शनिवार, 31 मई 2014

सुनील कुमार ''सजल'' का व्यंग्य - गिरोह का समाजवाद

ह तो हम पहले कह चुके हैं। गिरोहों के पीछे मत पड़ो। पर पुलिस वाले मानते कहाँ हैं। कहते हैं -'हम गिरोहों को पकङेगें। उनकी ऐसी -तैसी करके रख देंगे। देखते हैं कैसे बचते हैं बच्चू। 'गिरोह तो गिरोह है। समाज के खरपतवार। एक मिटता है ,दूसरा सक्रिय हो जाता है। पुलिस वालों की नाक के नीचे। थाने के सामने वारदात कर जाते हैं। वह भी सरेआम। पुलिस है कि अपनी पीठ थ पथपाती है ,'इलाके में शांति है। 'शांति तो थाने परिसर में रहती है। जहाँ लोग प्यार से हलाल होते हैं। उफ़ !तक नहीं करते।

हम लोकतान्त्रिक शैली में पहले भी कहते थे। अब भी कहते हैं। भविष्य में भी कहते रहेंगे की गिरोहों को फलने -फूलने दो। उनके पेट पर लात काहे मारते हो। साहब हमें गुप्त सूत्रों से पता है। पुलिस दुनियां के सामने उन्हें गिरफ्तार करती है। ठुकाई करती है पर वास्तव में उनसे ला भ का हिसाब बैठाती है।

यह बात तो सच है। हर नम्बर दो के काम के लिए पुलिस का सहयोग जरुरी है। ऐसे सहयोगियों का भी अपना एक गिरोह है ,जो गिरोहों को असामाजिक से सामाजिक होने का प्रमाण -पत्र देते हैं। साहब गिरोह चलना सहज काम नहीं है। बिलकुल फैक्टरी चलने जैसा है। आपके पास साहस ,क़ानून को खरीदने के लिए धन -बल। आतंक मचाने के लिए हथियार और टारगेट को स्कैन करने की क्षमता होनी चाहिए। इनमें भी प्रमोशन की व्यवस्था होती है पर खास बात यह है कि इनमें सामाजिक मतभेद प्रदाता आरक्षण लागू नहीं होता ,जिसके लिए संसद में पक्ष और विपक्ष में घमासान मचा है।

हर प्रगतिशील व्यवस्था के दो मायने होते हैं। लाभ -हानि की व्यवस्था। व्यवस्था की एक टांग पर कौन खड़ा हो सका है

गिरोहबाजी बड़ा रिस्की व्यवसाय है। किरन या गल्ला का धंधा नहीं है। माल नहीं बिक तो औने -पौने किसी को भी थमा दो। मगर गिरोह कौन खरीदेगा ?

साब गिरोहों का केवल आंतक पक्ष मत देखिये। हम तो यही कहेंगे कि उससे उत्पन्न लाभ भी देखिए। कहते हैं जहर जीवन भी देता तो मौत भी। वाही कुछ बात है गिरोहों की। देखिए साब ,आपकी औलाद परीक्षाओं में कई वर्षों तक लुढ़कती जाए तो आप क्या करेंगे। या तो औलाद का जीना हराम कर देंगे या सर पर हाथ रखकर बैठेंगे।

पर आप चिंता न करें। परीक्षा में सफलता हासिल करके रहेगी आपकी औलाद। बस आप परीक्षा में सफलता दिलाने वाले गिरोह से मधुर सम्बन्ध बनाइये।

साब आपको सफलता कैसी चाहिए ?फर्जी अंकसूची वाली या मुन्नाभाइयों की सहायता से वास्तविक अंकसूची। आजकल ऐसी ही अंकसूची ,जाति प्रमाण पत्र व् अन्य प्रमाण पत्रों का बोलबाला है।

इसी तरह एक गिरोह होता है लाइसेंस व परमिट बनाने वाला। आप सरकारी दफ्तरों में दर्जनों चप्पलें घिस चुके होते हैं। तब भी वहां के अधिकारी कर्� ��चारी आपको शक की नजर से देखते हैं। हम बताते हैं। आप बेवजह के पचड़े में न पड़े। लाइसेंस परमिट निर्माता दलाल से संपर्क साधिए। यार आज अपने पास इतना वक्त कहाँ हैं एक लाइसेंस या परमिट के लिए दफ्तर में कुंडली मारकर बातें रहे कि हम अपने कागजात लेकर ही जाएंगे। ध्यान रहे आपको वहां ऐसे हालत में कुत्ता सूघंने को न आएगा। तो कहे अपनी धुलवाने को सोचते हैं। काम के प्रति जो इज्जत आपको गिरोह देगा। वह और कोई नहीं।

हमने एक गिरोह ऐसा भी देखा है ,जो अफसर ,नेता व रईसजादों की सेवा के लिए बना है। गरम गोश्त का सफ्लायर। रातों को रंगीन व मदहोश बनाने वाला गिरोह। कैसा माल चाहिए। एक फोन कॉल। रेट-वेट तय करो। माल ठिकाने पर हाजिर। वाह कर उठेंगे आप भी अरब के शेखों की तरह।

हम गिरोहबाजों को समाजसेवक कहेंगे जो बड़े लोगों का माल लूटकर छोटे लोगों को सस्ते में सामान उपलब्ध कराता है। समाजवाद लाने का प्रयास। भेदभाव ऊंचनीच की दीवार यहाँ गिरती नजर आती है। वरना छोटे वर्गों के लिए आधुनिक बड़ी चीजें मात्र सपना होकर रह जाती।

पिछले सालों में चड्डी -बनियान गिरोह काफी सक्रिय रहा है पर हो सकता है आधुनिकता आने से इनके ड्रेस कोड बदल गए हों। जींस -टी शर्ट गिरोह हो गए हैं। आखिर देश की अर्थव्यवस्था ,शिक्षा,चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्रों में तो पाश्चात्य रंग बिखर रहा।

हम तो य ही कहेंगे की इन्हे कटु निगाहों से न निहारिये ,बल्कि सम्मान दीजिए। अगर ये न होते तो आप ही बताइये अपनी तरक्की के पथ पर बिखरे कांटे को किससे हटवाते। बताइये ?

--- सुनील कुमार ''सजल''

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  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव6:55 am

    सजल जी का व्यंग गिरोह का समाजवाद अच्छा
    लगा एक सच को निडर और प्रभावशाली ढंगसे
    प्रस्तुत किया गया है लेखक को हमारी बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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