गुरुवार, 15 मई 2014

प्रमोद यादव का हास्य व्यंग्य - मुलाकात एक जिन्न से…

मुलाक़ात-एक जिन्न से../प्रमोद यादव

न मालूम क्यों बचपन से मुझे भूत-प्रेत, जिन्न-पिशाच,आत्मा-परमात्मा आदि पर एक विश्वास जैसा रहा..छुट्टियों में गाँव जाता तो वहां के वातावरण में इस विश्वास को और बल मिल जाता...वहां ग्रामीणों का फुर्सत के समय बस यही एक विषय होता- भूत-प्रेत और जिन्न - पिशाच..जैसे हमारे यहाँ का होता है- राजनीति-भ्रष्टाचार और व्याभिचार-घोटाला...जहाँ गाँव में चार यार बैठते- बस शुरू हो जाता..भूत-प्रेत के सच्चे कारनामों का सिलसिला..टोनही की कारगुजारियों का सिलसिला.. जिन्न के किसी शरीर में घुसपैठ कर जाने का सिलसिला..मैं आत्मविभोर हो कांपते -डरते सब सुनता....मेरे भीतर का कौतुहल बार-बार उनसे पूछता-‘ क्या सचमुच ऐसा घटित हुआ ?’ तब सभी “ मिले सुर मेरा तुम्हारा” के अंदाज में एक सुर से इसे “ आखों देखी-कानों सुनी” घटना करार दे देते.. एक कहता- आधी रात को मैंने खेत के मेड़ों के ऊपर इन्हें जमीन से दो फीट ऊपर हवा में चलते (उड़ते ) देखा..दूसरा तुरंत इस बात की पुष्टि कर देता- ‘ हाँ..मैं भी साथ में था..’ कोई बताता कि कैसे पड़ोस की अच्छी भली महिला अपने बगल वाली टोनही के संगत में यह विद्या (?)सीख दो बच्चों को खा गई.. कैसे गाँव वालों ने उसे निर्वस्त्र कर बैगा के कहने पर गाँव से बाहर कर दिया..कोई बताता कि कैसे मंगलू को गाय चराते वक्त भूत ने धर लिया..कैसे अजीब-अजीब आवाज में गुर्राता था वह..बैगा को भूत भगाते पसीना छूट गया..लोगों को बताया कि कोई भारी भूत ने उसे दबोच रखा था..तब मैं भारी भूत का अर्थ नहीं समझ पाया..पर अब लगता है कि भारी से उसका आशय “जिया उल हक़” या “किंगकांग” के भूत से रहा होगा.

कभी–कभार ये भी बताते कि कैसे पड़ोस की जवान लड़की को समय-बेसमय कोई जिन्न पकड़ लेता है..जिन्न के पकड़ते ही वह विचित्र-विचित्र हरकतें करती है..मुझे होश सम्हालने के बाद मालुम हुआ कि शहर में तो जिन्न वाला ये काम जवान छोकरे कब से करते आ रहे हैं..

खैर..तो मैं बता रहा था कि गाँव जाकर मैं पूरी तरह भूत हो जाता..खाना-पीना सब भूल जाता..बस,यही किस्से-कहानी ही सुनता रहता..कभी-कभी सोचता कि क्या कभी किसी भूत-प्रेत या किसी जिन्न से मुलाक़ात होगी ? क्या कभी इन्हें “फेस टू फेस” देख सकूँगा? क्या इनसे बातें कर सकूँगा? इनकी असीमित शक्तियों के विषय में भी काफी कुछ पढ़ा था..कहते हैं कि ये अगर किसी पर मेहरबान हो जाए तो समझो उसकी लाटरी लग गई..”जो मांगोगे-वही मिलेगा” वाली बात हो जाती..उनके लिए हर वक्त ये हाथ फैलाए,सिर झुकाए “हुक्म हो मेरे आका” की मुद्रा में खड़े होते..ऐसे ही एक अदद जिन्न की मुझे हमेशा दरकार और ख्वाहिश रही..पर ख्वाहिश आज तक ख्वाहिश ही रही..

सुनते आया था कि अक्सर ये आबादी से दूर सुनसान इलाके में रहते हैं..श्मशान घाट के आस-पास ज्यादातर पाए जाते हैं.. रामसे की कई फिल्मों में भी ऐसे ही उजाड़ जगह अथवा खंडहरों में इन्हें देखा करता..इसलिए गाहे-बगाहे मैं कई बार भारी गर्मी भरी दोपहरी में श्मशान घाट की सैर कर लेता..वहीँ कुछ पल ठहर जाता..ये सोच के कि – “कभी न कभी कोई न कोई तो आएगा” पर सिवा दो चार मरियल कुत्तों के कोई न आता..हाँ..कभी-कभी “राम नाम सत है“ की धुन के साथ एकाध नया-नवेला भूत जरुर आ जाता..तब थोड़ी देर वहां और रुक जाता..ये सोच के कि नया-नवेला है..अभी पूरी तरह दुर्गति को प्राप्त नहीं हुआ..यहाँ की डोर से मुक्त नहीं हुआ..शायद मुझे और मेरी मंशा को जान ले..और मुझे मिलने का “एपाइनमेंट” दे दे..

एक दिन यूं ही श्मशान घाट के बाहर लगे पीपल के पेड़ के नीचे बने चौरे पर बैठे ऊपर पेड़ की ओर तक रहा था कि देखा पेड़ के तने में आठ-दस मिटटी के घड़े लटके रहे ..उत्सुकतावश उठा और एक घड़े का ढक्कन खोला ही था कि भूचाल सा आ गया..एकाएक अँधेरा घिर आया..बिजली चमकने लगी..जोरों की आंधी चलने लगी..मैं घबरा गया..समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ.. फिर दो-तीन मिनट की निस्तब्धता के बाद झक सफ़ेद कुरते पायजामे में एक मरियल से व्यक्ति का पदार्पण हुआ..मैंने पूछा- ‘ कौन हैं आप ? ‘

‘ मुझे जिन्न कहते हैं आका.. आपका गुलाम.. आपका खादिम..आपकी बरसों की मानसिकता से परिचित हूँ..इसलिए शायद मिलना हुआ...वैसे गैरों से मिलना-जुलना हमारे यहाँ निषिद्ध है..हम मिलते नहीं..केवल घुसते हैं..और वो भी अच्छी “बाड़ी” देखकर ही घुसते हैं..’

मैं मन ही मन हंसा..खुद की बाड़ी तो मकोड़ी जैसे..और ख्वाहिश है माधुरी में घुसने की..मैंने कहा- ‘ आओ जिन्न..स्वागत है..पर तुम जिन्न जैसे तो लगते नहीं..हमने तो आज तक जितने देखे-सब के सब मुस्टंडे..बाड़ी बिल्डर वाले..टकले..पहाड़ से ऊँचे..घनी मूंछों और लम्बी चोटी वाले ही देखे..हम कैसे मान लें कि तुम जिन्न हो ? ‘

‘ अरे..शंका का निवारण किये देते हैं..जिसे देखना चाहो..दिखा देते हैं..ऊपर के लोक में निवासरत किसी भी परिजन अथवा सेलिब्रिटी से कहो तो अभी के अभी मिलवा देते हैं..’

‘ सच..क्या ऐसा संभव है ? तो फिर नर्गिस को यहाँ बुलाईये..वो मेरी फेवरेट थी..’ मैंने कहा.

‘ नहीं आका....इस वक्त वो नहीं आ सकती..बाहर “डू नाट डिस्टर्ब” का बोर्ड लगा है..राज साहब से “श्री 420” की सीक्वल पर चर्चा चल रही हैं.. सीक्वल का ज़माना है न.. फारिग होगी तभी आ पाएगी..उनसे फिर कभी मिल लीजियेगा ’

मुझे शक होने लगा कि पहले ही फरमाईश को पेंडिंग में डाल दिया तो काहे का जिन्न ? फिर भी एक मौका और देते कहा- ‘ अच्छा..तो मधुबाला को बुला दो..’

उसने आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाया और संगमरमरी बदन वाली हसीन मधुबाला ततक्षण ही मेरे सामने खड़ी हो गई- “ पिया..पिया..ना लागे मोरे जिया.” जैसी लग रही थी..कुछ उदास-उदास.. उसकी खूबसूरती देख मेरी आँखें चौंधिया गई..मैंने “नमस्ते” कहा तो जवाब में उसने “वालेकुम सलाम“ ठोंक मिनटों में गायब हो गई.

‘ अब तो विश्वास हुआ न ? हम जिन्न हैं...’

‘ हाँ जी बिलकुल....तो जिन्न भाई..क्या तुम किसी से भी मेरी बात करवा सकते हो..? ‘ मैंने पूछा.

‘ अवश्य..पर केवल दस मिनट ही..उससे ज्यादा कतई नहीं..’ उसने जवाब दिया.

‘ क्या मैं झांसी की रानी से भी मिल सकता हूँ ? ‘ मैंने फरमाइशी व्यक्त की.

‘ घोड़े वाली से ?’ उसने उलटे मुझसे पूछा.

‘ हाँ..जी.. वही .. बिलकुल वही.. और क्या मैं नेहरुजी से भी बतिया सकता हूँ ? ‘

‘ बिलकुल आका....फिलहाल तो खाली ही बैठे रहते हैं..कोई पुस्तक भी नहीं लिख रहे..’ उसने कहा.

‘ क्या ग्राहम बेल भी मिल सकते हैं? ‘ मैंने और कुरेदा.

‘ टेलीफोन वाले न..बिलकुल मिल सकते हैं...पर एक बात याद रखिये...केवल एक ही शख्स से मिल सकते हैं.. वो भी केवल दस मिनट के लिए..अब तय आप करो कि किससे मिलना है..किससे बातें करना है..दस मिनट में सोचकर बताईये ..तब तक मैं आज (श्मशान) आये भूत (मेहमान) को देख लूँ.. ‘ इतना कह वह खिसक गया.

मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि किससे मिलूं ? अकबर से कि बीरबल से..मुमताज से कि मोनालिसा से..भगतसिंह से कि सुखदेव से..रहीम से कि रसखान से..प्रेमचंद से कि टालस्टाय से..ग़ालिब से कि मोमिन से..केनेडी से कि लेनिन से...मीरा से कि पारो से..लैला से कि हीर से..न्यूटन से कि आइन्सटीन से..गाँधी से कि गोर्की से..नेहरु से कि राजीव से..नंदा से कि स्मिता से..काका से कि किशोर से..मृणाल से कि बासु से..चोपड़ा से कि देसाई से...जयप्रकाश से कि चरण सिंह से..वी.पी. से कि डी.पी. से..इसी उहापोह में दस मिनट बीत गए और जिन्न आ धमका-

‘ हाँ..आका..बोलो..किससे मिलना है ? किससे बातें करनी है ?..अब की बार हमें ही वहां जाना होगा..बोलो..किसके पास चलें ? ‘ उसने उड़ने के लिए अपने बाजू फैला रखे थे..मुझे पीठ पर सवार होने का इशारा कर रहे थे..मैं बगैर एड्रेस बताये पीठ पर बैठ गया..और बिना रन वे के वह उड़ चला..मिनटों में ही पच्चीस सौ फीट की ऊँचाई में पहुँच गया..अचानक बराबरी से सफ़ेद दाढ़ी वाले का चार्टर्ड विमान गुजरा...वे खिड़की से झांकते मुझे वी.शेप में ऊँगली दिखा रहे थे..दोनों उँगलियों के बीच चुनाव चिन्ह भी फंसा था....मैं काफी रोमांचित हो उठा..लगा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे..मैंने जिन्न से कहा- ‘ अपनी गति थोडा तेज करो जिन्न..इस विमान को पीछे छोड़ना है..’

‘ कौन है इसमें आका ? ‘उसने पूछा.

‘ अरे ..जब सारे ब्रम्हांड की जानकारी रखते हो तो इसे नहीं जानते ?’ उलटे मैंने जिन्न को डांटा.

‘ वो क्या है आका..कि उस लोक की पूरी जानकारी हमें है..पर ये तो दूसरा लोक है न..आप ही बता दीजिये कौन हैं ? ‘ उसने विनती की.

‘ ये वो शख्स हैं जो पिछले दो-तीन महीनो से हवा में ही तैर रहें..उसे भी शायद किसी जिन्न ने पकड़ रखा है..नीचे आते हैं तो मिडिया में उड़ने लगते हैं..उनके भाषणों के चलते बच्चों ने टी.वी.सेट बंद कर रखे हैं..उनकी पार्टी के आधे से ज्यादा सयाने लोग भी इस “हवा-हवाई” के खेल से परेशां हैं..पर बोल कोई नहीं पा रहा..सब को जैसे सांप सूँघ गया है..अभी-अभी एक नया शो शुरू किया है..जो उन्हें नहीं जानते या जानना नहीं चाहते,उनके लिए अपने बारे में आठ पुस्तकें प्रकाशित कर “ मान न मान –मैं तेरा मेहमान” को चरितार्थ कर रहे हैं..लोगों को किताब बाँट रहे हैं.. उनकी ऊँची उड़ान से देश ही नहीं वरन विदेशियों के माथे पर भी बल पड़ने लगे हैं..’

‘ अरे.. तब तो मुझे इसे पीछे धकेल पछाड़ना ही होगा..लो हम आगे निकल गए..’ इतना कह जिन्न ने झटके के साथ गति बढाई और एक ही झटके में उस विमान से काफी आगे निकल गया.

‘ अरे..जाना कहाँ है आका.. किससे मिलना है..अब तक नहीं बताया आपने..’ जिन्न को अचानक याद आया.

‘ दरअसल सूझ ही नहीं रहा जिन्न कि किससे मिलूं ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कल-परसों तक सोचकर तुम्हें बताऊँ ? ’

‘ अरे नहीं आका ..हमारा एक दिन दस साल का होता है..तो समझो अब बरसों बाद ही मिलेंगे..तब तक सोचकर रखना..फिलहाल यह कार्यक्रम यहीं स्थगित..अब हम समय ख़राब नहीं करेंगे..हमें ऊपर से अर्जेन्ट बुलावा है..चलो तुम्हें उस दाढ़ीवाले के विमान में घुसा देते हैं....तुम उनके साथ अपने ठिकाने उतर जाना..’

मैं जोर से चीखा - ‘ नहीं.....चाहो तो पीठ पलटी कर मुझे यूं ही नीचे गिरा दो..पर उनके साथ नहीं जाना....टी.वी. में सुनते-सुनते पक गया हूँ..अब क्या मार ही डालने का इरादा है ? ‘

‘ मुझे क्या ? ये लो....’ कहते उसने तुरंत पीठ पलटी कर मुझे नीचे गिरा दिया..

मैं ‘आह...’ का तेज क्रंदन करते धडाम से नीचे आ गिरा....उठने की कोशिश की तो खुद को बिस्तर के नीचे पाया...सचमुच.. कैसे-कैसे सपने आते हैं..एक जिन्न से मिलने की ख्वाहिश थी..दूसरा भी मिल गया..सरे राह चलते-चलते..- एक के साथ एक फ्री की तरह..

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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