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June 2014
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विराम से आगे

हरदेव कृष्ण

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किसी शायर ने लिखा है,"मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर आती नहीं?" हर जीव को मृत्यु का भय सबसे ज्यादा होता है। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है , "यदि कोई जीवन में अप्रिय वस्तु है, तो वह वस्तुतः मृत्यु नहीं , मृत्यु का भय है। मृत्यु हो जाने के बाद तो वह कोई विचारने की बात ही नहीं, मृत्यु जिस वक्त आती है , आमतौर से देखा जाता है कि मूर्च्छा उससे कुछ पहले ही पहुंच जाती है और मनुष्य मृत्यु के डरावने रुप को देख ही नहीं पाता। फिर भय और अप्रिय घटना का सवाल ही क्या हो सकता है? " कोई अचानक मर जाए तो उस का चेहरा हमारी आंख और दिमाग से हटता ही नहीं, उसके अन्तिम दर्शन के लिए जाते हैं। चलते फिरते लोगों पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन उन्हीं में से कोई लाश में तबदील हो जाए तो सब की निगाहें उस पर केन्द्रित हो जाती हैं। मौत आती है तो कैसा लगता है? उसके बाद क्या होता है ? इसे कोई नहीं बता सकता। वास्तव में मौत से डर लगता ही इसलिए है कि यह व्यक्ति को हमारे बीच से हमेशा हमेशा के लिए जुदा कर देती है। लेकिन ऐसी भी घटनाएं पढ़ी व सुनी जा चुकी हैं जिसमें अमुक व्यक्ति मर गया , पर बाद में उसके प्राण लौट आए। उन सब का अनुभव लगभग एक सा ही था जैसे कि प्रकाश दिखाई देता है और मार्ग किसी सुरंग या नली जैसा नजर आता है। ऐसे ही वृतांतों का विवरण " इंटरनेशनल ऐसोसियशन फॉर नियर डेथ एक्सपिरिंयस स्टडी" ने प्रस्तुत किया है। एक पत्रिका " रसिसटेशन" इसी विषय पर सामग्री पकाशित करती है। ऐसे ही विवरण एक ब्रिटिश शोधकर्ता " सुरान ब्लॅकमोर " ने अपनी 84 पृष्ठ की एक पुस्तक " डांइग टू लाइव " में लिपिबद्ध किए है। चिकित्सा जगत के छात्र रेमण्ड मूडी ने अपनी पुस्तक , " लाईफ आफ्टर लाईफ" प्रकाशित की थी। इस में उन लोगों के साक्षात्कार हैं जो पुनर्जीवित हो गए थे। इसके सात साल बाद ऐसा ही अध्य्यन उन 147 बच्चों पर किया गया जिनकी हालत बहुत गंभीर थी। इनमें से 26 तो बिल्कुल मौत के नजदीक थे।

अब प्रश्न उठता है कि मरने के बाद आदमी जाता कहां है ? क्या सूक्ष्म रुप में वह आगे के सफर तय करता है? " एक संबुद्ध से किसी शिष्य ने पूछा , "मरने के बाद हम कहां जाते हैं?" इस पर उस संबुद्ध व्यक्ति ने उतर दिया ," इसका मुझे अनुभव नहीं है, मैं जीवित हूं, वही बता सकता हूं जो मुझे जीते जी अनुभव हो रहा है।" मृत्यु बाद के रहस्य जानने के लिए कोई इतना बेचैन हो सकता है कि अपने जीवन का अन्त कर डाले? लगभग दस साल पहले की घटना है, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के पीएचडी ( तृतीय वर्ष ) के 27 वर्षीय एक छात्र ने आत्महत्या कर डाली। अपने सुसाइड नोट में यह लिखा कि मुझे कोई मानसिक परेशानी नहीं है, मौत के बाद क्या होता है यही जानने के लिए आत्महत्या कर रहा हूं।

हर धर्म के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। उनका विश्वास है कि शरीर नष्ट होने पर भी दिवंगत किसी दुनिया में रहता है। मिस्त्र जैसी प्राचीन सभ्यता का विश्वास था कि मृत्यु एक लंबी निद्रा है। इस लिए उन्होंने शवों को संरक्षित किया, इस आशा के साथ कि एक दिन मृत व्यक्ति जी उठेगा। हिन्दु धर्म में मान्यता है कि शरीर छोड़ने पर आत्मा 13 दिनों तक इसी लोक में रहता है। इस्लाम के अनुसार जितनी भी रुहें कब्रों में आराम फरमा रही हैं कयामत के दिन उनका फैसला होगा। ऐसा ही विश्वास ईसाई धर्म का है। लोगों का विश्वास है कि मौत द्वारा बिछुड़ा हुआ शख्स अव्यक्त रुप में कहीं न कहीं विद्यमान रहता है। तभी तो हिन्दु लोग श्राद्ध करते हैं, हरिद्वार या गया जैसे तीर्थ स्थानों पर पिंडदान करते हैं। ईसाइ व मुस्लिम बिरादरी भी बिछुड़ी आत्माओं को सम्मान से याद करते हैं। चीन में छिंग मिंग नाम की परंपरा है जिसमें अपने पूर्वजों और मृत रिश्तेदारों को कब्रिस्तान में जाकर याद किया जाता है। ऐसे ही रीतिरिवाज विश्व की तमाम आदिवासियों व जनजातियों में भी देखे जा सकते हैं।

चिकित्सीय दृष्टि से एक ब्रिटिश शोधकर्ता ने लिखा है,"मौत एक प्रक्रिया है,एकल क्रिया नहीं।" उसके अनुसार पहले ब्रेन डेथ , फुल ब्रेन डेथ और अंत में व्होल डेथ होती है। एक भारतीय डॉक्टर मनीष का भी यही कहना है,"मृत्यु एक प्रकृया है और मृत होना उस प्रकृया का रुकना है।" वे एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, "1950 के दशक तक नाड़ी और श्वसन क्रिया के रुकने को मृत्यु करार दिया जाता था,पचास के दशक में पश्चिम में "रीसस्सीटेशन" नाम की एक तकनीकि आई, इस की सहायता से उन व्यक्तियों को जीवित कर लिया गया जिनकी नाड़ी और श्वसन क्रिया बंद हो चुकी थी।' इस प्रणाली के अंर्तगत हृदय पर बिजली की मशीन से झटके दिए जाते हैं, कृत्रिम जीवन सहायक यन्त्रों व डॉयलेसिस आदि का इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक "मृत्यु" को भी एक "व्याधि" समझते हैं और इसका इलाज ढूंढने में लगे हैं।

दार्शनिक पक्ष से देखें तो जीते जी हमारा शरीर बहुत कुछ भोगता है , गमीदृसर्दी, दुखदृसुख , ईष्यादृद्वेष आदि। लेकिन मरने के पश्चात इन से मुक्त हो जाता ह़ै। किसी से कोई स्पर्धा नहीं, शत्रु मित्र सब भाव तिरोहित हो जाते हैं। जब शरीर किसी भयंकर बीमारी, आघात अथवा सघन मानसिक दबाव से गुजरता हैं तब मौत ही उसे मुक्ति दिलवाती है। किसी लंबे रोग के उपरान्त मरे आदमी के बारे में अक्सर यही कहा जाता है," छूट गया।" यहीं से मानव को "इच्छा मृत्यु" ख्याल आया। जीना दूभर हो जाए तो क्यों न इससे छुटकारा पा लें? इच्छा मृत्यु के समर्थक कहते हैं -  मनुष्य को जीने का हक है तो उसे मरने का हक भी दिया जाना चाहिए। सब और से लाचार आदमी जो हर रोज मरता है, उसे मृत्यु अपनाने की छूट मिलनी चाहिए। महान दार्शनिक प्लेटो ने आत्महत्या करने वाले की कठोर शब्दों में निंदा की है, लेकिन इच्छामृत्यु को खारिज नहीं किया। उसका मत था कि अगर व्यक्तिय किसी आसाध्य रोग, घोर गरीबी या गंभीर दुख से बेहाल है तो बेशक वह अपनी मृत्यु चुनने का अधिकारी है। इसी तरह 'नीत्शे' ने भी कहा है कि व्यक्ति को अपना जीवन समाप्त करने का नैतिक अधिकार होना चाहिए।

मरने की तमन्ना अत्यधिक ऊब और तीव्र मानसिक आघात से भी हो सकती है। रामायण काल में जाएं तो वहां सीता धरती की गोद में समा जाती है। वाल्मीकि रामायण में पहले लक्ष्मण और बाद में राम द्वारा सरयू नदी में अपने प्राण त्यागने का उल्लेख है। शरभंग ऋषि और शबरी ने अग्नि में प्रवेश कर के जीवन का अंत किया था। महाभारत मे भी ऐसे विवरण मिलते हैं। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। सत्यवती ने स्वंय मृत्यु को गले से लगाया और माद्री ने भी आत्मदाह कर लिया था। अंत में पांडव और साथ में द्रौपदी मृत्यु का वरण करने के लिए हिमालय की ओर चले गए।

देखा जाए तो स्वेच्छा मृत्यु की धारणा नई नहीं है। सामाजिक व धार्मिक कारणों से इसे माना जाता रहा है। बहुत प्राचीन काल की बात है, जैन समाज की एक स्त्री 'मचिकब्बे' ने उस वक्त की एक धार्मिक प्रक्रिया "संल्लेखन" द्वारा मृत्यु को प्राप्त किया था। इसने कर्नाटक के श्रवण बेलगोला क्षेत्र में एक महीना कठोर उपवास कर अपने प्राणों को त्याग दिया था। अपने पति व बेटी की मौत से इस महिला के अन्दर इतना वैराग्य उत्पन्न हो गया कि इसने अपने गुरु से ' सन्यसन्' व्रत धारण कर लिया। इस व्रत के अनुसार अन्नदृजल धीरेदृधीरे बन्द कर दिया जाता था और किसी खुली चट्टान में मृत्यु आने तक एक ही मुद्रा में रहना पड़ता था। इसी क्षेत्र में कटवप्र नाम की पहाड़ी है जहां सन् 601 से लेकर 1600 तक , सल्लेखन् द्वारा मरने वालों की विशाल सूची है। इसी तरह सती प्रथा नाम की भयानक कुरीति को चलाया जा रहा था, सन् 87 में राजस्थान की एक युवती रुपकुंवर सती हो गई थी। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प़ी ़ सी ़ जोशी के अनुसार - पहले सती प्रथा थी, मगर इसे आत्महत्या नहीं कहेंगे, यह एक तरह का कर्तव्य माना जाता था। कहते है कि प्रयाग में डूब मरने की प्रथा थी ,बनारस में आरे से कटवाने की और जगन्नाथ में रथयात्रा के दौरान रथ के नीचे आने की। कहा नहीं जा सकता इनके पीछे कारण क्या होगें?

सुपसिद्ध साहित्यकार स्व ़"विजयदान देथा" ने एक साक्षात्कार में कहा था , "यह निश्चित है कि मेरे अस्तित्व का अर्थ है 'पढ़ना लिखना', यही मेरा धर्म है, ईश्वर है - यही जीवन है, जिस क्षण यह पूरी तरह तय हो जाएगा कि मुझ से अब पढ़ा लिखा नहीं जाएगा - तब मेरे जीने की सार्थकता नहीं रहेगी  दस बारह गोली डायबिटीज की एक साथ लेकर सो जाऊंगा।" भूदृदान आन्दोलन के जनक बिनोबा भावे ने अपनी शारीरिक अक्षमता को देखते हुए मृत्यु का वरण लिया था। अगर इन बिन्दुओं के आधार पर "मर्सी कीलिंग" का कानून पास हो जाए तो मृत्युशैया पर पड़ा मरीज निदान के साथ दृसाथ डॉक्टर से "मौत" भी मांग सकता है। तब डॉक्टर सुखमय मृत्यु प्रदान करने के अधिकारी हो सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह सामाजिक समस्याएं पैदा होंगी, इस कानून का दुरुपयोग भी हो सकता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु को विधि सम्मत बनाने के ल्एि मुद्दा संविधान पीठ को भेजा जा चुका है जहां इसके सभी पहलुओं का अध्य्यन किया जाएगा।

अब थोड़ा सन्तों के नजरिए से देखें। कबीर ने अपने एक दोहे में लिखा है,"जीवन से मरना भला,जो मरि जानै कोय। मरने से पहिलै जो मरे,अजर रु अम्मर होय।" उनका एक और दोहा है, "कबीर जिस मरने ते जग डरै मेरे मन आनंदु।मरने ही ते पाईए पूरनु परमानंदु। गोरख कहते हैं - मरो वे जोगी मरो मरो मरन है मीठा तिस मरणी मरौ जिस मरणी गोरख मर दीठा। यह मरना वह मरना नहीं है जो आजकल आत्महत्याओं के रुप में हो रहा है। यह सन्त मत की एक प्रक्रिया है जिसमें साधक अपने ध्यान को तीसरे नेत्र पर केन्द्रित कर देता है। वह सुन्न समाधि की अवस्था को प्राप्त कर लेता है जिसे संतों की भाषा में "जीते जी मरना" कहा जाता है। कबीर का दावा है कि ऐसी स्थिति अगर प्राप्त हो जाए तो मृत्यु का भय सदा के लिए चला जाता है और निरंतर ऐसा अभ्यास करने से मोक्ष मिल जाता है। कुरान में भी एक आयत है दृ "मूतू कबलन्त मूतू" अर्थात मरने से पहले मर जाओ। आधुनिक सन्त ओशो ने भी ध्यान की इस पद्धति का समर्थन किया है।  एक फिल्मी गीत के कुछ बोल ध्यान करने योग्य है , " जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी , मौत महबूबा है साथ लेकर जाएगी , मर के जीने की अदा जो दुनिया को सिखालाएगा , वो मुकद्दर का सिकंदर कहलाएगा।" यहां गीतकार का वही आशय नजर आता है जो कबीर व अन्य सन्तों का है। मसला मृत्यु के खौफ पर विजय पाने का है। एक संवेदनशील कवि ( शिशु ' रश्मि ' ) की पंक्तियां हैं - " वाल्मीकि कहता है , तुलसी भी लिखता है/ मौत एक शीशा है राम जिसमें दिखता है /सच बड़ा सख्त है जूती सा काटता है, इज्जत बचाता है , धोती बन जाता है/ मौत तो आराम है, आराम में ही राम है/ मौत की आशंका से फिर क्यों डर जाता हूं? "

मृत्यु पर शोध होते रहेंगे। वैज्ञानिक अमरत्व की खोज में लगे हैं। पर हमें यह याद रखना चाहिए कि मृत्यु अन्त नहीं है। बुद्ध मत में कहा है,"मौत जीवन का नहीं केवल शरीर का अन्त है।"। गीता में साफ कहा गया है कि आत्मा नष्ट नहीं होता, जैसे शरीर नए वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा एक नया शरीर धारण करता है। प्रसिद्ध विचारक दीपक चोपड़ा इसे समझाने के लिए एक सुन्दर उदाहरण देते हैं, "जल की एक बूंद जब सूखती है तो उसका अन्त नहीं हो जाता, वह वाष्प बनकर बादलों के समूह में शामिल हो जाती है।" कुदरत यही चाहती है कि आपको जो जीवन प्राप्त हुआ है इसका सम्मान करें। विनम्रता , धैर्य और सहनशीलता से पुरुषार्थ करते हुए एक एक दिन व्यतीत करें। अपनी शक्ति और सार्म्थय का सदुपयोग करें उसका दुरुपयोग भूल कर भी न करें , ताकि अन्तिम समय में आपको कोई पीड़ा या मलाल न रहे।

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पताः- हरदेव कृष्ण, ग्राम व डाक- मल्लाह

पिनकोड-134102 (हरियाणा)

Mail:- hardevkrishan@gmail.com

सामग्रीस्त्रोतः-1 अहा जिंदगी (फरवरी,2007)—रामायण प्रसंग

2 द्वैमासिक स्त्रोत पत्रिका (मार्च-अप्रैल,1997) – जैनधर्म की संल्लेखन प्रथा

3 अमरउजाला, दैनिक ट्रिब्यून व अन्य पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित समाचार व सूचनाएं

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दिनांक 28 मई 2014

मारीशस यात्रा पर आए हुए 120 घंटॆ,= 7200 मिनट,= 432000 सेकंड कैसे बीत गए पता ही नहीं चल पाया. हर दिन एक नया दिन और एक नयी रात होती. आँखों में मीठे हसीन सपने पल रहे होते. रोज प्रकृति के नित-नूतन श्रॄंगार को खुली आँखों से देख प्रफ़ुल्लित हो उठता. मन में कई विचार अंगडाइयाँ लेने लगते. साथ यात्रा कर रहे लोग,पहले तो अजनवी से मिले, फ़िर इतने घुलमिल गए, मानो बरसों की पहचान रही हो. यह बात अलग है कि यात्रा की समाप्ति के बाद लोग एक दूसरे को कितना याद रख पाते हैं, कितना नहीं. लेकिन कुल मिलाकर एक पूरा परिवार सा बन चुका था. लोग अपनी सुनाते, दूसरों की सुनते और इस तरह दिन पर दिन कैसे पंख लगाकर उडते चले गए, पता ही नहीं चल पाया.

आज यात्रा का यह छटवां दिन है. यह खास दिन था हम सबके लिए. आज का दिन भाषणॊं का दिन था, कविता पाठ करने का दिन था. सब अपनी-अपनी तैयारी के साथ आए थे. सभी ने कुछ न कुछ लिख रखा था सुनाने के लिए. इसके साथ ही एक खास बात यह भी जुड गई थी कि मारीशस के नामी/गिरामी साहित्यकरों से मुलाकात जो होने जा रही थी. यात्रा संयोजक श्री नरेन्द्र दंढारेजी ने काफ़ी समय पूर्व उन्हें ईमेल/पत्र/फ़ोन द्वारा इस कार्यक्रम में शरीक होने के लिए आमंत्रण दे रखा था. श्रीमती अलका धनपतजी ( वरिष्ठ प्राध्यापिका ),श्री रामदेव धुरंधरजी (ख्यातिलब्ध सहित्यकार), श्री राज हीरामनजी ( वसंत -तथा रिमझिम पत्रिका के वरिष्ठ सहा. संपादक तथा पत्रकार),तथा श्री राजनारायणजी गुट्टी (कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार) से जब-तब मुलाकातें हो जाया करती थी. वे अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की रुपरेखा बनाते और उसमें अथक सहयोग प्रदान करते.

दिन का ग्यारह बज रहा है. अब हमें इन्तजार था अतिथियों के आगमन का. एक के बाद एक आते रहे. नरेन्द्र भाई उनका भाव-भीना स्वागत करते. फ़िर अन्य लोगों से मिलते-clip_image002

बतियाते और अपने निर्धारित  स्थान पर जा बैठते. ठीक ग्यारह बजे कार्यक्रम. श्री वैधनाथ अय्यर की अध्यक्षता में एवं श्री राज हीरामनजी के मुख्य आतिथ्य में शुरु हुआ. डा.श्रीमती वंदना दीक्षित ने मंच का कुशलतापूर्वक संचालन किया. वे बारी-बारी से वक्ताओं को बुलाती, वे अपना वक्तव्य देते हैं. चुंकि वक्ताओं की सूची काफ़ी लंबी थी और दोपहर के दो बजने वाले थे, भोजन का भी समय हो चला था. अतः श्री हीरामनजी के उद्भोधन के पश्चात इस सत्र का समापन करना पडा. 

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श्री हीरामनजी ने अपने वक्तव्य में हिन्दी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा;-“ वे हिन्दी में बोलते हैं,हिन्दी में अपना साहित्य रचते है,हिन्दी का सम्मान करते हैं और हिन्दी से ही सम्मानीत होते हैं. हिन्दी उनकी शान है, संस्कृति का आधार है, हमारी पहचान है. महात्मा गांधी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि बापू हमारे देश में केवल एक बार सन 1901 में कुछ दिन के लिए आए थे. उनके आगमन के साथ ही हमारी सोच में व्यापक परिवर्तन आया. हमने अपना स्वरुप पहचाना. हमने गांधी को अपने हृदय में स्थान दिया, जबकि वे भारत से थे, उन्हें वहाँ केवल सरकारी नोट में स्थान दिया गया.” अपनी घनीभूत होती पीडाओं को शब्दों का जामा पहनाते हुए उन्होंने एक लंबा वक्तव्य दिया.

श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी ने विषयों का चयन बडी सूझ-बूझ से किया था, वे इस प्रकार थे.....

(१) विदेश में भारत (२) हिन्दी के विकास में विदेशी/प्रवासी लेखकों की भूमिका (३) वैश्वीकरण की हिन्दी प्रसार में भूमिका (४) मोरीशस में हिन्दी शिक्षा में युवाओं का योगदान (५) युवा पीढी में हिन्दी बोध (६) जनभाषा और हिन्दी (सहोदर संबंध)

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भोजन के पश्चात दूसरे सत्र का आगाज हुआ. मारीशस के कला एवं संस्कृति मंत्री मान.श्री मुखेश्वर चुनीजी के विशिष्ठ आतिथ्य ,श्री डा.श्रीमती व्ही. डी.कुंजल( निदेशक महात्मा गांधी संस्थान, मारीशस. के मुख्य आतिथ्य एवं श्रीवैध्यनाथ अय्यर की अद्ध्यक्षता में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ. श्रीमती काले एवं.डा.सुश्री भैरवी काले ने भारतीय परम्परा का निर्वहन करते हुए स्वागत गीत गाया.

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मंच पर बांए से दांए (१) श्रीराजनारायण गुट्टी( कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार (२) डा.श्रीमती व्ही.डी.कुंजल (निदेशक, महा.गांधी संस्थान) (३) श्री गंगाधरसिंह सुकलाल “गुलशन”(डिपटी सेक्रेटरी जनरल,विश्व हिन्दी सचिवालय. (४) मान.श्री मुखेश्वर मुखीजी( कला एवं संस्कृति मंत्री) (५)श्री वैध्यनाथ अय्यर ( अध्यक्ष अभ्युदय संस्था, वर्धा (५) श्री नरेन्द्र दण्ढारे ( महासचिव-संयोजक,वर्धा)

कुछ प्रतिभागी अपना वक्तव्य देने में शेष रह गए थे, उन्होंने अपने आलेखों का वाचन किया. इस क्रम में म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के संयोजक श्री गोवर्धन यादव ने अपना आलेख “हिन्दी-देश से परदेश तक”, संस्था सचिव श्री नर्मदा प्रसाद कोरी, बुरहानपुर के श्री संतोष परिहार, खण्डवा के श्री शरदचन्द्र जैन ने अपने-अपने आलेखों का वाचन किया.

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यादव अपने आलेख का वाचन करते हुए(२)श्री कोरी वाचन करते हुए (३) श्री मफ़तलाल पटेल वाचन करते ह

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सभागार के कुछ दृष्य

चित्र क्रमांक (३) तीन में श्री मफ़तलालजी पटेल( एम.ए.पीएचडी, संपादक “अचला”पत्रिका इस यात्रा में सहभागी रहे. यहाँ यह बात विशेष उल्लेखनीय थी कि आपकी पत्नी श्रीमती आनन्दी बेन गुजरात के मुख्य मंत्री पद की शपथ ले रही थी,जब कि वे हमारे साथ थे. वे अहमदाबाद से अपनी भांजियों को लेकर बीस मई को ही रवाना हो चुके थे, तब वे यह नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी मुख्य मंत्री बनायी जाने वाली हैं.

मंचासीन सभी विद्वतजनों के संभाषण के पश्चात विशिष्ठ अतिथि मान.श्री मुखेश्वर मुखी (कला एवं संस्कृति मंत्री-मारीशस) के हस्ते सभी विद्वतजनो/पत्रकारो/साहित्यकारों/बुद्धीजीवियों का सम्मानीत किया गया.

सम्मानीत होने वालों के नाम इस प्रकार हैं:- श्री अतुल पाठक(सुरत)/ डा. वन्दना दीक्षित (नागपुर),/ डा. अनन्तकुमार नाथ(तेजपूर-आसाम)/डा. मफ़तलाल पटेल(अहमदाबाद)/डा. उषा श्रीवास्तव( बंगलूरु)/ डा.पी.सी.कोकिला (चैन्नई)/डा. मधुलता व्यास (नागपुर)/डा. वामन गंधारे( अमरावती)/ डा. शंकर बुंदेले(अमरावती)/ गोवर्धन यादव (छिन्दवाडा)/ शरदचन्द्र जैन (खंडवा)/श्रीमती सुजाता सुर्लेकर(गोवा.)/श्रीमती वासंथी अय्यर(नागपुर)/संतोष परिहार(बुरहानपुर)/पाण्डुरंग भालशंकर( वर्धा)/नर्मदाप्रसादकोरी(छिन्दवाडा)/विकास काले (वर्धा)/सुश्री हीना शाह(अहमदाबाद)

(२)अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा द्वारा मारीशस के साहित्यकारों का सम्मान किया गया. उनके नाम इस प्रकार हैं

मान.श्री मुखेश्वर चुनीजी( कला एवं संस्कृति मंत्री मारीशस) (२) श्री राजनारायण गति( अध्यक्ष हिन्दी स्पिकिंग युनियन,) (३) डा.अलका धनपत ( महा.गांधी संस्थान) (४) श्री धनपत राज हीरामन (महा.गांधी संस्थान) (५) श्री प्रल्हाद रामशरण (पोर्ट्लुई) (६) श्री रामदेव धुरंधर(पोर्टलुई) (७) श्री इन्द्रदेव भोला (पोर्टलुई) (८) डा.श्रीमती व्ही.डी.कुंजल( निदेशक महा.गांधी संस्थान) (९) श्री धनराज शंभु (पोर्टलुई) (१०) डा श्रीमती.विनोदबाला अरुण( पोर्टलुई),(११) श्री सूर्यदेव सिबोरत(पोर्टलुई) (१२) डा.श्रीमती रेशमी रामधोनी( पोर्टलुई) (१३) डा.हेमराज सुन्दर (पोर्टलुई) एवं श्रीमती उषा बासगीत(पोर्टलुई)

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कार्यक्रम के समापन के बाद गोवर्धन यादव की अध्यक्षता में श्री संतोष परिहार ने काव्य-मंच का संचालन किया,जो देर रात तक चलता रहा. कवि-गोष्ठी के समापन पर श्री नर्मदा प्रसाद कोरी ने सभी उपस्थित विद्वतजनॊं के प्रति आभार व्यक्त किया.

दूसरे सत्र की शुरुआत के समय डा. अलका धनपतजी, आकाशवाणी मारीशस के कार्यक्रम अधिकारी को साथ लेकर आयीं. उन्होंने मुझे सभाग्रह से बुलाकर इस बात की सूचना दी कि आपका साक्षात्कार रिकार्ड किया जाना है. मेरे अलावा रिकार्डिंग श्री दण्ढारेजी, एवं संतोष परिहार कि की जानी थी,लेकिन परिहार का नाम उसी क्षण मंच पर आलेख वाचन के लिए पुकारा गया. शायद इसी वजह से उनका साक्षात्कार रिकार्ड नहीं हो सका. पास ही के एक हाल का चुनाव किया गया,जहाँ शोरगुल बिल्कुल भी न था. मेरे साक्षात्कार के बाद उन्होंने मुझे बधाइयां देते हुए कहा कि आपका साक्षात्कार बहुत ही जानदार रहा है और इसका प्रसारण 7 जून 2014 को होगा. चुंकि हमें 29 मई को मारीशस से रवाना हो जाना था. अतःमैंने उनसे निवेदन किया था कि यदि कार्यक्रम अधिकारी इसकी रिकार्डिंग की एक प्रति मुझे भेज देंगे, तो उत्तम रहेगा.जैसा की उन्होंने बतलाया भी था कि इसे आप अपने कंप्युटर पर भी सुन सकते हैं,लेकिन मेरी इसमें इतनी दक्षता नहीं थी कि उसे सुन सकूं आप सभी जानते ही हैं कि सरकारी नियमों के अधीन ऎसा किया जाना संभव नहीं है. बाद में ईमेल के जरिए डा. धनपत ने मुझे उसके प्रसारित हो जाने बाबद सूचना प्रेषित की. मैंने उन्हें हृदय से धन्यवाद देते हुए आभार माना कि उन्होंने कम समय में मेरे लिए इतना परिश्रम किया. ( ईमेल की प्रति संलन्ग है)

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नमस्कार जी

आपका कार्यक्रम टेलीकास्ट हो चुका है .भेजना मुश्किल है.

अलका

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व्यंग्य लेख -गढ़तंत्र की झांकी

हमारे उत्तर आधुनिक संविधान ने इंसान को बनावटी बना दिया है और अधिकारों को मौलिक. ये अधिकार, अधिकारियों की बपौती, जन सामान्य की चुनौती और और लोकतंत्र के नुमाइंदों के लिए चरित्र की कसौटी हैं. यह बात दीगर है कि जब प्रवृत्ति गुणग्राही हो जाय तो चरित्र का विसर्जन करना ही पड़ता है. आज धांधली ‘धर्म और अर्थ ‘गुण’ का पर्याय है . इन्ही गुण धर्मों के आधार पर पद रूपी मोक्ष की प्राप्ति होती है. प्रस्तुत हैं ऐसे ही दृश्य.

वैधानिक चेतावनी-पात्र एवं घटनाओं को काल्पनिक समझने की भूल कदापि न करें.

 

दृश्य १-२६ जनवरी की सुबह

गणतंत्र दिवस की सुबह सेना की एक टुकड़ी, टिकाऊ पुर ओवरब्रिज से होकर गुजरी. धारा से संविधान रूठ गया और पुल किसी कानून की तरह टूट गया. ठेकेदार जेल में, चीफ इंजीनियर की छुट्टी, सरकार ने पिलाई जांच आयोग की घुट्टी. आनन-फानन में जांच आयोग की रिपोर्ट आयी. पुल टूटने का कारण तो मार्चपास्ट था. पुल की आवृत्ति का क़दमों की आवृत्ति से अद्भुत नाता है दोनों बराबर हों तो पुल टूट जाता है. विज्ञान की भाषा में इसे ‘रीजोनेन्स’ कहा जाता है. नतीजा. ठेकेदार बहाल. इंजीनियर खुशहाल, मेजर का कोर्ट मार्शल सैनिकों को सजा. भाई ये है असल गणतंत्र का मजा. असल में लोकतंत्र के टिकाऊ खम्भों पर बिकाऊ पुल बनाए जाते हैं. जिनसे समाज की इंजीनियर और ठेकेदार मन से लूटते हैं. वैसे भी पक्ष –विपक्ष के लेफ्ट-राईट से लोकतंत्र के पुल अक्सर टूट ही जाते हैं.

विकट रहस्यमय स्थिति है भ्रष्टाचार हमारे देश का राष्ट्रीय विचार हो गया है और घोटाले मोनालिसा की मुस्कान. भष्टाचार के संरक्षण, संवर्धन और पोषण के लिए ‘सतर्क भष्टाचार’ की लोकतंत्र में बहुत आवश्यकता है.

 

दृश्य-२ गणतंत्र दिवस की दोपहर.

विरोधी पार्टी के किन्तु एक ही परिवार के भाई –भतीजे, चाचा-चाची एक ही छत के नीचे जमा होकर समतामूलक परिवार की अखण्डता का व्रत ले रहे हैं.

“क्यों चाची जी, मजा आ गया बीते वर्ष के चुनाव में. चित भी अपनी, पट भी अपनी. इस बार मैं पार्टी बदल रहा हूँ, आपको जिताने के वास्ते, आखिर कहीं तो ईमानदारी कायम होनी चाहिए. ”

“हाँ भतीजे , पत्नी को रणछोड़ पुर से खडा कर देना. वहां तुम्हारे चाचा विपक्ष में रहकर जीत दिला देंगे. अब तो जिताऊ पार्टी के लिए दलबदलू होना वांछनीय किन्तु डकैत होना अनिवार्य योग्यता हो गयी है. मुझे खुशी है की तुम इन मापदंडों पर खरे उतर रहे हो”

“ सब आपका आशीर्वाद है चाचीजी”

“भतीजे, मुझे तुम्हारे पिताजी से शिकायत है, वो इनदिनों स्विट्ज़रलैंड की बर्फ में फिसल रहे हैं, यहाँ उनका वोट बैंक फिसला जा रहा है. साल में एक बार रोज़ा-इफ्तार पार्टी कराते हैं, फिर ईद का ही चाँद हो जाते हैं. कार्यकाल का अंतिम साल है, आश्वाशनों और वायदों का मौसम आ गया है . ”

“आप चिंता का करें, अपनी बहन नैना है न. उसका बनावटी अपहरण किराए के आतंकवादियों से करा देंगे. फिर नैना को छोड़ने की एवज में साथी आतंकवादियों की रिहाई की मांग , देश के लिए बेटी की कुर्बानी का ढोंग, भावनात्मक नाटक, फिर एक आध फर्जी एनकाउन्टर, नैना की सुरक्षित रिहाई, जनता की संवेदनाएं यानी वोट बैंक पर कब्ज़ा. ”

“ह्वाट एन आइडिया सर जी, नेताजी के पीए का साथ सभी का जोरदार अट्टहास.

वाह रे गणतंत्र, तू तो वंशवाद के खात्मे हेतु बना था. पर तू तो परिवार के दलील दलदल में चूजे की तरह फंस गया है. देश और समाज विघटनशील पर राजनैतिक परिवार विघटनहीन हैं. ऐसे विघटनहीन परिवारों से अखंड राष्ट्र का निर्माण कैसे हो, यह समाजशास्त्रियों के लिए शोध का विषय है. इसके बावजूद जनता को यह देख अपने लोकतंत्र पर गर्व करना चाहिए कि नेताओं और अफसरों के बीच एकता, घोटालों को लेकर अखंडता, चोरी में समग्रता एवं कालेधन को लेकर संप्रभुता कायम है.

 

दृश्य -३ गणतंत्र दिवस की शाम

छुट्टी के दिन छुट्टा घूमते रईसजादों की नशेमन टोली पूरे शबाब में.

“हिप हिप हुर्रे, यार नए साल के बाद इतनी मस्ती आज नसीब हुयी है. ”

“पर मस्ती अभी सस्ती है दोस्त, अपन तो महंगी मस्ती का आदी है”

“तो शुरू कर, आज तो आज़ादी है”

तभी उनकी वासनासिक्त नज़रें ट्यूशन पढ़ा कर वापस लौटती मध्यम वर्गीय सायरा पर पड़ गयीं. और उच्च वर्ग की नीचता परवान चढ़ गयी. सायरा पलट कर भागी तभी एक रईसजादे की चेतना जागी.

“यार गणतंत्र दिवस है, देश पर उपकार कर. आज कानून के दायरे में रहकर बलात्कार कर. ”

गिरफ्त में सायरा, और बगल में टीकमगढ़ थाने का दायरा. गणतंत्र की आवाज़ घुट गयी. आज़ादी संविधान के दायरे में रहकर लुट गयी. लोकतंत्र के उड़ते चीथड़ों के बीच सायरा मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज, महिला संगठनों का मुद्दा, परिवार का कलंक, संसद का शून्यकाल एवं समाज का शून्य बन गयी थी.

तभी आज़ाद हवाओं का एक तेज़ झोंका आया और सायरा का फटा दुपट्टा तिरंगे से लिपटकर चौक पर लहराने लगा.

तो यह थी गणतंत्र के अन्दर पल रहे गढ़तंत्र की झांकी.

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पंकज प्रसून

पता-टी एम -15  सी इस आई आर कालोनी , टैगोर मार्ग लखनऊ 226001

 

सिद्धपुर गांव में दो जुड़वा भाई मन्टू और चन्टू रहते थे । दोनों का बचपन बहुत कठिनाइयों में बीता । जब वे पांच वर्ष के थे तभी उनके पिता दयाराम की मृत्यु गांव में फैली महामारी में हो गयी थी । मां पार्वती ने लोगों के खेतों में मज़दूरी कर उन्हे पाला । दस वर्ष के होने के कुछ दिनों के बाद ही उनकी मां भी एक सड़क दुर्घटना में चल बसीं और दोनों अनाथ हो गये ।

दोनों भाई एक दूसरे को ढाढ़स बंधाते और आगे के जीवन के बारे में सोचते लेकिन कुछ सोच न पाते । कुछ दिन तो गांव के लोगों ने उन्हें खाने को दिया परन्तु फिर कतराने लगे । मन्टू बहुत सीधे और सरल स्वभाव का था और चन्टू बहुत समझदार और चतुर था । कई बार दोनों को भूखे पेट ही सोना पड़ता लेकिन उनके मन में कभी भी किसी प्रकार की चोरी या बेईमानी करने का विचार नहीं आता । वे मेहनत और ईमानदारी से जीना चाहते थे पर इतनी छोटी उम्र में उन्हें कोई काम ही नहीं देता था ।

एक दिन दोनों ज़मींदार के आम के बाग़ के पास घूम रहे थे । ज़मींदार के नौकरों ने उन्हें यह सोच कर पकड़ लिया कि वे बाग़ से आम चुराने आये हैं । उन्होने ने बहुत विनती की कि वे चोर नहीं हैं, वे तो अनाथ हैं और काम की खोज में भटक रहे हैं । नौकरों ने उनकी एक न सुनी और दोनों को पकड़ कर ज़मींदार के सामने पेश किया । ज़मींदार को दोनों ने अपनी कठिनाइयों के बारे में बताया और प्रार्थना की कि वे उन्हें कुछ काम दिला दें । ज़मीदार को उनकी आयु और भोली सूरत देखकर उन पर दया आ गयी । उसने पूछा - ''तुम दोनों क्या काम कर सकते हो ?'' यह सुन चन्टू ने मन्टू के कान में कुछ फुसफुसा दिया । फिर चन्टू बोला - ''बाबू साहब, मेरा भाई बहुत सीधा है यह कुछ भी कह देता है और मैं उसे सही सिद्ध कर देता हूँ । हम सिद्धपुर के रहने वाले हैं न ।''

ज़मींदार ने कहा - ''वह कैसे सिद्ध करोगे ?''

चन्टू ने मन्टू के कान में फिर कुछ कहा और मन्टू बोला - ''बाबू साहब, जब हम दोनों छोटे थे तो गर्मी में पिताजी खजूर के पेड़ के पत्तों के पास चारपायी डाल कर बैठते थे । खजूर के पत्ते हिलते तो बड़ी अच्छी हवा लगती थी और बड़ा मज़ा आता था । '' इतना कह कर मन्टू चुप हो गया और चन्टू की ओर देखने लगा । चन्टू के चहरे पर ख़ुशी की लहर तैर रही थी ।

ज़मींदार सोचने लगा कि खजूर का पेड़ इतना लम्बा होता है, उसके पेड़ के पत्तों के पास चारपायी कैसे डाली जा सकती है ? उसने हैरानी से पूछा - ''ऐसा कैसे हो सकता है ?''

चन्टू तुरन्त बोला - ''हो सकता है बाबू साहब । हमारे घर  के आँगन में एक कुआँ था । पिताजी बताते थे कि उनसे बचपन में खजूर की एक गुठली कुएं में गिर गयी थी । उस गुठली से खजूर का पेड़ निकल आया वही बड़ा होकर उपर तक आ गया । बस , कुएं के किनारे चारपायी बिछाते थे और ठंडी हवा खाते थे । ''

 

चन्टू का यह उत्तर सुनकर ज़मींदार उसकी समझदारी और आपसी प्रेम देख कर बहुत प्रभावित हुआ । उसने अपने मुंशी से कहा कि वह इन दोनों बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई की व्यवस्था करवा दें । दोनों ने ख़ूब पढ़ाई की और आगे चलकर अपनी मेहनत, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से बहुत ख्याति प्राप्त की ।

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( मार्च-अप्रैल 2014 को बालवाणी (हिन्दी संस्थान, लखनउ) में प्रकाशित )

(शैलेन्द्र नाथ कौल)
11,बसन्त विहार
(निकट सेन्ट मेरी इन्टर कालेज)
सेक्टर-14, इन्दिरा नगर, लखनउ-226016

हिन्दी में ज्ञानात्मक साहित्य : तीन किताबें, तीन दृष्टियाँ, तीन आयाम

(डॉ विपिन चतुर्वेदी की दो किताबें “ऊतकी परिचय” तथा “मानव शरीर की अस्थियाँ”

और बालेंदु शर्मा दाधीच की किताब “तकनीकी सुलझनें” पर केन्द्रित)

 

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किसी सम्पूर्ण प्रभुतासंपन्न देश की अस्मिता के चार पहलू होते हैं : उस देश का राष्ट्रध्वज, उस देश का राष्ट्र गीत, उस देश का राष्ट्रीय प्रतीक (राजमुद्रा, राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी, आदि) और उस देश की राजभाषा । प्रथम तीन पहलू स्थूल रूप में होते हैं, देश के भीतर उनका बहुत महत्व के साथ प्रयोग होता है और विदेशों में विशेष अवसरों पर देश की उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए उनका सीमित उपयोग होता है । किन्तु चौथा पहलू, किसी देश की राजभाषा; सूक्ष्म रूप में उस पूरे देश में किसी चिरंतन स्रोतस्विनी सी प्रवाहित रह कर सारे देश को जहां एकता के सूत्र में पिरोती है वहीं सारे देश की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी होती है । विदेशों में भी विभिन्न माध्यमों से किसी देश की राजभाषा ही अपने देश का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करती है । राजभाषा में रचित साहित्य सारी दुनिया में उस देश का गौरव गान मुखर स्वर में प्रसारित करता है ।

भारतवर्ष की स्वाधीनता के बाद संविधान निर्माण के दौरान बहुत लंबे वैचारिक विमर्श और कड़े संघर्ष के पश्चात 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और संविधान के अनुच्छेद 343 में तदाशय के स्पष्ट निर्देश दिये गए । हिन्दी भारतवर्ष के सर्वाधिक भूभाग में और सर्वाधिक जनसंख्या के द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, देश के हिंदीतर क्षेत्रों में भी हिन्दी कार्यसाधक भाषा है, इसके साथ ही स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी की अहम भूमिका होने और इस अकेली भाषा की लिपि और व्याकरण भाषाविज्ञान के सिद्धांतों की कसौटी पर खरे उतरने के कारण हिन्दी को संस्कृत, उर्दू और अँग्रेजी की अपेक्षा अधिक तरजीह दी गई । राजभाषा के महत्व को समझते हुए संविधान में अनुच्छेद 120, अनुच्छेद 210 और अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 तक कुल 11 अनुच्छेदों में राजभाषा के सर्वांगीण उन्नयन और विकास के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं ।

किसी भाषा की सामर्थ्य उसमें रचे गए साहित्य से की जाती है । साहित्य दो प्रकार का होता है- पहला भावात्मक साहित्य, जिसके अंतर्गत कविता कहानी, उपन्यास आदि भावात्मक विधाओं में रचित साहित्य आता है । हिन्दी के पास प्रचुर मात्रा में भावात्मक साहित्य है और इसके विकास की स्पष्ट धारा भी है । वैश्विक वाङमय में हिन्दी के इस भावात्मक साहित्य का सम्मानित स्थान है जो विश्व पटल पर भारतीय मनीषा को पूरे सामर्थ्य के साथ प्रतिष्ठापित करता है । साहित्य का दूसरा प्रकार होता है- ज्ञानात्मक साहित्य । इसके अंतर्गत ज्ञान के विविध क्षेत्रों में रचा गया ऐसा साहित्य आता है जो ज्ञानार्जन के लिए उपयोग में आता है । यह ज्ञानात्मक साहित्य प्रमुख रूप से शिक्षण कार्यों में प्रयुक्त होता है । यह निर्विवाद सत्य है कि शिक्षा का स्तर तभी ऊंचा उठ सकता है जब शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो ।

ज्ञानात्मक साहित्य के सृजन के लिए यह आवश्यक होता है कि संबन्धित विषय की पूरी पारिभाषिक शब्दावली हमारे पास हो । हिन्दी के मानकीकरण के लिए पहली बार उल्लेखनीय कार्य आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (15 मई 1864-21 दिसंबर 1938) ने किया । सन 1903 में वे रेलवे की नौकरी छोडकर हिन्दी की पत्रिका “सरस्वती” के संपादक बने और सन 1920 तक उन्होने ये कार्य किया । इस दौरान उन्होने नए शब्दों, अभिव्यक्तियों और संकल्पनाओं को अपनी पत्रिका के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया और इस प्रकार हिन्दी के प्रारम्भिक दिनों में उसकी संरचना, व्याकरण, शब्द-भंडार और ज्ञानात्मक कोशों को समृद्ध किया । सन 1933 में अपने विराट लोक अभिनंदन समारोह में आत्मनिवेदन में उन्होने अपने भाषा संबंधी विचारों को इन शब्दों में व्यक्त किया – “.......... मैं संशोधन द्वारा लेखों की भाषा अधिक संख्यक पाठकों की समझ में आने लायक कर देता । यह न देखता कि यह शब्द अरबी का है या फारसी का या तुर्की का । देखता सिर्फ यह कि इस शब्द, वाक्य या लेख का आशय अधिकांश पाठक समझ लेंगे या नहीं ।“ किसी भी भाषा के शब्द भंडार को समृद्ध करने के लिए यही सर्वश्रेष्ठ और सर्वमान्य तरीका है । ऑक्सफोर्ड, केंब्रिज, आदि शब्दकोशों के नए संस्करणों में ऐसे शब्दों को बहुत सम्मान और आत्मीयता के साथ शामिल किया जाता है जो अँग्रेजीदाँ समाज में घुलमिल चुके होते हैं । इनको शामिल करने में उन शब्दों की मूल भाषा आदि कोई रुकावट नहीं बनती । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाषा के विकास संबंधी व्यावहारिक अवधारणाएँ जन सामान्य के मनो-मस्तिष्क में पैठ करती गईं और हिन्दी की सामर्थ्य पर अविश्वास करने वाले महापंडितों ने भी उसके महत्व को स्वीकार किया । वर्तमान हिन्दी की संरचना वही है जो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने निर्धारित की थी । उनके रचे हुए और ग्रहीत किए हुए बहुत से शब्द आज भी प्रचलन में हैं ।

स्वतन्त्रता के पश्चात पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण का सबसे पहला, सबसे महत्वपूर्ण और सर्वमान्य कार्य महान भाषाविद, कोशकार और भारतीय संकृति के प्रखर अध्येता डॉ रघुवीर (30 दिसंबर 1902-14 मई 1963) ने किया था । लगभग पाँच साल के छोटे से कार्यकाल में उन्होने हिन्दी में छह लाख से अधिक शब्द निर्मित करके हिन्दी के शब्द भंडार को समृद्ध किया । उनके बनाए हुए लगभग 80 प्रतिशत शब्द आज हमारे दैनिक जीवन में, प्रशासनिक विधिक, आर्थिक, सांविधानिक, लेखा, बैंकिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित अनेक क्षेत्रों में घुल मिल चुके हैं और बहुतायत से प्रयोग किए जा रहे हैं । शब्द निर्माण के लिए उन्होने संस्कृत की मूल धातुओं में छुपे अर्थों और शक्तियों को जैसे पुनर्जीवित किया और संस्कृत के ही उपसर्गों और प्रत्ययों का उपयोग कर के नए शब्द गढ़े, उन शब्दों को अर्थ और संस्कार दिये । शब्द निर्माण की यह विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है । हालांकि डॉ रघुवीर के संस्कृत के प्रति प्रबल आग्रह के कारण दैनिक उपयोग के कुछ अहिंदी शब्दों के बनाए हुए हिन्दी शब्द उपहास के पात्र बने लेकिन उन गिने चुने शब्दों के कारण डॉ रघुवीर के योगदान का महत्व कम नहीं हो जाता । आज भी शब्दावली निर्माण के क्षेत्र में डॉ रघुवीर के सिद्धांतों का अनुसरण किया जाता है । उनके अतिरिक्त डॉ भोलानाथ तिवारी, बाबूराम सक्सेना, आचार्य रामचन्द्र वर्मा, आचार्य किशोरी दास वाजपेयी, डॉ हरदेव बाहरी, हरी बाबू कंसल, विमलेश कांति वर्मा, बद्रीनाथ कपूर, प्रोफेसर रामप्रकाश सक्सेना आदि सहित अनेक विद्वानों ने अपने अपने तरीके से हिन्दी की शब्द सामर्थ्य, अभिव्यक्ति और ज्ञानात्मक विकास में अपना योगदान दिया है । यह शृंखला अभी थमी नहीं है और अभी भी नई पीढ़ी के विद्वान प्रकारांतर से अपना रचनात्मक योगदान दे रहे हैं ।

लेकिन इन वैयक्तिक प्रयासों की सीमाएं थीं; इनमें एकरूपता भी नहीं थी और इसलिए इनका मानकीकरण कर पाना संभव नहीं था । इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 344 (6) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए भारतवर्ष के माननीय राष्ट्रपति ने 27 अप्रेल 1960 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था जिसके अंतर्गत शब्दावली निर्माण, प्रशासनिक, कार्य-विधि और ज्ञानात्मक साहित्य का हिन्दी में प्रामाणिक अनुवाद कराना, हिन्दी का प्रचार, पसार तथा विकास के लिए आवश्यक कदम उठाने और हिन्दी के प्रशिक्षण संबंधी निर्देश दिए गए थे । इस आदेश के अनुपालन में सन 1960 में “केंद्रीय हिन्दी निदेशालय” का, सन 1961 में “वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के स्थायी आयोग” का और सन 1971 में “केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो” गठन किया गया । इनके साथ ही अनेक संस्थाएं और समितियां भी बनाई गई हैं जो हिन्दी के ज्ञानात्मक साहित्य की श्रीवृद्धि करने में निरंतर सक्रिय हैं ।

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा विभाग) के अंतर्गत कार्यरत वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग भारतवर्ष के संविधान के अनुच्छेद 351 में वर्णित हिन्दी भाषा के उन्नयन और विकास के लिए दिशा निर्देशों के अनुसरण में विभिन्न विषयों की अँग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं की शब्दावलियों के लिए हिन्दी में पारिभाषिक शब्द गढ़ने का महत्वपूर्ण कार्य सन 1961 में अपनी स्थापना से ले कर अब तक निरंतर कर रहा है । आयोग के द्वारा ज्ञान के सभी क्षेत्रों की मानक शब्दावलियाँ तैयार कर ली गई हैं और उनको निरंतर अद्यतित किया जा रहा है । इन शब्दावलियों के शब्दों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी सरल वर्तनी और स्पष्ट व सीमित अर्थवत्ता है जिसके कारण भाषा का सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी जब किसी अनजान विषय के शब्द को पढ़ता है तो वह उसकी अवधारणा का अनुमान लगा लेता है । जैसे विज्ञान विषय में अँग्रेजी का एक शब्द है “बैरोमीटर”, इस शब्द से अँग्रेजी जानने वाला भी इसकी अवधारणा का अनुमान लगा पाने में कठिनाई अनुभव करेगा किन्तु इसके लिए हिन्दी में बनाए गए शब्द “वायु दाब मापी” से सामान्य हिन्दी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस उपकरण के बारे में, इसके कार्य और उपयोग के बारे में सटीक अनुमान लगा लेगा । हिन्दी माध्यम से ज्ञान के विस्तार और विकास का यह अनंत क्रम निरंतर जारी है ।

शब्दावलियों के निर्माण और विकास के साथ साथ वैज्ञानिक तथा शब्दावली आयोग ने विश्वविद्यालय स्तरीय ग्रंथ निर्माण योजना का सूत्रपात किया है जिसके अंतर्गत हिन्दी ग्रंथ अकादमी प्रभाग, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा चिकित्सा साहित्य की अनेक किताबें हिन्दी में तैयार कराई गई हैं । इनमें ख्यातिलब्ध लेखक-चिकित्सक डॉ (कर्नल) विपिन चतुर्वेदी की दो किताबें “ऊतकी परिचय” और “मानव शरीर की अस्थियाँ” शामिल हैं । इन दोनों किताबों के शीर्षक से ही सामान्य हिन्दी जानने वाले पाठक को किताबों की विषयवस्तु की जानकारी हो जाती है । इन किताबों को लेखक ने “उन भाग्यहीन छात्रों को” समर्पित किया है जो “अँग्रेजी के भार के कारण मेडिकल की पढ़ाई के योग्य नहीं समझे गए” और साथ ही यह आशा भी व्यक्त की है कि “उनकी अगली पीढ़ी को यह पीड़ा न झेलनी पड़े ।“ समर्पण के इन शब्दों में लेखक की वेदना और सहानुभूति झलकती है ।

पहली किताब “ऊतकी परिचय” चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के लिए सबसे पहले और सबसे अनिवार्य विषय “कोशिका” के बारे में है । इस विषय पर हिन्दी में यह पहली किताब है । यह किताब दो भागों में है पहला भाग “सामान्य ऊतकी” है जिसमें विभिन्न प्रकार के आधारभूत ऊतकों का परिचय दिया गया है और दूसरे भाग “विशिष्ट ऊतकी” में शरीर के विभिन्न अवयवों के ऊतकों का सचित्र विस्तृत वर्णन है । यह पूरी किताब 18 अध्यायों में विभक्त है । पाठकों की सुविधा के लिए इसमें हिन्दी-अँग्रेजी शब्दावली दी गई है जिससे पाठक सुविधानुसार अँग्रेजी के समानार्थी शब्द खोजकर अँग्रेजी के ग्रन्थों को संदर्भित कर सकते हैं । किताब की भाषा सरल और बोधगम्य है । इसमें वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा निर्मित मानक शब्दों का प्रयोग किया गया है जिससे आयोग द्वारा निर्मित मानक शब्दावली व्यावहारिक रूप में जन साधारण तक पहुँचती है । कुल मिला कर यह किताब चिकित्सा शास्त्र के छात्रों के लिए तो उपयोगी है ही किन्तु ज्ञान पिपासु सामान्य पाठकों को भी रोचक और ज्ञानवर्धक लगेगी ।

डॉ विपिन चतुर्वेदी की दूसरी किताब “मानव शरीर की अस्थियाँ” है जिसके नाम से ही ज्ञात हो जाता है कि ये किताब मानव शरीर की हड्डियों के अध्ययन का अवसर देती है । मानव शरीर की रचना का आधार अस्थियाँ होती हैं । इनसे ही शरीर की पूरी संरचना बनती है । अस्थियों के जोड़ से विभिन्न प्रकार की संधियाँ बनती हैं जिनसे शरीर को गति मिलती है । अनेक अस्थियों के नाम पर उनसे जुड़ी मांसपेशियों, रक्त वाहिकाओं और तंत्रिकाओं के नाम होते हैं । इस प्रकार चिकित्सा के छात्रों के लिए अस्थियों का अध्ययन करना अनिवार्य होता है । यह किताब इस अनिवार्यता की पूर्ति करती है । इसमें हिन्दी के पारिभाषिक शब्दों के साथ उनके अँग्रेजी पर्याय कोष्ठक में दिये गए हैं जिससे अँग्रेजी के संदर्भ ग्रन्थों को संदर्भित करने में बहुत सहायता मिलती है । डॉ विपिन चतुर्वेदी शरीर रचना विज्ञान के प्राध्यापक हैं और इस विषय पर उनकी अच्छी पकड़ है जिसे उन्होने इस किताब में साबित भी किया है ।

इन दोनों किताबों में हिन्दी की मानक शब्दावली का प्रयोग किया गया है और साथ ही अँग्रेजी के शब्द कोष्ठक में दिये गए हैं । इससे हिन्दी और अँग्रेजी की शब्दावलियों के बीच तुलना करने का अवसर बनता है । कोई भी सामान्य पाठक इस नतीजे पर बहुत जल्दी पहुँच सकता है कि अँग्रेजी के शब्द अर्थ, वर्तनी और उच्चारण की दृष्टि से हिन्दी के शब्दों की अपेक्षा बहुत कठिन हैं । कुछ शब्दों के उदाहरण दृष्टव्य हैं : कर्ण गुहा (auditory meatus); अश्रु अस्थि (lacrimal bone); ऊर्ध्व हनु (maxilla); अधोहनु (mandiable); मेरुदंड (vertebral column) आदि । इनको देख कर ही स्पष्ट परिलक्षित होता है कि हिन्दी के शब्द अपना अर्थ स्वयं स्पष्ट कर रहे हैं और अँग्रेजी के शब्दों से न तो अर्थ स्पष्ट होता है और न ही उनकी वर्तनी और उच्चारण सरल हैं । हिन्दी को कठिन मानने वालों को अपने पूर्वाग्रह छोड़कर दोनों भाषाओं के शब्दों की यह तुलना देखना चाहिए ।

दोनों किताबों के अंत में विषय से संबन्धित हिन्दी-अँग्रेजी शब्दावली दी गई है । यह शब्दावली अकारादि क्रम में नहीं है जिससे ये असुविधाजनक है । अगले संस्करण में इस त्रुटि का परिष्कार होना अपेक्षित है । दोनों किताबों का मूल्य उनकी उपयोगिता के हिसाब से कम ही है । यह बात बड़ी पीड़ा दायक है कि इन महत्वपूर्ण किताबों की केवल 500-500 प्रतियाँ ही मुद्रित हुई हैं । हिन्दी में सृजित ज्ञानात्मक साहित्य को अनदेखा करने की व्यवस्थित कुचेष्टाओं के चलते इन प्रतियों की अधिकांश संख्या प्रकाशक उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के गोदाम में ही रखी हों तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए । हमारे देश में 500 से अधिक तो चिकित्सा महाविद्यालय होंगे और हर साल कम से कम 50 हज़ार डॉक्टर बनते होंगे किन्तु हिन्दी में लिखी गई अपने विषय की इन पहली किताबों को अनदेखा किए जाने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता । बहरहाल, ये किताबें उन उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं जिनके लिए इनको लिखा गया है । अब यह समाज का दायित्व है कि वह लेखक-प्रकाशक की भावनाओं, प्रयासों और परिश्रम को कितना मान देता है -? और साथ ही उसके भीतर अपनी भाषा और अपनी अभिव्यक्ति के उन्नयन के लिए कितनी ललक, कितना उत्साह है ?

डॉ विपिन चतुर्वेदी की किताबों से हटकर बालेंदु शर्मा दाधीच की किताब “तकनीकी सुलझनें” है । बालेंदु शर्मा दाधीच सूचना प्रौद्योगिकी और इंटरनेट मीडिया के क्षेत्र में सितारा हैसियत रखते हैं । वे स्वयं को भाषायी पृष्ठभूमि जनित प्रौद्योगिकीय वंचितता और आंकिक विभाजन जैसी अन्यायपूर्ण स्थितियों के विरुद्ध जारी आंदोलन का स्वयंसेवक मानते हैं । यह एक कड़वा सच है कि भारत में तकनीकी शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी होने के कारण बहुत से प्रतिभाशाली छात्र पढ़ नहीं सके और समाज उनकी मेधा से वंचित रह गया । डॉ विपिन चतुर्वेदी की भांति बालेंदु शर्मा दाधीच के हृदय में भी ऐसे ही वंचित रह गए लोगों के प्रति सहानुभूति है और वे इस परिस्थिति के विरुद्ध अपना पूर्ण रचनात्मक योगदान दे रहे हैं । वे अत्याधुनिक संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिख रहे हैं । उन्होने अनेक निःशुल्क हिन्दी सोफ्टवेयरों का विकास करके उन्हें जनसाधारण के लिए उपलब्ध कराया है । उनके महत्वपूर्ण लेखों के संकलन की यह किताब कई अर्थों में भिन्न है । पहली बात तो यही कि इस किताब का प्रकाशन उनके निजी प्रयासों का प्रतिफलन है । कम्प्युटर, इंटरनेट, बैंकिंग, स्मार्टफोन, चोरी गए लैपटॉप की तलाश, आदि जैसे रोज़मर्रा के तीस विषयों पर आम पाठक को उसकी ही बोलचाल की साधारण भाषा में जानकारी उपलब्ध कराती है ।

आज के समय में इंटरनेट हर घर की आम ज़रूरत बन चुका है । इंटरनेट के द्वारा जहां एक ओर सारी दुनिया का ज्ञान और सुविधाएं सिमट कर हमारे पास आ गईं है वहीं कई तरह की नई नई समस्याओं ने भी जकड़ लिया है । घर पर अभिभावकों की अनुपस्थिति में कच्ची उम्र के बच्चे इंटरनेट पर सहज उपलब्ध अश्लील वेबसाईटें देख कर बिगड़ रहे हैं । यह भी संभव है कि किसी के ईमेल अकाउंट को कोई चोरी छिपे खोलकर उसे परेशानी में डाल दे या खुफिया एजेंसियां किसी के अकाउंट को हैक करके उसमें से व्यक्तिगत जानकारियाँ चुरा कर उनका दुरुपयोग कर सकती हैं । गुमनाम या अज्ञात नाम से आया धोखे या धमकी आदि का ईमेल किसी भी व्यक्ति की नींद उड़ा देने के लिए पर्याप्त है । क्रेडिट कार्ड का क्लोन बना कर उसका दुरुपयोग होना आम बात हो गई है । किसी भी तरह के साइबर क्राइम का शिकार होने के बाद कोई भी व्यक्ति सिर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर पाता । “तकनीकी सुलझनें” में ऐसी ही समस्याओं पर चिंता प्रकट करते हुए उन के सरल व सटीक समाधान सुझाए गए हैं । इनके अतिरिक्त पेन ड्राइव के स्थान पर गूगल ड्राइव का इस्तेमाल, गूगल में खोज करने का सही तरीका, इंटरनेट पर जायज़ तरीकों से धन कमाने के तरीके, अपने इनबॉक्स में कोई बहुत पुराना मेल तलाश करने का तरीका, इंटरनेट का उपयोग करके निःशुल्क विडियो कॉल करने का तरीका, टेबलेट और स्मार्टफोन के एप्स को विंडोज़ कम्प्युटर पर चलाने के तरीके, कम्प्युटर से फ़ैक्स भेजने और प्राप्त करने का तरीका, कम्प्युटर को रिमाइंडर की तरह उपयोग करने का तरीका, डाऊनलोड करते समय होने वाली समस्याओं का समाधान, पुराने सोफ्टवेयरों को नए ओपेरेटिंग सिस्टम में चलाने का तरीका, कहीं से भी अपने कम्प्युटर को एक्सेस करने का तरीका, चोरी गए या खोए लेपटाप का पता लगाने का तरीका, धीमे पड़ गए कम्प्युटर को खोई हुई या डिलीट हुई फाइल को फिर से रिकवर करने का तरीका, कम्प्युटर को वाइरस से मुक्त रखने के लिए निःशुल्क एंटी-वाइरस इंस्टाल करने का तरीका और अपने टेलीविज़न सेट को कम्प्युटर का मॉनिटर बनाने का तरीका बहुत रोचक और सामान्य भाषा में बताया गया है । घर में एक से अधिक कम्प्युटर होने पर उनका छोटा सा नेटवर्क बनाने की उपयोगिता और उसको बनाने की विधि को बहुत विस्तार से समझाया गया है । आजकल सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक बहुत प्रचलन में है । फेसबुक के अकाउंट में भी असामाजिक तत्व घुसपैठ करके व्यक्तिगत और गोपनीय आंकड़े चुरा लेते हैं और उनका दुरुपयोग करते हैं । ऐसी स्थितियों से बचने के उपाय भी इस किताब में दिये गए हैं । कम्प्युटर खराब होने पर मेकेनिक को बुलाने से पहले की जाने वाली जांच, सस्ते दामों में मिलने वाले जेनुइन सोफ्टवेयरों की प्रामाणिक जानकारी से इस किताब की उपादेयता बढ़ गई है । अपनी सहजता और उपयोगिता के कारण यह किताब अपने ध्येय वाक्य ”रहस्यावरन से मुक्त : सरल, सार्थक, सुरक्षितऔर लाभप्रद कम्प्यूटिंग” को चरितार्थ करती है । कुल मिला कर कम्प्युटर, इंटरनेट, लेपटाप, टेबलेट, एटीएम, क्रेडिट कार्ड, स्मार्ट फोन आदि जैसी आधुनिक सुविधाओं और तकनीकों का उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह किताब अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए और इसे अपने संग्रह में रखना चाहिए । इस पुस्तक का ई-बुक संस्करण भी उपलब्ध है जिसे वैबसाइट http://www.eprakashak.com से प्राप्त किया जा सकता है ।

डॉ विपिन चतुर्वेदी की दोनों किताबें और बालेंदु शर्मा दाधीच की किताब हिन्दी के ज्ञानात्मक साहित्य को तीन नई दृष्टियाँ और तीन नए आयाम देती हैं । दोनों लेखकों की भाषा की तुलना करने पर हम पाते हैं कि डॉ चतुर्वेदी की किताबों की भाषा शास्त्रीय, व्याकरण सम्मत, मानक और इसी कारण कुछ क्लिष्ट सी लगती है जबकि बालेंदु शर्मा दाधीच की किताब में आम बोलचाल की ऐसी भाषा प्रयोग की गई है जिसमें अँग्रेजी के उन शब्दों की बहुतायत है जो विषयवस्तु के संदर्भ में जनमानस में गहरी पैठ बना चुके हैं । उन्होने पारिभाषिक शब्दावली पर अधिक ज़ोर नहीं दिया है । इससे उनकी भाषा बोझिल नहीं हुई और उसमें सहज प्रवाह बना रहा । वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग भी यदि ज्ञान के नए क्षेत्रों में विकसित हो रही अवधारणाओं के लिए नए शब्दों के गढ़ने की अनिवार्यता को समाप्त कर, प्रचलित शब्दों की वर्तनी, रूप आदि का मानकीकरण करके उन्हें हिन्दी के संस्कार देने का काम करे तो हिन्दी का शब्द भंडार तेज़ी से बढ़ेगा और ज्ञानात्मक साहित्य का सृजन भी तेज़ी से होगा ।

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कृति : “ऊतकी परिचय”

लेखक : डॉ विपिन चतुर्वेदी

प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

आईएसबीएन : 978-81-89989-29-3

मूल्य : 230 रु.

कृति : “मानव शरीर की अस्थियाँ”

लेखक : डॉ विपिन चतुर्वेदी

प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

आईएसबीएन : 978-93-82175-00-1

मूल्य : 310 रु.

कृति : “तकनीकी सुलझनें”

लेखक : बालेंदु शर्मा दाधीच

प्रकाशक : ईप्रकाशक.कॉम,

504 पार्क रॉयल, जीएच-80,

सैक्टर-56, गुड़गाँव पिन-122011

मूल्य : 235 रु.

समीक्षक : आनंदकृष्ण

IV/2, अरेरा टेलीफ़ोन एक्सचेंज परिसर

अरेरा हिल्स, भोपाल (म. प्र.)

पिन : 462001

मोबाइल : 9425800818

ई-मेल : aanandkrishan@gmail.com

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बचिए – कान खाए जा रहे है.

आँखों को बचाने के साधारण तरीकों के बारे लिखा लेख पसंद कर कुछ साथियों ने कानों की सुरक्षा के बारे में भी लिखने का आग्रह किया. उनके प्रेरणा व प्रोत्साहन का ही फल है कि यह लेख आप सबको समर्पित है.

बचपन की अपनी खुद की बचकानी हरकतों पर आज शर्म आती है. तब किसी के समझाए भी समझ नहीं आती थी. कोई सीरियस बात चल रही हो तो पास की किसी सहेली या दोस्त के कान में फुसफुसाना. जरा सुनना... पास आ.. ना. और जब पास आए तो उसके कान में पूरी भरपूर ताकत से चीखना.. यह एक शरारत होती थी. लेकिन जिसके कान में चीखा गया, उसके कान के पर्दे कंपन से इतने आहत करते थे कि उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे. यदि चीख ज्यादा तेज हो, तो शायद कान के पर्दे फट जाएँ. बड़ों ने तो बहुत समझाया, लेकिन समझने को तैयार ही कौन था ? अब बूढ़े हो गए तो समझ आई पर अब बच्चे समझने को तैयार नहीं हैं.

कान की नाजुकता को समझिए. बचपन में उल्टियाँ आने पर आपकी माताजी आपके दोनों कान अपनी हथेलियों से ढँक लेती थीं. किसलिए ?. इसलिए कि उल्टियों के समय जिस जोर से पेट से सारा माल बाहर आता है, उसमें होने वाली तीव्र आवाज से आपके कानों को कोई नुकसान नहीं पहुँचे. जब पटाखों के फूटने के पहले आप अपने कान बंद कर लेते हो. तेज बिजली कड़कने पर आप आँख और कान दोनों बंद कर लेते हो. उस वक्त आपकी मानसिकता क्या होती थी कभी सोचा है आपने ?.

स्कूल कालेज की परीक्षाओं के दौरान यदि आपके घर या हॉस्टल के आसपास कोई शादी हुई हो या किसी के जन्मदिन पर म्यूजिक डी जे का प्रोग्राम हुआ हो, तो आपको एहसास हो ही गया होगा कि ये शोर आपके कान और मूड के साथ कैसा खिलवाड़ करते हैं. पर गम इस बात का है कि अपने घर प्रोग्राम हो तो हम भी इनकी परवाह करना पसंद नहीं करते.

अक्सर तिमाही परीक्षाओं के समय गणेश चतुर्थी के कारण लोग पंडालों में जोर जोर से गाने बजाया करते थे. छःमाही के समय क्रिसमस और नया साल का मजमा होता था. अच्छा हुआ ये तिमाही – छःमाही परीक्षाएं खत्म ही कर दी गईं.

कानों के लिए आजकल एक नई बीमारी आ गई है मोबाईल फोन. लोग फोन कान से सटाए, घंटों उस पर लगे रहते हैं. खासकर सफर में तो इन बड्स के बिना लोग सोते भी नहीं. एक नया उपकरण है ब्लूटूथ ईयर प्लग जो हेंड्स ऑफ काम करता है. हमेशा कानों में ही लगा रहता है. जब कोई कान में हीयरिंग बड्स (प्लग) या ब्लूटूथ रिसीवर डालकर झूमते रहता है, तब कई तो उन्हें पागल समझने लगते हैं. उनकी हँसी को बेकारण समझ कर सोचने लगते हैं कि कहीं वह हम पर तो नहीं हँस रहा और बिन बात के उसके बारे में गलत धारणा घर कर लेती है. ऐसे समय किसी से कुछ कहो तो पहले आपकी मुखाकृति देखकर सोचेगा कि इसकी बात सुनी जाए या नहीं. यदि सुनने का मन बना लिया, तब अपने एक कान से स्पीकर (हीयरिंग) बड निकालेगा फिर पूछेगा क्या ? यानि आपको निश्चिंत रहना है कि पहली बार कोई सुनेगा ही नहीं. इसलिए पहली बार केवल होंठ हिलाइये, जब कान खाली हो जाएं तब ही कहिए. अन्यथा आपकी मेहनत बेकार. इस तरह की हरकतों से जब तक जरूरी न हो कोई उनसे बात करने की कोशिश नहीं करेगा और वे अपने आप अलग थलग रह जाएंगे.

लगातार कान में इस तरह का शोर कान खराब करने में पूरी मदद करता है. लोग परहेज तो कर नहीं सकते, इसलिए कान ही खराब करते हैं. लगातार कान में रहकर ईयर प्लग वहाँ घाव भी करता है. ऐसे लोगों से भी पाला पडता रहता है जिन्हें अपने आनंद के लिए दूसरों को परेशान करना भी अखरता नहीं है. छोटे बच्चे या बुजुर्गों वाले पडोस में भी रात के तीसरे पहर तक हाई वॉल्यूम में संगीत बजाकर मदहोश नाचते गाते कालेजी विद्यार्थी या बेचलर एम्लॉईज को कोई फर्क नही पड़ता. किसी को भोर सुबह उठने की आदत है, किसी को सुबह की फ्लाईट पकड़नी है या किसी की तबीयत खराब है – इससे किसी को क्या लेना देना. हम तो अपने घर में पार्टी कर रहे हैं – आवाज आपके घर जाए तो हम क्या करें ? कुछ गलतियाँ इन फिल्म वालों की भी है. आजकल के गाने शायद लो वॉल्यूम में अच्छे भी नहीं लगते. पुराने गीत तो लो वॉल्यूम में ही सुने जाते हैं. वेस्टर्न कल्टर की देन है या कहें महत्ता है यह सब.

यदि आप पार्टियों के शौकीन हैं तो गौर कीजिए कि नशा चढ़ते चढ़ते आपकी श्रवण क्षमता घटती जाती है. इसका अंदाज आप इससे लगा सकते हैं कि नशा आते ही बोलने की आवाज बढ़ जाती है, क्योंकि कान कम सुनते हैं. इस लिए यह समझ कर कि धीरे बोला जा रहा है, तेज बोला जाता है. सामान्य से तेज बोलने से ही नशेड़ी सुनेगा.

आप यदि सड़क पर निकलते रहते हैं तो अक्सर देखते होंगे कि स्कूटर या मोटर सायकिल पर सवार लोग (सायकिल वालों की बात क्या करें) अपना एक कंधा उठाकर कानों से लगा लेते हैं और एक झलक में ही आप भाँप जाते हैं कि वह मोबाईल पर बिजी है. उसे आपके गाड़ी की हॉर्न क्या सुनाई देगी. यही आदते सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रही हैं. यह बात और है कि इसी कारण उसे सर्विकल स्पोंडेलाइटिस हो जाएगा और वह डॉक्टरों के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा.

यह खबर अखबारों में आ ही चुकी है कि छत्तीसगढ में बिलासपुर के पास उसलापुर स्टेशन के नजदीक एक लड़का ईयर फोन पर गाने सुनते सुनते रेल्वे ट्रेक पर चलते हुए अपने घर की तरफ (शायद) जा रहा था. पीछे से दिल्ली जाने वाली संपर्क क्रांति एक्सप्रेस आई. जैसे ही चालक को व्यक्ति नजर आया, उसने ब्रेक लगाना और हॉर्न बजाना शुरु किया, पर उस लड़के को सुनाई नहीं पड़ा. ब्रेक लगते-लगाते भी लड़के को जान से हाथ धोना पड़ा. यह तो एक है. पता नहीं कितने और होंगे. शायद यह आईडिया वालों का विज्ञापन था – वॉक द टॉक”. लेकिन आज भी कान में स्पीकर प्लग डालकर पैदल चलते, दुपहिया या चारपहिया चलाते चालकों की संख्या में कमी नहीं आई है. कार वाले तो समझते हैं कि हम चार पहियों पर सुरक्षित हैं और बेबाक मेबाईल पर बात करते रहते हैं. ध्यान हटा और हॉर्न न सुने जाने की वजह से कोई टक्कर लग गई तो वे चार पहिए ही कंधों का रूप धारण कर सकते हैं इसका उनको भान भी नहीं रहता. ध्यान के भटकाव को कम करने के लिए, यातायात अधिकारियों ने इस पर भारी जुर्माना भी कर रखा है, पर किसे पड़ी है चिंता – जान ही तो जाएगी.

आप किसी न्यायालय, स्कूल या अस्पताल के पास जाकर खड़े हो जाईए. वहाँ एक संदेश पटल दिखेगा - हॉर्न बजाना मना है (NO HORN). पर हर एक गुजरती गाड़ी हॉर्न जरूर बजाकर जाएगी, जैसे मानो लिखा हो कि हॉर्न बजाना है. इसके ठीक विपरीत अंधे मोड़ों पर विशेषकर चमकदार अक्षरों में लिखा होता है हॉर्न बजाईए (Horn Please), वहाँ लोग हॉर्न बजाने से परहेज करते हैं. यह अपनी सुरक्षा के प्रति अवहेलना का भाव है या कानून की अवहेलना का - यह मेरे समझ से परे है. हम मनुष्य औरों के दर्द से दूर क्यों हो रहे हैं. अपने दर्द को भी पहचान नहीं पा रहे हैं - यह कौन सी मानसिकता है.

मानव के कान निश्चित तीव्रता और फ्रीक्वेंसी रेंज के लिए ही बने हैं और इसमें आवाज की एक हद तक ही सहनशीलता है. इसे डेसीबल्स में नापा जाता है. 85 डेसीबल्स से ज्यादा की आवाज (शोर) कान को खराब करने की क्षमता रखती है. आवाज की तीव्रता बढ़ने से कम समय में ही तकलीफ शुरु हो जाती है. ज्यादा देर तक उस आवाज के दायरे में रहने से परमानेंट नुकसान भी हो सकता है. इसके लिए सरकारी तौर पर भी नियम बनाए गए है. लेकिन कान हमारे हैं- आदत हमारी है–कौन बदल सकता है.

बड़े खराखानों में अक्सर शोर की समस्या रहती है सो वहां ईयर प्लग या मफलर का प्रयोग किया जाता है. जैसे सर की सुरक्षा हेलमेट से होती है वैसे ही कानों की सुरक्षा ईयरप्लग या मफलर से होती है. ईयरप्लग (स्पाँज के बने) कानों में ठूँसकर रखने के लिए होते हैं और ईयर मफलर, हेडफोन स्पीकर (फुल कवर–क्लोज्ड) की तरह पूरे कान को ढँक कर रखते हैं जिससे पास पड़ोस का शोर कानों में नहीं जाता और कान के पर्दों पर हाईफ्रीक्वेंसी या तीव्रता का कोई असर नहीं हो पाता. हमेशा हिदायत दी जाती है कि कभी भी अधिक शोर शराबे वाले इलाके में जाने से पहले कानों में मफलर (कम से कम ईयर प्लग) लगा लेना चाहिए. रकवस क असर नह हत. हमश हदयत द जत ह कफपपप

एक बार हम सब अपने कार्यालय की तरफ से मेडीकल जाँच करवाने गए. जब मेरे कान को जाँचने की बारी आई तो नर्स ने कहा यह रिमोट हाथ में रखो और जब भी बीप की आवाज सुनाई दे, दबा दिया करना. इससे यह मालूम हो जाएगा कि आपको आवाज सुनाई दी है. जाँच के बाद रिपोर्ट डॉक्टरके पास आई. मुझे देखकर ही डाक्टर हैरान हो गए. मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मुझसे मेरा नाम, उम्र, पता, काम सब पूछ लिया. बोल पड़े 53 वर्ष और इतने अच्छे कान ? मैंने खुलकर उनसे पूछ लिया आप कहना क्या चाहते हैं ? उनने पूछा क्या आप पंपशेड में नहीं जाते हैं. मैने बताया कि रखरखाव के लिए मुझे पंप शेड में ज्यादा ही जाना पड़ता है. उनने मुझसे साझा किया कि मेरे कानों की श्रवण क्षमता उम्र के सापेक्ष में बहुत ही अच्छी है. फिर सवाल किया कि पंप शेड में जाते हुए भी आपके कान इतने अच्छे कैसे हैं, जबकि आपके सारे साथियों के कानों में कुछ न कुछ तकलीफ तो हैं ? मुझे खुशी हो रही थी कि मेरी कोशिश रंग लायी और ईयर मफलर के प्रयोग ने मेरे कानों को बचाकर रखा.

मैंने डॉक्टरों को बताया कि मैं कभी भी बिना ईयर मफलर के एंजिन-पंप शेड के पास भी नहीं जाता – यह निश्चित है. नौकरी तो 58-60 साल की उम्र तक रहेगी, पर कानों को तो मेरी जिंदगी भर साथ देना है. नौकरी के लिए मैं अपने कान नहीं गँवा सकता. डॉक्टर मेरी बातों से बहुत खुश हुए और कहने लगे आपके और साथियों को क्यों नहीं समझाते. समझाएं किसे. सब तो जानकार हैं. जानबूझ कर भी कोई अपने कानों को खोने का खतरा मोलना चाहे, तो कोई क्या कर सकता है ?

यह तो हुई कान को जरूरत के समय बंद रखने के विभिन्न गलत तरीके जो आजकल के युवा अपना रहे हैं, और सही तरीके जिनकी अवहेलना हो रही है. ऐसे लोग अक्सर अलग एकाकी जीवन जीने के पक्ष में होते हैं. पता तब चलेगा जब बीबी चीखेगी कि बहरे हो गए हो क्या. या फिर जब साथी की जरूरत होगी, अकेलापन खाने को दौड़ेगा और कोई साथ देने वाला नहीं होगा.

दूसरी प्रजाति है जो बैठे बिठाए निठल्ले की तरह हाथ में जो कुछ भी हो जैसे माचिस की तीली. गाड़ी की चाबी, छोटा स्क्रू-ड्राईवर या ऐसी पतली चीजों से कान कुरेदते रहते हैं. कभी कोई झटका लगा या फिर गलती हो गई तो कान से खून निकलने लगता है और फिर डर लग जाता है कि कहीं कान तो खराब नहीं हो गए. वैसे जॉन्सन के इयर बड्स काफी चल पड़े हैं लेकिन मेरा मानना है कि कानों में तेल के अलावा कुछ न डालें तो ही बेहतर होगा. दैविक सृष्टि के कारण कान का मैल तेल डालते रहने से अपने आप बाहर आ जाता है.

मेरे एक पढ़े लिखे मित्र ने एक कमाल दिखाया. कभी स्कूल में पढ़ा था कि कानों को हाईड्रोजन पराक्साईड से साफ किया जाता है (धोया भी जाता है) सो जनाब खुद डाक्टर बन गए और बाजार से लाकर हाईड्रोजन पराक्साईड को कानों में डाल लिया. फलस्वरूप उसका एक कान खराब हो गया और दूसरा कम सुनता है. इलाज के लिए सारी दुनियाँ घूम चुका है. अपने लिए खुद मुसीबत मोल ली. जब अक्ल ज्यादा हो जाती है तो ऐसे ही होता है. खैर गनीमत है कि वह अभी भी कम सुनने वाले कान में मोबाईल लगाकर बात कर पाता है.

एक अतिरिक्त समस्या है - गुस्से को काबू में न रख पाना और कनपटी पर खींच कर चपत लगाना. यदि सही कनपटी पर पड़ गया तो आँसू छलक जाते हैं. चपत के जोर पर निर्भर करता है कि श्रवणशक्ति बची या गई. जोर की मार से कान के पर्दे झन्ना जाते हैं और कभी कभार फट भी जाते हैं. ऐसा गुस्सा न ही करें तो ही अच्छा है. अच्छा हुआ कि अब स्कूल व घर में बच्चों को पीटना जुर्म की श्रेणी में आ गया है. एक अन्य स्थिति उत्पन्न होती है, हवाई सफर में. टेक ऑफ व लेंडिंग के समय कानों के पर्दों के दोनों तरफ हवा के दबाव की असमानता के कारण दर्द होने लगता है. ऐसे वक्त जम्हाई लेते रहें या फिर मुँह से श्वास लें तो दर्द जाता रहेगा. इसी लिए पहले पहल वायुयात्रा में टॉफियाँ दी जाती थी. बच्चे समझते थे कि परिचारिका कितनी अच्छी है. इसके लिए अब फ्रूट जूस दिया जाता है पर यात्री इसे तुरंत पी जाते हैं.

अंततः उन सिरफिरे ड्राईवरों का जिक्र तो करना ही होगा जिनको हॉर्न बजाते रहने की आदत है. ये ट्राफिर हो न हो सारे रास्ते हॉर्न बजा बजाकर आपके कान खाते रहेंगे. दूसरे वे जिनकी गाडी में रिवर्स हॉर्न है. चाहे जरूरत हो-न हो,बजेगा ही, कोई कंट्रोल नहीं होता. रात के तीसरे पहर भी गाड़ी पार्क करते या निकालते वक्त भी हॉर्न से सबको परेशान करना जरूरी होता है.

इन सब बातों का जिक्र कर मैंनें उन सब हालातों को दोहराया है जिससे आपके या किसी और के कानों को तकलीफ होती हो. अब परहेज करना न करना - आप पर निर्भर करता है... ये आपके ही कान है... दीवारों के नहीं. जरा सोचें.

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एम.आर.अयंगर.

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शोर, कान, हॉर्न, हाईड्रोजन पराक्साईड, ईयर बड्स,

दिल्ली की बेदिली / प्रमोद यादव

‘एक बात कहूँ जी ? ‘ पत्नी ने बिस्तर ठीक करते कहा.

‘ हाँ...कहो..’ पति ने टी.वी. में आँखें जमाये जवाब दिया.

‘ अरे...ये टी.वी.आपसे छूटे तो आपकी बीबी बात करे..पहले आप इसे “ आफ “ कीजिये तभी हम “ आन “ होंगे..’ पत्नी ने शर्त रख दी.

‘ अरे बाबा..बोलो भी...सब सुन रहे हैं हम..’ उसने पत्नी की ओर सिर घुमाकर कहा.

‘ मैं सोचती हूँ...काश..हमारा ये बंगला दिल्ली में होता..तो कितना अच्छा होता...’ पत्नी लम्बी सांस लेते बोली.

‘ क्या मतलब ? ‘ पति ने चौंकते हुए कहा- ‘ यहाँ भोपाल में भला कौन सा रोज भूचाल आ रहा है कि दिल्ली में बंगला होने की बात कर रही हो...’

‘ अजी आप समझे नहीं..मेरा मतलब है कि दिल्ली देश का दिल है..वहां होते तो सबके दिलों में रहते..धड़कते..’ पत्नी ने अतुकांत सफाई दी.

‘ओ मेम साब..सबके दिलों में धड़कने का क्या मतलब ? तुम्हारा ठिकाना..आशियाना तो केवल मेरा दिल है...औरों के दिल में क्योंकर धड़कोगी ? तुम तो जानती हो..इस बंगले से भी ज्यादा “ स्पेस “ मेरे दिल में है..जो पूरी तरह मैंने मुहब्बत के दिनों ही तुम्हारे नाम ”एलाट” कर दी ..शादी के बाद तो तुम्हारा पूरा अमला( कमला,सरला.मुन्नू, टुन्नू, माँ-बाबूजी ) इस बंगले में आ बसे (घुसे) फिर भी मैंने दिल थामें रखा..अचानक क्या बात हो गई कि दिल्ली पे दिल आने लगा ? ‘

‘ अरे बाप रे...आप भी ना..क्या से क्या सोच डालते है पल भर में...मैं तो आपके ( “आप”के ) उस बेचारे की समस्याओं के मद्देनजर दिल्ली की बात कर रही थी जो चार-पांच महीने पहले दिल्ली के सिरमौर और मुखिया थे...हीरो थे..दिल्ली के दिल थे ’

‘ कौन? वो टोपी और मफलरवाले महाशय की बात कर रही हो क्या ? ’ उसने चौंककर पूछा.

‘ हाँ..एबस्लूटली वही..बेचारे की क्या गति ( दुर्गति ) हो गई है..उसने पूरे दिल्ली वालों को टोपी पहनाई,अब दिल्ली वाले उन्हें टोपी पहना रहें..चंद ही दिनों में उन्हें हीरो से जीरो बना दिया...बेदर्दों ने सिरे से उसे खारिज कर दिया...’

‘ साफ़- साफ़ कहो यार बात क्या है ? ‘ पति ने मुद्दे पर आने कहा.

‘ अरे बेचारे को दिल्ली में कोई किराए का मकान नहीं दे रहा....कहाँ-कहाँ नहीं भटक रहे-दस-बारह कालोनी घूम आये पर उन्हें अपनी पसंद का बंगला नहीं मिल रहा..एक-दो जगह बात तय हुई..किराया भी तय हुआ..पर सामान शिफ्ट करने की तैयारी में जुटे कि मकान मालिक का पैगाम आ गया- “ सॉरी ..पडोसी एतराज कर रहे..धमका रहे हैं...आपके आने से यहाँ नित हो-हल्ला होगा. आन्दोलन और हड़ताल का सिलसिला होगा.....कालोनी की शान्ति भंग होगी.. कान्ति कम होगी.. सो, हम किराये पर मकान नहीं देंगे..हमें कृपया क्षमा करेंगे.“

‘ तो तुम्हें इससे क्या मतलब यार.. वैसे भी किराए पर मकान मिलना इतना आसान नहीं....देखती नहीं- हमारे भोपाल में ही कितने लोग मुंहमांगे पैसे लिए मकान के लिए भटकते रहते हैं..ढूँढने से एक बार “ जॉब “ मिल जाएगा पर किराए का मकान नहीं....वे पहले भी आम आदमी थे.. आज भी है..उन्हें मालूम है कि आम आदमी की देश में कितनी क़द्र है..तुम्हें सुनकर बुरा लग रहा कि उनके साथ ऐसा बुरा बर्ताव हो रहा..लेकिन उन्हें तनिक भी बुरा नहीं लग रहा..चुनाव में कितने ही थप्पड़ खाए.. “उफ़” तक नहीं किये..उलटे उनके घर जाकर पूछते रहे- “ मेरा कुसूर क्या है ? “ लोगों ने उनके चेहरे पर स्याही फेंकी..उन्होंने बुरा नहीं माना..कहा- लोकतंत्र में यह सब चलते रहता है..’

‘ बात उनके आम या विशेष होने की नहीं जी..चार-पांच महीने में ही उन्होंने ऐसा क्या गजब ढा दिया कि दिल्ली वाले इतने बेदर्द और बेदिल हो गए..किराए के एक मकान के लिए उन्हें तरसा रहे..कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें उनके विरोधी पार्टीवालों का हाथ हो..’ पत्नी ने संदेह जाहिर किया.

‘ अब इनके सारे विरोधी तो सत्ता में हैं..या फिर सता के आसपास ही हैं..अब जब उनके ही आदमी उन्हें “ चवन्नी-अठन्नी “ समझ छोड़ रहे हैं..पार्टी छोड़ भाग रहें हैं..तो मैं नही समझता कि सत्ता में बैठे लोग इस नाचीज के साथ ऐसा तुच्छ व्यवहार करेंगे. ऐसा घटिया काम करेंगे...’

‘ अरे.. आप भी उन्हें चवन्नी-अठन्नी कह रहे हैं ..भूल गए..कभी आप भी “आप“ हुआ करते थे..उन्हीं की टोपी लगा तारीफ़ के पुल बांधा करते थे..उनके सुर से सुर मिलाया करते थे..आपसे ऐसी आशा न थी.. छिः..’ पत्नी विचलित होकर बोली.

‘ देखोजी..राजनीति में भावुकता का कोई स्थान नहीं होता.. हमें वक्त के साथ चलना चाहिए.. उनका वक्त था तो उनके साथ था..अब अच्छे दिनों की बात ये कर रहे तो इनके साथ हूँ..हमें वर्तमान को साधकर चलना चाहिए ..’ पति ने फिलासफी बघारी.

‘ फिर भी आप बड़े खुदगर्ज निकले.. दिल्ली वालों की तरह बेदर्द निकले..आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी..’ पत्नी गुस्से से बोली.

‘ अरे भागवान..”न सूत न कपास. आपस में लठम-लठा” जैसी स्थिति मत बनाओ.. तुम्ही कहाँ –कहाँ की बातें छेड़ती हो.. मुझे लड़ने को उकसाती हो...खैर..अब छोडो इन बातों को और बताओ- तुम दिल्ली में बंगला होने की कुछ बातें कह रही थी...’ पति ने बड़े ही सहजता से कहा.

‘ अब जाने भी दो...’ पत्नी दो टूक जवाब दे बिस्तर पर पसर गई.

‘ कहीं ऐसा तो नहीं कि महारानीजी दिल्ली में उस “बेचारे” को किराया देने का मूड बना रही थी ..’ पति ने कटाक्ष करते पूछा.

वह लजाकर मन्द-मन्द मुस्कुराने लगी.

‘ तो ये बात है..’ पति ने छेड़ते हुए कहा - ‘ तुम्हारी दिली इच्छा है तो दिल्ली में इन्हें किराये पर मकान तो दे सकते हैं..पर पहले वहां एक बड़ा-सा बंगला खरीदना होगा.और इसके लिए यहाँ के बंगले को बेचना होगा..तुम्हारे माता-पिता ,भाई-बहनों को “बेक टू पेवेलियन“.भोपाल से सीहोर भेजना होगा.. कहो तो इनसे बातें करूं ? ‘

‘ फालतू बातें बहुत करते हो जी.. जाओ...मुझे नींद आ रही....मैं सो रही हूँ..’ इतना कह वह करवट बदल लुढ़क गई.

पतिदेव उसकी बेसिर पैर की बातों को याद करते, हौले-हौले मुस्कुराते फिर न्यूज देखने बैठ गए....टी.वी. खोलते ही वही हजरात दिखे -- ट्रक में सामान लादे कहीं शिफ्ट होने जा रहे थे..पीछे मुड-मुड अपने पुराने (सरकारी) आवास को निहार रहे थे.. उसने सोचा कि पत्नी को उठाकर ये दृश्य दिखाए..

फिर सोचा- नहीं.. किरायेदार खो देने का गम उसे रात भर सोने नहीं देगा....दिली धक्का लगेगा.. दिल्ली उसे सचमुच बेदिल लगेगा..

उसने पत्नी को नहीं उठाया.. चुपचाप टी.वी.बंद कर वह भी बगल में लुढ़क गया.

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प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

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    अब नवीन शिक्षा सत्र् 2014-15 शुरू हो चुका है। यही कारण है कि प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षा को पटरी पर लाने की कवायद शुरू कर दी है। यह स्पष्ट है कि अब तक की सरकारों ने यह तो स्वीकार किया है कि देश और प्रदेश के शिक्षा की व्यवस्था संतोषजनक नही है। प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए पिछले लगभग डेढ़ माह से जिलाध्यक्षों के माध्यम से बैठक लेते हुए चिन्तन किया जा रहा है। हर बैठक में युक्ति युक्तकरण की बात की जाती है। यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि राज्य मे शिक्षको की कमी नही है। बावजूद इसके शिक्षकों की पदस्थापना में लापरवाही स्पष्ट नजर आ रही है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों एवं विद्यार्थियो के बीच का अनुपात 1:20 होना चाहिए, किन्तु वह कहीं 1:13, 1:15 पाया जा रहा है, तो कहीं शिक्षकों की भारी कमी दिखायी पड़ रही है। बनाये गये नियमों के अनुसार निःशुल्क शिक्षा के अधिक पद रिक्त नही होने चाहिए । वस्तुस्थिति यह है कि अधिकता वाली शालाओं में भी शिक्षक नियमित उपस्थिति दर्ज नही करा रहे हैं, कमी वाले क्षेत्रों की तो दुर्दशा का बखान करना ही गलत होगा।


    शिक्षकों के युक्ति युक्तकरण के लिए मई 2014 तक आवश्यक कार्यवाही पूर्ण कर लेने की बात योजना में की गयी है। चिन्तनीय यह है कि कमी वाली शालाओं में शिक्षकों का पदांकन राजनीतिक पहुँच रखने वालों के चलते कैसे पूरी हो पायेगी? सचिव छत्तीसगढ़ शासन, स्कूल शिक्षा विभाग की मंशा के अनुसार अतिशेष शिक्षको कोनिकटतम विकास खण्ड पर युक्ति युक्तकरण करते हुए केवल जिला स्तरीय समिति द्वारा विचार किया जाना प्रावधानित किया गया है। कठिनाई का दौर यहीं से जन्म लेता है और वह शिक्षक अथवा शिक्षाकर्मी अपना नाम हटाने जोर मारने लगता है जिसे मालूम है कि उसे अन्यत्र भेजा जा सकता है। ऐसी स्थिति में जिला स्तरीय समिति के सदस्य भाई-भतिजा वाद से नही उठ पा रहे हैं। एक नियम के अनुसार युक्ति युक्तकरण में पदस्थापना हेतु विकलाँग और महिलाओं को प्राथमिकता की बात भी कही गयी है जो वास्तव में छलावा मात्र है। न तो महिलाओं के साथ न्याय किया जा रहा है और न ही विकलांगो को सुविधा दी जा रही है।

देखा जाये तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक तथा तकनीकी शिक्षा से लेकर व्यवसायिक शिक्षा तक अभूतपूर्व क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। साथ ही शिक्षा का क्षेत्र व्यापक होने के साथ-साथ बहुआयामी भी हो गया है।


    देश की शिक्षा व्यवस्था को सुचारू करने अनेक प्रयास गंभीरता के साथ किये जा रहे हैं। इतिहास उठाकर देखें तों वर्ष 1976 तक शिक्षा संविधान की राज्य सूची में सम्मिलित थी अर्थात् शिक्षा के संबंध में राज्य सरकारें ही कानून बनाने के लिए सक्षम थी, किन्तु इसी वर्ष संविधान में संशोधन करते हुए (42 वाँ संशोधन) शिक्षा को समवर्त्ती सूची में डाल दिया गया। अब केन्द्र तथा राज्य सरकारें दोनो ही कानून बना सकती हैं, परंतु यदि केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये गये कानूनों में अन्तर होता है तो केन्द्र का कानून वैध माना जाता है। जहाँ तक मैं समझता हूँ इसी व्यवस्था ने शिक्षा तंत्र को उलझाकर रख दिया है। राज्य सरकार अपने सेटअप के अनुसार व्यवस्था बनाती है और केन्द्र सरकार अपने संसाधनों के आधार पर। जहां तक हो सकें राज्य और केन्द्र की साझा बैठक में शिक्षा का ढाँचा तैयार किया जाये ताकि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के अनुसार प्रधान पाठक से लेकर विषय शिक्षकों का पदांकन छात्रों की संख्या के आधार पर हो सके, जो नही हो पा रहा है। कठिनाई किस स्तर पर आ रही है इसका मुल्यांकन जरूरी है। यह तो स्पष्ट है कि सरकार जरूरत से ज्यादा राशि खर्च कर रही है, किन्तु कहीं न कहीं नेताओं का हस्तक्षेप, क्रियान्वयन में आड़े आ रहा है। यदि किसी शाला में अतिशेष शिक्षक पाये जा रहे है तो नियमों का हवाला देते हुए उन्हें अन्यत्र भेजने पर मंत्रालय से लेकर जिला शिक्षा विभाग तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करते हुए युक्ति युक्तकरण करें तो शिक्षा की स्थिति में गुणात्मक सुधार आसानी से लाया जा सकता है। पति-पत्नी का युक्ति युक्तकरण जहाँ तक सम्भव हो सके  एक ही स्थान पर करने की बात भी की जा रही है, जो कहीं दिखायी नही पड़ रही ऐसे दम्पत्ति शिक्षा विभाग के चक्कर काटते थक रहे है।


    हिन्दुस्तान में शिक्षा की मशाल को रोशन रखने के लिए प्रशासन स्तर पर हर किश्म की कोशिशे की जाती रही है। शिक्षा को गुणवत्ता के दायरे में बनाये रखन के एक नही अनेक शिक्षा शास्त्रीयों की अध्यक्षता में कमेटियों का गठन भी किया गया। विडम्बना यह है कि किसी भी शिक्षा कमेटी की सिफारिशों को पूर्णतः लागू करने से पूर्व ही बदल दिया गया अथवा उसके  स्वरूप में परिवर्तन कर नयी-नयी सोच को स्थान दे दिया गया। कहने का तात्पर्य यह कि हमारे देश की सरकारों ने शुरू से ही शिक्षा के क्षेत्र को प्रयोगों का पिटारा बनाकर रख दिया है। वास्तव में देखा जाये तो भारत वर्ष में शिक्षा का ढँाचा भूल-भुलैया में उलझा हुआ हैं। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र मे किये जाने वाले सरकारी  प्रयास न सिर्फ नाकाफी हैं, बल्कि नीतियों के स्तर पर भी अंतर्विरोधों से भरे पड़े हैं। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के महँगे स्कू लों ने अच्छी शिक्षा को एक छोटे से वर्ग का विशेषाधिकार बना डाला है। परिणाम के रूप में हम पा रहे हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में बराबरी लाने की तमाम-कोशिशें शिक्षा में विषमता बढ़ाने का सबसे बड़ा औजार बन कर रह गयी हैं।


    सच तो यह है कि लार्ड-मैकाले द्वारा हमें सौंपी गयी शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव हमें इस कदर जकड़े हुए हैं कि हम विद्या से दूर होते जा रहे हैं और उस शिक्षा के गुणगान में लगे हैं जो सिर्फ किताबी कीड़ों की फ ौज तैयार कर रही है। इन सारी स्थितियों को देखकर लगता है कि कुटिल अंग्रेज लार्ड-मैकाले अपने मन्तव्य में आज भी कई गुना कामयाब है। लार्ड-मैकाले ने एक सोची समझी साजिश के तहत एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का लबादा हमें उढ़ाया जो हमारी सनातन परंपरा पर कफन तो साबित हुआ ही साथ ही अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया। मैकाले द्वारा प्रद्त शिक्षा पद्धति और स्कूली पाठ्यक्रम ने जिस शिक्षा की नींव रखी, हम उसे ही विद्या समझने की भूल कर बैठे । अब जब हम पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं है, तब भी हम प्रतिवर्ष नवीन सत्र प्रारंभ होने से पूर्व नये प्रयोगों को जन्म देते आ रहे हैं। हमारे शिक्षा शास्त्री और सरकार में बैठे शिक्षा विभाग के मंत्री या तो खुद शिक्षा की महत्ता समझ पाने में असमर्थ होते हैं या फिर कमेटी का गठन कर उनके सुझावों की बैशाखी पर शिक्षा तंत्र को एक और साल के लिए प्रायोगिक तौर पर सभी जिला शिक्षा अधिकारियों पर लाद देते है।


    शिक्षा व्यवस्था पर जमी स्याह परत बड़ी आसानी से उजली की जा सकती है बशर्ते कि इच्छा शक्ति प्रबल की जाये। मात्र आयोगों और समितियों के गठन और उनसे सुझाव प्राप्त कर लेने भर से शिक्षा जगत की समस्याओं को समाप्त नही किया सकता है न ही शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिवर्ष नाम मात्र का बजट बढ़ा देने से इसमें व्याप्त बुराइयों और कठिनाइयों का सुक्ष्मता से अध्ययन कर दीर्घकालीन नियोजन, राजनैतिक, प्रशासकीय दृढ़ इच्छाशक्ति, जन सहयोग और जन कल्याण की भावना से सभी संबंधित व्यक्तियों द्वारा अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना पर्याप्त होगा। अतः समुचित वातावरण बनाने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। इस संबंध में कुछ सुझाव इस प्रकार हो सकते हैं -


1.     शिक्षा विभाग के अंतर्गत किसी भी शाला में पदस्थ शिक्षक अथवा किसी अन्य कर्मचारी को सांसद, विधायक अथवा मंत्री स्तरीय व्यक्ति का सचिव न बनाया जाये ताकि शाला कार्य सुचारू रूप से चल सके  ।


2.     जिला शिक्षा विभाग और अधिकारी के साथ चाटुकारिता कर शाला कर्तव्य से बचने वाले शिक्षकों को उनका कर्त्तव्य याद दिलाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी अच्छी पहल कर सकते हैं।


3.    शिक्षकों की कमी वाली शालाओं से भी शिक्षकों को अधिगृहित करते हुए शिक्षा के अतिरिक्त काम कराने की प्रवृत्ति भी समाप्त की जानी चाहिए।


4.    जनसंख्या गणना से लेकर, विकलांगों की गणना, पशुगणना, चुनावों के दौरान वोटर लिस्ट की पूर्णता में शिक्षकों का संलग्निकरण न करते हुए कुछ ऐसी व्यवस्था बनायी जाये कि बेरोजगारों को अवसर प्रदान कर दो पक्षीय लाभ लिया जा सके ।


5.    शिक्षकों पर कड़ाई अथवा नियम थोपने से पूर्व विकासखण्ड शिक्षा अधिकारियों को नियमितता पूर्ण  निरीक्षण हेतु दिशा-निर्देशित किया जाना भी उचित हो सकता है।


    शिक्षा में गुणवत्ता लाने की बात करने वाले छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के कर्णधारों को गंभीरता पूर्वक सोचना होगा कि कक्षा आठवीं तक परीक्षा की औपचारिकता द्वारा फेल न करने का नियम कितना उचित और कारगर है। शिक्षा की गुणवत्ता तो दूर उसे अपाहिज बनाने वाले नियमों के तहत अब कक्षा दसवीं और बारहवीं बोर्ड में अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों को पत्राचार की तरह चार मौके देना कौन सी गुणवत्ता की ओर शिक्षा तंत्र को ले जायेगा, इस पर भी विचार जरूरी है। एक और परिवर्तन द्वारा नवीन शिक्षा सत्र से एक पाली में लगने वाली शासकीय शालाओं का समय सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक करने के पीछे कौन सी सोच काम कर रही है, यह भी समझ से परे है। कारण यह कि न तो बच्चे को सुबह 9 बजे गरम भोजन मिल सकता है और न वापस लौटने पर 3 बजे ही। इसे हम महज एक नया प्रयोग ही कह सकते हैं, जो आने वाले समय में निश्चित रूप से बदलाव की माँग करता दिखायी पड़ सकता है।    

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जिजीविषा


रीना का विभा से आज अचानक मिलना हुआ .शहर के एक बड़े अस्पताल में डाक्टर की केबिन में वह डाक्टर की प्रतीक्षा में बैठी थी .अपने एक रिश्तेदार के बारे में उसे कुछ पूछना था .उनकी सारी रिपोर्ट्स भी साथ ही लेकर आई थी .तभी एक महिला ने प्रवेश किया .रीना को लगा कोई और पेशेंट होगा .पर उसके गले में परिचय -कार्ड देख कर लगा कि यह अस्पताल का ही स्टाफ है .वह सीधे जाकर कुछ फाइलें देख रही थी .रीना उठकर उसके पास गई और पूछा .....सुनिए !क्या आप बता सकती हैं कि डॉक्टर साहब कब तक आएंगे ?
विभा ने बिना उसकी और देखे ही बताया ...`अभी राउंड पर गए है .करीब आधा घंटा लगेगा .आप यहाँ प्रतीक्षा कर सकती है .अगर आपने अपॉइंटमेंट लिया हुआ है ....आपको बुला लिया जायेगा तब तक आप लाउंज या कैंटीन में बैठ सकती हैं `.
रीना ने धन्यवाद कहा और फिर आकर वहीँ सोफे में बैठ गयी .विभा कमरे से लौट गई .तब रीना को लगा कि ऐसा लगता है कि वह विभा को पहले कभी मिल चुकी है पर कहाँ ...?बहुत सोचने पर भी याद न आया .
तभी डाक्टर वर्मा ने प्रवेश किया ....उन्होंने अंदर जाकर हाथ धोये और लौट कर अपनी फाइल देख कर बीमारों की सूची देखने लगे ..इस बीच उन्होंने रीना के अभिवादन का उत्तर देते हुए कहा .....जरा देख लूँ  ..और बेल बजा दी .एक वार्डबॉय ने बताया ``जी साहब ..पहला नंबर इन्हीं का है ``.
कहकर वह बाहर चला गया और दरवाज़े के पास खड़ा हो गया .
डाक्टर वर्मा ने रीना को कहा `आइये ! बताइये क्या तकलीफ है ?रीना ने कहा ...`डॉक्टर साहब मैं ठीक हूँ असल में मेरी एक करीबी रिश्तेदार बीमार हैं .वह दूसरे शहर में हैं जहाँ उनका इलाज तो चल रहा है पर कोई असर नहीं हो रहा है .वह जानना चाहती हैं कि यदि यहाँ आकर इलाज़ संभव हो तो ?ये उनकी सारी रिपोर्ट्स हैं '......उसने डाक्टर को फाइल थमा दी .दस-पंद्रह मिनट तक उन्होंने सारी रिपोर्ट्स ,एक्स-रे ,एम .आर .आइ,मैमोग्राफी और इलाज़ की जानकारी ले ली .फिर थोड़ी गंभीर मुद्रा में बोले ...हुम्म्म ....हाँ तो मामला कैंसर का है ....लगता है काफी देर हो गई है ....अब दवा नहीं सर्जरी ही ज़रूरी लगती है ......इन से तो यही लगता है ..पर अगर यहाँ आकर सारी जाँच कराई जाये तभी मैं कुछ ठीक से कह पाउँगा ...मरीज़ की और हालत को भी ध्यान में रखना होगा ....उन्हें मेंटली तैयार करना होगा ..ऑपरेशन के लिए ......अब आप इस बारे में अधिक जानकारी मिस विभा से ले सकती हैं '......उन्होंने फिर वार्ड बॉय को बुलाया और कहा..' इन्हें विभा जी के पास ले जाओ .'
रीना विभा के केबिन के पास पहुँची तो बाहर लगी नेम -प्लेट से पता चला कि वह परामर्श दाता है .अंदर जाने के लिए उसने दरवाज़े पर दस्तक दी .मेज में कुछ फाइलों में डूबी हुई विभा ने सिर उठकर उसे देखा और आने के लिए कहा और बैठने का इशारा किया .बस थोड़ी देर ...कहती हुई उसने पूछा ..जी मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ ?
रीना ने अपना परिचय देकर सारी बात बताई ..तभी बीच में ही विभा ने कहा ..'ओह !रीना दी अरे !इतने दिनों बाद देखा कि पहचान ही न पाई आपको ...आप को याद न होगा शायद कॉलेज की ड्रामेटिक सोसाइटी में हम दोनों साथ थे हुआ करते अब से लगभग पंद्रह साल पहले .आप एक साल सीनियर थी हमारा विषय एक ही था सायकॉलॉजी ....शिमला ...
रीना भी मानों सपने से जागी अरे ! अब जाके याद आया अभी थोड़ी देर पहले जब तुम्हें देखा तभी से मन बेचैन सा था कि कहाँ मिलें होंगे हम ?चलो कितना अच्छा दिन है कि आज मिले ...पर तुम यहाँ कैसे ?तुम्हारा विवाह हो गया था फाइनल इम्तिहान के बाद ....हैं न ?अब यहाँ कैसे ?आगे
की पढाई कब की? जॉब कब से कर रही हो ?पति और बच्चे ?लो मैं तो पीछे ही पड़ गयी . विभा पर हमारी दोस्ती तब तक ही रही थी ?
विभा की आँखों में आँसू छलक उठे रीना को लगा पुरानी बातों ने दिल में उछाल मारी है ....वह भी भावुक हो गई .विभा ने कहा बड़ी लम्बी बात है रीना दी एक ही दिन सब जानोगी ...अब मिले हैं तो आगे भी मिलते रहेंगे .कहो आप यहाँ कैसे ?सब ठीक तो है ?रीना ने आने का कारण बताया तो विभा जैसे कुछ विचलित सी हो उठी .धीरे से बुदबुदाई ..ओह !फिर एक बार ...फिर संभल कर बोली .ठीक है दीदी ....मैं ये सारी रिपोर्ट्स पढ़ लूँगी.मेरा घर यहीं पास में है आप जब चाहें आ सकती हैं यहाँ की पाबंदी नहीं होगी आराम से बात करेंगे .उसने अपना पता और फोन नंबर दे दिया ...फिर कैंटीन में जाकर रीना के साथ एक -एक कप चाय पी .दी आज इतने वर्षों बाद मिले हैं बेशक घर नहीं है तो भी कैंटीन में जाकर पुरानी बातें ताज़ा करें .....बाद में रीना को गेट तक छोड़ने भी आई .
रीना की चचेरी ननद को ब्रेस्ट कैंसर हो गया था .....जिसका ऑपरेशन जरूरी था ....कैंसर ने अब तक दोनों स्तनों को प्रभावित कर दिया था ....सारे शरीर में फैलने से तुरंत रोका जाय तो अभी भी बहुत उम्मीद की जा सकती थी .
काम तुरंत होना आवश्यक था इसलिए विभा ने शाम को ही रीना को अपने घर बुला लिया था .रीना उसकी तत्परता से बहुत प्रभावित हुई .अब तय यह हुआ रीना जल्दी ही अपनी ननद को बुला ले ताकि इलाज की प्रक्रिया शुरू हो सके .....रीना ने फिर विभा से उसके परिवार के बारे में पूछा ..तो विभा ने टाल दिया ..छोडो न दीदी ....पहले अपनी सुनाओ ...इतने सालों की बातें घर परिवार ..फिर मेरी बारी ......पर रीना बोली.....' ओहो पूछा मैंने है पहले ...'....उनकी बातों में फिर वही कॉलेज के दिनों की मस्ती छलकने लगी पर विभा मायूस सी दिखी .....बहुत कहने पर ही विभा ने बताया ...
क्या फायदा दीदी मेरी कहानी ख़त्म हो चुकी ...यह तो मेरा दूसरा जन्म है मैं पिछले जन्म की सारी बातें भूल जाना चाहती हूँ ...भूल भी गयी हूँ पर आज इस रिपोर्ट ने फिर यादों को कुरेदा है .
विवाह के बाद हम लोग सुखी जीवन जी रहे थे .दो बेटियाँ भी जन्म ले चुकी थी .हालाकि सास-ससुर को पोता न होने का दुख अखरता था पर उम्मीद थी .इसी बीच न जाने ये जानलेवा बीमारी कहाँ से आ गयी ......रोज रोज के दर्द को मैं सहती चली गयी कि ठीक हो जायेगा ....सभी गृहणियों की तरह यही सोचा कि मेरी बीमारी से सभी को परेशानी होगी ..अतः चुप ही रही ..वह तो जब पीड़ा असह्य हो गयी ...चुप रहना नामुमकिन हो गया .बरबस चीखें निकल आती तब कुछ सोचा .....बीमारी का इलाज़ ऑपरेशन ......दोनों स्तन काट काट फेंक दिए गए ....दवाओं और कीमो थेरेपी के कारण सारे बाल झड़ चुके थे ..रंग काला हो गया था ....खुद को ही दर्पण में देखना कठिन हो गया .....इस पर भी घरवालों का व्यव्हार मेरी और बदल चुका था ...दया की भीख तो मैं भी नहीं चाहती थी पर सहानुभूति की आशा रखती थी ....सबको लगने लगा जैसे कि यह छूत की बीमारी है .मेरे पास आने भर से सबको लग जाएगी .और तो और मेरी बेटियों तक को दूर कर दिया गया .खान पान -बर्तन सब अलग .मैं बिलकुल अलग थलग सी हो गयी ......इसी बीच जब एक दिन अपनी सास और ननद को मेरे पति की दूसरी शादी रचाने की बात कहते हुए सुना तो अपने को रोक न सकी .....पूछा ये क्या बात कर रही हो अभी मैं जिंदा हूँ .....तो उत्तर मिला अरे हाँ ,...हो तो ....पर अब तुम्हारा नारीत्व कहाँ बचा ?
सुनकर जैसे होश ही उड़ गए .....पति ने मेरे इलाज़ में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ..मुझे उनपर पूरा भरोसा था ......लेकिन अपनी माँ की इस बात का उन्होंने कोई प्रतिकार नहीं किया ....
दिनों दिन अवसाद बढ़ता जा रहा था तभी चेक -अप के लिए डॉकर वर्मा के पास गयी थी ....वे बोले सुधार में अचानक कमी कैसे ?  अरे !बी ब्रेव !खुश रहो ..तो मै रो पड़ी और सबकुछ उन्हें बताया .....तब एक दिन मुझे वे अपने साथ ऐसी जगह ले गए जहाँ कैंसर की विभीषिका से पीड़ित लोगों को रखा गया था.जिनका इलाज़ हो चुका था ..पर आगे कोई उम्मीद नहीं बची थी ...कई लोगों के प्रिय लोग मिलने आते थे .और कुछ लोगों के रिश्तेदार उन्हें जीते जी तिलांजलि दे चुके थे .....डाक्टर वर्मा ने बताया ..अगर तुम चाहती हो तो यहाँ इनकी सेवा कर सकती हो ...बदले में तुम्हें हिम्मत मिलेगी ...जीने का मकसद मिलेगा ...
बस उसी दिन से मैंने भी सोच लिया ....स्त्री यदि किसी अंग से हीन होने पर अपना अस्तित्व खो बैठती है इस समाज की सोच में तो ....यही सही .... क्या शरीर के अंगों से ही पूर्णता परिभाषित होती है ?मन की भावनाओं का कोई मोल नहीं ?
मन में एक जिजीविषा जाग उठी ..इलाज का भी ठीक असर हुआ .....मैं ठीक हो गई ... आगे पढाई भी की ..डाक्टर वर्मा ने नौकरी भी दी .......मैं खुश हूँ कि मैं अधूरी नहीं .मैं पूरी औरत हूँ ....सपाट सीना है पर लोगों के ताने - उलाहने झेल सकती हूँ .'
यही मेरी कहनी है अब तक  ...रीना रो भी रही थी ...विभा की हिम्मत की दाद देना चाहती थी पर शब्द गुम थे .....विभा ही बोली तो दीदी ...मेरी कहानी के पात्र का मोनोलॉग जरा बड़ा हो गया न ? रीना बस उसे निहारती रही .
ज्योतिर्मयी पन्त

आलेख

मोहन राकेश

हिन्दी नाटक का नवीन हस्ताक्षर

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स्वप्ना नायर, तमिलनाड़ु के कॉयम्बत्तूर करपगम विश्वविद्यालय में प्रो.(डा.) के.पी.पद्मावती अम्मा के मार्गदर्शन में पी.एच.डी केलिए शोधरत

हिन्दी में नाटक का विकास आधुनिक काल में हुआ था। जिसमें महान साहित्य नायक बाबु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का स्थान सर्वोपरी है। साहित्य में ‘भारतेन्दु युग’ नामक काल को निर्मित हरिश्चन्द्र को हिन्दी नाटक के संस्थापक माना जाता है। ‘नहुष’ उनका पहला नाटक है।

हमारी नाटक परंपरा की ओर दृष्टि डालते समय प्रथम नाटककार के स्थान में रीवा नरेश विश्वनाथ सिंह का नाम आता है। उनका ‘आनन्द रघुनन्दन’ को हिन्दी का पहला मौलिक नाटक माना जाता है। हिन्दी नाटक के इतिहास को कई चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

1. भारतेन्दु युगीन नाटक।

2. प्रसाद युगीन नाटक।

3. प्रसादोत्तर बुद्धि प्रधान नाटक।

4. प्रसादोत्तर आधुनिक बोध को निरूपित करने वाले नाटक।

भारतेन्दु युगीन नाटक

भारतेन्दु ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में हिन्दी गद्य का स्वरूप निश्चित करके गद्य में विभिन्न प्रकार के रचनाएँ करने का प्रारंभ किया। वे स्वयं नौ मौलिक नाटक रचे तथा आठ नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘सत्यवादी हरिश्चन्द्र’ है। इस युग के नाटकों का प्रमुख आधार संस्कृत भाषा पर रचित नाटक है। एक और विशेषता यह है कि इस काल में पद्य व्रज भाषा में और गद्य खड़ीबोली में लिखते थे। मालूम होता है कि इस समय के नाटककारों ने कथापात्रों के चरित्र-चित्रण में बड़ी ध्यान नहीं दिया है।

प्रसाद कालीन नाटक

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बीसवीं सदी के आरंभ में मौलिक नाटकों की तुलना में अनूदित नाटकों का भरमार रहा और अनुवाद के स्रोत तीन भाषाओं से रहे, अंग्रेज़ी, बँगला और संस्कृत। यह तर्क रहित बात है कि हिन्दी नाटक का उत्थान महाकवि जयशंकर प्रसाद के साथ आरंभ हुआ। प्रसाद मुख्य रूप में कवि होकर भी नाटक क्षेत्र में भी अपना प्रतिभा दिखाया बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार है। उनका पहला प्रौढ़ नाटक ‘विशाख’ है। इसके बाद अजात शत्रु, स्कन्द गुप्त, चन्द्र गुप्त, राज्य श्री और ध्रुवस्वामिनी आदि लिखे गये। प्रसाद की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने हिन्दी के साहित्यिक नाटक का पुनरुद्धार किया। वे अपने नाटकों के संवाद और चरित्र-चित्रण पर नया रूप और भाव लाया।

प्रसादोत्तर हिन्दी नाटक

लक्ष्मी नारायण मिश्र प्रसादोत्तर नाटक क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध नाटककार है। वे आरंभ में सामाजिक नाटक रचकर साहित्य रंगमंच पर पदार्पण किया। मिश्र के समय का अन्य नाटककारों में उपेन्द्रनाथ अश्क का नाम उल्लेखनीय है। सेठ गोविन्ददास भी इस ज़माने के प्रसिद्ध नाटककारों में एक है। उनके समकालीन नाटक रचयिताओं में मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल, रमेश बख्शी तथा सुरेन्द्र वर्मा के नाम आदर के साथ लिया जाता है। इस समय के नाटकों में प्रेम, सौन्दर्य और कल्पना की जगह समसामयिक यथार्थ ने ली है और आदर्श का चौखटा टूट गया है।

मोहन राकेश

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हिन्दी नाट्य परंपरा के एक सशक्त आवाज़ है मोहन राकेश। वास्तव में राकेश हिन्दी नाटक क्षेत्र का नयी चेहरा है। राकेश कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार और कवि भी है। उनका जन्म 8 जनवरी 1925 में पंजाब के अमृतसर पर हुआ था। उनके बच्चपन का नाम ‘मदन मोहन मुगलानी’ था। वे पंजाब विश्व विद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम. ए. शिक्षा पूरा करके साहित्य पर उतरे। पहले वे अध्यापक का नौकरी करता था। ‘सारिका’ के संपादक के रूप में प्रसिद्ध हुए राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार मिला गया नाटक है। नाटकों के सिवा राकेश ने अंधेरे बंद कमरे, अन्तराल तथा न आनेवाला कल आदि उपन्यास, क्वाटर तथा अन्य कहानियाँ, पहचान तथा अन्य कहानियाँ, वारिस तथा अन्य कहानियाँ, अन्तराल, इन्सान के खंडहर, एक और ज़िन्दगी, जानवर और जानवर जैसे कहानी संग्रह भी लिखे है। ‘आखिरी चट्टान’ तक उनके यात्रा वृत्तांत है। ‘परिवेश’ उनका निबंध संग्रह और ‘मृच्छकटिक’ एवं ‘शाकुंतलम’ अनुवाद है। वे नयी कहानी आन्दोलन के वक्ता रहा था। इस कालजयी नाटककार ने सीमा रेखाओं को पार करके हिन्दी नाटक को देश-विदेश तक की व्याप्ति दे दिया। 3 जनवरी 1972 दिल्ली में राकेश का निधन हुआ। नाट्य साहित्य न केवल अपनी विकास-यात्रा में वैविध्य पूर्ण रहा है, अपितु विकास के विभिन्न चरणों में प्रयोग से प्रगति, प्रगति से नव लेखन तक फैलता चला गया है। यही कारण है कि हिन्दी नाटक की विकास यात्रा के केन्द्र में प्रसाद स्थित है तो छठे दशक में मोहन राकेश।

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मोहन राकेश हिन्दी नाटक रास्ता के एक ज्वलित दीपस्तंभ है। ‘नाटककार और रंगमंच’ नामक लेख में राकेश अपना मनोभाव व्यक्त करता है- ‘‘रंगमंच की पूरी प्रयोग-प्रक्रिया में नाटककार केवल अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं लगती। न ही यह कि नाटककार की प्रयोगशीलता उसकी अपनी अलग चार दीवारी तक सीमित रहे और क्रियात्मक रंगमंच की प्रयोगशीलता उससे दूर अपनी अलग चारदीवारी तक। इन दोनों को एक धरातल पर लाने के लिए अपेक्षित है कि नाटककार पूरी रंग-प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग बन सके। साथ यह भी कि वह उस प्रक्रिया को अपनी प्रयोगशीलता के ही अगले चरण के रूप में देख सके।’’ उन्हें नाटक संबन्धी विषय पर अपनी आदर्श और निष्ठा है।

राकेश का स्थान

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक में मोहन राकेश को महत्व पूर्ण स्थान होता है। राकेश ने नाट्य-लेखन के साथ साथ नये ढंग में रंग चेतना का विकास भी किया और नाट्य समीक्षा में यह बात अहम् हो उठी कि नाटक की आलोचना पाठ्य साहित्य के प्रतिमानों की भूमिका पर उतना उचित नहीं है। मोहन राकेश मानते है कि लिखित नाटक मंचीय प्रस्तुतीकरण में नया जन्म लेता है और एक ही नाटक प्रस्तुतीकरण की भिन्नता के कारण भिन्न रूप धारण कर लेता है। उनके अनुसार नाट्य साहित्य का महत्व दूसरा है। वह है एक स्तर पर वह लिखित रचना के रूप में साहित्यिक सौन्दर्य से वलयित है और दूसरे स्तर पर वह मंचीय गुणों के कारण प्रभावी है तथा जन मानस में धर किये हुए है। उनके नाटकों में ये दोनों पक्ष प्रबल है। मोहन राकेश के नाटक संवेदना, चरित्र-सृष्टि, आधुनिकता एवं शिल्प के नये प्रतिमान को प्रस्तुत करते है। उन्होंने पूरी सफलता के साथ आधुनिक मानव और उनके संबंधों को अपने नाटकों में निरूपित किया है।

मोहन राकेश के नाटकों में आषाढ़ का एक दिन, लहरों का राजहंस और आधे-अधूरे तथा उनके अवसानोपरांत कमलेश्वर द्वारा पूरा किया ‘पैर तले की ज़मीन’ आदि सभी नाटक आधुनिक बोध के वाहक है। आषाढ़ का एक दिन का प्रकाशन 1958 में हुआ था। इसे आधुनिक हिन्दी नाटक के प्रवाह धारा का प्रथम नाटक माना जाता है। यह नाटक ऐतिहासिक clip_image010

पृष्ठभूमि पर रचित होकर भी आधुनिक लगता है। रंगमंच प्रस्तुतीकरण उनके नाटकों के शीर्षस्थ गुण है। उनकी नाट्य-भाषा निरन्तर साहित्यिकता अथवा काव्यात्मता से बोलचाल के मुहावरे में ढलती गयी है। उसमें पर्याप्त नाटकीयता एवं जीवनी शक्ति है। इतना ही नहीं, राकेश ने कथा तत्व, चरित्रांकन, वस्तु-विन्यास, अभिनेता और शिल्प को पूर्णता देने में या कहें कि उसे व्यवहारिक और स्वाभाविक बनाने में पर्याप्त श्रम किया है। नाट्य-लेखन के क्षेत्र में राकेश की परिकल्पनाएँ यथार्थ से पुष्ट, समकालीन जीवन की त्रासदी से संस्पर्शित और अस्तित्ववादी चेतना से वलयित है तो उनका शिल्प अकृत्रिम और जीवंत अवश्य है।

आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे नाटकों में मोहन राकेश ने यथार्थ परिवेश को प्रस्तुत किया है। आषाढ़ का एक दिन में उन्होंने कलाकार की सृजनात्मक प्रतिभा की समस्या को लेकर अपने विचारों को प्रस्तुत किया है। वास्तव में मोहन राकेश के चर्चित तीनों नाटक तीन बिन्दुओं से महत्वपूर्ण जीवन स्थितियों के संकेत देते है, प्रेम, विरक्ति और अधूरापन की संकेत। ये तीनों नाटक अपने आप में उपलब्धि है और मोहन राकेश की रचनात्मक प्रतिभा को उजागर करता है। इन तीनों नाटक राकेश के अमरत्व को उज्ज्वल बना देता है।

सहायक ग्रंथः-

1.हिन्दी साहित्य का इतिहास, डा. नगेन्द्र।

2.हिन्दी साहित्य का इतिहास, डा.चातक एवं प्रो.राजकुमार वर्मा।

3.नाटककार और रंगमंच, मोहन राकेश।

(Swappna Nair, Research scholar, under the guidance of Dr.K.P.Padmavathi Amma, Karpagam University,Coimbatore,Tamil Nadu)

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