शनिवार, 31 मई 2014

नरेश अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताएँ (ईबुक - कविता संग्रह)

चुनी हुई कविताएँ

कवि द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताएँ
डॉ. नरेश अग्रवाल

  सर्वाधिकार सुरक्षित - डॉ. नरेश अग्रवाल
इस ‘ई-पुस्तक’ का प्रकाशन डॉ. नरेश अग्रवाल द्वारा स्वंय किया गया है तथा पुस्तक के रुप में प्रकाशन-राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, राजस्थान द्वारा किया गया है।
प्रकाशन वर्ष सन् 2014

राजस्थानी ग्रन्थागार
सोजती गेट,
जोधपुर, राजस्थान

डॉ. नरेश अग्रवाल-एक परिचय
‘‘नरेश का मिजाज एक चिन्तक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।’’ - इंडिया टुडे

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1 सितम्बर 1960 को जमशेदपुर में जन्म। 
अब तक स्तरीय साहित्यिक कविताओं की 6 पुस्तकों का प्रकाशन तथा शिक्षा सम्बन्धित 6 पुस्तकों का प्रकाशन। साहित्य जगत में रचित पुस्तकों को अच्छी ख्याति प्राप्त। ‘इंडिया टुडे’ एवं ‘आउटलुक’ जैसी पत्रिकाओं में भी इनकी समीक्षाएँ एवं कविताएँ छपी हैं। देश की सर्वोच्च साहित्यिक पत्रिका ‘आलोचना’ में भी इनकी कविताओं को स्थान मिला। लगभग सारी स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

‘मरुधर’ रंगीन द्विमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन पिछले चार वर्षों से लगातार कर रहे हैं, जो आर्ट पेपर पर छपती है।

सन् 2014 में सूक्तियों पर ‘सूक्ति-सागर’ नाम से एक पुस्तक लिखी, जो भारतवर्ष में संभवतः यह पहला प्रयास होगा जब किसी लेखक द्वारा स्तरीय 1000 सूक्तियाँ हिन्दी भाषा में लिखी गयी।

‘हिंदी सेवी सम्मान’, ‘समाज रत्न’ सम्मान, अक्षर-कुंभ सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित।

पौधों की बोनसाई विद्या में पूर्ण रुप से पारंगत तथा हजारों र्दुलभ पौधे इनके संग्रह में शामिल। बोनसाई में अनेक पुरस्कार मिले।

शतरंज, ज्योतिष, हस्त रेखा एवं होम्योपैथी में कई साल तक विस्तृत अध्ययन।
लगभग 5000 पुस्तकें इनके निजी पुस्तकालय में संग्रहीत हैं।

फोटोग्राफी विद्या में पूर्ण रुप से दक्ष तथा अपने भ्रमण के दौरान हजारों तस्वीर का संग्रह इनके बेवसाईट पर उपलब्ध हैं। यात्रा के बेहद शौकीन तथा अनगिनत जगहों की यात्रा की।
सम्पर्क -
रेखी मेन्शन, 8 डायगनल रोड, बिटुपुर, जमशेदपुर-831001
ई. मेल - smcjsr77@gmail.com
बेवसाईट : www.nareshagarwala.com


 

आत्मकथन


जब तक शब्द अक्षर थे वे चुपचाप थे, परन्तु जब वे चित्र बने, चलने लगे। एक सधी हुई कलम से सारा काव्य चित्रमय हो जाता है। घटनाएँ काल्पनिक न होकर एक जीती-जागती प्रस्तुति बन जाती हैं। वे सारे प्रतीक और उपमाएँ अपने पंख फड़फड़ाने लगती हैं, और जब समाप्त होता है कथन तो लगता है कुछ रहस्यमय उतर आया है हृदय में, वह भी बिना अनुमति के। इसी तरह के अनुभवों से सरोकार हो पाठक का, यही सोचकर इन कविताओं की रचना की गयी है।
अन्त में बस इतना कहना चाहूँगा-
लोग उलझे रहेंगे।
शताब्दी के नये-नये कारनामों में
हर दिन नयी चीजें उपलब्ध होंगी
उनके हाथों में
फिर भी मेरी कविताओं,
तुम्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ेगा,
रखा जाएगा हाथों में जब भी तुम्हें
अँगुलियाँ पन्ने पलटने लगेंगी।
-डॉ. नरेश अग्रवाल

पूर्व लिखित पुस्तकों पर सम्मतियाँ

‘‘नरेश का मिजाज एक चिन्तक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।’’
- इंडिया टुडे

‘‘सब कुछ को सलीके से छिपाकर वे अपने पाठक को सरल से सरल भाषा में दृश्य-दर-दृश्य, कुछ अनसुने, अनदेखे और अनजाने को सुनने, देखने और जानने के लिये उकसाते हैं। इसलिए उस मर्म और तत्त्व को ढूँढ़ते हुए, वहाँ तक पहुँचने की प्रक्रिया में वे पाठक को खोजकर पाने के सुख से सुखी कर देना चाहते हैं। उसे अपने ढंग से अपने लिए पाकर पाठक के मन में उसके विस्तार और उसके प्रदर्शन की सबसे ज्यादा सम्भावना बनती है।’’
लीलाधर जगूड़ी
(पद्मश्री एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित)

‘‘ये कविताएँ ह्रदय का उद्गार हैं, ह्रदय की बात है। प्रभविणु कविचित्त पर जीवन के प्रसंगों ने जो तरंगें उत्पन्न की, उनकी अक्षत अभिव्यक्ति सरल-सुगम भाषा में कवि का अभीष्ट है। ये जीवन-प्रसंग जाने-पहचाने, रोज-ब-रोज के होते हुए भी एक विस्तृत सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत होकर नया अर्थ ग्रहण करते हैं।’’
- अरुण कमल, कवि एवं सम्पादक

‘‘नये घर में प्रवेश, नये घर में प्रवेश नहीं, कवि का अपनी अन्तश्चेतना की चौखटों को पारकर अपने आप को पाने, खोजने का प्रयत्न हे। गहन आत्मविश्लेाणात्मक है कवि की दृष्टि। दुनिया के सारे कुएँ से लेकर-कई कविताएँ।’’
          -चित्रा मुद्गल, उपन्यासकार

‘‘श्री नरेश अग्रवाल की इन कविताओं में समय और परिवेश के प्रति कवि की विनम्रता आकर्षित करती है। इनमें किसी प्रकार का भावुक आवेश या आक्रामक उबाल नहीं है, न अनुभव और भाषा की स्फीति। अभिव्यक्ति का यह अनुशासन इन कविताओं को प्रौढ़ और चिन्तनपरक बनाता है।’’
-श्री विश्वनाथ तिवारी
कवि एवं सम्पादक, दस्तावेज

‘‘आपकी सृजनात्मकता ने नये धरातलों को स्पर्श किया है। अपने आसपास के जीवन से यह संलग्नता इनकी एक विशिट पहचान बनाती है। संवेदनात्मक गहराई में डूबी हुई इन कविताओं को पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आपकी मार्मिकता मन को छूती है।’’
   - विजय कुमार, कवि एवं आलोचक

‘‘आपकी प्रकृति आधारित कविताएँ भी मात्र दृश्यचित्र नहीं हैं, उनमें मन बोलता है। कश्मीर को आपने सैरगाह की जगह संवेदना बनाया है। अगर इन पुस्तकों  का वितरण ठीक प्रकार से किया जाए तो ये समाज के लिये उपयोगी सिद्ध होंगी।’’
- ममता कालिया, साहित्यकार

‘‘आपकी कविताओं में बड़ी सहजता है। अनुभवों का निर्व्याज आवेग है। बड़ी आत्मीय स्वतः स्फूर्तता है।’’
- विजेन्द्र, कवि एवं सम्पादक


श्री नरेश अग्रवाल को वह दृष्टि प्राप्त है, जिस पैनी दृष्टि से कोई अपने चतुर्दिक का पर्यवेक्षण कर पाता है।

-श्रवण कुमार गोस्वामी
पूर्व सदस्य, हिन्दी सलाहकार समिति
गृह मन्त्रालय, भारत सरकार

विषय-सूची


खुशियाँ    12
चित्रकार    13
हर आने वाली मुसीबत    14
दादी जी के लिए    15
नियंत्रण    16
दुनिया के सारे कुएँ     17
सब कुछ मौन है    18
बच्चे    19
मैं सोचता हूँ    20
विदाई    21
कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा ऋण    22
छत    23
मनाली में    24
तुम्हारे न रहने पर    25
डूबती हुई नाव    26
पगडंडी     27
पूजा के बाद    28
खिलाड़ी    30
तुम्हारा संगीत    30
एक दुर्घटना के बाद    31
आग    32
अवसर    33
जो मिला है मुझे    34
आज सचमुच लगा    35
नये घर में प्रवेश                           36-37
यहाँ के दृश्य    38
यह लालटेन    39
परीक्षाफल    40
डूबते हुए जहाज में प्रेम    41
फूल    42
डर पैदा करना    43
समुद्र तट पर    44
तुम्हारा न रहना    45
मैं भूल गया हूँ    46
अंतिम संस्कार    47-48
अत्मीयता    49
लोहा बन गया हूँ मैं    50
विडम्बना    51
चित्र    52
एक संगीत समारोह में    53
बैण्डबाजे वाले    54
पिंजड़ा    55
प्रकाश    56
इस बार                                 57-58
मकान                                  59-60
पार्क में एक दिन    61
युद्ध    62
मजदूर के घर कबूतर     63
शब्द    64
मेरे दोस्त    65
हक    66
शोर    67
चिट्ठियाँ    68
यहाँ की दुनिया    69
पिता के लिए प्रार्थना                           70-71
मुलाकात के बाद    72
सेल्समैन    73-74
अनुभूतियाँ    75
तुम्हारी थकान    76
गेहूँ के दाने    77
आधुनिकता    78
डायरी में    79
रेगिस्तान    80
आवरण    81
कबूतर    82
पत्नी के जन्म दिन पर    83
घटित होती हुई साँझ    84
प्रशंसा    85
विश्वास    86
काँटा    87
हाथ    88
नफरत    89
समुद्र के किनारे    90
सृजन रुकता नही     91
कीड़े    92
टोपी    93
पिता के लिए    94-95
किताब    96


खुशियाँ

मुझे थोड़ी सी खुशियाँ मिलती हैं
और मैं वापस आ जाता हूँ काम पर
जबकि पानी की खुशियों से घास उभरने लगती है
और नदियाँ भरी हों, तो नाव चल पड़ती है दूर-दूर तक।

वहीं सुखद आवाजें तालियों की
प्रेरित करती है नर्तक को मोहक मुद्राओं में थिरकने को
और चाँद सबसे खूबसूरत दिखाई देता है
करवा चौथ के दिन चुनरी से सजी सुहागनों को

हर शादी पर घोड़े भी दूल्हे बन जाते हैं
और बड़ा भाई बेहद खुश होता है
छोटे को अपनी कमीज पहने नाचते देखकर

एक थके हुए आदमी को खुशी देती है उसकी पत्नी
घर के दरवाजे के बाहर इंतजार करती हुई
और वैसी हर चीज हमें खुशी देती है
जिसे स्वीकारते हैं हम प्यार से।


 


चित्रकार

मैं तेज प्रकाश की आभा से
लौटकर छाया में पड़े कंकड़ पर जाता हूँ
वह भी अंधकार में जीवित है
उसकी कठोरता साकार हुई है इस रचना में
कोमल पत्ते मकई के
जैसे इतने नाजुक कि वे गिर जाएँगे
फिर भी उन्हें कोई सँभाले हुए है
कहाँ से धूप आती है और कहाँ होती है छाया
उस चित्रकार को सब कुछ पता होगा
वह उस झोपड़ी से निकलता है
और प्रवेश कर जाता है बड़े ड्राइंग रूम में
देखो इस घास की चादर को
उसने कितनी सुन्दर बनाई है
उस कीमती कालीन से भी कहीं अधिक मनमोहक।


 

 

 


हर आने वाली मुसीबत

उसकी गतिविधियाँ
असामान्य होती हैं
दूर से पहचानना
बहुत मुश्किल होता है
या तो वह कोई बाढ़ होती है
या तो कोई तूफान
या फिर अचानक आई गन्ध

वह अपने आप
अपना द्वार खोलती है और
बिना इजाजत प्रवेश कर जाती है

फिर भागते रहो
घंटों छुपते रहो इससे
जब तक वह दूर नहीं चली जाती
हमारे मन से

बचा रह जाता है
उसके दुबारा लौट आने का भय।


 

दादी जी के लिए

तुम नहीं हो
फिर भी हमें लगता है
तुम यहीं कहीं हो

कभी घड़े के पानी की तरह
उतरती हो हमारे गले में
कभी अन्न का स्वाद बनकर
शान्त करती हो हमारी भूख

दीये की लौ की तरह
जलती हो हमारी पूजा में
फूलों की सुगन्ध बनकर
बसती हो हमारी प्रार्थना में

एक आभास की तरह
जिन्दा हो हमारी रग-रग में
हवा की तरह मौजूद हो
हमारे हर दुःख-सुख में

तुम यहीं कहीं
बसी हुई हो हमारे दिल में
जैसे मौजूद थे हम कभी
तुम्हारी कोख में ।ु

नियंत्रण

जिन रातों में हमने उत्सव मनाए
फिर उसी रात को देखकर हम डर गए
जीवन संचारित होता है जहाँ से
अपार प्रफुल्लता लाते हुए
जब असंचालित हो जाता है
कच्चे अनुभवों के छोर से
ये विपत्तियाँ  ही तो हैं।
कमरे के भीतर गमलों में
ढेरों फूल कभी नहीं आएँगे
एक दिन मिट्टी ही खा जाएगी
उनकी सड़ी-गली डालियाँ।
बहादुर योद्धा तलवार से नहीं
अपने पराक्रम से जीतते हैं
और बिना तलवार के भी
वे उतने ही पराक्रमी हैं।
सारे नियंत्रण को ताकत चाहिए
और वो मैं ढूंढ़ता हूँ अपने आप में
कहाँ है वो? कैसे उसे संचालित करूँ?
कभी हार नहीं मानता किसी का भी जीवन
वह उसे बचाए रखने के लिए पूरे प्रयत्न करता है
और मैं अपनी ताकत के सारे स्रोत ढूंढक़र
फिर से बलिष्ठ हो जाता हूँ।

दुनिया के सारे कुएँ

मँडरा रहा है यह सूरज
अपना प्रबल प्रकाश लिये
मेरे घर की चारों ओर
उसके प्रवेश के लिए
काफी है एक छोटा सा सूराख ही
और जिन्दगी
जो भी अर्जित किया है मैंने
उसे बाहर निकाल देने के लिए
काफी होगा एक सूराख ही
और प्रशंसनीय है यह तालाब
मिट्टी में बने हजार छिद्रों के बावजूद
बचाये रखता है अपनी अस्मिता
और वंदनीय हो तुम दुनिया के सारे कुओं 
पाताल से भी खींचकर सारा जल
बुझा देते हो प्यास हर प्राणी  की ।

 

 

 


सब कुछ मौन है
 
सुन्दर दृश्यों, चूमता हूँ मैं तुम्हें
और तुम खत्म नहीं होते कभी
थक जाता हूँ मैं
खत्म हो जाते हैं मेरे चुम्बन
कुहासा खोलता है दृश्य पर दृश्य
जैसे हम उनके पास जा रहे हों, लगातार
सारी खिड़कियाँ खुल गयी हैं मन की
इनमें सब कुछ समा लेने की इच्छा जागृत
कोई तेज घुड़सवार आ रहा है मेरी तरफ
और बड़ी मुश्किल से संभालता हूँ मैं अपने आपको
इस ऊबड़-खाबड़ जमीन से।
यहाँ पत्थरों में अभी भी हल्की बर्फ जमी हुई है
भेड़ों के लिए आजाद दुनिया, हरे-भरे मैदान की
गड़ेरिया अपनी पुरानी वेष-भूषा में टहलता हुआ
करता है आँखों से मुझे मौन सलाम
और सब कुछ मौन है यहाँ
फिर भी मुझसे बातें करता हुआ लगातार
 
 

 

 

बच्चे

बच्चे लाइन में चलना नहीं चाहते
बच्चे नहीं जानते यह सुरक्षा का नियम है
बच्चे लाइनें तोड़ देते हैं
वे खेलना चाहते हैं मनपसंद बच्चों के साथ।
बच्चों के लिए कोई थकान नहीं,
न ही कोई दूरी है
दायरा है दूर-दूर तक देखने का
वे खेलते समय पाठ याद नहीं रखते
भूल जाते हैं पढ़ाई भी कुछ होती है
बच्चे मासूम उगते हुए अंकुर या छोटे से वृक्ष
अभी इतने कच्चे कि हवा से लथ-पथ
इनके चेहरे याद नहीं रहते
जैसे सभी अपने हों और एक जैसे
और उनकी खुशियाँ समा लेने के लिए
कितना छोटा पड़ जाता है यह भूखंड।

 

 

 


मैं सोचता हूं

मैं सोचता हूँ सभी का समय कीमती रहा
सभी का अपना-अपना महत्व था
और सभी में अच्छी संभावनाएँ थीं,
छोटी सी रेत से भी भवनों का निर्माण हो जाता है
और सागर का सारा पानी दरअसल बूंद ही तो है।
 
रास्ते के इन पत्थरों को
मैंने कभी ठुकराया नहीं था
इन्हें नहीं समझ पाने के कारण
इनसे ठोकर खाई थी
और वे बड़े-बड़े आलीशान महल
अपने ढहते स्वरूप में भी
आधुनिकता को चुनौती दे रहे हैं
और उनका ऐतिहासिक स्वरूप आज भी जिंदा है।


 

 

 


विदाई

एक पत्थर जो पड़ा है वर्षों से वहीं का वहीं
कभी विदा नहीं होता जलधारा के साथ
और एक दिन हार मान लेती है नदी
ना ही कभी विदा होते हैं उर्वरक धरती से
चाहे कितनी ही फसलें उगाई और काट दी जाती रहें,
तुम जो मेरे सीने से निकलती हुई धड़कन हो
जो एक दिन दो से तीन हुई थी
जहां भी रहोगी, कहीं की भी यात्रा करती हुई
फिर से लौट कर आओगी
नाव की तरह अपने तट पर
और हम फिर से मिलकर एक हो जाएँगे
और बातें करेंगे हमेशा की तरह
उन्हीं पुरानी कुर्सियों पर बैठ कर।

 

 

 

 

 

कैसे चुका पायेंगे तुम्हारा ऋण

रात जिसने दिखाये थे
हमें  सुनहरे सपने
किसी अजनबी प्रदेश के
कैसे लौटा पायेंगे
उसकी स्वर्णिम रोशनी

कैसे लौटा पायेंगे
चाँद-सूरज को उनकी चमक
समय को बीती हुई उम्र
फूलों को खुशबू
झरनों को पानी और
लोगों को उनका  प्यार

कैसे लौटा पायेंगे
खेतों को फसल
मिट्टी को स्वाद
पौधों को उनके फल

ऐ धरती तुम्हीं बताओ
कैसे चुका पायेंगे
तुम्हारा इतना सारा ऋण ।


छत
 
इन्हें भी चाव है स्थिरता का
और शौक कि लोग आयें बैठें-टहलें उसमें कुछ देर
उपयोग किया जाए उसका अच्छी तरह से।
नीचे भी दीवारों से घिरी खोखली नहीं है यह
क्षमता है इसमें सब कुछ समा लेने की
चाहे बिस्तर, मेज या रसोई का सामान
और कैसी भी छत हो इस दुनिया की
अपने ऊपर धूप सहती है
और नीचे देती है छाँव,
अपनी आखिरी उम्र तक
जिस दिन उजड़ती है यह
उस दिन महसूस होता है
कितना बड़ा आकाश ढोती थी
यह अपने सिर पर।


 

 

 


मनाली में
 
ये सेब के पेड़ कितने अजनबी हैं मेरे लिए
हमेशा सेब से रिश्ता मेरा
आज ये पेड़ बिलकुल मेरे पास
हाथ बढ़ाऊँ और तोड़ लूँ
लेकिन इन्हें तोड़ूँगा नहीं
फिर इन सूने पेड़ों को,
खूबसूरत कौन कहेगा।
 

 

 

 

 

 

 

 


तुम्हारे न रहने पर

थोड़ा-थोड़ा करके
सचमुच हमने पूरा खो दिया तुम्हें
पछतावा है हमें
तुम्हें खोते देखकर भी
कुछ भी नहीं कर पाये हम,
अब हमारी आँखें सूनी हैं,
जिन्हें नहीं भर सकतीं
असंख्य तारों की रोशनी भी
और न ही है कोई हवा
मौजूद इस दुनिया में
जो महसूस करा सके
उपस्थिति तुम्हारी,
एक भार जो दबाये रखता था
हर पल हमारे प्रेम के अंग
उठ गया है, तुम्हारे न रहने से
अब कितने हल्के हो गये हैं हम
तिनके की तरह पानी में बहते हुए ।


 

 

डूबती हुई नाव

नाव चोट खा गयी है
लगता है, डूब जाएगी
पानी धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा है
दर्द से हिलती है नाव
पानी खून का प्यासा हो गया है
डर से सबके शरीर पत्थर
अब कुछ नहीं हो सकता है
एक ही सत्य है मौत
और मौत बढ़ रही है
बिना किसी शस्त्र के
कितनी आसानी से
छीन रही है प्राण
पानी भर रहा है
साँस की जगह
और दया दिखाई नहीं देती है
दूर-दूर तक ।

 

 

 

पगडंडी

जहाँ से सड़क खत्म होती है
वहाँ से शुरू होता है
यह सँकरा रास्ता
बना है जो कई वर्षों में
पाँवों की ठोकरें खाने के बाद,
इस पर घास नहीं उगती
न ही होते हैं लैम्पपोस्ट
सिर्फ भरी होती हैं खुशियाँ
लोगों  के  घर  लौटने की !


 

 

 

 

 

 


पूजा के बाद
 
पूजा के बाद हमसे कहा गया
हम विसर्जित कर दें
जलते हुए दीयों को नदी के जल में
ऐसा ही किया हम सबने।
सैकड़ों दीये बहते हुए जा रहे थे एक साथ
अलग-अलग कतार में।
वे आगे बढ़ रहे थे
जैसे रात्रि के मुँह को थोड़ा-थोड़ा खोल रहे हों, प्रकाश से
इस तरह से मीलों की यात्रा तय की होगी इन्होंने
प्रत्येक किनारे को थोड़ी-थोड़ी रोशनी दी होगी
बुझने से पहले।
इनके प्रस्थान के साथ-साथ
हम सबने आँखें मूंद ली थीं
और इन सारे दीयों की रोशनी को
एक प्रकाश पुंज की तरह महसूस किया था
हमने अपने भीतर।

 

 

 

खिलाड़ी

गजब सा खेल है यह
इसमें खिलाड़ी हवा में गुलाटी लगाता है
फिर सीधे पाँव खड़ा हो जाता है डंडे की तरह
बेहद कठिन है यह
इसलिए लोग खड़े हैं इसे देखने
रोमांच जाग पड़ता है सबों के शरीर में
कई बार तो लगता है
वह ठीक से नहीं कर पाएगा इस खेल को
तुड़वा बैठेगा अपनी हड्डियाँ
और गिर जाएगा कमर के बल टेढ़ा होकर
लेकिन सबकी इच्छा है
वह कभी गिरे नहीं
खेल उसका चलता रहे।
साँस रुक जाती है लोगों की
जब वह लगभग जमीन छूने को होता है
और जमीन छूते ही वापस शुरू कर देता है
अपने खेल को
आनंद उतर आता है दर्शकों में
सभी थोड़े-थोड़े रुपये उसे दे देते हैं
हालाँकि वह किसी से कुछ नहीं माँगता
सिर्फ सारा ध्यान केंद्रित करता है खेल में।

तुम्हारा संगीत

कितने सारे पहाड़ देख लिए मैंने
कितनी ही नदियाँ
और संगीत बड़े-बड़े वादकों का
फिर भी सुनता हूँ जब
तुम्हारी ढोलक की थपथपाती मधुर आवाज
लगता है जैसे मैं जाग गया,
जाग गया हो चंद्रमा
इसके दोनों छोर के हिलने से।
सिर्फ मैं नहीं सुन रहा हूँ इस आवाज को
सभी सुन रहे हैं इस आवाज को
जहाँ तक जाती होगी यह
सभी के कान तुम्हारी तरफ
जैसे तुम उनमें एक शक्ति का संचार कर रहे हो
भर रहे हो धड़कन धीमी-धीमी
पारे के आगे बढ़ने जैसी।
तुम बार-बार बजाओ
मैं निकलता जा रहा हूँ दूर तुमसे
पूरी तरह ओझल
फिर भी  तुम्हारे स्वर मुझे थपथपा रहे
जाग्रत कर रहे हैं मुझे अब तक।


एक दुर्घटना के बाद

अनाज के दाने निकाल लेने के बाद
हल्की हो जाती हैं फसलें
बचा-खुचा मवेशियों के लिए या आग तापने के लिए,
सूरज के डूब जाने के बाद
नष्ट हो जाता है रंग किसी भी भूखंड का
तापमान गिरा और कठिन हो गयी सर्दभरी रात।
इस रात की तहस-नहस भरी जिन्दगी में
कहाँ पर ठौर मिल सकता है,
मालूम नहीं है उन्हें
वे अकेले नहीं हैं, वे बहुत सारे लोग हैं एक साथ
जो अभी-अभी यहाँ पहुँचे हैं
उन्हें न तालाब की चिन्ता है न ही पेड़ देखने का मन,
सब की एक ही चिंता है
कि अगर उनकी खुशियाँ बचेंगी भी तो
न जाने वे किस तरह की होंगी।

 

 

 


आग

चीजों के राख में बदल जाने के बाद
कुछ भी मालूम नहीं होता
इसका पिछला स्वरूप क्या था
और आग जलती है बिना भेद-भाव के
प्राप्त करती है अपनी खुराक नरम चीजों से
और पकड़ने को बढ़ती है सख्ती की ओर
लेकिन कितनी आसानी से बाँध लेते हैं इसे
छोटे से मिट्टी के दीये भी, अपने आकार में
जबकि सूरज की आग की हमें परवाह नहीं
ना ही डर है चाँद-सितारों से
क्योंकि ये दूरस्थ मित्र हैं हमारे
रोटी की तरह हमारा पोषण करते हुए
और वह आग बेहद डरावनी हो सकती है कल
जो अभी बंद है किसी माचिस की डिबिया में
और जिसे शैतानी हाथ ढूंढ़ रहे हैं घुप्प अंधेरे में।

 

 

 


अवसर

चील बहुत फुर्तीली है
आँखें उसकी तीव्र है
बखूबी देख लेती है शिकार को
बहुत दूर से
लेकिन तुम्हारे हिस्से में एक लाभ है
वो बहुत दूर है
जल्दी झपट्टा मारने का
पहला अवसर, तुम्हारे पास है।

 

 

 

 

 

 

 


जो मिला है मुझे

उपदेश कभी खत्म नहीं होंगे
वे दीवारों से जड़े हुए
मुझे हमेशा निहारते रहेंगे,
जब मुझमें अपने को बदलने की जरूरत थी
उस वक्त उन्हें मैं पढ़ता चला गया
बाकी समय बाकी चीजों के पीछे भागता रहा,
अत्यधिक प्रयत्न करने के बाद भी
थकता नहीं हूँ
कुछ न कुछ हासिल करने की चाह।
जो मिला है मुझे
जिससे सम्मानित महसूस करता हूँ
गिरा देता हूँ सारी चीजों को एक दिन
अपने दर्पण में फिर से अपनी शक्ल देखता हूँ
बस इतना काफी नहीं है
इन बिखरी चीजों को भी सजा कर रखना है
वे सुन्दर-सुन्दर किताबें
वे यश की प्राप्ति के प्रतीक
कल सभी के लिए होंगे
और मैं अकेला नहीं हूँ कभी भी।

 


आज सचमुच लगा

आज सचमुच लगा,
मेरे बीमार पिता को
एकदम से मेरी जरूरत है
वे धीरे-धीरे बोल रहे थे
बहुत कम विश्वास था
उन्हें ठीक होने का
जितना भी जिया, संतुष्ट थे उससे
लेकिन एक खालीपन था चेहरे पर
लगता था, प्यार ही भर सकता है जिसे
मैंने धीरे-धीरे हाथ बढ़ाया
अपना हाथ उनके हाथ में लिया
फिर कंधे पर फेरा हाथ
और आखिर में हाथ सिर पर रखकर
बच्चों की तरह प्यार किया
उन्होंने मुझे देखा
थोड़ी अच्छी तरह से
शायद उन्हें लगा,
अभी जीने के कुछ ये ही कारण बचे हैं
उन्हें जीना चाहिए
वे कुछ नहीं बोले
तेजी से आँख मूँदकर
मुँह फेर लिया ।

नये घर में प्रवेश

वर्षों से ताला बन्द था
उस नये घर में
कोई सुयोग नहीं बन रहा था
यहाँ रहने का
आज किसी शुभ हवा ने
दस्तक दी और खुल गये इसके द्वार
देखता हूँ, बढ़ रहा है
इसमें रहने को छोटा-सा परिवार
माता-पिता-बच्चों सहित
साथ में दादा-दादी
सभी खुश हैं
आज पहली बार खाना बनेगा
इसके रसोई घर में
छोंकन से महकेगा सारा घर
कुछ बचा-खुचा नसीब होगा
आस-पास के कुत्तों और पक्षियों को भी
कुछ पेड़-पौधे भी लगाये जाएँगे
साथ में तुलसी घर भी होगा आँगन में
पिछवाड़े में होंगे स्कूटर और साइकिल
और एक कोने में स्थापित होंगी
ईश्वर की कुछ मूर्तियाँ ।
कुछ ऊँचे स्वर भी सुनाई देंगे
कभी-कभार दादा के
जो बतायेंगे   
अभी घर की सारी सुरक्षा का भार
उन्हीं के सिर पर है।

 

 

 

 

 

 

 

 


यहाँ के दृश्य
 
यहाँ दृश्य टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरे हुए हैं
एक-एक कण सभी को समर्पित
थोड़े से बादल हटते हैं
दृश्य कुछ और हो जाता है
हवा चलती है जैसे हम सभी को
एक साथ समेट लेने को
मन में इच्छा होती है वैसी आँखें मिल जाएँ
जो सब कुछ ले जाएँ अपनी झोली में।
थोड़ी सी तस्वीरें खींची हुई मेरे पास
एक पेड़ की डालियों जितनी भर
और यहाँ तो हर क्षण
कहीं भी जा सकते हैं आप दूर-दूर तक
वो भी पलक झपकाये बिना
और भूल जाते हैं हम
किस दुल्हन का मुखड़ा ढूंढ़ रहे हैं हम यहाँ।
 
 

 

 


यह लालटेन

सभी सोये हुए हैं
केवल जाग रही है
एक छोटी-सी लालटेन
रत्ती भर है प्रकाश जिसका
घर में पड़े अनाज जितना
बचाने के लिए जिसे
पहरा दे रही है यह
रातभर!

 

 

 

 

 

 

 


परीक्षाफल

वह बच्चा
पिछड़ा हुआ बच्चा
चील की तरह भागा
अपना परीक्षाफल लेकर
अपनी माँ के पास
एक बार माँ बहुत खुश हुई
उसके अच्छे अंक देखकर
फिर तुरंत उदास
किताबें खरीदकर देने के लिए
पैसे नहीं थे उसके पास।

 

 

 

 

 

 


डूबते हुए जहाज में प्रेम

जहाज डूबने को था
हमने देह से अधिक
प्रेम को बचाना चाहा
जब सारे लोग भाग रहे थे
हम प्रेम में थे मग्न
हमारा प्रेम सिलसिलेवार चलता रहा
जो बच सके, वे बच गये
जो नहीं बच पाये, वे नहीं बच पाये
उनमें हम दोनों भी थे
दोनों हाथ हमारे मिले हुए थे
साथ ही कन्धे से कन्धा
और मन से मन
भय कहीं नहीं था
पानी हमें झाँक रहा था
और हम एक-दूसरे को।

 

 

 


फूल

खामोश हरियाली के बीच
पर्वतनुमा इस जगह में
एक शांत कब्र ढकी हुई फूलों से
बार-बार निगाह जाती है उन पर
लगता है चेहरा शव का हमेशा ढका रहे
केवल फूल ही फूल दिखलाई दें,
सारे दुखों को ढक लेते हैं फूल
फूल ही हैं वे जिनकी तरफ आँखें दौड़ती हैं,
इनके ही भार से हल्का हो जाता है
किसी के भी छोड़ जाने का दुख।

 

 

 

 

 

 


डर पैदा करना

केवल उगते या डूबते हुए सूर्य को ही
देखा जा सकता है नंगी आँखों से
फिर उसके बाद नहीं
और जानता हूँ
हाथी नहीं सुनेंगे
बात किन्हीं तलवारों की
ले जाया जा सकता है उन्हें दूर-दूर तक
सिर्फ सुई की नोक  के सहारे ही,
इसलिये सोचता हूँ,
डर पैदा करना भी एक कला है।

 

 

 

 

 

 


समुद्र तट पर

इतने लोगों की भीड़
इनके साथ रहूँ या साथ छोड़ दूँ?
मैं अकेला समुद्र तट पर
एक मात्र कुर्सी पर भी कर सकता हूँ विश्राम
चारों तरफ जल, जैसे नहीं हो कुछ इसके सिवा
अगर कुछ है तो मैं ही हूं इतना भर ही।
इस सुबह की धूप में कोई मजाक नहीं करता
न ही चढ़ता है किसी पेय का नशा
आँखें ढूँढ़ती रहती हैं रंग-बिरंगी बोटें
और यात्री उन पर आते-जाते हुए।
हर छोटा बच्चा रेत से घर बनाना चाहता है
जैसे यह हमारी पैदाइशी ख्वाहिश
और भाग रहे हैं जो मछलियों के पीछे
जाल उनके पंजों की तरह हिलते हुए
पूरे बाजार में समुद्री खाद्य पदार्थ टँगे हुए
जैसे चित्रित करते हों सूखे समुद्र को।
कितना कुछ है यहाँ
और मैं देखता भर हूँ सिर्फ समुद्र की लहरों को
लहरें मेरे पास आती हुई, मुझसे दूर जाती हुई
मुझे अपने पास आने का प्रलोभन देती हुई।


तुम्हारा न रहना

तुम्हारे अनगिनत बिम्ब
झाँकते हैं मेरी ओर
अपने हजार हाथों से दस्तक देते हुए
और उलझन में रहता हूँ
कैसे उन्हें प्रवेश दूँ
जबकि जानता हूँ
वे आयेंगे नहीं भीतर
केवल झाँकते रहेंगे बाहर से
तुम्हारा पास न रहना
इसी तरह का आभास देता है मुझे हर पल ।

 

 

 

 

 

 


मैं भूल गया हूँ

मैं भूल गया हूँ पृथ्वी तुम्हें
अब मेरे पाँव तुम पर नहीं पड़ते
तरस गयी हैं मेरी आँखें
तुम्हारी सुगंधित मिट्टी देखे बिना
दूर हो गया है यह सूर्य
दिखलाई नहीं देता मुझे
जिसका उदय और अस्त होना,
बैठा रहता हूँ घण्टों-घण्टों भर
इस व्यवसाय की कुर्सी में
और देखता रहता हूँ मेज को
जिससे उठकर कागज पर कागज
चिपकते जाते हैं मेरे चेहरे पर
और इस कलम से किये गये हस्ताक्षर
महसूस कराते हैं मेरी मौजूदगी भर।

 

 

 

 

अंतिम संस्कार

मैं गुजर रहा था
अपने चिरपरिचित मैदान से
एकाएक चीख सुनी
जो मेरे सबसे प्रिय पेड़ की थी

कुछ लोग खड़े थे
बड़ी-बड़ी कुल्हाड़ियाँ लिये
वे काट चुके थे इसके हाथ
अब पाँव भी काटने वाले थे

मैंने इशारे से उन्हें रोकना चाहा
वे रुके नहीं अपना काम करते रहे

मैंने फिर कहा माफ  करो इसे
अगली बार यह जरुर फल देगा
इसमें पत्ते भी आयेंगे और फूल भी
पथिक भी आराम करेंगे
चिडियाँ भी घोंसले बनायेंगी

न हीं वे माने और न ही रुके
केवल बुदबुदाते रहे-
मरे हुए का शोक करता है
कौन है यह आदमी?
क्या इसे अपना हिस्सा चाहिए?

आगे मैं कुछ बोलता
वे पहले ही बोल पड़े-

हम लोग लाश उठा रहे हैं
अंतिम संस्कार भी करा देंगे
तुम राख ले जाना

वे बहुत खुश थे
जोर-जोर से हँस रहे थे
जड़ें हिल रही थीं उनकी हँसी से,
कुल्हाड़ियाँ चमक रही थीं
और उखड़ने लगे थे
धरती से मेरे पाँव।

 

 

 

 


अत्मीयता

उसने कितनी आत्मीयता से कहा था,
आपने दावत देने का वादा किया था और नहीं आये
उसके  शब्दों में एक मीठा आग्रह था
साथ न बैठ पाने का सहज दुख
और वो जानती थी कि उसका हक मुझ पर कितना कम था
यह मुलाकात एक सुंदर दृश्य की तरह
और उसे सब कुछ भुला देना था।
उस दिन अचानक ही हम एक-दूसरे को अच्छे लगे थे
कोई कारण नहीं था बातें करने का
फिर भी हमारी उत्सुकता ने हमें मिला दिया
वह हँसी थी जैसे पहली बार में ही
अपना परिचय देने को इच्छुक हो
लेकिन मैंने पाया असीम था उसके पास देने को
बातों ही बातों में और अधिक जीवंत होती जा रही थी वो
कोई विवरण नहीं था उसके पास
किसी तरह का कोई स्पर्श भी नहीं
बस अपनी कोमल भावनाओं का इजहार
और मुश्किल हो रहा था मुझसे यह सब कुछ सहना
शायद इसलिए कहा था मैंने उससे
अलविदा! कल फिर मिलेंगे
और आज बस उससे क्षमा माँगने आया था।

लोहा बन गया हूँ मैं

सरल मार्गों का
अनुसरण कब किया मैंने
खाई-खन्दक से भरी जमीन पर
योद्धा बन कर गुजरा हूँ मैं
धूप में तपकर
अनगिनत रूपों में ढला हूँ मैं
वक्त ने सौंपे जो भी काम
हँसते हुए पूरा किया उन्हें
कभी थका नहीं
पहाड़ों पर चढ़ते हुए
लोहा बन गया हूँ  मैं
झेलते-झेलते।


 

 

 

 

विडम्बना
 
यह विडम्बना थी कि
इन सुंदर दृश्यों को छोड़कर
वापस मुझे आना होता था
मेरे ठहराव में उतनी गहराई नहीं थी
कि स्थापित कर लेता मैं वहीं, अपने आपको
केवल उनके रंगों से रंगता अपने आपको
और धीरे-धीरे वापस लौटने पर
चढ़ जाते थे इन पर, दूसरे ही रंग।
फिर भी मैंने कभी सोचा नहीं
एक जगह चुपचाप रहना ही अच्छा होगा
बल्कि फिर से तलाशी दूसरी धरती
और पाया ये भी वैसे ही हैं
पृथ्वी के रंगीन टुकड़े।
जीवन सभी जगह पर रह सकता था
क्या तो कठोरता में या क्या तो तरलता में
और जहां दोनों थे
वहीं अद्भुत दृश्य बन सके
और हमें दोनों से तादात्म्य बैठाना था।
 

 

चित्र

चित्र से उठते हैं तरह-तरह के रंग
लाल-पीले, नीले-हरे
आकर खो जाते हैं हमारी आंखों में
फिर भी चित्रों से खत्म नहीं होता
कभी भी कोई रंग।
रंग अलग-अलग तरह के
कभी अपने हल्के स्पर्श से तो कभी गाढ़े स्पर्श से
चिपके रहते हैं,
चित्र में स्थित प्रकृति और जनजीवन से।
सभी चाहते हैं गाढ़े रंग अपने लिए
लेकिन चित्रकार चाहता है
मिले उन्हें रंग
उनके व्यक्तित्व के अनुसार ही,
जो उघाड़े उनका जीवन सघनता में।
अक्सर यादें रह जाती हैं अच्छी कलाकृतियों की
रंग तक भी याद आते रहते हैं
लेकिन जो अँगुलियाँ गुजर गयीं हजारों बार
इन पर ब्रश घुमाते हुए
कितना मुश्किल है समझ पाना
कौन सी भाषा में वे लिख गयीं
और सचमुच क्या कहना चाहती हैं वे?

एक संगीत समारोह में

शांति चारों ओर थी
और उसके संगीत के साथ परम शांति की ओर बढ़ते हम सभी
अगर शुरू के स्वरों से बाद में आने वाले शब्दों को
बाँध लें हम मन में,
तो संगीत को नृत्य के रूप में देखा जा सकता है यहाँ
यह संगीत अपनी लय में नृत्य करता हुआ
और उनकी आवाज, चेहरे और वाद्यों की धडक़न
जैसे हममें स्थित किसी सुप्त श्रोेता को पुकारने लगी हो
जो अब लगभग पूरी तरह से जाग गया था
और सुर-ताल में स्थित प्रखर तेज का आलिंगन करने लगा था
हम स्थिर होकर भी महासमुद्र का गोता लगाते हुए,
कोई चुप नहीं यहाँ
सभी एक ही मंच को आलिंगनबद्ध किए हुए।

 

 

 

 

बैण्डबाजे वाले

आधी रात में
बैण्डबाजे वाले
लौट रहे हैं
वापस अपने घर
अन्धकार के पुल को
पार करते
जिसके एक छोर पर
खड़ी है उनकी दुखभरी जिन्दगी
और दूसरे छोर पर
सजी-धजी दुनिया!

 


 

 

 

 

पिंजड़ा

सचमुच पिंजड़े के बाहर
कितनी आजाद है दुनिया
और इसके भीतर कितनी तंग
फासला दोनों के बीच है
बस हाथ बढ़ाओ और
छू लेने जितना
फिर भी लग जायेगी
सारी जिन्दगी इस पंछी को
इसे पार करने में भी।

 

 

 

 

 

 

प्रकाश

हर अँधेरे की भूख
कि उसे केवल प्रकाश चाहिए।
अपने अंतिम क्षणों तक भी
आँखें मूँदना नहीं चाहता कोई
प्रकाश हमें थोड़ा सा मिला
यही हमारा दुख है।
मेरी सारी गतिविधियों में शामिल है प्रकाश
यह मेरे साथ उठता और बैठता हुआ।
चाहे कितना भी अँधेरा क्यों न हो जाए
गुम हो जाएँ सारी बत्तियाँ
एक अंधकार चारों ओर जैसे पानी के नीचे हम दबे हुए
फिर भी हम तड़पेंगे आँखें खोलने के लिए
मैं इसी तड़प को देखता हूँ दिन-रात
कुछ है जो मेरे भीतर
जो अपना मार्ग ढूंढ़ता है
और ये शब्द उसी के माध्यम से
अपनी आँखें खोलते हैं कागज पर।

 

 

इस बार

इस बार अपने स्वभाव के विपरीत
बहुत जल्दीबाजी की तुमने
हाथ छुड़ाया और चले गये
थोड़ा सा भी समय नहीं दिया
जी भर के देखने का
और बातें करने का,
कितनी चीजें थीं हमारे पास
दिखाना चाहते थे तुम्हें
एक ाुभ दिन
सब वैसी की वैसी रह गयी
एक उँचाई की ओर बढ़ रहे थे हम,
जहाँ से पुकारना चाहते थे तुम्हें
अपना हाथ हिलाते हुए,
अब उसे सुनने वाला कोई नहीं है
इसलिए हार गये हैं हम
हमारे सारे गर्व चूर हो गये हैं
और अब हम धरती पर हैं।

कहा था एक दिन तुमने
सभी को इसी तरह जाना होता है
बिलकुल खाली हाथ
लेकिन कितना सारा प्रेम
छोड़़कर गये हो तुम
और रेखाएँ तुम्हारे हाथ की
अब भी भाग्य बनकर
जी रही हैं हमारे साथ
और सारा कुछ देख लेने के बाद
तुम अब कहाँ हो


जान लेने की इच्छा बची है मन में केवल
और तुम्हारा ठीक से रहना ही
बहुत सारा सन्तोा  देता है हमें।


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


मकान

ये अधूरे मकान लगभग पूरे होने वाले हैं
और जाड़े की सुबह में कितनी शांति है
थोड़े से लोग ही यहाँ काम कर रहे हैं
कई कमरे तो यूँ ही बंद
खूबसूरती की झलक अभी बहुत ही कम
दिन ज्यूँ-ज्यूँ बढ़ते जाएँगे
काम भी पूरे होते जाएँगे।
खाली जगह से इतना बड़ा निर्माण
और चांद को भी रोशनी बिखेरने के लिए
एक और नई जगह
बच्चे खुश हैं दौड़-दौड़कर खेलते हुए
अभी उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं
एक अच्छे भविष्य की ओर बढ़ता हुआ मकान
जैसे एक छोटी सी चीज को
बहुत अच्छी तरह से सजाया जा रहा है
हाथ की मेहँदी तो एक छोटा सा भाग होती है दुल्हन का
फिर भी इसके दरवाजे उतने ही महत्त्वपूर्ण
जिन पर पौधों की शाखाएँ झूलने लगी हैं
कुछ आगन्तुक गुजरते हैं पास से
इसे देखते हुए
कोई सम्मोहन उन्हें रोक लेता है
सभी थोड़ी-थोड़ी झलक लेते हैं
लम्बी हो या छोटी।
सारी थकान के बाद यह एक पड़ाव है
और कोई कैसे बढ़ता है सफलता की ओर
हर पल दिखला रहा है यह निर्माण। 
       

 

 

 

 

 

 

 


पार्क में एक दिन

इस पार्क में जमा होते जा रहे हैं लोग
कोई चुपचाप निहार रहा है
पौधों की हरियाली और फूलों को
कोई मग्न है कुर्सी पर बैठकर
प्रेम क्रीड़ा करने में,
कोई बढ़ रहा है आगे देखने की उत्सुकता लिए
कोई वहीं बैठ गया है घास पर
थोड़ी ठंडक का आनन्द लेने
कई बच्चे अलग-जगह पर हैं
झूला झूलते या दूसरे उपकरणों से खेलते हुए
सभी लोग फुर्सत में हैं, फिर भी व्यस्त।

अब थोड़ी देर में फव्वारे चालू होंगे
रंग-बिरंगे मन मोहते हुए
यही आखिरी खुशी होगी लोगों की
फिर लौटने लगेंगे वे वापस घर
कोई परिश्रम नहीं, फिर भी थके हुए।

 

 


युद्ध

फुर्तीले शरीर और शानदार घोड़े
दिशाओं में सिहरन पैदा करते हुए
एक इशारे से जंग की ओर दौड़ते हुए
और बिल्कुल साफ-सुथरी वेशभूषा लड़ाकों की
सभी की एक जैसी, वातावरण में प्राण फूँकती हुई
सभी एक जैसे कि एक गिरे तो
दूसरा ठीक उसी तरह से उठ खड़ा हो
वे दौड़ते हैं जैसे कोई भयानक आग को रोकने को
सभी तरफ आग ही आग
और यह शरीर से निकलती युद्ध की आग
प्राण ले लेती है अपनों के ही
युद्ध खत्म होने पर बच जाते हैं सिर्फ अवशेष,
थके हुए घोड़े और रोष से पीड़ित अधमरे लोग
किसी में कोई चमक नहीं
अब आँखें उन्हें देखने से भी कतराती हैं।

 

 

 


मजदूर के घर कबूतर

मेरे दादा मजदूर थे
लेकिन अपनी मर्जी के
वे साइकिल के पीछे
अनाज की बोरी रखकर
मुट्ठी भर-भर पूरे गाँव में बेचते थे
और थोड़े से पैसे लेकर
शाम को घर लौटते थे
और उस वक्त
कबूतर उनका इंतजार करते थे
जो बोरे को झाड़ने के बाद
बचा हुआ अन्न खाकर
पानी पीते
और उड़ जाते थे।
लोग कहते थे
यह कैसा प्रेम
मजदूर  के घर कबूतर
और मेरी दादी
सबकी नजरें चुराकर
हर सुबह थोड़ा-सा
अनाज बिखेर देती थी
जिसे खाकर वे चुपचाप
छत पर उड़ जाते थे।
दादा कभी नहीं समझ पाये
इस राज को
हमेशा की तरह
बोरों को झाड़-झाड़कर
अनाज बाँटते हुए
बहुत खुश होते थे वे ।

शब्द

सभी के साथ सलाह-मशविरा
कितनों का ही अनुभव सर आँखों पर
खून तक में उतर आता है एक अच्छी पुस्तक के प्रति प्यार
छोटे-छोटे बच्चे तक-
प्यार करते हैं नयी-नयी किताबों को
वे जिल्द चढ़ाकर रखते हैं सुरक्षित सभी को
इनमें लिखी एक-एक चीज का महत्त्व
और उत्तर ही उत्तर माँगते हैं सब पाठ।
जो कम पढ़े-लिखे हैं
उनकी दुनिया में थोड़े से शब्द हैं
फिर भी जीवन यापन तो हो ही जाता है,
मैं भी लिखता हूँ हर दिन थोड़े से शब्द
जो हैं मेरी आत्मा से निकले हुए
दूसरों से आत्मीय होने के लिए
वे ढूँढ़ते हैं लोगों के बीच उनके फुर्सत के क्षण।

 

 

 


मेरे दोस्त

बहुत सारे दोस्त रहे मेरे
कुछ उन कौओं की तरह थे
जो वक्त आने पर
शोर मचा सकते थे हित में मेरे
लेकिन भीतर से उतने ही कमजोर
हवा की थोड़ी-सी धमक से
उड़ जाया करते थे मुझे छोड़कर।
कुछ वैसे भी रहे
चील की तरह दूर से ही
मुझ पर दृष्टि जमाए हुए
जब भी मौका मिला
छीनकर ले गए खाना मेरा।
और कुछ थे बेहद ऊबाऊ
सुअर की थोथी नाक की तरह
हमेशा मुँह दिखलाते हुए
कुछ ही थे अच्छी बातें कहने वाले
कहकहे लगाने वाले थे ज्यादा
लेकिन सभी दोस्त ही तो थे
इसलिए गले लगाए रखना
जरूरी था उन्हें।


हक
 
प्रकृति की सुंदरता पर किसी का हक नहीं था
वो आजाद थी, इसलिए सुंदर थी
एक खूबसूरत चट्टान को तोडक़र
दो नहीं बनाया जा सकता
ना ही एक बकरी के जिस्म को दो।
इस धूप को कोई नहीं रोक सकता था
धीरे-धीरे यह छा जाती थी चारों तरफ
इसलिए इसके भी दो हिस्से नहीं हो सकते
और जो हिस्से सुंदर नहीं थे
वे लड़ाइयों के लिए पहले ही छोड़ दिये गये थे।

 

 

 

 

 

 


शोर

अलग-अलग
होता सबका शोर-
भीड़ का
रोने का
बहते पानी का और
गुस्से का
थक जाता जब
सारा शोर
शांति होती है
सबकी एक जैसी ही ।

 

 

 

 

 

 


चिट्ठियाँ

दूर से आती है चिट्ठियाँ
अपनों को और अधिक अपना बनाने के लिए
और दुनिया छोटे से कागज में सिमटकर
बैठ जाती है हृदय पर
पहला खत था यह बेटी का
मुझको लिखा हुआ
अपने सारे दुख-सुख का निचोड़
घूमता रहा कई दिनों तक मेरे मन में ।

 

 

 

 

 

 

 


यहाँ की दुनिया

बच्चा अभी-अभी स्कूल से लौटा है
खड़ा है किनारे पर
चेहरे पर भूख की रेखाएँ
और बाँहों में माँ के लिए तड़प।
माँ आ रही है झील के उस पार से
अपनी निजी नाव खेती हुई
चप्पू हिलाता है नाव को
हर पल वह दो कदम आगे बढ़ रही
बच्चा सामने है
दोनों की आँखें जुड़ी हुई
खुशी से हिलती है झील
हवा सरकती है धीरे-धीरे
किसी ने किसी को पुकारा नहीं
वे दोनों निकल चले आये ठीक समय पर
यही है यहाँ की दुनिया।

 

 

 


पिता के लिए प्रार्थना

मैं प्रतिदिन तेरे द्वार पर आता रहा
और निराश होकर लौटता रहा
इस आशा में कि एक दिन
तू जरूर मेरी तरफ देखेगा
और अपने सर्वव्यापी हाथों से
मेरे आँसू पोंछेगा
विदा करेगा मुझे
अपना दुर्लभ प्रसाद देकर
लेकिन मेरी आशा
रोज मेरे पिता की रुगण शैया
के आस-पास दम तोड़ती रही और
तुम्हारी धरती नाराज होकर रूठी रही
उन्हें पाँवों से खड़े होने का
सहारा तक नहीं मिला
अनगिनत दिन बीत गये
मैं ठीक से समझ भी नहीं पाया
कि तू मेरी परीक्षा ले रहा है या
यह कोई तेरा बहाना है
मुझे अपने पास बुलाने का
अगर तू मेरी प्रार्थना से
थोड़ा-सा भी खुश होता है
तो यह खुशी मेरे पिता के
चेहरे पर बिखेर दे

मेरी आँखें तेरी इस परम अनुकम्पा से
सन्तुष्ट हो जायेंगी।

 


 

 

 

 

 

 

 

मुलाकात के बाद

जब मैं चीजों को समझता हूँ
वे कभी सुव्यवस्थित दिखाई नहीं देतीं
सभी में रुखड़ापन उजागर होने लगता है
एक दिन सब कुछ सही हो जाएगा,
उम्मीद छोड़ देता हूँ इसकी।
मैं अब किसी से भी मिलकर
उतनी संतुष्टि से विदा नहीं हो सकता
कुछ न कुछ छूट ही जाएगा कहना
एक बार में खेत, खोद नहीं डालते हल
हर बीज को खुली मिट्टी और हवा चाहिए
मैं इसी तरह से खुलता हूँ
फिर ढक लेता हूँ अपने आपको
इस तरह से धीरे-धीरे वृहद हो जाता हूँ मैं
मैं यहाँ मौजूद हूँ और सबको प्यार बाँटता हूँ
इस तरह से मेरा हृदय हमेशा सक्रिय रहता है
हमारी इस मुलाकात के बाद थोड़े से हम स्थिर हुए
थोड़े से हम बदल गए।

 

 


सेल्समैन

वह कितना प्रभावहीन था
जब आया था मेरे पास
 
-देखते-देखते
तन गया था उसका पूरा शरीर
एक योद्धा की तरह
उसने रख दी थी नजरें मेरे चेहरे पर
मानो वह मेरा ही मुखौटा हो

-तर्कपूर्ण बातों से
कसता जा रहा था मुझे
एक शिकंजे में
वह वही बोल रहा था
जो मैं सुनना चाहता था
वह वही समझा रहा था
जो मैं समझना चाहता था

हाव-भाव सभी सतर्क थे
तत्पर थे पूरा करने के लिए
जो वह करना चाहता था
दौड़ रहा था आत्मविश्वास
उसके रग-रग में
जिसने पैदा कर दिया था

मुझमें ऐसा विश्वास
मानो वह मेरा बहुत
पुराना मित्र हो

उसके कपड़े-जूते चेहरे सब
चमकने लगे थे एक तेज से
जिनके आगे मैं झुकता
चला जा रहा था
जबरदस्ती नहीं, खुशी से

अंत में वह हँसा
मानो जीत लिया हो उसने
जो वह जीतना चाहता था

वह एक अच्छा
सेल्समैन था!

 

 

 

 

अनुभूतियाँ
 
सचमुच हमारी अनुभूतियाँ
नाव के चप्पू की तरह बदल जाती हैं हर पल
लगता है पानी सारे द्वार खोल रहा है खुशियों के
चीजें त्वरा के साथ आ रही हैं जा रही हैं
गाने की मधुर स्वर लहरियाँ गूँजती हुई रेडियो से
मानो ये झील के भीतर से ही आ रही हों
हम पानी के साथ बिलकुल साथ-साथ
और नाव को धीरे-धीरे बढ़ाता हुआ नाविक
मिला रहा है गाने के स्वर के साथ अपना स्वर
और हम खो चुके हैं पूरी तरह से,
यहाँ की सुन्दरता के साथ।
 


 

 

 

 

 

तुम्हारी थकान

इधर तुम काम बन्द करते हो
उधर सूरज अपनी रोशनी
चारों तरफ अँधेरा छा जाता है
और तुम्हारी थकान
जलने लगती है
एक मोमबत्ती की तरह!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गेहूँ के दाने

ये दाने गेहूँ के
जो अभी बन्द हैं
मेरी  मुट्ठी में
थोड़ी-सी चुभन देकर
हो जाते हैं शान्त
अगर जो ये होते
मिट्टी के भीतर
दिखला देते
मुझे ताकत अपनी ।

 

 

 

 

 

 

 

आधुनिकता

ये कितने ही अनजाने चेहरे
जिन्हें हम देखते हैं रोज
कितनी ही बार उनके पास से गुजरते हैं
कभी साथ भी बैठ जाते हैं
सफर में-
लेकिन हममें दूरियाँ हैं
नीचे से ऊपर तक की
दूरियाँ सपने और वास्तविकता जितनी।
सभी का मिलन संक्षिप्त होता है
टुकड़ों-टुकड़ों में बनते-बिखरते संबंध
और साँसों का प्रयास
कि जल्दी ही हम अपने काम पर पहुँचें।
किसी ने गिरे हुए आदमी की मदद की
यह उपकार थोड़ी देर में खत्म हुआ
और भूल गए लोग सारी गाथा।
एक कहानी से कुछ सबक लिया गया
फिर वो किताब खुली ही नहीं वर्षों तक।
दिन के उजाले कितना ही प्रकाशित कर दें
कितनी ही सारी चीजों को
आधुनिकता हमें बहुत कम देर ही
ठहरने देगी उस छोर तक।
प्यार से देखता हूँ एक पल इस तोते को
मुस्कान से वो चोंच खोल देता है
मेरी खुशी को वो देखे
उससे पहले ही मैं उससे दूर चला जाता हूँ।


डायरी में

आज चारों तरफ कितना खाली है
कहीं भी जा सकता हूँ मैं आसानी से
कितना तरल हो गया हूँ मैं
कि किसी लैम्प की रोशनी भी मुझे नहीं रोकती
न ही ये पैदल सवार या गाड़ियाँ
सभी से जैसे भिन्न हूँ मैं
सड़क पर पानी की तरह बहता हुआ
कोई खुशी छू चुकी थी मुझे कभी की
अब मुझे उसका पता चला,
एक नशा सा पूरे शरीर में
मन करता है इसे बस सँभाले रहूँ
इसी में डूबा रहूँ
रुकता हूँ तो बस सारे सोच बंद
सपनों की सवारी से बाहर आ गया हूँ जैसे
लिख सकता हूँ आज की रात मैं यही बात
सोने से पहले
अपनी इस डायरी के पन्ने में।

 

 


रेगिस्तान

रेगिस्तान हो या पथरीले पहाड़
हरियाली फूटकर बाहर आ जाती है
जैसे वे आत्मा के रंग ही हों
थोड़े-थोड़े हरे रंग भरे हुए यहाँ
जिन्हें कभी ओस नसीब नहीं होगी
न ही बारिश।
फिर भी ये धीरे-धीरे बढ़ते रहेंगे
चमकते रहेंगे हमारी आँखों में समाकर।
जीवन एक से निकलता है
समा जाता है दूसरे में
यहाँ सुनसान सी दुनिया
रेत में भी रेत के कण उड़ते हुए
थोड़े से लोग मौजूद
बाजार से ऐतिहासिक चीजें खरीदते हुए
यहाँ के बाजार कभी नहीं बदलेंगे
वे छोटी-छोटी चीजें ही हमेशा बेचेंगे
और मेरे हाथों में जो तस्वीरें हैं
इन पुरानें अवशेषों की
यह  इतिहास का एक पन्ना है
जिसे कागज में सुरक्षित
ले जा रहा हूँ वापस ।

आवरण

अचानक कोई जाग जाएगा
और देखेगा जो उसने खोया था
पा लिया है
और हर पायी हुई चीज को
रखना पड़ता है सुरक्षित अपने पास ही
और संचय  पुराने होते जाते हैं
समय उन्हें ढकते चला जाता है
आवरण पर आवरण
और जीवन के आवरणों से ढकी हुई चीजों से
किसी बहुमूल्य को निकाल  लेता हूँ एक दिन
सारी सफाई के बाद एक उत्तम खनिज
जीवन के किस रस में ढालना है इसे
अब यह हमारी बारी है।

 

 

 

 

 

कबूतर

तालाब सूख गये हैं गर्मी से
और ये कबूतर पानी भरी बाल्टी से
बुझा रहे हैं अपनी प्यास
अभी थोड़ी देर पहले ही
दाना खाया है इन्होंने
और उड़ रहे हैं मंदिर की चारों ओर ।

तपती धूप में चमकता है
मंदिर का गुम्बज
और कौओं के लिए
कोई भोजन नहीं यहाँ
ये कबूतर ही हमेशा दोस्त रहे मंदिरों के
कहीं न कहीं इनकी जगह है
दीवारों में रहने की
और ये सीधे-साधे पालतू,
हाथ की अँगुलियों तक पर
बैठाया जा सकता है इन्हें।

 

 


पत्नी के जन्म दिन पर

कविता न लिख पाया
जो लिखनी थी
आ गया पहले ही
तुम्हारा जन्मदिन
पूछता कहाँ है-
वह तोहफा
शब्दों से भरा
वाक्यों से सजा
थरथरा रहे
जिसे पाने हेतु
मेरे होठ
रोमांच जाग रहा
कौतूहल की माँद में
माँग भी चमक रही
चेहरा भी हुआ लाल
कहाँ है वह?
सुनकर तेरी बातें
आँखें मेरी झुक आयीं
कविता लगी
पंख फड़फड़ाने
किन्तु लिखूँ किस भाव से
जब सब कुछ
सौंप दिया है तुम्हें आज।   ु

घटित होती हुई साँझ

साँझ से पहले हमें वहाँ पहुँचना है
और देखेंगे हम सूर्यास्त।
यह किनारे की भूमि
जहाँ से धीरे-धीरे सागर में अस्त होता है सूरज,
बस आखिरी किरणों की झलक
नारियल के दो पेड़ों पर
जिनके बीचोंबीच से गुजरती हुई छोटी सी नाव।
हमारी हर पल दृष्टि नाव पर
मद्धिम होती जा रही है जिसकी झलक
बैठा हुआ आदमी उसमें
दिखाई देता है जैसे बिंदु पेंसिल का।
किरणों का गिरना और उठना लहरों पर
और लौटते हुए पक्षियों की परछाई का स्पर्श जल पर।
यहाँ से कितने सारे पक्षी उड़े
सबने वापसी दर्ज की लौटने की,
अंतिम पक्षी की उड़ान के साथ
अस्त होता हुआ सूरज
चारों तरफ अँधेरे की लकीरें
अपना काला रंग भरती हुई
और हमारी उत्सुकता खत्म हो चुकी है अब।


प्रशंसा

मैं कर सकता था प्रशंसा सबकी
एक बालू के कण से लेकर वृहद आकाश की
सब में हवा बनकर जिया था मैं
कहीं न कहीं इन सब में था मौजूद
क्योंकि जब भी बैठा था मैं इनके पास
पूरी तरह था इनका ही
और उनके ही कर्म बस शब्द थे मेरे
ये ही पैदा कर देते थे तरंगें मेरे मन में
जैसे तट के ही छोटे पत्थर नदी के जल में।

 

 

 

 

 

 

 

विश्वास

मुश्किलों से लड़ने के लिए
कोई अस्त्र नहीं है मेरे पास
अस्त्र के नाम पर
सिर्फ एक विश्वास है
हर लड़ाई में मैं
उसे ही बचाने की कोशिश करता हूँ
क्योंकि यही मुझे बचाये रखता है ।


 

 

 

 

 

 

 


काँटा

एक बार नहीं अनेक बार
वह घुसा है चोर की तरह
तालाब के शान्त पानी में
और देखते-देखते
चुराकर लाया है एक मछली
बहुत सारी मछलियों के झुण्ड से
फिर भी अनजान रहीं मछलियाँ
चुप रहीं मछलियाँ
थामा उसका हाथ हमेशा
कोई अपना प्रिय समझकर

 

 

 

 

 

 


हाथ

सभी संसर्ग जुड़ नहीं पाते
अगर ऐसा हो तो फिर ये अंगुलियाँ
अपना काम कैसे करेंगी।
मैं कभी-कभी मोहित हो जाता हूँ
आटा गूँधने की कला पर
जब सब कुछ एक साथ हो जाता है
जैसे सब कुछ एक में मिल गया हो
लेकिन आग उन्हें फिर से अलग करती है
हर रोटी का अपना स्वरूप
प्रत्येक के लिए अलग-अलग स्वाद।
मैं अजनबी नहीं हूँ किसी से
जिससे थोड़ी सी बात की वे मित्र हो गए
और मित्रता अपने आप खींच लेती है सबों को
दो हाथ टकराते हैं जीत के बाद
दोनों का अपना बल
और सब कुछ खुशी में परिवर्तित हो जाता है।

 

 

 

नफरत

फँसने के बाद जाल में
कितना ही छटपटा ले पक्षी
उसकी परेशानी हमेशा बनी रहेगी
और उड़ान छीन लेने वाले हाथों से
प्राप्त हुआ भोजन भी स्वीकार करना होगा।
जिसने हमें जल पिलाया
भूल जाते हैं हम उसके दिए सारे क्लेश
और जो सबसे मूल्यवान क्षण हैं खुशियों के
वे हमेशा हमारे भीतर हैं
बस हमें लाना है उन्हें
कोयल की आवाज की तरह होठों पर।
जल की शांति हमें अच्छी लगती है,
जब बहुत सारी चीजें प्रतिबिम्बित हो जाती हैं उसमें तब
लहरें नफरत करती हुई आगे बढ़ती हैं,
किनारे पर आकर टूट जाता है उनका दम्भ।
धीरे-धीरे सब कुछ शांत
चुपचाप जलती मोमबत्ती में
मेरे अक्षर हैं इस वक्त कितने सुरक्षित।

 

 

समुद्र के किनारे

कितने सारे पेड़ चाहिए नारियल के
इस प्रदेश को हरा-भरा दिखने के लिए
और बगल से, वेग से आगे बढ़ता पानी समुद्र का
जिस पर जलते हुए सूर्य की चिंगारी ठंडी होती हुई।
इस रेतीले तट पर निशान ही निशान लोगों के
जैसे सभी को पहचान दे सकती हो यह जगह।
हवा उठती है बार-बार लहरों की तरह
मेरे पंख हों तो मैं भी उड़ चलूँ।
चारों तरफ यात्री ही यात्री
और सामने सूचना पट पर लिखा है
खतरा है पानी के भीतर जाने से
और एकाएक अनुशासन को टटोलता हूँ
मैं अपने भीतर।
और यकीन करता हूँ कि
खुशियों के साथ इनका भी कुछ संबंध है।

 

 

 


सृजन रुकता नही

काफी तेज बारिश हुई है
लगा एक मुश्किल समय सामने है
फूलों की मुश्किल कि उन्हें धोने की जरूरत नहीं थी
और बेवजह उनके धुले चेहरे मुर्झाने लगे
इतना अधिक पानी कि पत्ते जरूर चमकने लगे।
सभी तरफ से घिरे बादल भी
रोशनी को नहीं रोक सकते
मैदान जल से भरे हुए
अब लोग क्या काम करें
वे चुपचाप थके हुए से
धूप का करते हुए इंतजार
गुलाब के काँटे बिलकुल धारदार
पत्तों की नोक तक दिखती है
पक्षियों के बिना सूना आकाश
फिर भी सृजन रुकता नहीं
घास में हरियाली पहले से अधिक असरदार।

 

 

 

कीड़े

जब कीड़े घुस जाएँ फल में
क्षीण हो जाता है उसका मूल्य
और जो मूल्यहीन है
फेंक दिया जाता है बाजार में।
हमने देर लगा दी
नष्ट होते हुए को देखने में
नाव में कब सुराख हुआ
मालूम ही नहीं पड़ा।
अपनी चलनी को बचाकर रखना है
तभी घुलेगी आटे की मिठास जीभ पर
जख्म हुए तो पाँव में वेदना की चुभन
और निहायत जरूरी है
लोहे के बक्से तक को मजबूत रखना
मधुमक्खी अपने डंक लेकर हमेशा सावधान है
सावधान है वह भीड़
जो बार-बार तालियाँ बजा रही
लेकिन उतने सावधान नहीं
इसे सुनने वाले लोग
कीड़े अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ेंगे।

 

टोपी

तरह-तरह की टोपियाँ
हमारे देश में
सबका एक ही काम
सिर ढकना
-नहीं एक और काम
विभाजित करना
लोगों को
अलग-अलग समुदायों में ।

 


 

 

 

 

 

 

पिता के लिए
हम उड़ेंगे एक दिन आकाश में
और माँग लायेंगे
देवताओं से
तुम्हारे लिए ढेर सारी खुशियाँ
रंग-बिरंगे सपने
और हँसता- खेलता स्वास्थ्य तुम्हारा
पिता फिर तुम मुस्कुराना
और तुम्हारी हँसी
बदल जायेगी हमारी हँसी में
जिसके बीच छुप जायेगा
हमारा अन्धकार तुम्हारे प्रकाश में
पिता इस प्रकाश के बीच
हमारे हृदय से झरेंगे
बहुत सारे श्रद्धा के फूल
नये-नये गीत प्रार्थना के
और प्रेम हमारा धूप की तरह
बिखरता जायेगा तुम्हारे चरणों में
तुम इन्हें देखो  और कुछ कहो
इससे पहले ही
हम खुशियों के आँसू बनकर
बस जायेंगे तुम्हारी आँखों में
तुम हँसो इससे पहले ही
हम मौजूद होंगे
कहीं न कहीं तुम्हारे होठों में
पिता तुम हमसे
कुछ कहो चाहे न कहो

हम मौजूद रहेंगे
हमेशा तुम्हारे साथ
एक साये की तरह ।

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किताब

अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद
एक किताब लिखी जाती है
अनगिनत सीढ़ियाँ उतरने के बाद
एक किताब समझी जाती है।

 

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-समाप्त-

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