शनिवार, 31 मई 2014

पुस्तक समीक्षा - सपनों के वातायन

पुस्तक समीक्षा - 

समीक्ष्य पुस्तक --सपनो के वातायन [कविता संग्रह \

कृतिकार --पद्मा मिश्रा

प्रकाशक -सारस्वत प्रकाशन

मुल्य -१२५ रु


नैसर्गिक मूल्यों की तलाश --सपनों के वातायन

कविता साहित्य की सर्वाधिक  एवं बहुचर्चित विधा रही है ,इसकी अनगिन परिभाषाएं की गई हैं ,कुछ भावकों ने इसके कलापक्ष को और कुछ ने भाव पक्ष को अधिक महत्त्व दिया है ,कविता में कला और भाव का संतुलित प्रयोग हो ,यह एक बहु मान्य सिद्धांत रहा है ,

मई विश्व हिंदी सम्मेलन ,सूरिनाम [दक्षिण अमेरिका ]गया था ,वहाँ भारतीय एवं विदेशी विद्वानों से भेंट हुई थी ,कुछ लोग कविता ,विशेषतया हिंदी कविता के वर्तमान स्वरूप से चिंतित थे उनकी चिंता का कारन था -कविता का गद्यनुमा हो जाना ,सपाटबयानी से कविता को अखबारी समाचार बना देना अश्लीलता की बढती प्रवृत्ति --और कविता को वाद विशेष का घोषणापत्र बना देना इत्यादि।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में कविता को केवल ''वाणी का अमृत ''कह कर ही नहीं रहा जा सकता ,--वह समाज का दर्पण भी है --संघर्ष का पाथेय  भी है ,पर साथ ही उसका उद्देश्य लोक मंगल भी होना चाहिए ,मानव कभी रोबोट नहीं बन सकता ,जब तक मानव है ,उसकी संवेदनाएं भी साथ रहेंगी ,और उसका नैसर्गिक सौन्दर्य बोध भी उसे यंत्र मानव बनाने से बचाता रहेगा ,आजके सन्दर्भ में पद्मा मिश्रा की कवितायेँ इन्ही मानवीय पक्षों और नैसर्गिक मूल्यों की तलाश में प्रयासरत हैं ,ये कवितायेँ जीवन के हर संघर्ष में -सुख दुःख -हर्ष ,विषाद - के पलों में संजीवनी हैं ,उर्जा हैं -हर निराशा के अंधकार में राह दिखाती रौशनी की तरह। +प्रस्तुत संग्रह में कुल ८८ कवितायेँ हैं -कुछ शीर्षक हैं -तुम छू लो ,राष्ट्र वन्दना ,बेटियां ,--धरती के भींगे अंतर में ,--यह दिया विश्वास का। ।'टिस्को तेरे नाम जिन्दगी ,--अक्षर कुम्भ से लौट कर ,आदि --स्पष्ट है ,कुछ कवितायेँ भाव प्रधान हैं ,-कुछ में यथार्थ मुखरित है ,कुछ कवयित्री के निजी अनुभवों आधारित हैं ,और इन रचनाओं में भाव वैविध्य है ,

कवयित्री जहाँ नैसर्गिक सुषमा से प्रभावित होती है ,वहीँ वर्तमान समाज की विद्रूपता का विरोध भी करती है ,उसकी भाषा भवनुगामिनी होने के कर्ण सहज सवेद्य हो उठती हैं ----''बीते कल की मनुहार लिए ,

स्वागत का आगत भर लिए

गुण गुण करता ,

गीतों में राग विराग लिए

बासंती  मन क्या गाता  है ?

पद्म में एक भावुक ,संवेदनशील ,मानवीय अनुभूतियों से युक्त ,विकास शील कवयित्री के सभी गुण विद्यमान हैं ,उच्च शिक्षा प्राप्त और साहित्य की सभी विधाओं से परिचित पद्मा छोटे छोटे बिम्बों और प्रतीकों द्वारा बहुत कुछ कह जाती है -

''दहलीज पर खड़ी ओउरत   क्या सोचती है ?--                                    नम आँखों सेनिहारती ,

आकाश का कोना कोना

उड़ने को आकुल -व्याकुल

पंख तौलती है -तलाशती है राहें -

मुक्ति के द्वार की ,

कभी कभी प्रेम नारी जीवन में एक पूरक रूप में सामने आता है --

तुम कोई गीत लिखो और मैगाऊँ 

तुम लिखो धूप -छाँव सी कोई कविता

औरमै शब्दों की रंगोली बनाऊं                               --

कुल मिलकर यह एक पठनीय व् संग्रहनीय कविता संग्रह है ,आशा है भविष्य में और अधिक भावपूर्ण जीवन से भरी हुई रचनाएँ कवयित्री की लेखनी से प्राप्त होंगी

मैं इस कृति का साहित्य जगत में स्वागत करता हूँ ,

 

-----डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

जमशेदपुर -१३ --संपर्क ---0657 237089



कवयित्री --पद्मा मिश्रा

 

जमशेदपुर -13

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