रविवार, 11 मई 2014

हनुमान मुक्त का व्यंग्य – मार्चोत्सव एक ऑफ़िस का

मार्चोत्सव एक ऑफिस का

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आज सुबह बिलकुल ठीक समय पर ऑफिस खुला देख मुझे आश्चर्य हुआ। घड़ी को देखा, वह सही चल रही थी। ऑफिस को देखा, वह भी खुला हुआ था। ऑफिस वास्तव में ही खुला हुआ है, इसकी तसल्ली करने में वहां चला गया।
लोग अपनी सीटों से दौड़-दौड़ कर काम कर रहे थे। कुछ अपनी सीटों पर ही अपने चश्में को संभालते हुए कुछ करने में मशगूल थे। मेरी समझ में नही आ रहा था कि वास्तव में मैं किसी ऑफिस में ही आया हूँ या गलती से गलत जगह पहुंच गया हूँ।


इतनी सुबह का समय चाय-पानी का होता है, एक-दूसरे के हाल-चाल जानने का होता है, हाथ मिलाने का होता है। अखबार पढ़ने का होता है। और ये है कि...। ऐसा लग रहा था कि ये सब असामाजिक हो गए हैं। ऑफिस का सामाजिक शिष्टाचार भूल गए हैं। कहीं ना कहीं दाल में काला जरूर है।
दाल में काला क्यों है? और कहां है? यह जानने के लिए मैंने एक फाइल को लेकर बड़े साहब के चैम्बर की ओर दौड़ से रहे व्यक्ति से पूछा।
भैया, आज सब लोग सुबह-सुबह से इतना काम क्यों कर रहे हैं? ये पगला तो नहीं गए हैं?
वह रूका, मेरी ओर घूरते हुए बोला, तुम्हें पता नहीं है हम मार्चोत्सव मना रहे हैं। यह उत्सव मार्च के शुरू होते ही प्रारंभ हो जाता है।
- मार्चोत्सव! यह क्या होता है? मैं बोला।


- अरे, जैसे फागोत्सव, वैसे ही मार्चोत्सव। फागोत्सव में गुलाल उड़ाई जाती है, फूलों की पत्तियां उड़ाई जाती है और मार्चोत्सव में रुपए उड़ाए जाते हैं। तुम देख नहीं रहे, कितने रुपए उड़ रहे हैं?
- मैने इधर-उधर देखा। अपने चश्में को आंखों से उतारा उसे पोंछा, फिर इधर- उधर देखा। मुझे नोट उड़ते हुए दिखाई नहीं दिए।
- मुझे तो कहीं भी नोट उड़ते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं मैं बोला,
- तुम्हें ये उड़ते हुए कैसे दिखाई देंगे। ये तो हम ऑफिस वालों को ही दिखाई देते हैं और हम ही इन्हें लूट सकते हैं।
- तुम्हें यह ऑफिस की बिल्डिंग रंगी-पुती नजर आ रही है?
- मैनें कहा-नहीं। लेकिन हम सबको यह बिल्कुल चकाचक रंगी-पुती दिख रही है। किसी भी कार्मिक से पूछ लो। ठेकेदार को उसका पेमेन्ट अभी होना है।
मैं कुछ समझा नहीं। कैसे हो सकता है? जो चीज तुम्हें नजर आए, वह मुझे नजर नहीं आए? जबकि मैनें अपनी आंखों में लैंस प्राइवेट हॉस्पिटल में लगवाए हैं। मुझे सब कुछ साफ-साफ नजर आता है।


अरे भई, इसमें लैंस लगवाने या नहीं लगवाने का कोई फर्क नहीं पडता। यह मार्चोत्सव में होने वाले काम हैं। ये सब सिर्फ उस ऑफिस के कार्मिकों को ही नजर आते हैं। काम का फैलाव जितना होता है, वहां तक के लोगों की नजरें साफ हो पाती हैं।
तुमने देखा। हमारे ऑफिस के कबाड़खाने से सारा सामान आज ही नीलाम हुआ है और आज ही सारा सामान आ भी गया है। बड़े साहब से लेकर छोटे बाबू तक को सारी कागजी कार्यवाही को पूरा करना है इसलिए हम सब भाग-दौड़ कर काम कर रहे हैं।
लेकिन मुझे तो कुछ भी नीलाम होते नहीं दिखा। मैं तो ऑफिस खुलने के समय से पहले ही यहां आ गया। यह कब हो गया?
मैनें बताया था। इस मार्चोत्सव में ऑफिस के कार्मिकों को दिखने वाली चीजें,, अन्य किसी को नहीं दिखती। यह सब हम को दिख रही है। आपको भला कैसे दिख सकती है? आप इस उत्सव में शरीक थोड़े ही हो।


इस मार्चोत्सव में शरीक प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्यक्ष में वह सब दिखना शुरू हो जाता है जो कागजों में हो रहा है। उसे इस महीने में दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। जिसे हम मार्चदृष्टि कहते हैं। मार्च दृष्टि प्राप्त व्यक्ति को समय का ध्यान नहीं रहता। वह सब, सामाजिक शिष्टाचार, नवाचार भूल जाता है। साल भर से रह रहे समस्त बकाया काम इस उत्सव के दौरान फटाफट पूरे हो जाना शुरू हो जाते हैं।


यह सब मेरी समझ से बाहर हो रहा था। लेकिन मन को तसल्ली यह थी कि ऑफिस, समय पर खुल गया और कार्मिक मन लगाकर काम कर रहे हैं।
मैनें सोचा, जब ऑफिस में आ ही गए हैं तो गत महीनों से नहीं बन पा रहे राशन कार्ड के बारे में ही पूछ लिया जाए।
मैने पूछा- राशन कार्ड बनाने वाले बाबूजी आए हैं?
उसने हिजरत से देखते हुए मुझसे कहा, इतना भी नहीं समझते। मार्च का महीना चल रहा है। हम लोग कितना काम कर रहे हैं और तुम्हें अपने राशनकार्ड की पड़ी है। अपने काम करवाने मार्च बाद आना। पब्लिक डीलिंग का कोई भी काम इस महीनें में नहीं होगा।
तो फिर तुम सब तो भाग दौड़कर काम कर रहे हो। वह कौनसी डीलिंग के काम हैं?


ये सब हमारी पर्सनल डीलिंग के काम हैं। इन कामों को पहले से डीलकर ली गई है। तुम्हारे साथ किसी ने किसी भी प्रकार की कोई डीलिंग की है? यदि की है तो यह डीलिंग वाला काम हो जाएगा। यदि नहीं की है तो नहीं होगा।


मैने ना में सर हिलाया। मेरा सर हिलते ही वह जोरों से मुझे धक्का सा देता हुए ऑफिस से बाहर लाया और बोला तुम इतनी देर से मेरा सर खा रहे थे। अब तक काम का कितना हर्ज हो गया, तुम्हें पता है। तुम्हारे जैसे लोग आ जाते हैं। सुबह-सुबह टाइम बेस्ट करने।
मैं समझ रहा था तुम भी पर्सनल डीलिंग वाले व्यक्ति हो यदि इसी कारण मार्चोत्सव में शामिल होने आए हो। चुपचाप यहां से खिसक जाओ। मैं भी बिना हीलो हुज्जत किए ऑफिस से बाहर लौट आया।

Hanuman Mukt

93, Kanti Nagar

Behind head post office

Gangapur City(Raj.)

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1 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव12:02 pm

    एकदम सच को ही पूरी तरह उजागर किया है
    श्री हनुमान मुक्त जी को और यह बहुत साहस
    और आत्म विश्वास को दर्शाता है भाषा थोड़ी
    पैनी और चुभती हुई और होती तो ज्यादा प्रभावशाली व्यंग बनता हमारी बधाई और आशीर्वाद

    उत्तर देंहटाएं

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