मुकेश कुमार का शोध आलेख - विद्यासागर नौटियाल के उपन्यासों में पहाड़ी परिवेश

विद्यासागर नौटियाल के उपन्यासों में पहाड़ी परिवेश

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(विद्यासागर नौटियाल)

उपन्यास आधुनिक जीवन की जटिलताओं को समग्रता से प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। साहित्यकार समाज में रहते हुए अपनी आँखें बन्द नहीं करता। समाज की विसंगतियाँ उसके कोमल हृदय को प्रभावित करती हैं और उसकी अभिव्यक्ति भी अनिवार्य रूप से वह करता है। उपन्यास का फलक विस्तृत होने के कारण इन विसंगतियों का सम्पूर्ण चित्र उतारने का अवसर उपन्यासकार को मिलता है। यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास में समाज को उसके यथार्थ रूप में देखा जा सकता है।

नौटियाल जी ने अपने सभी उपन्यासों में टिहरी गढ़वाल को केन्द्र में रखकर कथा वस्तु का निर्माण किया है। वे नई कहानी दौर के साहित्यकार थे, उन्होने गढ़वाल के विषय में लिखकर साहित्य में अपनी पहचान को सुरक्षित रखा है। गढ़वाल की यथार्थ तस्वीर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर इन्होंने गढ़वाल की सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं से पाठकों को परिचित कराया है। पहाड़ को आम-जन के बीच में उपस्थित कर पहाड़ के अनेक आदर्शों को साहित्य में कलमबद्ध कर नौटियाल ने सराहनीय कार्य किया है। पहाड़ों पर बसने वाले आम-जन की पीड़ा, टोने-टोटके, अंधविश्वास तथा पूंजीपति वर्ग द्वारा आम-आदमी का शोषण, अत्याचार आदि का नौटियाल ने यथार्थ वर्णन अपने सभी उपन्यासों में किया है।

नौटियाल जी ऐसे प्रतिभाशाली उपन्यासकार थे, जिन्होंने गढ़वाल का, उसके परिवेश का, लोगों के आपसी संबंधो का, उनके खान-पान का गहन अध्ययन किया था। नौटियाल जी गढ़वाल के दुखों से घबराए नहीं उन्होंने उन सभी दुखों का डटकर विरोध किया। राजनैतिक जीवन हो या सामाजिक या साहित्य जीवन हो। वे कभी किसी बात से विचलित नहीं हुए और एक सच्चे कलम के योद्धा बन विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेते रहें। उन्होने गढ़वाल का कोना-कोना घूम रखा था। वहाँ पर बसने वाले लोगों की पीड़ा को भली-प्रकार समझा था। वे जीवन भर उन्हीं की पीड़ाओं को दूर करने में कटिबद्ध रहे। चाहे राजनैतिक क्षेत्र हो या साहित्यिक क्षेत्र हो, वे गढ़वाल के भोले-भाले, असहाय और निरीह प्राणियों पर किए गए शोषण का मुखर विरोध करते रहे।

नौटियाल जी अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में भी अपनी लेखनी द्वारा तत्कालीन सरकार का ध्यान गढ़वाल तथा वहाँ पर बसे आम-जनों की समस्याओं की ओर आकर्षित करते रहे। वे गरीब, मजदूर, भूमिहर किसानों तथा अधिकारों से वंचित आम-नागरिकों को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्नशील थे। सामंती सरकार के विरोध के कारण इनके परिवार को भी तत्कालीन सामंती सरकार ने अनेक कष्टों को झेलने के लिए मजबूर किया, परन्तु नौटियाल जी सभी आघातों को हृदय पर झेलते हुए अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर रहें। तत्कालीन सामंती सरकार द्वारा किए गए अत्याचारों ने इन्हें कभी दुर्बल नहीं बनने दिया और न ही दुखों को अपने जीवन का अभिशाप बनने दिया, बल्कि इन्हीं दुखों से प्रेरणा लेकर नौटियाल जी किसी लौह पुरुष की भाँति-सबलतापूर्वक दुखों का बोझ झेलते रहे और उससे शक्ति प्राप्त करते रहे। इनका साहित्य एक साथ पहाड़ी जीवन और मनुष्य की खोखली प्रवृत्तियों का यथार्थ चित्रण करता है, जिसमें कथा तत्व में अत्यंत सूक्ष्म और कुशाग्र बुद्धि की पकड़ है, जो वास्तविकता की प्रतिछाया है। नौटियाल ने हमेशा पहाड़ को आदमी से जोड़कर देखा है। उनके जीवन में पहाड़ और आदमी का घनिष्ठ संबंध रहा है। वे पहाड़ के बिना आदमी को और आदमी के बिना पहाड़ को अस्तित्वहीन मानते थे। वह स्वयं भी स्वीकार करते हैं कि- "जिस रचना में आदमी मौजूद नहीं उस पहाड़ से मेरा कोई संबंध नहीं"

पहाड़ पर जीने की कोशिश में घोर संघर्षों से जुटे लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। ये लोग खेत-खलिहानों में गाँव में तथा सरकारी दफ्तरों में हर जगह शोषण और जुल्म के शिकार है। नौटियाल ने साँस लेने को तरसते इन्हीं लोगों की व्यथा को अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। जिन संघर्षों से पहाड़ का मनुष्य जूझ रहा है उन संघर्षों में सोच-विचारकर या योजनाबद्ध तरीके से शामिल होने की किसी को फुर्सत नहीं है। राजनेता या उच्च अधिकारी दिन-रात लूट-खसोट और भ्रष्टाचार में लिप्त है। वे योजना बनाकर पत्रकारों के सामने दिखावटी वृक्षारोपण करने के लिए पहले से खोदे गए गड्ढों के अंदर अपने कर-कमलों को ले जाने का ढोंग करते फिरते हैं। नौटियाल जी के उपन्यासों में ऐसी अनेक समस्याओं की भरमार है, जिसमें केवल आम-आदमी ही पिसता नजर आता है। यह आम-आदमी इनके उपन्यासों में तो पहाड़ का है। परन्तु उसके जन-जीवन, उसके दुःख-दर्द, और उस पर हुए शोषण एवं अत्याचार की गूंज समस्त भारत देश में सुनाई देती है। यह उत्पीड़न किसी एक राज्य विशेष के पूंजीपतियों द्वारा नहीं बल्कि समस्त देश में यह उत्पीड़न की लहर आज भी चल रही है। स्वरूप भले ही बदल गया हो परन्तु उत्पीड़न आज भी भारतीय समाज में चरम पर देखा जा सकता है।

नौटियाल जी के उपन्यासों में कथा वस्तु हो या चरित्र सृष्टि। संवाद प्रस्तुति हो या वातावरण निर्मित। भाषा शिल्प हो या जीवन आदर्श सभी औपान्यासिक तत्वों में गढ़वाल का जीता-जागता संसार बसता है। सामंती व्यवस्था हो या सूदखोरी, पूँजीपति हो या निर्धन किसान, शोषक हो या शोषित, सम्पन्न वर्ग हो या विपन्न वर्ग, सवर्ण हो या अवर्ण, पुरुष हो या स्त्री आदि सभी को केन्द्र में रखकर लेखक ने गढ़वाल की सुन्दर, सजीव एवं यथार्थ झाँकी प्रस्तुत की है।

नौटियाल जी का प्रथम उपन्यास सन् 1959 ई. में ‘उलझे रिश्ते’ नाम से प्रकाशित हुआ। लगभग (35) पैंतीस वर्षों के अन्तराल में उनके दो उपन्यास ‘भीम अकेला’ (1944) एवं ‘सूरज सबका’ है (1997) में प्रकाशित हुआ। इन उपन्यासों में पहाड़ी जीवन के कटु यथार्थ के साथ-साथ उत्तराखण्ड के इतिहास और संस्कृति का भी अंकन हुआ है। उनका चौथा उपन्यास ‘उत्तर बायां है’ है। पाँचवा उपन्यास झुण्ड से बिछुड़ा छठा उपन्यास ‘यमुना के बागी बेटे’ है। इस उपन्यास की कथा भी टिहरी गढ़वाल में जन-विद्रोह की घटी सत्य घटनाओं पर आधारित है। इनका सातवाँ और अन्तिम उपन्यास ‘स्वर्ग दद्दा! पाणि-पाणि’ है।

सामंती व्यवस्था का ऐसा ज्वलन्त प्रश्न नौटियाल ने उपरोक्त उपन्यासों में किया है, जो प्राचीन होकर भी प्राचीन नहीं है अपितु आधुनिक युग में भी नवीन बना हुआ है। लेखक ने सामंती व्यवस्था के कुचक्र को स्वयं अपने समय में देखा है, भोगा है, उसकी पीड़ा को अनुभव किया है तथा आम लोगों को सामंती व्यवस्था की पीड़ा को सहते देखा है, उस पीड़ा से छटपटाते देखा है और उनकी छटपटाहट को महसूस किया है। इसी कारण लेखक की रूचि अपने कथा लेखन में गढ़वाल तथा गढ़वाल की तत्कालीन सामंती व्यवस्था को उजागर करने में रही है। वे एक सच्चे यथार्थवादी उपन्यासकार है, उन्होंने अपने उपन्यासों का आज के युग से बोध कराया है।

उपन्यास के तत्वों में कथावस्तु का विशेष योगदान होता है। उपन्यास की सफलता बहुत कुछ कथावस्तु पर ही निर्भर होती है। कथावस्तु में उपन्यासकार द्वारा जो वस्तु दी हुई होती है, वह इस तरह से विन्यस्त होती है कि उसमें कार्य-कारणशृंखला हो तथा वे एक-दूसरे से असंबद्ध प्रतीत न हो। कथावस्तु की गतिशीलता के लिए उपन्यासकार अनेक शैलियों का उपयोग करता है। वर्णनात्मक शैली के माध्यम से वह तटस्थ रहकर कथा कहता है तो संवाद शैली में पात्रों के पारस्परिक कथन से कथा को आगे बढ़ाता है। कहीं-कहीं पर वह पात्रों के मनोविश्लेषण के लिए पत्र शैली, डायरी शैली आदि का प्रयोग भी करता है। कथावस्तु में रोचकता, मौलिकता, गतिशीलता और कौतूहल का रहस्य भी आवश्यक माना गया है। नौटियाल के उपन्यासों की कथावस्तु में उपरोक्त विशेषताएँ परिलक्षित होती है।

नौटियाल के प्रथम उपन्यास ‘उलझे रिश्ते’ की कथावस्तु में भी अन्य उपन्यासों की तरह मौलिकता, रोचकता, गतिशीलता और कौतूहल का पुट है, परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि काफी प्रयत्न के बाद भी लेखक का यह उपन्यास उपलब्ध नहीं हो पाया है। लेखक ने इस विषय में स्वयं मुझे बताया था कि- वह उपन्यास रूपसी प्रकाशन से छपा था। उसकी कोई प्रति अब उपलब्ध नही है। टिहरी स्थित लेखक के घर से किसी जासूस ने जानबूझकर उसे गायब किया था। ऐसा लेखक को सदैव सन्देह रहा है। उपन्यास की कथा ऐसी थी कि अपनी पढ़ाई समाप्त कर, विश्वविद्यालय छोड़ने के दस साल बाद एक नौजवान के मन में छात्र जीवन के अपने मित्रों के हालात को जानने की जिज्ञासा होती है। प्रत्येक मित्र से उसके संबंध अलग-अलग किस्म के थे। उनमें से कुछ को वह उनके असली नाम से पुकारने के बजाए, अपने द्वारा या मित्र मंडली के द्वारा दिए गए नामों से संबोधित करता था। कोई रूदिन था, कोई बजारोव। उन्हीं सभी घटनाओं का उपयोग करते हुए वह उन सभी को पत्र भेजता था। अधिकांश पत्र वापिस लौट आते थे। डेड लैटर की इस टिप्पणी के साथ कि पाने वाले का पता नहीं लग रहा है। असली बात जो लेखक दर्शाना चाहता है, वह यह थी कि वे समाज में खो गए हैं। वापिस लौट आए वे पत्र मूल रूप में उपन्यास में दिए गए हैं। कुछ पत्रों के उत्तर प्राप्त होते हैं। वे उत्तर भी शामिल कर दिए गए हैं। वे उत्तर कुछ-कुछ खुलासा करते हैं कि मूल पत्र, जिसका जवाब लिखा जा रहा है, में क्या कुछ लिखा गया होगा। विश्वविद्यालय के छात्र जीवन पर आधारित यह अनुपलब्ध उपन्यास है।

‘भीम अकेला’ उपन्यास में लेखक ने गढ़वाल के ग्रामीण यथार्थ का चित्र प्रस्तुत किया है। चार दिन में हम यदि अवध अंचल से परिचय पाते हैं तो ‘भीम अकेला’ में दो दिन की यात्रा से। विद्यासागर नौटियाल तब उत्तर प्रदेश विधान सभा के विधायक थे, उन्हें पता चला कि अमर शहीद ‘मौलाराम’ की पत्नी ‘सूरमा देवी’ जिसने अपने अंधेपन के बावजूद अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है, उनकी पेंशन किसी गलत प्रवादों के कारण रोक ली गई हैं। इस घटना से नौटियाल उद्धेलित हो उठे- "इस संस्मरण के लिखे जाने के बाद शहीद मौलाराम की विधवा के साथ प्रदेश के शासन द्वारा किया गया हृदयहीन घर्णित व्यवहार लगातार मेरे मन में चोटे मारता रहा। मैं ‘सूरमा देवी’ को एक जीवित शहीद मानता आया हूँ। शासन के नाम लिखी उसकी चिट्ठी एक दस्तावेज है। यह अंधी वीरांगना समाज के कुल जहर को घोल-घोल कर पी गई है। महाशिव रात्रि के दिन मैं उसकी गाथा लिखने बैठा हूँ। गरल पीकर शिव नीलकण्ठ हो गए, ‘सतुरी’ (सूरमा देवी) अंधी। सतुरी की यह कथा ‘भीम अकेला’ का उपसंहार है।"

विद्यासागर नौटियाल इसी पूरे तथ्य को जानने के लिए ‘भरदार’ भ्रमण की योजना बनाते हैं। लेकिन इस यात्रा में एक-एक कर अनेक अनुभव लेखक को प्राप्त हुए हैं। कैसे बोलता हुआ पहाड़ अपनी पूरी अंर्तज्वाला के साथ हमारे सामने आ जाता है। रास्ते में तमाम लोग मिलते हैं और उनके सुख-दुःख और विवशताओं की एक लड़ी सी बनती जाती है। किसी से जरा भी हालचाल लेखक ने पूछा तो उसकी बातों में पहाड़ का दर्द बोलने लगता है। पहाड़ की गरीबी, नौजवानों की बेरोजगारी, बस और यातायात की समस्याएं और पीने के पानी की समस्या। समस्याओं का कोई अंत ही नहीं है और ऐसे में कोई आलू छील-कर उसे कच्चा ही सेब की तरह खाता दिखाई देता है तो हैरानी नहीं होती। भूख क्या नहीं कराती है। इसी के बीच पहाड़ के उस शिक्षक की भी व्यथा-कथा है, जो पत्थर पर पत्थर जोड़कर हनुमान की पूँछ की तरह आसन बनाए बैठा अपने बच्चों को पढ़ा रहा है और बच्चे जिस टाट पर बैठै हैं और पढ़ रहे हैं, उसे वे अपने-अपने घरों से लाए हैं।

‘तेजसिंह’ जैसा जीवित शहीद अपनी पेंशन के लिए जगह-जगह ठोकर खा रहा हो, या किसी स्वतन्त्रता प्रेमी की विधवा की पेंशन सिर्फ इसलिए रोक ली जाए कि उसने देवर से विवाह कर बच्चे पैदा कर लिए हैं और अपना तिल-तिल जलाने वाले इन जीवित शहीदों के दर्द को लोग महसूस करना ही बन्द कर दे तो यह पूरे देश के लिए कलंक है। तकनीकी खाना पूर्ति में उलझा प्रशासन यह बात नहीं समझ पाता। विद्यासागर नौटियाल ‘भीम अकेला’ के दो दिन की पहाड़ की यात्रा के ब्याज से हमारी इसी सोई हुई आत्मा को झिंझोड़ते है। कथावस्तु में बड़े अर्थपूर्ण ढंग से भीम की कहानी पिरोई गई है, जिसे पांडव राक्षस को सोंपकर आगे बढ़ जाते है। भीम राक्षस को मारकर बच निकलता है, लेकिन भीतर ही भीतर दहल भी जाता है। अकेले में अपने आप से कुछ बड़बड़ाता रहता है। यह दैन्य अवस्था में अकेला मशहूर भीम हमारे आज के शहीदों की दैन्य अवस्था का सही प्रतीक है। ‘सूरज सबका है’ लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है। इसका मूल कथ्य गढ़वाल के बनने से मिटने तक की घटना है। उपन्यास का शरीर ऐतिहासिक है, यथार्थ की रक्षा करते हुए उपन्यास को मोहकता प्रदान की गई है। लेखक ने इतिहास को आधुनिक दृष्टि से देखा है और उसका विवरण लोक जीवन में व्याप्त लोक कथाओं, वार्ताओं और गानों की शैली में प्रस्तुत किया है।

कथा की शुरूआत सन् 1804-15 में गढ़वाल पर गोरखों के आक्रमण से होती है, जो बीच-बीच में ‘क्लेश’ की तरह आती है। सोनी गाँव की दादी की जीवेष्णा, गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में रानी कर्णावती के साहस, बुद्धिचातुर्य, दिल्ली की मुगल सल्तनत के मनसबदार नवाजत खाँ की मूर्खतापूर्ण लोलुपता, ईस्ट इंडिया कम्पनी की धूर्तता से गुजरते हुए, आजाद भारत के शुरुआती दिनों में परगनाधिकारी देवीदत्त की सहृदयता को लक्षित करते हुए सोनी गाँव पर ही समाप्त हो जाती है।

140 पृष्ठों का यह उपन्यास 31 खण्डों में विभक्त है। यह उपन्यास दो सौ वर्षों के गढ़वाल के इतिहास की कथा कहता है। इस उपन्यास में वीर पराक्रमी भड़ है। साहसी और पराक्रमी गढ़वाल के सपूत है। रानी कर्णावती और अनेकानेक जुआरू लोग है। उपन्यास में एक नन्हीं बालिका ‘छुन्ना’ भी है जो दादी के घर घुसना चाहती है। दादी का घर सोनी गाँव में है जो गढ़वाल इलाके में आता है, जिसकी राजधानी श्रीनगर है। इस नगर में ‘रानी कर्णावती’ अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए शासन कर रही है। अपनी कुटिल चाल से शाही मुगल सेना को धूल चटा देती है। इस प्रकार यह उपन्यास रेल की पटरी सा, या तानेपुर के दो तारों सा समानान्तर कथानक सृजन का सोपन बनाए हुए हैं। एक में अंगुली रखे तो दूसरा तार तरंगित हो जाता है घटनाओं का मर्म खुल जाता है। कर्णावती और शाही मुगल सेना का द्वंद एवं गढ़वाली परिवेश इसका जीवंत आख्यान यह उपन्यास उपस्थित करता है। यह उपन्यास अपने अद्वितीय कथानक में निहित प्रतीकों के माध्यम से जीवन जगत की संघर्षमय पड़ताल कराता हुआ, उस सत्य की और इशारा करता है, जिससे हम विमुख होते जा रहे हैं। वह सत्य अपने देव समाज के प्रति प्रतिबद्धता है।

‘उत्तर बायां है’ लेखक का चौथा और महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह हिमाच्छदित पर्वतशृंगों पर बेहद कठिन और दुर्दांत परिस्थितियों में जीवन यापन करने वाले निरीह पालसियों और भेड़पालकों तथा घुमन्तु गूजरों की कहानी है जो भारत की आजादी की आधी सदी बाद भी आज तक उपेक्षित है। गरीबी, अशिक्षा, बेबसी और कदम-कदम पर ठगे जाना ही उनके जीवन का प्रयाय बन चुका है। समुंद्र से हजारों फुट ऊपर बीहड़ बुग्यालों (चरागाहों) में रहने वाले, प्राकृतिक आपदाओं से पस्त गरीब सैलानी गूजर, गडरिये और किसानों की अतरंग कथा, जो एक और निरन्तर प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों से जूझते रहते हैं तथा हिंसक पशुओं की दाढ में दबे और दूसरी और इन पशुओं से भी खूंखार, नरभक्षी सरकारी मुलाजिमों, हाकिम-हुक्कामों और कोर्ट-कचहरी के दरिंदों के कठिन पाटों में पिसते हुए जी रहे हैं।

उपन्यास की कथावस्तु को लेखक ने इस तरह पिरोया है कि उपन्यास में आने वाले ज्वलनशील विस्फोटक यह बताते हैं कि शायद कोई फर्क नहीं आया है, पराधीन भारत के ‘होरी’, धनिया, गोबर, सिलिया, भोला (गोदान) और आज के रिखू, सदरू, करणू (उत्तर बायां है) की जिन्दगी में। शायद यह और बदतर हुई है। जहाँ करणू को ग्राम प्रधान का आलू भरा बोरा ढोने से इन्कार कर देने पर ‘मिलावटी दूध’ बेचने के फर्जी अपराध में जेल की सजा हो जाती है।

उपन्यास की कथावस्तु किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित न होकर टिहरी गढ़वाल के पूरे पहाड़ी जन-जीवन की कथा बन गई है। पर्वत शिखरों के पास बसा भेड़पालकों के सैंतीस घरों का गाँव ‘चाँदी’ है। जहाँ से ये ऊँचे, दुर्गम बुग्यालों (चरागाहों) पर अपनी भेड़ बकरियों को चराने ले जाते हैं। तेज हवाओं बर्फबारी और बारिश के बीच तंबू लगाकर कई-कई दिन वहीं टिकते हैं। भैंस पालक घुमन्तू गूजर भी अपनी भैंसों को चराने यहीं लाते हैं और विषम मौसम का सामना करते हुए अपने अस्थाई डेरे डोलते हैं। इनकी तुलना में घाटी के गाँव ‘रेमासी’ के लोग है जो सिर्फ खेती करते हैं और अपेक्षाकृत सुविधाओं का जीवन जीते हैं। गाय भैंसें तो उन्होंने पालना छोड़ ही दिया है। भेड़ों को लेकर, जंगलों के रास्ते चरागाहों में जाते सदरू, करणू या हुकम अथवा घास काटने जाती या लकड़ी बीनती उनकी बहुओं छछरी या भांभरी को बाघों, जंगली रीछों और सूअरों से उतना खतरा नहीं है जितना मैदानों में कार्यरत प्रशासनिक मशीनरी से है।

‘झुण्ड से बिछुड़ा’ उपन्यास पर्वतीय जनजीवन की त्रासदी को बड़े ही विश्वसनीय ढंग से उजागर करता है। विशेषकर गढ़वाली ग्रामीणों के संघर्ष और उनकी जिजीविषा को लेखक ने तमाम प्रचलित मिथकों, किंवदन्तियों, रूढियों और अंधविश्वासों को सामने रखते हुए एक नई कथाशैली और प्रविधि के साथ उपन्यास में प्रस्तुत किया है यह उपन्यास अपने आप में नये जीवन के द्वार खोलने जैसा है। 104 पृष्ठों का यह उपन्यास एक लघु उपन्यास है, लेकिन इसमें अनेक प्रसंग ऐसे आए हैं, जिससे यह उपन्यास अपना विस्तृत आकार ग्रहण कर लेता है। कथा के केन्द्र में जहाँ ‘शान्ति’ नामक निरूपाय और निस्सहाय एक पहाड़ी महिला है, जिसे अपनी भोली गाय के प्रति अथाह प्यार है, तो दूसरी ओर एक भयानक बाघ है, जिसके रूप में मानों काल ही जंगल में घूमता रहता है। लेखक को जंगल के स्वभाव और बाघ के स्वभाव की ऐसी सूक्ष्म जानकारी है कि आश्चर्य होता है। पूरे उपन्यास में एक रूपक भी कथा के समानान्तर चलता रहता है। उस जंगल राज में बाघ के हमले किस-किस रूप में होते है, इसको लेखक भली-भाँति जानता है। श्रीधर जैसे पात्र ही मानों बाघ बनकर घूम रहे हों जो भोले-भाले प्राणियों को हर तरह से अपना शिकार बनाने के लिए सदा सचेत रहते हैं।

उपन्यास की मुख्य कहानी के आस-पास फैला पहाड़ी जीवन तो उपन्यास में आता ही है, बाघ के आतंक से लोगों को सुरक्षा देते पात्रों का दुर्दम्य साहस भी लेखक ने चित्रित किया है। वहाँ के आम जन के जीवन में बाघ एक पहाड़ी मिथक भी है और हकीकत भी। लेखक ने प्रस्तुत उपन्यास की कथा को प्रतीकात्मक शैली मे चित्रित किया है। सत्ता और नौकरशाही के आतंक को जिस तरह उपन्यास की विषय वस्तु के साथ लेखक ने पिरोया है, उससे यह कृति इन सभी गुंथित जीवन प्रसंगों का जीवंत पाठ बन जाती है। लेखक ने वर्तमान सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की सच्चाई को उजागर किया है, तो जनमानस में व्याप्त गाय के प्रति धार्मिक विश्वास का अंकन भी सहज रूप में हुआ है।

‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास का मूल स्रोत सन् 1930 के आस-पास टिहरी गढ़वाल रियासत में जन विद्रोह की आग से उत्पन्न सामंत की छोटी-बड़ी क्रूरता, यातना और यंत्रण की घटनाएँ हैं। नौटियाल जी अधिकांशतः उन एतिहासिक घटनाओं में कथा-सूत्र खोजते थे, जो इतिहास की पुस्तकों के बाहर समाज की वाचिक परंपरा में प्रवाहमान है। संघर्ष की चिंगारी इनमें भरपूर होती है। इन्हीं चिंगारियों में भविष्य की रोशनी के विधुत चिन्ह निहित होते है, जो किरणों की तरह खिलकर बाहर आ पड़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा में है। प्रस्तुत उपन्यास की कथा जन-विद्रोह की घटी सच्ची घटनाओं पर आधारित है।

सन् 1930 ई. में घटित तिलाड़ी कांड की चिंगारी के विधुत कणों को ‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास में संगठित किया गया है। तिलाड़ी कांड तत्कालीन सामंती व्यवस्था की सबसे क्रूर घटना है। अंग्रेजी राज के चापलूस राजा के चापलूस दीवान ने हक की लड़ाई लड़ने वालों को यमुना नदी और पहड़ियों के बीच घेरकर मौत के घाट उतार दिया था। राजा और दरबारियों के शोषण से संघर्ष करते कर्मठ आदिवासियों की लड़ाई की जड़ें एक और पौराणिक काल की शांतनु कथा और ऋषि पत्नी ‘रेणुका’ के मानसिक द्वंद तक जाती है तो दूसरी ओर समूचे आज को अपनी जद में लेती जान पड़ती है। टिहरी रियासत के राजा नरेन्द्र शाह को अचानक नई राजधानी बनाने की जिद सवाद हुई। उनके मस्तिष्क में एक ऐसी राजधानी की कल्पना थी, जो पूरी तरह चाँक-चौबंध हो, जहाँ गरीब की आह सुनाई न पड़े। उन्होंने प्राकृतिक सुषमा से भरपूर ‘ओड़ाथली’ को उसके लिए चुना। वे चाहते थे कि राजधानी में अंग्रेज बहादुर के अलावा कोई न पधार सके। उसी तरह जैसे आज चमचमाते नगरों की शोभा झुग्गी-झोपड़ी और ठेले वालों से खराब होती है। इसी घटना ने जन संघर्ष का बीज जनता में रोप दिया था। यह उपन्यास विस्मृत क्रान्ति कथा की आवृति भर नहीं है यह एक दस्तावेज है, जो राजशाही में फँसी जनता की दुःख भरी दास्ताँ को व्यक्त करता है। विद्यासागर नौटियाल का यह उपन्यास 128 पृष्ठों का एक लघु उपन्यास है। आकार में छोटा होते हुए भी इस उपन्यास का फलक विस्तृत है।

‘स्वर्ग दद्दा! पाणि, पाणि’ नौटियाल का अन्तिम उपन्यास है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखक जल, जंगल और जमीन से जुड़ी चिंताओं को वृहत आयाम देते हैं। यह जन आंदोलनों की जरूरतों को रंखांकित करने वाला उपन्यास है। यह उपन्यास उस समय का एक ऐसा प्रतिरोध है जहाँ आज मेहनतकश, श्रमशील वर्ग से उसका हक ही नहीं छीना जा रहा है बल्कि उसके इतिहास को विस्मृत भी किया जा रहा है।

पहाड़, जंगल और जमीन से जुड़े लोग उसके कण-कण से जिस तरह प्रेम करते हैं, उसके ठीक विपरित सत्ता और शासन से सटे लोग बाजार की शक्ति से संचालित होकर उसके हर एक कण से अधिकाधिक लाभ खसोटना चाहते हैं। लोभ-लाभ के इस खेल में लिप्त सत्ता और बाजार के दलाल भूखे भेड़ियों से भी अधिक हिंसक और खतरनाक है। यह दलाल वर्ग सदाबहार देवदार और उसके छोटे-छोटे जलश्रोत ही नष्ट नहीं करता, अपितु सम्पूर्ण गंगा उद्गम पर ही पानी पीकर नदियों में सिर्फ जहर प्रवाहित करना चाहता है। प्रस्तुत उपन्यास की कथा जितनी रोचक और पठनीय है, उतनी ही बहस तलब भी। वरिष्ठ लेखक नौटियाल की अद्भूत लेखकीय क्षमता का परिणाम है कि पहाड़ की लोक कथा से शुरू हुआ ‘स्वर्ग दद्दा! पाणि-पाणि’ पर्यावरण की चिंताओं को लेकर भी आज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास बन गया है।

नौटियाल जी के सभी उपन्यासों की कथा वस्तु टिहरी गढ़वाल के आमजन की पीड़ा और छटपटाहट की यथार्थ कहानी हैं लेखक ने पहाड़ को ही केन्द्र में रखकर कथानक का समायोजन किया है। उनके उपन्यासों में वर्णित चरित्र टिहरी गढ़वाल के आसपास के ही जीवन्त चरित्र है। लेखक ने घटना और परिस्थिति के अनुरूप पात्रों का संजीव अंकन किया है। उनके उपन्यासों की मूल संवेदना करूणा है। वे अपने उपन्यासों द्वारा एक विशिष्ट दर्शन प्रतिफलित करना चाहते हैं। नौटियाल के उपन्यासों में संवाद कहीं भी बोझिल एवं नीरस नहीं हैं। यद्यपि उपन्यासों में कहीं-कहीं दीर्घ संवाद भी आ गए हैं, परन्तु वे घटना को स्पष्ट करने के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। अधिकतर लघु संवाद ही उनके उपन्यासों में दृष्टिगत होते हैं। वातावरण निर्माण में लेखक का कला-कौशल सराहनीय है। लेखक ने घटना को ध्यान में रखकर ही वातावरण को उपस्थित किया है। उन्होंने गम्भीर तथा भावात्मक सभी प्रकार का वातावरण चित्रित किया है। नौटियाल जी ने उपन्यासों को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए वस्तु, चरित्र चित्रण, संवाद, वातावरण भाषा एवं शिल्प सभी का सजीव एवं यथार्थ अंकन प्रस्तुत किया है।

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(डॉ. मुकेश कुमार - समीक्षक)

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