शनिवार, 3 मई 2014

डॉ. सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - माँ दिवस पर विशेष -: मासूम किलकारी के लिए इंतजार का नाम है – “माँ”-

मई द्वितीय रविवार (11 मई) माँ दिवस पर विशेष

-: मासूम किलकारी के लिए इंतजार का नाम है – “माँ”-

संसार में आया हर प्राणी अपनी माँ से अधिक और किसी का ऋणी नहीं हो सकता। दूसरे अपेक्षा रखते हैं, पर माँ उत्सर्ग करती है। उसकी करूणा, स्नेह, ममता अैर वात्सल्य का रस पीकर ही एक बच्चा मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है। माँ सर्वव्यापी सत्ता की प्रतिकृति है। देश जाति की संकीर्णताएँ उसकी ममता को कभी अवरूद्ध नहीं कर पायी। राम, कृष्ण, गौतम, महाराण प्रताप, शिवाजी, सुकरात, अरस्त़ु आदि सभी महापुरूषों के जीवन में छलकने वाली संवेदना प्राण और प्रकाश उनके जीवन में उनकी माँ के स्तनों में भरे दूध से ही होकर आया है। माँ की प्रतिष्ठा ही मानवता की प्रतिष्ठा है। नारी के अनेक रूपों में माँ के ही संस्कार सर्वत्र बिखरे दिखायी देते हैं। उनकी पवित्रता की रक्षा, मातृत्व का सम्मान और उसके उपकारों का मूल्य अदा करने का हमारा कर्त्तव्य मजेदार गुलगुले गद्दों में जाकर सो जाये तो इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती। माँ के प्रति बरती गयी कृतघ्नता किसी भी रूप में हितकारी नहीं, चाहे वह वैयक्तिक हो या सामाजिक । ऐसा करके मनुष्य अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारने जैसा अहित कर बैठेगा।

-: विश्वास और अनुभूति का नाम है - माँ :-

इस दुनिया में माँ ही वह पात्र है जो विश्वास और अनुभूति के साथ एक प्रगाढ़ रिश्ता कायम रखती है। गर्भ में होने वाले एहसास से लेकर, अपने पेट पर चलाये जाने वाले लात की मीठी अनुभूति और धीरे-धीरे सारे अंगों का निर्माण करने से लेकर बच्चे के जन्म और उसकी मासूम किलकारियों तक न जाने अपने मातृत्व की कितनी परिभाषाएं गढ़ती रहती है। वह अपने स्नेह, त्याग, उदारता और सहनशीलता के एक नहीं अनेक प्रतिमान गढ़ने में निरंतर लगी होती है। हम स्वयं जिसका अंश कहें जाते है, उसका ऋण कैसे चुकाएं। हमारे द्वारा ऋण चुकाने की कल्पना भी सूरज को दिया दिखाने जैसी अथवा उसका एहसास का बदला चुकाने जैसी धृष्टता से कम नहीं आंकी जा सकती है। हमारे सृजन से लेकर जन्म तक की माँ द्वारा बरती गयी सावधानी की गिनती की जाये तो कितने और कैसे-कैसे अहसान हैं इस पर ही हम उलझ कर रह जायेंगे। जन्म देने के बाद जब कभी वह हमें भूखा देखती तो अकुला उठती। क्या हम स्मृत कर सकते हैं दाल-चांवल से लेकर मटर पुलाव तक, अजवाईन वाली नमकीन पूरी पराठों से लेकर मेथी-आलू के पराठों तक, मलाईदार श्रीखण्ड से लेकर पुरनपोली तक और कुरकुरी भिण्डी से लेकर भुट्टे के पके व्यंजन तक जो माँ के अलावा और किसी के त्याग से दूर तक नाता नहीं रखती है। माँ को ईश्वर ने सृजनशक्ति देकर एक विलक्षण व्यवस्था का प्रमुख पात्र बनाया है। माँ की ऐसी ही महिमा को कुछ इस प्रकार भी कहा जा सकता है -

ममता भरा तेरा चेहरा, छाया मोहब्बत का जज्बा।

कायम रहे साया तेरा, कदमों में है स्वर्ग का पता।।

-: दोनों जहाँ से बरसाती है आशीर्वाद :-

ईश्वर हर जगत नहीं पहुंच सकता इसलिए उसने दुनिया में माँ भेज दी। यह भी सत्य है कि मां हर किसी के पास होती है, वह हर जगह होती है। हाड़-मांस का जीवित शरीर ही माँ की कल्पना को साकार नहीं करता है बल्कि उसके न होने पर भी उसके होने का अहसास हमें संबल प्रदान करता है। वह जब तक इस नश्वर संसार में हमारे साथ जीवित होती है तो उसकी ईश्वरीय छाया हमें सुख और आनंद प्रदान करती है इस संसार में अपना जीवन पूरा कर लेने के बाद जब वह प्रत्यक्ष रूप से हम सबके बीच नहीं होती तब उसके आशीर्वाद का सुरक्षा कवच हमें हर मुसीबत से बचाता रहता है। माँ की इन्हीं सारी बलिदानियों और त्याग की पराकाष्ठा के चलते हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे माँ एक अथाह नीला समुन्दर है जो सभी को अपने आप में समा लेने की असीम शक्ति रखता है। कितने भी बड़़े तूफान के बाद वह पुनः शांत, धीर और गंभीर बना रहता है। एक माँ अपने दिन का आरंभ चाहे ऊं से करे चाहे वाहे गुरू की कृपा से, चाहे ला इल्लाह से याफिर ओ़। गॉड से उसके हृदय और मन में सुकल्याण का एक ही शीतल जल छलछला रहा होता है। मेरी संतान यशस्वी हो, चिरायु हो, संस्कारी हो, सफल तथा वैभवशाली हो। उसकी प्रगति की राहें कभी कांटो से होकर न गुजरे, वह थके नहीं, झुके नहीं और अवसरों को चूके नहीं- इन्हीं निश्चल प्रार्थनाओं के साथ माँ की हर परीक्षा जुड़ी होती है। माँ घर की देहरी पर सजती कुमकुम रंगोली है, वह घर को आलोकित करता निष्कंप दीपक है। वह जीवन की पाठशाला की गुरूजी ही नहीं बल्कि चाक, कलम, पट्टी और तड़ातड़ पड़ती छड़ी भी है। अपने बच्चों को सबसे बड़ी दौलत मानने वाली माँ की भावनाएँ कुछ ऐसी होती हैं -

किसी ने माँ की हथेली पर काला तिल देखा

और कहा कि माँ यह दौलत का तिल है?

माँ ने अपने दोनों हाथों में उसका चेहरा थामा

और कहा - हां बेटा़। देखा मेरे दोनो हाथों

में कितनी दौलत है ़।

-: देना जिसका काम, माँ है उसका नाम :-

बच्चे के गर्भ में आने से लेकर उसे जन्म देने और अपने जीवन की अंतिम साँसों तक माँ इस दुनिया को कुछ न कुछ देने का ही काम करती है, इसके बदले में कुछ लेना विधाता ने उसे मानो सिखाया ही नहीं। वह अपना रक्त पिला-पिला कर अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के जीवन को उम्र प्रदान करती है। नौ महीनों तक हर प्रकार की तकलीफ को माँ बनने की खुशी में हँसते हुए सह जाती है। बच्चे को जन्म देने से पूर्व कई महीनों तक मतली, खुमारी आदि के प्रकोप से सामना करती रहती है। कभी चक्कर खाकर गिर पड़ती है तो कभी प्रसव की असहनीय पीड़ा को बर्दाश्त न कर पाने के कारण अपना जीवन ही खो बैठती है। बच्चा सकुशल इस दुनिया में आ गया तो वह देश और समाज का हो जाता है न कि उसका। बड़ा होकर वह अपनी इच्छा के अनुसार अपना मार्ग तय कर माँ की ममता से दूर चला जाता है। देखा जाये तो बच्चे को दुनिया दिखाने के बाद एक माँ को सिवाय तकलीफ के कुछ और नहीं मिल पाता है। उसका शरीर गर्भ के कारण क्षीण हो जाता है, सप्ताहों तक वह चारपायी पर पड़ी रहती है, कराहती है, छटपटाती है। बच्चे के बड़ा हो जाने पर वह उसे मैया, लल्ला, बाबू कहकर पुकारती हुई खाना -पीना भूल जाती है। परिवार में भोजन की कमी रहने पर वह बच्चों और अन्य सदस्यों क ो खिलाकर स्वयं भूखी सो जाती है। माँ के इन्ही सारे त्याग को देख-समझकर किसी ने सहीं कहा है -

माँ पृथ्वी है, जगत् है, धूरी है।

माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है।

-: विवेकानंद जी ने भी मानी माँ की महिमा :-

माँ की महिमा का गान बड़े-बड़े विद्वानों ने भी किया है। फिर चाहे वे राजनीति के जानकार हों, समाजसेवी हों, या फिर भारतवर्ष के युवा दार्शनिक स्वामी विवेकानन्द ही क्यों न हों। एक बार की बात है एक जिज्ञासु स्वामी जी के पास पहुंचा और पूछा इस नश्वर संसार में माँ की महिमा ही सबसे अधिक क्यों गायी जाती है? स्वामी जी ने हल्की मुस्कुराहट के साथ उस जिज्ञासु से कहा एक पांच सेर का पत्थर लेकर आओ । जब वह जिज्ञासु पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने कहा इसे एक कपड़े में लपेटकर अपने पेट में बांध लो और चौबीस घण्टे बाद मेरे पास आना। उस जिज्ञासु ने वैसा ही किया किन्तु महज कुछ घण्टों बाद ही उसके लिए कुछ भी काम करना आसान न रहा। उसे दिन में तारे नजर आने लगे। वह थका-माँदा स्वामी जी के पास आया और बोला अब मैं इस बोझ को और नहीं उठा सकता। आपने मेरे एक प्रश्न के लिए इतनी बड़ी सजा मुझे क्यों दी? स्वामी जी ने पुनः बड़ी सहज मुस्कान के साथ कहा। इस पत्थर का वजन तुमसे कुछ घण्टे सहा नहीं गया, और एक माँ पूरे नौ माह तक शिशु का बोझ उठके फिरती है। उस बोझ के साथ वह सारा काम करती है और जरा भी विचलित नहीं होती। इसीलिए माँ की महिमा इस संसार में सबसे अधिक गायी जाती है। जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत हो गयी। इसी तरह एक अन्य विद्वान ने कहा है - हर कलाकार अपनी कला को अपना नाम देता है, किन्तु माँ जैसी कोई नहीं जो स्वयं बच्चे को जन्म देकर नाम उसके पिता का देती है। माँ की महिमा की एक बानगी इन लाइनों में दिखायी पड़ती है :-

किसी ने माँ के कन्धे पर सिर रखकर पूछा

माँ कब तक अपने कन्धों पर सोने दोगी ?

माँ ने कहा जब तक लोग मुझे

अपने कन्धों पर न उठा लें ।

विश्व के रंगमंच के ऊंचे से ऊंचे पदों पर पहुंचे और महानता के उच्च शिखर को छू चूके लोगों के जीवन इतिहास पर नजर डालें तो माँ की ममता और आशीर्वाद के पक्ष में उदाहरण देने की जरूरत न पड़े। ऐसे लोगों के विकास में सामाजिक पारिस्थितियों, शिक्षा एवं संसाधनों आदि का सीमित योगदान रहा है। माँ के प्रति अनन्य श्रद्धाभाव ने ही उन्हें सफलता के शिखर पर पहुंचाया है। यह भाव न केवल उनके जीवन के आरंभिक काल में बना रहा वरन् अंतिम समय पर प्रेरणा देता रहा है।

 

जूनी हटरी,

राजनांदगांव छ.ग.

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