ललिता भाटिया की लघुकथा - पत्थर दिल

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-- पत्थर दिल

आज राधा काम पर नहीं जा सकी थी । कल उस के बेटे राजू के स्कूल में छुट्टी थी सो वो राजू को अपने साथ कोठी पर ले गई थी सोचा वो अंदर काम करेगी तब तक राजू बहार लान में खेलता रहेगा । उस समय वो टामी के बारे में बिलकुल ही भूल गई थी । टामी राधा को तो पहचानता था पर राजू उस के लिए अनजान था सो मौका मिलते राजू पर झपट पड़ा उसे २ ३ जगह काट लिया । काम छोड़ राधा बेटे को मेडिकल ले गई काफी डांट फटकार के बाद आखिर एक नर्स ने इंजेक्शन लगा दिया । तभी उसे लगा बाहर कोई हे देखा तो दरवाजे पर मालकिन खड़ी  है । मन में उम्मीद कि किरण जगी । सोचा आज राजू के लिये कुछ फल लाएगी । मालकिन आप आइये ,वो बोली

आना छोड़ हम तो ये जानने आये हे कहीं तुम्हारे बेटे को और कोई बीमारी तो नहीं जैसे टी बी ,अस्थमा

नहीं मालकिन मेरा राजू एकदम स्वस्थ हे ।

ओह थैंक गॉड मुझे डर था कहीं तुम्हारे बच्चे को कोई बीमारी

हुई तो उसे काटने से मेरा टौमी बीमार न हो जाये । अच्छा में चलती हूं तुम राजू का ध्यान रखना मैंने दूसरी काम वाली रक्ख ली हे राधा बुत बनी पत्थर दिल औरत को जाते देखते रही ।

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7 टिप्पणियाँ "ललिता भाटिया की लघुकथा - पत्थर दिल"

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव8:37 pm

    ललिता भाटिया जी की कहानी पत्थर दिल
    बहुत मार्मिक लगी ऐसे लोग संसार में होते हैं
    जो पूरी तरह से संवेदनाहीन होते हैं अछि लहनी के लिये बधाई

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  2. जमाने के चलन से मिलतू डजुलती .. वास्तविकता के निकट अच्छी कहानी.

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  3. लघुकथा कि सबसे बड़ी विशेषता यही है कि कम शब्दो में भी गहरा प्रभाव होता है इस दृस्टि से लेखिका ने सफलतापूर्वक निर्वहन किया है.

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  4. लघुकथा कि सबसे बड़ी विशेषता यही है कि कम शब्दो में भी गहरा प्रभाव होता है इस दृस्टि से लेखिका ने सफलतापूर्वक निर्वहन किया है.

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  5. मार्मिक कहानी

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