सोमवार, 26 मई 2014

पुस्तक समीक्षा - औरत की बोली

 

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पुस्तक : औरत की बोली

लेखिका : गीताश्री

प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन,  3320-21

जटवाड़ा,  नेताजी सुभाष मार्ग

दरियागंज,  नई दिल्‍ली-110002

मूल्‍य : 250 रूपए

सुप्रतिष्‍ठित पत्रकार एवं रचनाकार गीताश्री की सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘औरत की बोली : स्‍त्री विमर्श' एक शोध पुस्तक से किसी भी तरह कमतर नहीं है․ यद्यपि लेखिका ने इस पुस्तक को शोध तो नहीं मगर शोध जैसा ही कुछ मानती है․ हिन्‍दी में वर्जित विषय पर यह पुस्तक देश-विदेश में फैले देह व्‍यापार का एक विहंगम सर्वेक्षण है․ राजेन्‍द्र यादव जी ने इस पुस्तक के संदर्भ में ठीक लिखा है कि ‘‘निसंदेह दर्शक-दृष्‍टि के बावजूद गीता ने अपने तथ्‍य, परिश्रम और सूझ-बूझ से जुटाए और सजाए है․ इसके लिए उसे सोनागाछी, कमाठीपुरा, जी․बी․रोड से लेकर छोटे-छोटे शहरों, कस्‍बों की खाक छाननी पड़ी है․ देश ही नहीं, हांगकांग से लेकर स्‍वीडन, जर्मनी और न जाने कहां-कहां वह देह मंडि़यों में गई है․ यही नहीं, उसने घुटन-भरी गलियों से लेकर आधुनिक नाइट क्‍लों, पबों, फ्रेंडशिप क्‍लबों और मसाज पार्लरों के अंधेरों को भी टटोला है․''

लेखिका की दर्शक-दृष्‍टि के बावजूद हर छोटी-बड़ी चीजें को जांचने-परखने की लेखिका की सजग दृष्‍टि और उतने ही जीवंत चित्रण से पाठक अनायास ही पुस्तक के तथ्‍यों से जुड़ जाता है․ ‘औरत की बोली' के माध्‍यम से लेखिका ने देश के भौगोलिक सीमाओं से परे, जाल की तरह स्‍त्रियों को अपनी जद में लिए हुए देह व्‍यापार की यह व्‍यवस्‍था अलग-अलग भाव-विश्‍वों की एक अत्‍यंत दुरूह, अनिश्‍चित मगर निर्णायक सर्वेक्षण का दस्‍तावेज प्रस्‍तुत किया है․ यह पुस्तक लेखिका का लेखन कौशल मात्र नहीं है अपितु नए प्रयोगों-युक्‍तियों, समझौतों-सकल्‍पों और सतेज, निर्भीक एवं गहरी संवेदनशील नजर का परिणाम है․

लेखिका का कहना है, ‘‘दुनिया की नजर में सेक्‍स वर्कर चाहे जो हों, बुरी, अछूत, गंदी लेकिन मेरी नजर में वे दैहिक श्रमिक है․'' लेखिका की नजर दैहिक श्रमिक यानी सेक्‍स वर्करों की विवशता पर है, मजबूत देह व्‍यापार के सामने कानून कितना मजबूर नजर आता है․ लेखिका ने वेश्‍यावृति निरोधी कानूनों की पड़ताल के साथ-साथ तेजी से बदलते जा रहे इस धंधे की नब्‍ज को भी गहराई से परखा है इस पुस्तक में․ लेखिका ने सरल और आम बोल-चाल की भाषा में धर्म की सोहबत में हुए देह के सौदे पर समाज कैसे गर्व करता रहा है तथा खुद को विश्‍व बाजार में आज किस तरह बेच रही हैं लड़कियां और मर्द, जिगोलो भी बेच रहे हैं देह, का शोध परख आख्‍यान प्रस्‍तुत किया है․

आधुनिक सभ्‍यता की आड़ में भाषिक छद्‌म के साथ हो रहा यह व्‍यवसाय कैसे आज सारी दुनिया में फैला हुआ है, कैसे इसकी वजह से सपने टूटते जा रहे हैं और किस तरह सोनागाछी, कमाठीपूरा, जी․बी․रोड जैसी जगहें जिंदा लाशों की कब्रगाह में तब्‍दील होती जा रही है, यह सच्‍चाई ‘औरत की बोली' में पूरी तरह खुलकर सामने आयी है․ वेश्‍यावृति के तानेबाने में मौजूद असुरक्षा, आपसी विश्‍वास, कुंठा और अवसाद जैसी सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म और सघनतम तथ्‍यों की बारीकी से पड़ताल करती है-‘हो सकता है सुधिजनों को मुझसे असहमति हो, उनकी असहमति का स्‍वागत है मगर मैं तवायफों को तब भी कलाकार मानती थी, जिन्‍होंने अपने कोठों पर नाच, गीत, संगीत, शास्‍त्रीय संगीत को जिंदा रखा था․ आज भी वही मानती हूं और उनके धंधे को दैहिक श्रम का दर्जा देती हूं․'

पीढि़यों के अंतराल, संस्‍कृतियों के द्वन्‍द्व, नितांत भिन्‍न वैचारिक-मानसिक धरातल, मूल्‍यों-मान्‍यताओं-प्राथमिकताओं के बीच वेश्‍यावृति की बदलते तेवर को लेखिका ने ‘क्‍या बोलती है दुनिया ?' अघ्‍याय में ठीक लिखा है कि ‘‘वासना की वैश्‍विक मंडी में डिजिटल तकनीक के सहारे देह का सौदा आज भौतिक सुख-साधनों के उन सौदों से कतई अलग नहीं है, जिनमें लोग घर के लिए टीवी, फ्रीज या एसी की मांग करते है․ आज देह अपनी तमात हदों को पार कर सीधे मोबाइल फोन के जरिए भी लोगों तक पहुंच रही है․'' पाठक लेखिका के सटीकबयानी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है जब वे कहती है कि ‘‘अचरज की बात यह है कि 21वीं सदी के शोर में डूबी दुनिया भी नारी देह के सौदे पर विमर्श करने में झिझकती दिखाई देती है․'

 

पुस्तक में उन प्रश्‍नों की, जिनका समाधान लेखिका के पास नहीं है-शायद किसी के पास भी नहीं-जैसे जब देह ही दुकान बन जाए तो फिर सपनों, उम्‍मीदों और अरमानों के खरीददार कौन होंगे ? अदालत भी तो इस धंधे को वैद्य करना चाहती है, आखिर क्‍यों ?

इस आत्‍मकेन्‍द्रित दुनिया की अलगाव एवं अवसाद भरी जिंदगी की गूंज पुस्तक के अलग-अलग अध्‍यायों में सुनी जा सकती है, विशेषकर लेखिका जब निदा फाजली के एक शेर' को ‘कोट' करती है कि -

 

‘‘इनके अंदर पक रहा है वक्‍त का ज्‍वालामुखी

किन पहाड़ों को ढके है बर्फ जैसी औरतें ''

 

विश्‍वव्‍यापी वेश्‍यावृति के धंधे में निरंतर अकेले पड़ती जा रही स्‍त्री की व्‍यथा को लेखिका ने शिद्दत से महसूस किया है-‘मेरी सहानुभूति उनसे है जो किसी मजबूरी में, अपनी मर्जी के खिलाफ इस धंधे में उतर गई है या उतार दी गई है․'

‘औरत की बोली' की खासियत यह है कि हिन्‍दी के वर्जित विषय पर लिखी गयी यह पुस्तक सभी के पढ़ने योग्‍य है․ ऐसे विषय पर लिखते हुए शालीन भाषा का साथ छूट जाना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं पर लेखिका ने इसका खास ध्यान रखा है और भाषा को शालीन बनाए रखा है․ सामयिक प्रकाशन से छप कर आयी पुस्‍तकों की उम्‍दा फ्रूफ रीडि़ंग और उत्‍कृष्‍ट छपाई का क्‍या कहना․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

1 blogger-facebook:

  1. akhilesh chandra srivastava7:14 pm

    ek aurat ke liye aurton se sambandhit goodhh aur kathin vishay par likhna
    sachmuch himmat ka hi kam hai mai lekhika ko iske liye badhai aur
    aasheerwad deta hoon

    उत्तर देंहटाएं

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