शनिवार, 24 मई 2014

अरुण कुमार झा की लघुकथा - निकट सहयोगी

 

मैं एकदम बेजार था। समाज में निभाव के लिए जो तजरबा चाहिए, मेरे पास कभी रहा नहीं। मेरे अपनों की मेरे बारे में धारणा लगभग यही रही कि मैं कुछ कर गुजरने के लिए बना हूँ । समय-समय पर मेरा कोई अपना मुझे एक ठिकाना दे देता और उस लक्ष्यप्राप्ति की जिम्मेदारी मेरी होती। यदि मैं कहूं कि मैं कभी लक्ष्यच्युत नहीं हुआ हूँ तो अतिशयोक्ति नहीं करूंगा। साथ में यह भी बता दूं कि शिखर को छूने की मेरी यह यात्रा सदैव संशय के बादलों के बीच ही घुमड़ती-बढ़ती रही है। इन्हीं से मुझे बल मिलता है। मुझे इस पद्धति में कोई दाग भी दिखाई नहीं देता।

यह पहला मौका है जब मैं आहत हुआ हूँ।

मैंने सुना है कि प्रकृति के पास कुछ ऐसा खास करिश्मा होता है जो संतुलन कायम रखने में उसकी मदद करता है। विकट स्थिति में भी कुछ ऐसा घट जाता है कि पेड़-पौधे भी मुस्कुराने लग जाते हैं। आज यह मौका मैं आपको दे रहा हूँ। आप मेरी जिंदगी को एक ऐसी रेस का घोड़ा कह लें जिसकी लगाम हमेशा दूसरों के हाथ रही है। इस वाक्केलि पर आपकी स्मित मुस्कान देख शायद मेरे होंठ भी क्षण भर को थिरक लें।

.... पर मेरी बेचैनी जाती नहीं।

इसके पीछे के कारणों को मैं जानता हूँ। ... क्योंकि कुछ प्रतिक्रियाओं पर हमारा बस नहीं चलता? ... वे अपनी धुन में आती हैं और अच्छा-बुरा प्रभाव छोड़कर अनायास गायब हो जाती हैं। एक अजी‌म जिंदगी का तलबगार होने के नाते कोशिश करता हूँ कि जिंदगी की हर मुश्किल पर संशय रूपी चादर फैलाऊँ, आतशी शीशा में उन्हें परखूं, गुनूं, तौलूं और प्रभाव बुरा होने की स्थिति में बचाव के उपाय सामने लाऊँ। ... प्रकृति, चाहे हमें जैसी मिली हो, उसे खूबसूरत ठाठ-बाट देना हमारा कर्तव्य बनता है।

थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। तब देश आजाद नहीं हुआ था। देश के हर प्रदेश में छोटे-बड़े जमींदार हुआ करते थे। जुग जमाना बदला तो सोच भी बदलनी चाहिए पर ऐसा कम हुआ या शायद बहुत धीरे-धीरे हुआ। मेरा घर भी अपवाद न था । किसी खास रंदा से घिसते-घिसते खयालात भी अक्सर खास शक्ल अख्तियार लेते हैं। पैसा खुदा से कम नहीं जैसी बात पर मेरे घर वालों का पुख्ता यकीन था। आप खुद सोचकर देखिए, ... आपको लगेगा कि दुनिया में तमाम सुख-सुविधाएं पैसे के इर्द-गिर्द ही नाच रही होती हैं। अहम का तराना भी देर-सवेर यहीं जम्हाई लेता है। अपनी मम्मा को हालां, मैंने विषम परिस्थितियों में देखा है - शान-शौकत के बीच जिंदगी की सांसें गिनते हुए - एक सुखद लक्ष्य की दुखद परिणति। ... मैं कसमसा कर रह जाता। ऐसी ही कसमसाहटों ने बचपन से मुझे दूसरों पर निर्भर रहना सिखा दिया।

मुझे नहीं मालूम कि रुचि के घर वालों ने मेरे घर वालों से क्या बात की। मैं यह भी नहीं जानता कि शहरी प्रोफेसर (डॉक्टर) सुजान चौधरी ने कैसे मेरे बापू को रिझाया, खिझाया या फिर पटाया कि मेरी पढ़ा‌ई आगे बढ़ चली। आज में इतना ही कह सकता हूँ कि वे दोनों परम मित्र हैं - एक लक्ष्मी का भक्त, दूसरा सरस्वती का अनुगामी।

प्रोफेसर साहब मस्त जीव थे। मैं और रुचि जब उनके करीब होते तो वे खूब ऊँची और बड़ी-बड़ी बातें किया करते; मसलन, रिश्तों की सीमा तो दुनियाबी सीमा है। इसका एहसास लक्ष्मण-रेखा लाँघ ले तो आदमी को बिगाड़ देता है। ... और जवाब मेरा नहीं, उनकी प्यारी बिटिया का होता – “आपको किसी यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर की उपाधि दे दी तो इसका मतलब यह नहीं कि आप सामने वालों को सिर्फ रोगी समझा करें।” डॉक्टर चचा जवाब देते – “मैं दवा या इंजेक्शन नहीं देता हूं बिटिया।” बेटी फिर लाड़ जताती – “आप किसकी बात करते हो पापा ! कैलिफोर्निया में, सुना है एक डॉक्टर दुखड़ा सुनने के लिए मात्र बीस मिनट का समय देता है और बदले में साठ डॉलर फीस वसूलता है। लोगों की बीमारी उसके यहाँ ऐसे ही ठीक हो जाती है।” ... अब आप मुझसे हिसाब मत लीजिए कि मैं रुचि के लिए कितना खास था? एक खूबी जरूर थी उसमें। खुद भले मुझे कुछ कह ले पर दूसरे उसके सामने मेरे ऊपर ऊँगली उठा दें, उसे यह स्वीकार न था। सिक्ता से भी उसकी खूब छनती थी। दोनों जब एक साथ होतीं तो बीच में अपनी कहना मेरे लिए बड़ा मुश्किल काम होता।

जब मैंने पी-एच. डी. की डिग्री हासिल कर ली तो मेरा कद थोड़ा बढ़ा । कुछ स्कूल-कालेजों में मुझे आमंत्रित कर समारोह मनाए गए। रुचि तो इतनी खुश हुई मानो यह डिग्री मुझे नहीं, उसे मिली है। एक प्रतिष्ठित संस्था के संचालन का भार मुझे सौंपा गया। सिक्ता के पिताजी हाल ही में विदेश यात्रा से लौटे थे। मेरी उपलब्धियों की खबर उन तक जरूर पहुँची होगी। मैं जानता हूँ वह अजराल टेक्नोक्रैट हैं। उनकी बात बापू नहीं टालते। बापू की मेरी शादी के लिए हाँ का मतलब मेरी जबान पर ताला लग जाना था।

मुझे स्वीकार लेना चाहिए कि एक अच्छी भली गृहस्थिन के रूप में सिक्ता से मैं खासा प्रभावित रहा हूँ । मेरे घर के लोग भी उनसे काफी प्रभावित रहे हैं। वह कुलीन परिवार में पली-बढ़ी हैं। हर काम करीने से पूरा करना-करवाना उनकी आदत है। घरेलू मामलों में उनके विचार इतने सोचे-समझे व सटीक हुआ करते हैं कि मुझे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती । ऐसा जीवन जहां मेरी इच्छा सर्वोपरि हो और घरेलू जिम्मेवारी का एहसास पत्नी न होने दे, मुझे ईश्वरीय वरदान लगता है। हाँ, इस दाम्पत्य का एक दूसरा पहलू भी है। सामान्य आदमी, मैं जानता हूँ, इसे मेरी ‘परम को जानने की जिज्ञासा’ का नाम देगा। समाजशास्त्री शायद इसे मेरा ‘छद्म व्यक्तित्व’ जैसा कुछ नाम दें। बुद्धिजीवी वर्ग इस क्रिया-प्रतिक्रिया में ‘व्यवहार्यता अध्ययन’ की संभावनाएं तलाशें। मानवतावादी सोच वाले इंसानी इम्दाद के नजरिये से इस पर टिप्पणी करें । संभव है, पुरुषवादी वर्चस्व दृष्टि से भी इस संबंध का आकलन हो। महिला मंडल की भी इस मामले में अपनी स्वतंत्र राय हो सकती है। बहरहाल, लोग चाहे लाख कह लें, सीधी-सच्ची बात मगर, यह है कि हम पति-पत्नी प्राय: साथ नहीं होते हैं। जब सिक्ता मेरे पास होती हैं, मैं वहां नहीं रहता और जब मैं उनके सानिध्य की तलाश में रहता हूँ तो उनकी औपचरिकताओं से लबरेज बातें मुझे बेघर किए देती हैं।

रुचि मेरे बेहद करीब थी। आपको शुरु में ही बता चुका हूँ कि अपने जीवन का प्राप्य मुझे अपनों के मार्फत ही मिला है, ... साफ क्यों न कहूं? ... अब तक की मेरी सारी उपलब्धियों का स्रोत रुचि रही है, ... छुपाऊँ क्यों? ... बचपन से लेकर बड़ा होने तक अपनी हर योजना पर रुचि की राय लिए बगैर मुझे कल न पड़ती और तुर्रा यह कि फैसला उसी का चलता जो वह मुझसे मनवा लिया करती थी। मेरा काम केवल उन फैसलों को अंजाम देना भर होता। एक बार उसकी तरफ से ‘हाँ’ हो जाने पर मैं पीछे न देखता। उसे मेरी बड़ी चिंता थी। वह अक्सर मुझे चेताती थी - “अपने फैसले खुद लेना सीखो, वरन जीवन को संभाल नहीं पाओगे सुमंत! यह यात्रा बड़ी लम्बी और मुश्किलों भरी होती है।” मैं बड़ी दृढ़ता से उसे जवाब देता – “तुम साथ रहोगी तो सब ठीक रहेगा।”

पर ... कुछ ठीक नहीं रहा।

परसों सब स्तब्ध थे। सन्नाटा की धड़कन मेरे घर में महसूस की जा सकती थी। हम तो वाचारुद्ध थे ही, बाहर से मातमपुर्सी के लिए आए लोग भी एकाध स्फुट स्वरों के सिवा कुछ बोल नहीं पा रहे थे। कहते भी क्या? मैं तो शोक मनाने के काबिल भी नहीं रह गया था। दिन किसी तरह गुजरा। रात भी चुप्पी समेटे आयी। मैं सो नहीं सका। सिक्ता की आँखें आकाश में कुछ हेरती-सी लगीं। मैंने उन्हें झिंझोरा- “सच बताना, रुचि ने वाकई आत्महत्या की है या कोई और मामला है?”

“मुझसे पूछते हो? तुम्हारा उसका बरसों का साथ रहा है।” आवाज तल्ख थी। क्षण भर को उन्होंने मेरी आँखों में देखा - मानो किसी अजनबी को देख रही हों ... और फिर एकदम-से मुझे भींच लिया ।

“बुरा मत मानना। नंदोई जी को रुचि पर शक था। जब तुम्हारे सारंग परियोजना की भनक उन्हें लगी तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। रुचि का ट्रांसफर मुंबई करवाने में नंदोई जी और मेरे पिता जी दोनों का हाथ था । मैं जानती थी कि तुम्हारे लिए यह परियोजना जीवन-मरण का सवाल है। पर रुचि का इस काम में तुम्हारा निकट सहयोगी होना डॉ. संशय कुमार को कतई स्वीकार्य नहीं था।”

और मैं तबसे यही सोच रहा हूँ ... अगर डॉक्टर संशय चाहते तो हमारी यह परियोजना पिछले साल ही पूरी हो गई होती। आज हम समारोध परियोजना पर काम कर रहे होते। आखिर डॉ. संशय भी तो सदैव हमारे निकट सहयोगी रहे हैं।***

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