रविवार, 11 मई 2014

हनुमान मुक्त का व्यंग्य - दफ़्तर का नियम

                                   दफ्तर का नियम

काफी दूर से चलकर पहुंचा था। पूछता हुआ, संबंधित सरकारी दफ्तर में घुस गया। एक बैंच पर रामभरोसे बैठा-बैठा ऊंघ रहा था। सारा दफ्तर करीब-बरीब खाली पड़ा था। करीब-करीब शब्द इसलिए काम में लेना पड़ रहा है। चूंकि ऑफिस में कार्मिक के अलावा, कुत्ते, बिल्ली, चूहे भी विचरण कर रहे थे। उनकी मौजूदगी को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं। लंच टाइम चल रहा था। रामभरोसे को ऊंघते देख मुझे भी आलस्य आने लगा। मैं उसके बगल में बैठा ही था कि रामभरोसे ने मेरा हाथ पकड़ लिया। बोला- ठहरो, ठहरो। यह क्या कर रहे हो।
मैंने कहा- थकान आ रही है। मैं भी थोड़ी सी झपकी लेना चाहता हूं।
उसने कहा- तुम यहां झपकी नहीं ले सकते। यहां वही झपकी ले सकता है जिसे यहां से तनख्वाह मिलती है।
क्या मतलब? मेरा माथा ठनका।


हां। यही सरकारी दफ्तर का नियम है। जिसे जहां से तनख्वाह मिलती है। वह वहीं सो सकता है और वह भी तब, जब ऑफिस चल रहा हो।
यदि मैं रात को आकर यहां सोना भी चाहूं तो नहीं सो सकता। क्योंकि मुझे रात की तनख्वाह नहीं मिलती। यहां वही आकर सो सकता है जिसे रात की तनख्वाह मिलती हो। रात के चौकीदार को ही तुम यहां रात में सोते हुए देख सकते हो।
मैनें कहा, यह तो गलत है। तनख्वाह कोई सोने की थोड़े ही मिलती है। जो वह सो सकता है। तनख्वाह चौकीदार को रात में जागने की, चौकीदारी की मिलती है और तुम कह रहे हो कि सिर्फ वही सो सकता है।


रामभरोसे मेरी ओर घूरता हुआ बोला, यह तुम मुझे क्यों समझा रहे हो। मेरे लिए यही सरकारी आदेश है।
तुम हमारे साहब से बात करो। वे रेस्ट हाउस में रेस्ट कर रहे हैं।
उसके कहने के साथ ही मेरे जेहन में एक छोटे से सरकारी ऑफिस से लेकर संसद तक बैठे वेतन भोगियों तक का खाका खिंच गया। तभी दफ्तर में एक व्यक्ति आया और एक सीट पर आकर बैठ गया। शायद लंच टाइम खत्म हो गया था।
तभी रामभरोसे ने एक छोटी सी नोट बुक निकाली और उसमें कुछ इन्द्राज करने लगा।


मैंने कहा- यह क्यों लिख रहे हो?
उसने कहा- हिसाब रखना पड़ता है। अखबार में छपने वाले समाचारों के पहले पैराग्राफ के चारों ककारों (कौन, कब, कहां, क्यों) का प्रयोग हमें भी करना पड़ता है।
कौन व्यक्ति कब आया? उससे मिलने कौन-कौन कहां-कहां से और क्यों आए?
सरकार और पार्टियों में बने गुटों की तरह यहां भी दो गुट बने हुए हैं। कौन गुट कितनी देर बाहर रहा। कब सीट पर बैठा और कब उठकर चला गया। इस सबका हिसाब रखना पड़ता है।
लेकिन तुम अभी तो ऊंघ रहे थे। फिर तुम्हें कैसे पता चला कि कौन, कब आ रहा है और कब नहीं? मैंने कहा।
वह बोला- यही तो...। हमारी खासियत है। हम सोते हुए से दिखते हैं लेकिन सही मायने में सोते नहीं हैं उसी तरह जैसे हम काम करते हुए से दिखते हैं लेकिन हम काम करते नहीं। लोग समझते हैं कि हम कुछ कर रहे हैं और वे गलती कर बैठते हैं। मुझसे पहले मेरी सीट पर श्यामभरोसे था। उसे किसी ने चाय में नींद की गोली खिला दी और वह उस दिन की रिपोर्टिंग करना भूल गया। शाम को साहब ने उसकी सीट बदल दी। अब उसको रात में सोने का काम है।
मैं राम भरोसे से बात कर रहा था और ऑफिस में कुछ लोग धीरे-धीरे इधर-उधर से आकर छोटे साहब के कमरे में घुसते जा रहे थे। वहां गर्मागर्म बहस चल रही थी।
एक कार्मिक बड़ी ही भावुकता से कह रहा था। साहब यह साधारण बात नहीं है कि एक मंत्री के गाल पर कोई तमाचा मार दे।
मंत्री। यह वह पद है जिसे कोई भी व्यक्ति पाकर मुटिया जाता है। उसके गाल मुटिया जाते हैं। अच्छे-अच्छे लोग उन्हें छूने का, चिपकने का आनन्द लेना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह अवसर सहज ही प्राप्त नहीं होता।


ऐसे मुटियाये गालों पर थप्पड़ मारना कोई साधारण बात नहीं है, यह मंत्री का ही नहीं सारे सरकारी वेतन पर गुजारा करने वालों का अपमान है।
आखिर उन्हें थप्पड़ खाने की तनख्वाह मिलती है क्या? जिस खाने की तनख्वाह मिल रही है उसे वे बड़ी शालीनता के साथ खाते आ रहे हैं। फिर ऐसी गुस्ताखी क्यों?
तभी दूसरा कार्मिक बोला- बिल्कुल सही। यह सब हमारा अपमान है। लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का अपमान है। हम सब यह अपमान नहीं सहेंगे। इस प्रकार यह कहते हुए वे एक साथ बाहर आ गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपने बैग और गाड़ियां संभाली और अपने-अपने घरों की ओर मंत्रीजी के अपमान का बदला लेने के लिए रवाना हो गए।

1 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव8:30 pm

    एकदम फ्लैट लिखा गया है ये व्यंग

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