रविवार, 11 मई 2014

हनुमान मुक्त का हास्य-व्यंग्य - महिलाओं का चेहरा छिपाना

महिलाओं का चेहरा छिपाना
रानी ने आदेश दिया कि ‘‘सभी सुन्दरियां अपने चेहरे छिपाकर रखें, जिससे मनचले उनके चेहरे को देखकर भद्दे-भद्दे कमेन्ट्स नहीं करें। इससे व्यवस्था भंग होने का खतरा बना रहता है।’’
आदेश सुन्दरियों के लिए था, लेकिन इसकी आड़ में सभी महिलाजात ने अपने चेहरों को छिपाना शुरू कर दिया। छुपे चेहरे से किसी को कैसे पता चलेगा कि कौन सुंदरी है और कौन नहीं?
रानी जी की मंशा थी कि लोग सिर्फ भद्दे और कुरुप चेहरों को ही देखें, इससे चेहरों को देखकर कमेंट्स करने की समस्या खत्म हो जाएगी। देखने से भद्दे और कुरुप चेहरे भी सुन्दर हो जाएंगे।
मंशा होने से क्या होता है। लोग स्त्री जात के चेहरे तक देखने से तरस गए। दोनों ओर खलबली मच गई। चेहरा देखने और चेहरा दिखाने वाले दोनों ही परेशान। सरकारी फरमान था। उसकी अवहेलना भी नहीं की जा सकती।


आखिर महिलाओं ने मिल बैठकर बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने निर्णय किया किया आदेश सिर्फ चेहरे छिपाने के लिए है, अन्य के लिए नहीं। इसलिए महिलाजात अपने चेहरे के अलावा सब कुछ दिखा सकती है। वैसे भी लोगों की चेहरे के अलावा अन्य चीजों को देखने में ही ज्यादा रुचि रहती है।
इस निर्णय से महिलाओं में खुशी का संचार हो गया। उन्हें अब ऐेसे परिधानों की आवश्यकता थी जिससे चेहरे के अलावा अन्य सभी अंग अच्छे ढंग से दिख सके।
इसके लिए अच्छे टेलर्स और फैशन डिजायनर्स को बुलाया गया, उन्हें अपनी इस समस्या का हल किसी भी कीमत पर निकालने को कहा गया।
कीमत की बात सुनकर फैशन डिजायनर्स और टेलर्स में खुशी की लहर दौड़ गई। वे जानते थे कि छिपाना ज्यादा मेहनत का काम है, दिखाना नहीं। अब उन्हें दिखाना है छिपाना नहीं। जितने कपड़ों से पहले एक जोड़ी बनती थी अब पांच से दस जोड़ी तक बन सकेगी। बनाने में भी पहले से चौथाई भी समय नहीं लगेगा और कीमत! कुछ भी। उनकी तो पाँचों अंगुलियां घी में है। उन्होंने फटाफट ऐसे परिधान बनाना शुरू कर दिया।


डिजायनर्स भी मस्त थे अब वे एक रूमाल मात्र से एक ड्रेस बनाने लगे।
इस सबसे ज्यादा खुशी उन महिलाओं में थी जिन्हें अब तक भेदभाव का शिकार होना पड़ता था। जिनसे वे अपनी ओर देखने की अपेक्षा करती थी। वे ही पहले आँखें फेरकर बिन देखे निकल जाते थे और अब घूर-घूर कर देखते रहते हैं।
चेहरे छिपाने और अन्य चीजों को दिखाने के नए निर्णय से इस सबका समाधान अच्छे से हो गया।
खुशी सुन्दरियों में भी कम नहीं थी। अब बिना रोक-टोक और बिना झिझक के आसानी से अपने प्रेमियों से नैन मटक्का कर सकती थी। गलबहिया डालकर लोंग ड्राइव पर निकल सकती थी।


लोग सोचते थे अब अपना शहर भी आधुनिक हो गया है, बाहर की लड़कियां अपने मित्रों के साथ यहां की सड़कों से गुजरती है। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है।
अचानक कॉस्मेटिक मार्केट की बिक्री में तेजी से कमी आ गई। क्रीम, पाउडर, लिपिस्टिक एवं अन्यान्य चेहरे को कृत्रिम सौन्दर्य देने वाले प्रसाधन बिकने बंद से हो गए। मार्केट वाले परेशान, उनके बाल बच्चों के पेट का सवाल था। उन्होंने इस समस्या के निदान के लिए मीटिंग बुलाई। निदान के लिए उन्होंने नई उम्र के युवकों को उसकी जिम्मेदारी दी। कमेटी बना दी।


नए युवकों में नई सोच होती है, उनमें भी थी, दूर दृष्टि होती है, उनमें भी थी। उन्होंने दो-चार दिन इस सबका सर्वे किया। इधर-उधर पूछताछ की, अंतिम निर्णय पर पहुंच गए। उन्होंने बताया कि इस सबका मुख्य कारण वह आदेश है जिसने सुंदरियों को चेहरे छिपाने को पाबंद किया है। पहले वे लड़कों को आकर्षित करने के लिए चेहरे को सजाती थी, संवारती थी। अब उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती।


बिना चेहरा देखे ही लड़के उनकी ओर आकर्षित हो जाए, इसके लिए उन्होंने वैसे ही परिधान पहनना शुरू कर दिए हैं। उनकी निगाहें ही अब उनको आकर्षित बनाने लगी है।
बेचारे दुकानदार करते भी तो क्या करते, उन्होंने चेहरे के सौन्दर्य प्रसाधनों के स्थान पर अन्य अंगों के सौन्दर्य प्रसाधनों को बेचना शुरू कर दिया।
दुकानदारी पुनः ढर्रे पर आ गई। सब ओर प्रसन्नता का वातावरण चल रहा था कि नगर से लड़के, लड़कियों के भागने की घटनाओं में अचानक इजाफा आ गया। यही नहीं विवाहित महिलाएं भी अपने घरों से गायब होने लगी।


समझ नहीं आया कि आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया। पहले कभी साल दो साल में इक्के-दुक्के ऐसी घटना सुनने को मिलती थी, अब हर गली- मौहल्ले से ऐसा होने लगा।
मौहल्ले के लोग कहने लगे कि ‘‘फलां कि लड़की ऐसी तो बिल्कुल नहीं थी, हमने तो उसे कभी घर से निकलते तक नहीं देखा।’’
उन्हें क्या पता था कि वह रोजाना अपने प्रेमी से मिलने अपने चेहरे को ढांप कर उनके सामने से होकर गुजरती थी।
नगर में ऐसी घटनाओं से खलबली सी मच गई, सब लोग परेशान थे।


इसके अलावा लोगों ने भी रानी जी के सामने मांग रखी कि चेहरे ढांपने का यह तुकलगी फरमान वापस लिया जाए। इससे हमारी अस्मिता को खतरा पहुंच रहा है।
रानी ने पूछा, ‘‘इस आदेश से तुम्हारी अस्मिता कैसे खतरे में पड़ रही है? आप नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हो।’’
वे बोले, ‘‘बहुत बार चेहरा छुपा होने से हम सुन्दरियों को छेड़ देते हैं, बाद में पता चलता है कि जिसे हम छेड़ रहे हैं वह हमारी परिचित है, रिश्तेदार है।’’
ऐसी स्थिति में हम उसके सामने नंगे हो जाते हैं। हमारी इज्जत खतरे में पड़ जाती है।


तुम फिर अपने आपको ऐसा करने से रोकते क्यों नहीं? तुम्हें ऐसा करते कोई शोभा देता है क्या? रानी ने कहा, ‘‘हम अपना आदेश वापस नहीं लेंगे।’’
उधर, असुंदरियों ने भी सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। वे नहीं चाहती थी कि रानीजी किसी के बहकावे में आकर ‘‘चेहरा छिपाने ’’ का आदेश वापस लें। उन्हें इससे अपनी स्वतंत्रता और समानता खतरे में पड़ती दिख रही थी। अब तक बहुत भेदभाव सह लिया, अब किसी भी स्थिति में यह भेदभाव वे सहन नहीं करेगी।
रानी जी को बल मिल गया। वह भी राज्य में स्वतंत्रता और समानता की पक्षधर थी।


नगर के प्रतिष्ठित लोगों को चारों ओर से खतरा नजर आ रहा था। एक ओर बहन, बेटियां, बहुओं के भागने का खतरा तो दूसरी ओर उनकी स्वयं की इज्जत दाव पर लग रही थी।
उन्होंने बैठक कर सुन्दरियों को अपनी ओर मिलाना शुरू कर दिया। उन सब से रानी जी का आदेश नहीं मानने की अपील की।

Hanuman Mukt

93, Kanti Nagar

Behind head post office

Gangapur City(Raj.)

Pin-322201

4 blogger-facebook:

  1. badhiya vyangya hai ...
    sunil kumar ''sajal''
    http://vyangaban.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव8:13 pm

    श्री हनुमान मुक्त जी का व्यंग सही तो है पर एकदम फ्लैट लिखा गया है नतो कोई नयापन
    या नयी बात कही गयी है सबकुछ जाना पहिचाना ही है व्यंग होते हुए भी कोई तीखापन या चुटकी नहीं लि गई

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस विषय पर इससे अच्छा व्यंग आज तक तो पढ़ने में नहीं आया... ऐसविष्य पर भी बिना किसी तीखी टिप्पणी के हद में रह कर व्यंग्य कर पाना एक अद्भुत पकड़ और नियंत्रण मांगती है जो आप ने दिखा दिया. बहुत खूब.

    उत्तर देंहटाएं

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