‍याज़
प्‍याज़ को काटो
तो कितने आंसू आते हैं न ! !
--.
कहना


कहना होता है
कितना जरुरी
कहने भर से
सुंदर और सुंदर होने लगता है
न कहने पर भी कहना चलता है
मन नहीं मन।��
कितनी चीजें आ खड़ी होतीं हैं
कहने को रोकने के लिए ।
पर, फिर भी हम कहना चाहते हैं
कहते नहीं हैं
कहना चाहते हैं
कहते नहीं हैं
और फिर कहते नहीं हैं
कहते नहीं हैं।
--.
मौत

सारी माँएं एक से अद्‌भुत शिशु देती हैं
इस दुनिया को।
एक से पाठ पढ़ाती हैं
इसलिए
सारी माँओं के आँसू एक से होते हैं।
कितना ज़रुरी है
चाँद पर जाने से ज्‍यादा
धरती पर इंसान को
इंसान बनाए रखना।
यूँ तो इंसान सदा से क्रूर मजाक करता रहा है
पर जब - जब वो क्रूर मजा़क करेगा
मेरा - तुम्‍हारा काम
कुछ और, कुछ और बढ़ जाएगा
क्‍योंकि
''ओसामा बिन लादेन वाज़ नॉट बॉर्न ओसामा बिन लादेन''
न्‍याय की तराजू में मौके का पलड़ा
कितना भारी होता है।
पर छोड़ो
मौत बस मौत,
होती है।
हर मौत शांत कर देती है,
बड़े से बड़े उत्‍पाती को ।
वो दे जाती बस
आँखों में आँसू
और
होठों पर चुप्‍पी!!


--.
डर

तुमने कहा,
डरो मत
डर कुछ नहीं होता
डर अब है ही नहीं,
हाँ सचमुच !
सारे डर कम हो गए हैं
बस बढ़ गया है अब
आदमी से आदमी का डर।

--.
कंधे
यात्रा करते समय झुक जाते हैं   
कुछ सिर,पड़ौसी के कंधों पर
तो झटक देते हैं कई बार
वो, सिर
जो नहीं जानते
नींद की खुमारी क्‍या होती है ?
सहारा देने वालों के सामने बैठी
कुछ आंखें कहती हैं
झिंझोड़ दो इस सिर को
पर, कुछ कंधे फिर भी ढिटाई से देते हैं
सिर को सहारा ।
जो जानते हैं,
असली नींद - नकली नींद
पर, शायद वो नहीं जानते
अब कंधे कम होते जा रहे हैं
कि, जिन पर सिर रख कर कोई सो सके,
सिर रख कर रो सके,
और पहुंचा सके किसी को,
अंतिम यात्रा
----.
कामकाजी स्‍त्रियां

कामकाजी स्‍त्रियां
ले कर घूमती हैं
बड़ी - बड़ी गठरियां
आंसुओं की।
मिलते ही अपनी - सी
वे खोलती हैं,
अपनी - अपनी गठरियां
करती हैं साझा
आंसू ․․․․․․․․․․․․
अपनी हथेलियों में फंसाए
एकदूसरी की अंगुलियां
देती हैं सांत्‍वना।
उनकी बेबस आंखें पढ.ती हैं
एकदूसरी को गहरे से
पर, होठ कहते हैं
औरतों में बहुत ताकत होती है।

---.
    रिश्‍ता

कच्‍चे धागे सा रिश्‍ता
मेरा - तुम्‍हारा।
टूट सकता है
एक झटके से।   
इसमें नहीं बहती
खून की नस कोई
सिरों पर बंधन की
कोई गांठ भी तो नहीं।
पर, यह धागा
आज भी उतना ही रंगीन है,
उतना ही चमकीला,
जितना पहले दिन था
बांधता है मुझे तुमसे,
सात जन्‍मों के बाद तक के बंधन में।


---.
वो धार्मिक ?
मैं बचपन में समझती थी
पाखंडियों को धार्मिक
जितना पाखंडी
उतना धार्मिक।
आज धार्मिकों को डर है,
पाखंडियों से
ये कैसे धर्म है ?
इंसान को इंसान से डर ?
क्‍योंकि,
वे धार्मिक नहीं 
कट्‌टर हैं।
डर बिठाया था
मेरे अंदर
बचपन में।
अन्‍य धर्मावलंबियों से
पर, आज मैं डर गई
अपने ही धर्म के लोगों से
क्‍योंकि, उनके कान बंद
और मुंह, हाथ खुले थे।

---.
जो किनारे पर खड़े हैं ....

जो किनारे पर खड़े हैं
वही सबसे पहले डूबेंगे ।
सबसे पहले उनकी नौकरियाँ जाएँगी
सबसे पहले उन्हीं की बस्तियाँ,
आग के हवाले होंगी ।
सबसे पहले वही विस्थापन के नाम पर
धकेले जाएँगे
यहाँ - वहाँ, वहाँ - यहाँ पर कहीं नहीं।
सबसे पहले उन्हीं की गलतियाँ अक्षम्य होंगीं
सबसे पहले उन्हीं की माँ - बहन बलात्कार की शिकार होंगी
रोंदी जाएँगी, कुचली जाएँगी और अंततः मार दी जाएँगी
ये किनारों पर खड़े आदमी
नहीं डरते हैं,
प्राकृतिक विपदाओं से
नहीं डरते हैं
किसी अज्ञात ताकत से
इन्हें डर है,
आदमी की ताकत का ।
कितना डर है, एक आदमी को, एक आदमी से ।
क्या तुम भी किसी से डरते हो ?
यदि डरते हो
तो वह आदमी नहीं है
जिससे तुम डरते हो ।

----.
वैश्‍या

वैश्‍या,
जुमले बहुत घड़े हैं समाज ने
तुम्‍हारे लिए
तुम्‍हारा होना भी चिरकाल से स्‍वीकारा है
समाज ने
जायज भी ठहराया है
कहते हुए कि
''यदि वैश्‍या नहीं होतीं, तो व्‍याभिचारी कहां जाते ?''
सबसे निकृष्‍ट कही जाने वाली वैश्‍या,
तुम तो शिव के समान हो गई हो
तुमने समाज का विष रख लिया है कंठ में
जो निगल गईं तो नहीं बचोगी
और उगल दिया तो फैल जाएगा सब जगह
चौराहों से घरों तक
तुम तो बन गई हो पत्‍थर की मूर्ति जैसी
जो अब रोती नहीं है
न ही चोटिल होता है,
तुम्‍हारा शरीर
न ही आहत होती हैं,
तुम्‍हारी भावनाएं
तुम बन गई हो रबड़ की गुडि़या
जिससे कोई भी खेल जाए
और फेंक दे
उस बदनाम बस्‍ती में
जिसे देखने भर से शर्मसार होती है,
सभ्‍य समाज की, सभ्‍य बिरादरी
'हां' तुम भी कभी रही होंगीं
10 - 12 साल की
बात - बात पर रोने वाली
जिद करने करने वाली
भावी स्‍त्री
पर तुम स्‍त्री नहीं बन सकीं
न ही बन सकीं महिला
समाज की जरुरत के लिए तुम बन गईं वैश्‍या
सुनो, तुम पर कुछ स्‍त्रियां जार - जार रोती हैं
कौनों में बैठकर,
हाथ बांधे।
---.
कच्चे किले
ताकत,
तुमने अलग – अलग प्रकार की मिट्टी के
कितने ही रंग के
बनाए हैं किले
छोटे – बड़े. 
हाँ, तुम जानते कि तुम्हारे बनाए
ये सब किले
कच्ची मिट्टी से बने हैं
जिनकी कोई नींव नहीं है 
इसलिए  
तुम कितना डरते हो
आँधियों से.
जब भी तेज हवाएं चलीं बस तुमने
रंग रोगन करके
अपने किले को जैसे – तैसे बचाने की कोशिश की
तुमने मिट्टी को नहीं जाना  
तुम बस किले को बचाना चाहते रहे हो,
आँधियों से.
ये मत भूलना तुम
कि
मौसम बदलते हैं,
सदा एक से नहीं रहते
कच्ची मिट्टी से बने
तुम्हारे ये किले भरभरा कर ढह जाएंगे
फिर ये आँधियों से नहीं रुकेंगे ........
---.
दो और दो का मेल हमेशा, चार कहाँ होता है ?
जीरो से सौ तक रेंज होती है
रिश्तों की,
प्यार की,
रंगों की,
भेदभावों की.
इन सब में नहीं होती
स्पष्ट कोई रेखा
इनमें होता है ओवरलैप – सा
एक से दो के बीच.
इसलिए तुम क्लेम नहीं कर पाते हो असलियत को
कभी – कभी नहीं, बहुत बार.
जीवन गणित नहीं होता
एक और दो के बीच होते हैं
बहुत से धागों के रेशे
जिन्हें तुम पकड़ नहीं पाते हो
पर वो होते हैं ......


अनुपमा तिवाड़ी
जयपुर
00000000000


 

मनुज


सुनो,
खोजना चाहता हूँ तुम्हें
सातवें आसमान तक
और उससे भी आगे
यदि तुम हो वहाँ

इस प्रकृति के
कण-कण में भी
तुम्हारे होने को
महसूस करूँगा
यदि तुम हो यहाँ

मैं चाहता नहीं
तुम्हें पा जाना
बिना श्रम के
कहीं, कभी
यदि तुम हो कहीं

कभी -कभी
तुम्हारा होना
महसूस होता है
मेरे अंतरमन में
क्या तुम हो यहीं
---

स्त्री -३

स्त्री,
तुम्हें मैं केवल
पुरुष की तरह
प्रेम नहीं करता,
तुम्हें मैं
एक सम्पूर्ण
मनुष्य की तरह
प्रेम करता हूँ।

--
मैं पत्थर सा
पुरुष होने के दंभ में
तुम्हें देखता हूँ
स्त्री तुम,
बारिश की
मिट्टी की तरह
सोंधी-सोंधी
महकती रहती हो
मैं तुम्हें
मेरा आधार
होने से
नकारता हूँ
और तुम बस
मुस्कुरा देती हो

--
ये जो तुम बैठे हो
बालकनी में अपने
चाय का सिप लेते हुए
बारिश में मुझे भीगता देख
हँस कर कह देते हो
क्या पागल है
बेवजह भीगता है बारिश में

एक तो यह कि
तुम बैठे हो जिस छत के नीचे
उसकी नींव में डाले पत्थरों पर
मेरे हाथ की उंगलियों के निशान हैं
और वह मुझे दिये मेहनताने से
नहीं मिट पायें है
तो तुम्हें मुझ पर हँसने का
कोई हक नहीं –
----
और मेरे
छाता नहीं खरीदने की वजह
बस यही है कि
बारिशें अब पहले सी
नहीं रही
और
छाते के रुपयों से मैं
बेटी को किताबें ले आया
कि कभी मैं भी
इत्मीनान से बैठ सकूँ
अपने घर में अपनों के साथ
मगर मैं मजाक नहीं बनाऊँगा
तुम्हारी तरह
----

0000000

कैलाश यादव सनातन


एहसास

अगर मेरे गम का․․․․․ एहसास होता, कभी गम न देते,
                       मेरे संग होते․․․․․․
अश्‍कों में मेरे, तुम डूब जाते, मुझको यकीं है, मेरे संग रोते․․․․․․․․․․․
अगर मेरे गम का एहसास होता, कभी गम न देते,
                       मेरे संग होते․․․․․․
              लफज मिले कब․․․․․ जज्‍बातों को, कलम कहां लिख पाई है आहें․․․․․․․․․․․
              गम की किस्‍मत लिखते हैं आंसू, पथरीली हैं․․उनकी राहें․․․․․․․․․․․․․
              अगर मेरे अश्‍कों का․․․․․ एहसास होता, कभी गम न देते․․․․
              अगर मेरे गम का एहसास होता, मेरे संग होते․․․․․․
              अश्‍कों में मेरे, तुम डूब जाते, मुझको यकीं है, मेरे संग रोते․․․․․․․․․․․
सांसों की होती․․․․․․ नहीं कोई भाषा, धड़कन की होती․․․․․․ नहीं कोई बोली․․․․․․․․․․․
इक गर है दामन․․․․․तो दूसरा चोली․․․․․․․․
दोनों सदा संग․․․․ आते जगत में․․․․․․․․
और जब हैं जाते․․․उठती हैं संग-संग
दोनों की डोली․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․․
  अगर मेरी संगत का, एहसास होता, कभी गम न देते․․․․․․․․․․
  अगर मेरे गम का․․․․․․․․․․․․․․․ एहसास होता, मेरे संग होते․․․․․․
  अश्‍कों में मेरे, तुम डूब जाते, मुझको यकीं है, मेरे संग रोते․․․․․․․․․․․

                               ‘‘सनातन''

000000

देवेन्द्रसिंह राठौड़


दुनिया के बाजार मे हर सामान बिकता है,
किसी की उम्मीद, किसी का अरमान बिकता है ।
बिलखते हुये बच्चे को दूध नहीं मिलता,
मजबूर उस माँ का, मान बिकता है ।
नेकी करके फैक दी, दरिया में हमने,
खुदगर्ज इस जहां में हर अहसान बिकता है ।
जर, जमीं, रूत्बे की होड़ मच रही,
झूठी शान की खातिर ईमान बिकता है ।
हर शय की होती तिजारत अब यहां,
शर्म अपनी बैचकर, इंसान बिकता है ।

पता :- देवेन्द्रसिंह राठौड़ (भिनाय),
        -
  Email:- dsrbhinai@gmail.com


0000000

रमाकान्त यादव


गैरोँ का गम आजकल
अपनाता कौन है ?
सबको पसंद हैँ, सुख के तराने
गम-ए-गीत गुनगुनाता कौन है?
क्योँ  दिखायेँ अब हम
अपने पुराने जख्मोँ को,
मरहम लगाता कौन है.
दिल पर जो चोट लगी
रोनेवाले रो लिये खुद ही,
किसी को रुलाता कौन है ?
हमको हुयी है मोहब्बत आपसे
इसलिये तन्हाइयोँ मेँ जीते हैँ,
वरना
गमोँ मेँ मुस्कुराता कौन है ?
--.

जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुके नौजवानों को,
हसीनों पर मरते सुना है.
जो बातेँ दिल की
बयाँ कर सकी न ये जुबाँ,
आखोँ से उसे कहते सुना है.
अपने मेँ मस्त मगन,
कभी हंसते तो कभी रोते सुना है.
मोहब्बत न करना किसी से
ऐ दोस्त,
जमाना बेवफा है
लोगों से ये कहते सुना है.

ramakant yadav
Class 12
jaunpur, u.p

3 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------