शनिवार, 3 मई 2014

पुस्तक समीक्षा - पुकार

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पुस्‍तक ः ‘पुकार'

कवि ः राजेश कुमार पाठक

प्रकाशक ः जयहिंद सेना (सामाजिक संस्‍थान) धनबाद

मूल्‍य ः 120 रूपए

मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘कविता अघाये आदमी की डकार नहीं है․' असंगतियों में संगति की लय तलाशती ‘पुकार' की कविताएँ एक प्रतिसंसार के रचाव की विराट आकुलता है जिसमें कवि ने मौन और चीत्‍कार को संगठनिक तौर पर एकीकृत करने का जबरदस्‍त प्रयास किया है․ कवि राजेश कुमार पाठक ने इन कविताओं के माध्‍यम से नक्‍सल विचारधाराओं से प्रभावित एवं इसके मुख्‍य कर्ताधर्त्‍ता व्‍यक्‍तियों से मुख्‍यधारा में लौटने की अपील की है जो शासन और प्रशासन को शत्रु मान बैठे हैं․

प्रस्‍तुत संकलन में कविताएँ, माँ पुकारती, माँ की ममता, सपने, जंगल, अंधेरा, रोको खून बहाना, दूध का कर्ज, बंकर का औचित्‍य, देखो आकर अंतर, सबके लिए जो अच्‍छा नामक शीर्षक में विभक्‍त है जो कभी अपनी स्‍थूलता से तो कभी अपनी प्रतीकात्‍मकता से जीवन का स्‍पर्श करते रहते हैं। नक्‍सलियों को पुनः मुख्‍यधारा का जीवन मिल सके, कवि का मूल प्रयोजन बन जाता है, जब कवि कहता है- जंगल और पहाड़ों में / माँ तुम्‍हें आज पुकारती

खोया बेटा मिल जाए तो / आज उतारूं आरती

माँ की संवेदना से कवि जंगलों में भटकने वालों को लौट आने का आह्‌वान इन शब्‍दों में करते हैं- राई को पर्वत कर सकते / पर्वत को तुम राई

कुछ के लिए तुम नक्‍सली / कुछ के लिए तुम भाई

कवि राजेश कुमार पाठक का वैचारिक विश्‍वास किसी जूठी आयातित विचारधारा में न होकर शुद्ध भारतीय मन की सोच पर आधारित है․ अपने जीवनानुभवों के आधार पर अपना जीवन दर्शन रचते है․ वे समझते है कि शासन को शत्रु मानने वाले लोग भ्रांति के शिकार हैं․ सामंत और सूदखोर शासनव्‍यवस्‍था कब की खत्‍म हो चुकी, इसके बावजूद अगर सामंती सोच बरकरार है तो कवि कहता है- मैं मान रहा शासन में / कुछ बैठे हैं सौदागर

अगर उन्‍हें तुम जानते / कर दो नाम उजागर

राजेश कुमार पाठक की कविता की पुकार में असर है․ इनकी कविताएँ समय के सरोकारों, ताप-तेवर और प्रतिरोध की चेतना से लैश है और उम्‍मीद की जा सकती है कि इन्‍हें पुरूस्‍कार मिले न मिले पर जनता का प्‍यार अवश्‍य मिलेगा․

कुल जमा छब्‍बीस छोटी-बड़ी कविताओं के साथ हिन्‍दी जगत में उनका यह प्रथम काव्‍य संग्रह है। इन कविताओं का अपना संसार है, अपना संस्‍कार है, अपनी धरती और भावना है․ राजेश कुमार पाठक लोकधर्मी कवि है․ उनके लिए कविता लिखना सिर्फ अपने समय और समाज से संवाद करना ही नहीं अपितु उन तमाम दुखों में साझेदार भी होना है जो उन्‍होंने हाशिए पर जीवन गुमारने वालों के लिए महसूसा हो․ इस अमानवीय समय में मनुष्‍यता और रिश्‍तों को बचाना जरूरी है․ जब पूरी दुनिया एक बाजार में तब्‍दील हो चुकी है, जहाँ सब कुछ बिकाउ हो जाने की संभावनाएँ मौजूद है, ऐसे में कवि का पूरा दायित्‍व है कि वह इन स्‍थितियों के विरूद्ध प्रतिरोध दर्ज करें․

नक्‍सलियों को मुख्‍यधारा में लाने की अपील करती राजेश कुमार पाठक की कविताएँ एक सुन्‍न पड.ते समय में हरकत की हल्‍की सी आहट की तरह है जिससे गुजरते हुए मैं यह सोचता रहा कि इतनी सादगी या सहजता के साथ ये क्‍यों हमारी आत्‍मा में दाखिल होती है और हमारी संवेदना को झंकृत करती है․ ‘पुकार' की कविताएँ पुकार-पुकार कर सहजता और सादगी का अपना वैभव दिखाने में कामयाब रही है वहीं कवि राजेश कुमार पाठक ने इस प्रतिकूल समय में कला रूप को सहजता के माध्‍यम से एक बड़ा प्रतिरोध रचा है․

‘पुकार' की कविताओं से गुजरते हुए आठवें दशक से ठीक पहले की कविता यानी 1967-1975 की कविताओं की याद आती है जिसके एक बड़े हिस्‍से पर नक्‍सलबाड़ी आन्‍दोलन का प्रभाव था․ जब कविता किसी आन्‍दोलन के प्रभाव से पैदा होती है तो वह घटनाओं को, राजनीति, सत्‍ता को सीधे एवं स्‍पष्‍ट रूप से देखने-दिखाने पर बल देती है․ जाहिर है इसमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे स्‍पष्‍ट तौर पर कविता के रूप में स्‍वीकार करना कठिन हो․ देश, राजनीति, सत्‍ता एक गतिशील अवधारणा है․ जिस तरह समाज, मनुष्‍य और राजनीति में आज जो बदलाव आया है, सत्‍ता के स्‍वरूप में परिवर्तन आया है तो मनुष्‍य और उसका समाज भी बदला है․ बदलाव की इस प्रक्रिया से साहित्‍य भी अछूता नहीं रह सकता। यही वजह है कि आज की अधिकांश कविता में आठवें दशक की कविता के स्‍वीकृत प्रारूप का दुहराव नजर आता है․ कहना न होगा कि राजेश कुमार पाठक एक हद तक इन अविश्‍वसनीय लगती स्‍थितियों को समय के आख्‍यान के रूप में सामने रखते है․ विलगाव के सर्वाधिक क्रूर और अविश्‍वसनीय प्रतीत होती स्‍थिति को कवि पाठक ने ‘पुकार' के कविताओं के माध्‍यम से सामने रखा है जिसमें दृश्‍यों की गतिशीलता भविष्‍य के संकेत सूत्रों को परिलक्षित करती है․ इस बेहद गैर राजनीतिक से लगते समय में सांस्‍कृतिक प्रतिरोध का एक रूप हम इन कविताओं में देखते हैं․ कवि को अपने कविताकर्म में भविष्‍य में भी लगे रहने के लिए शुभकामनाओं के साथ․

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राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा

गिरिडीह-815301

झारखंड

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