सोमवार, 9 जून 2014

उमेश मौर्य की कहानी – जीवों की व्यथा

जीवों की व्यथा
- उमेश मौर्य -


    जंगल के राजा शेरसिंह किसी तरह सर्कस से जान बचाकर भागने में सफल हुए और साथ में उन सारे पशुओं को निकलवाने में मदद की जो उनके साथ कार्य कर रहे थे। भागते भागते किसी तरह एक जंगल के पास पहॅुचे। राजा शेर ने सभी जीवों को आमंत्रित होने का आह्वाहन किया। जिससे समस्त जीव मात्र के कल्याण की चर्चा सके। इस क्रूर और पापी मानव जाति से। कुछ करना होगा नहीं तो हम सभी एक एक नष्ट हो जायेंगे। फिर धरती पशु विहीन हो जायेगी।


    सारे जीव एक बड़े से बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे इकट्ठा हो गये। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊॅट गर्दन उठाए आ पहॅुचा, घोड़ा भी हिनहिनाता हुआ आ गया, हाथी ने जोर से चिंघ्घाड़ते हुए सबका हौसला बुलंद किया। सारे जलचर प्राणित के लिए भी व्यस्था कर दी गई थी। तोता जी टहनियों पे उछल कूद मचा रहे थे। बन्दर भाई भी सभा की निगरानी कर रहे थे। गिद्ध जी एक ऊॅची सी डाली पर बैठे कौन-कौन आ रहा है। ऊपर से ही ब्योरा दे रहे थे। सभी बहुत खुश थे। क्योंकि आज उनके जीवन की सबसे गंभीर विषय पर होनी थी। वो ये था। कि इस मानव जैसी क्रूर, पापी, अत्याचारी, स्वार्थी, स्वादलोलुप जाति से सम्पूर्ण जीवों की रक्षा कैसे की जाय।


    सभा के संबोधित करते हुए शेरसिंह जी गरजे। हमारे समस्त जीवधारियों, जलचर प्राणियों एवं गगनचर मित्रों। आज हम सभी यहाँ इस दुष्ट मानव जाति राक्षस प्रजाति से अपने आपको कैसे बचाया जाय चर्चा करेंगे और मिलकर कोई निष्कर्ष निकालेंगे। हाथी, चिंघ्घाड़ा- ''महराज आप यदि आज्ञा दें तो हम अपने समस्त समूह के साथ जाकर एक एक मानव को नष्ट-विनष्ट कर दे। पूरे सभा में जोश फैल गया। चीता, सॉप, बिच्छू और सभी जीव अपनी-अपनी युद्ध कला की निपुणता की व्याख्या करने लगे। सर्पदेव ने कहा हम चाहें तो समस्त मानव जाति को अपने विषाक्त जहर से खत्म कर दें।


    वनराज ने सबको शान्त होनें का संकेत किया और कहा-''ये समय किसी भी तरह उत्तेजित होने का नहीं है। आज तक आप सबने इन्सानों का अत्याचार देख लिया है। मानव जैसा चालाक प्राणी पूरे ब्रह्माण्ड में नहीं होगा। उसके पास हमारे गजराज जैसे चाहे ताकत न हो परन्तु बुद्धि की चतुरता कहीं ज्यादा है। सर्पराज जैसे विष न हो लेकिन उससे कही ज्यादा जहरीला है। हमे कुछ और ही सोचना होगा। क्योंकि केवल युद्ध से ही इसका समाधान नहीं हो सकता। आज मानव के पास इतने सारे आधुनिक अस्त्र-शस्त्र हो गये हैं कि एक ही पल में जीव क्या समस्त पृथ्वी ग्रह का विनाश हो जायेगा। यदि हम ऐसा करेंगे तो ईश्वर की बनाई इस सुन्दर सृष्टि की व्यवस्था डगमगा जायेगी। हम उनके जैसे क्रूर तो नहीं बन सकते। हमे ईश्वर की बनाई इस सृष्टि को सुरक्षित रखना है। मानव हमारे साथ बुरा कर रहें हैं लेकिन हमें उनके साथ ऐसा नहीं करना चाहिए वर्ना हममें और इन दुष्ट अहंकारी, मनुष्यों मे क्या अन्तर रह जायेगा।'' इतना कहकर वनराज किसी गहरी चिन्ता में ढूब गये। थोड़ी देर बाद एक गहरी स्वास खींचकर बोले- प्रार्थना।
    सारे जीवों के मॅुह से एक साथ निकल पड़ा - प्रार्थना !


    हॉ प्रार्थना। ये एक ऐसी शक्ति है। जिसके द्वारा हम अपने दुःख दर्द को ईश्वर को समर्पित करेंगें और अपनी भावनाएं प्रकट कर उन्हे ही समस्त समस्या से अवगत करेंगे। जैसे मानव जाति के जीवन में प्रार्थना का स्थान है। वैसे हमारे भी जीवन में हमारी तो प्रार्थना ईश्वर जरूर सुनेगा क्योंकि हम तो उससे लाख गुना अच्छे और सच्चे है। हम सभी उस परमपिता परमेश्वर को सच्चे दिल से याद करेंगे और अपना संदेश उस तक देंगे। सब जीव अपनी अपनी शैली में जिससे जैसे हो सका बैठकर पूजा-ध्यान में लग गया। एक दिन बीत गये दो दिन बीत गये लेकिन कुछ भी नही हुआ। कोई आशा की किरण न दिखी। सभी निराश हो गये। और उठने लगे तभी एक कुत्ते ने भौं-भौं करते हुए कहा- हमारी इस घड़ी की परीक्षा भी भगवान लेता है कि हम कितने श्रद्धावान हैं और धैर्यवान हैं। मै कुछ दिन एक संत के पास रहा हॅू जो कहते थे कि श्रद्धा और सबर से की गयी  प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। सभी फिर से शान्ति में ढूब गये।


    तभी आकाश मार्ग से अंधेरे का चीरता हुआ एक तेज पुंज प्रकट हुआ। रात्रि का अंधियारा छट गया। सम्पूर्ण सृष्टि लगता उसके स्वरूप में समाहित हो रही थी। कुछ ही क्षण बाद वह तेज पुंज एक आकार में परिवर्तित हो गया और एक करूणामयी ध्वनि वातावरण में फैल गयी- ''हे मेरे पुत्रों तुम्हें क्या संकट है। सारे के सारे इतने निराश क्यो लग रहे हो। मैन धरती के समस्त प्राणियों के लिए एक आनन्द का संसार रचा था। सबके लिए व्यवस्था बना रखी थी। फिर तुम्हें क्या समस्या आ पड़ी। तुम्हारे ये ऑसू देखकर मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है। मेरा हृदय रो रहा है। मेरे बच्चों इसमें ऐसी कितनी प्रजातियाँ जो मुझे नहीं दिख रही। कहाँ लुप्त हो गई। तुम लोग मौन क्यो हो। मुझसे अपने दिल की बात कहो। हमारे लिए इस धरती के समस्त जीव, पशु-पक्षी, जल-थल-नभ, में विचरण करने वाले प्राणी, चींटी से लेकर हाथी,  धूल और पर्वत सब एक समान है मैं समस्त प्राणियों में एक जैसा ही वास कर रहा हॅू। लेकिन मनुष्य मेरी कृति का सर्वोच्च स्वरूप है। वो मेरा रूप है। जिसके अन्दर मेरी सारी शक्तियाँ एवं गुण विद्यमान है। मेरी ही तरह दया, करूणा, प्रेम, समानता, भावुकता, ममता, ज्ञान-विज्ञान, विस्तार, एवं समस्त जीवों के सेवा की उत्कृष्ट भावना विद्यमान है। सम्पूर्ण वनस्पितियों एवं जीव जन्तुओं की सेवा और सुरक्षा का उत्तरदायित्व मानव को ही मैने सौंपा है। लेकिन सारे जीव भी हमे उसी तरह प्यारे हैं जैसे कि मानव इसमे हमें तनिक भी भेदभाव नहीं है। सभी जीव हमें अपनी अपनी समस्या से अवगत कराओ। हम तुम्हारे मुँह से तुम्हारी व्यथा सुनना चाहते है। हे गौ माता तुम बोला।''


-''गाय रम्भा के बोली। हमें नहीं रहना है इस क्रूर और पापी मानव जीवों के बीच में हम सारे जीव धरती से ऊब चुके हैं।
-''लेकिन इससे तो धरती का जीवन चक्र ठहर जायेगा माते। पूरी सृष्टि खत्म हो जायेगी।'' भगवान ने शान्त भाव से कहा।
-''हे प्रभो आपने जितने सारे गुण इन मानवों के बारे में कहा है उसमें से एक भी गुण आज उनमें विद्यमान नहीं है। न करूणा, न दया, और न ही हमारे दर्द को समझने की संवेदना। आपने पत्थर हृदय कठोर प्राणी क्यो बनाया। केवल धर्म और विज्ञान का अहंकार भरा है। बस !''
-'' मनुष्य ने क्या किया तुम निर्दोषों के साथ ? मैने तो उनके जीवन यापन के लिए सारी व्यवस्था बना दी थी। पृथ्वी पे जगह-जगह उपजाऊ मिट्टी, जिसमे उनके जीवन यापन के लिए अन्न की व्यवस्था और पेड़ों से स्वादिस्ट फल, सुगन्धित पुष्प, की भी व्यवस्था की थी। धीरे-धीरे उनके दिमाग को क्रमबद्ध परिस्थितियों के अनुसार इतना सुदृढ बना दिया कि प्राकृतिक आपदाओं से अपनी सुरक्षा की व्यवस्था भी कर सके।''


बीच में ही घोड़ा बोल पड़ा-'' हे भगवन निःसन्देह मानव ने आपके अनुसार सारे विकाश तो किये, हवा में उड़ रहा है, रहने के लिए सुन्दर-सुन्दर भवनों की निमार्ण किया है। कार्य करने की आधुनिक तकनीक का विकाश कर लिया है। कि उसका जीवन कितना सरल बन गया है। प्रकृति के समस्त रूपों पे उसने विजय प्राप्त कर ली है। लेकिन वह अपने स्वाद पर अंकुश न कर सका।''


तभी बकरी मिमियाते हुए भगवान के चरणों पे गिर पड़ी- ''हमें इस धरती पे किस लिए बनाया है। क्या केवल मानवों के भोजन के लिए। इतनी निरीहता से हर दिन हर एक घर में हमारे मॅुह को दबाकर हमारी गर्दन को दबाकर हमारे बच्चों के सामनें, हमारे बच्चों को हमारे सामने काट दिया जाता है। हमें भी दर्द होता है। क्यो हमें आवाज नहीं दी कि हम उन्हे बता सकें कि कितना दर्द होता है। हमारा खून छलछलाकर पानी की तरह बहता है कितना निर्दयी प्राणी है मानव हम पशुओं को अपने भोजन का अभिन्न अंग मानता है। हर मानव पशुओं की हत्या के नाम से अपनी अलग-अलग मानसिकता, परिभाषाऐं बना रखी है। कोई कहता है हमारे पवित्र ग्रंथ में लिखा है। कोई कहता है भगवान बलि मॉगता है। कोई कहता है कि इनका जन्म खानें के लिए ही हुआ है। कोई भी हमारे ऑसू और दर्द को नही देखता। हे भगवन ये तेरा कैसा विधान है।''
    भगवान की ऑखें क्रोध और करूणा से लाल हो गई। क्या मनुष्य को अन्न और फल कम पड़ गया। जो इन निरीह प्राणियों की हत्या पर तुला है। इनका जीते जी भी उपयोग कर सकता है। गाय का दूध पीने के रूप में, इनके बच्चों का कृषि कार्य के रूप में उपयोग कर सकता है इनके जीवनोपरान्त उनके चमड़े से अपने जीवन की उपयोगी चीजे भी बना सकता है। मैने समस्त जीवों की आयु इसी अनुसार निर्धारित की है कि मनुष्य के एक जीवन में अन्य जीव का कितना उपयोग हो सकता है सहयोग करके खत्म हो जायेंगे ऐसा नहीं कि इनकी मात्रा ज्यादा हो जायेगी।


अन्य सारे जंगली जीव जो मुनष्य की भॉति कृषि कार्य नहीं कर सकते उन्हे उनकी अपनी खाद्य श्रृंखला में बॉध दिया है। जिससे उनका ये संतुलन चलता रहेगा। सारे प्राणियों की  शारीरिक बनावट भी उनकी खुद की प्रकृति के अनुसार ही निश्चित है। जिस दिन किसी एक भी प्रजाति का दूसरी सारी प्रजातियों पर अतिक्रमण बढ़ जायेगा। सारी की सारी प्रजातियॉ नष्ट हो जायेंगी। चाहे मानव ही क्यो न हो। डायनासोर की तरह। जिनके अत्याचार से उनका अस्तित्व सदा सदा के लिए खत्म हो गया।


मुर्गी ने प्रभु के चरणों में अपनी चोंच गड़कर कुछ कहना चाहा- ''हे प्रभु इन मानवों ने हमें मशीन बना डाला है। हमारी प्राकृतिक प्रजनन क्षमता को अपने तरीके से बदल कर हमारे भ्रूण का निशदिन भोजनादि मे प्रयोग कर रहा है। बाद में मेरे पंखों को निर्दयता से उखाड़कर मेरी गर्दन मरोड़ देता है और अपने स्वाद का स्तर बढ़ाता है। आखिर हमें भी तो इन्ही की तरह दर्द होता है। हम बोल नहीं पाते तो क्या हुआ। हमारी भी सारी क्रियायें मनुष्य की तरह है। हे प्रभु हमें इनकी स्वादलोलुपता से बचा लो'' और चिल्लाते हुए दम तोड़ दिया।
ऊॅट, बैल, सूअर, भैंस, मछली, सारे जीव शोक मग्न हो गये। हे प्रभु इन मानव जैसे निम्नस्तरीय जीव से हमारी रक्षा करो। उसने हमे अपने ज्ञान को अहंकार में, विज्ञान के अहंकार में आके तरह तरह के व्यंजनों की तरह अपने पेंट की ज्वाला को शान्त कर रहा है। क्या आपने धर्म और विज्ञान की किताबों मे इन्हे इस तरह की क्रूर हरकत करने की छूट दी है। हम सभी जीवों ने मानव जीवन को अपने जीते जी समस्त भार वहन करने का कार्य किया। क्या बड़ी-बड़ी परिभाषाऐं बनाने से हमारे दर्द कम हो जायेंगें, हमारी पीड़ा खत्म हो जायेगी हम भी जीना चाहते है। हम भी आपके बनाए इस संसार का एक हिस्सा है। भले ही हम बोल नहीं सकते लेकिन हर मानव की तरह हमें भी सुख, दुःख, प्रेम, पीड़ा, अत्याचार, क्रोध, और घृणा का एहसास होता है। हमे भी धूप लगती है, हमें भी प्यास लगती है, हमे भी मानवों से हमेशा प्रेम की अपेक्षा रखते हैं और उनपर अपना प्यार न्योछावर करने के लिए अपनी जान स्वेच्छा से देने को तैयार रहते है। लेकिन मानव कभी भी हम जीवों की भावना को नहीं समझ सका।


    केवल अपने स्वार्थ के लिए जो भी चीजें उसके रास्ते में आती गई उसका दुरूपयोग करता रहा वह केवल ज्ञान का अहंकार करता है। अपनी आवश्यकता एवं सुख सुविधा की चीजों को एकत्रित करता रहा और उसे विकाश का नाम दे दिया। कुछ पुस्तकों को लिखने और बोलने का ज्ञान प्राप्त कर लिया है तो सारे जीवों पर अत्याचार कर रहा है। उससे ज्यादा तो हमे हमारी प्रकृति का एहसास है। हमे पृथ्वी या आकाश में होने वाली किसी भी चीज का अनुमान उसके सारे यंंत्रो से कई्र गुना स्पष्ट हो जाता है तो किस चीज का विज्ञान जिस पर इतना घमंड कर रहा। उसका भी अपना एक समाज है ज्ञान क्षेत्र है। हमारा भी हमारी प्रतिभा इन पागल मानवों से कोई कम नहीं लेकिन हमारी कुछ शारीरिक मजबूरियॉ हैं। जिससे हम अपने अनुभवों को उनकी तरह उनसे कह नहीं पाते। हमने आज तक कभी भी प्रकृति के नियमों की अवहेलना नहीं की। यदि मानव इतने ज्यादा समझदार है तो क्या हमारी भाषा को समझ सकते है। फिर क्या है इनके पास केवल कुछ ईंटों का मकान या कुछ लोहे की मशीनें। बस ! उनके पास हृदय नहीं है वो भी केवल मशीन है मशीन।'' ऊॅट गुस्से से बिलबिला उठा।


मछली भी उछल के बोली- ''हे करुणानिधान पानी ही मेरा जीवन है। लेकिन ये मानव हमको पानी से अलग कर देता है। हम तड़पड़ाती रहती है कूदती रहती है। छटपटाती रहती हैं। लोग काट कर गरम तेल की कड़ाही मे डाल देते है और अपनी सेहत बढ़ानें का वैज्ञानिक कारण बनाते है। हे भगवन इसके विज्ञान और चिकित्सा की शैली ने सम्पूर्ण जीवों के जीवन को संकट में डाल दिया है। मै पॅूछती हॅू क्या कोई स्त्री-पुरुष अपने जीवन मे कुछ पल बिना हवा के रह सकता है। जो उसका जीवन है। उसी तरह मेरा भी जीवन पानी है। जैसा कष्ट उन्हे होता है वैसा हमें भी होता है। हम कैसे बताए कि हमें कितनी पीड़ा होती है। काश ये मानव हमारी पीड़ा को समझ सकते !''


    भगवान को अपनी अन्तिम कृति पर ग्लानि हो रही थी। सोचा क्यों दी उसने मनुष्य का विज्ञान की शक्ति। धर्म का ढकोसला उसने किस आधार पर बनाया है। जीवों को मारनें और खानें की कौन सी चिकित्सा प्रणाली बना ली है। भगवान ने क्रोध में आकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गॅुजा देने वाली आकाशवाणी में धरती के सम्पूर्ण मानव को चेतावनी दी -''जिस दिन धरती का अन्तिम जीव, आकाश का अंतिम पक्षी, जल की अंतिम मछली, और वसुन्धरा का अंतिम वृक्ष समाप्त हो जायेगा। उसी दिन तेरे विज्ञान, ज्ञान, धर्म, और तेरे झूठे मानव मन के द्वारा गढ़ी पुस्तकें और इस ब्रह्माण्ड की कोई शक्ति तुम्हारा अस्तित्व खत्म होने से नहीं बचा सकती। तेरे भगवान भी क्योंकि भगवान तो केवल मानव के द्वारा दिया गया एक नाम है। लेकिन वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। सभी जीवों में एक समान है। जब तक प्रकृति से तुम्हारा सामन्जस्य है तभी तक तुम्हारा जीवन धरती पर सुरक्षित है। अपनी झूठी और सुन्दर सी परिभाषाओं से बाहर निकलो। धर्म, मजहब, ईश्वर, अल्लाह, के बन्धनों को छोड़कर जीवों की पीड़ा को समझो यही ईश्वर का संदेश है। नहीं तो ये तुम्हारी परिभाषाएं कभी तुम्हारे खुद के खून को भी पानी के रूप में पी लेंगी। और एक सुन्दर सी परिभाषा का रूप ले लेंगी।

 


-उमेश मौर्य
सराय, भाईं, सुलतानपुर
उत्तर प्रदेश, भारत ।

2 blogger-facebook:

  1. अनामिका जी,
    अपनी अमूल्य टिप्पणी देने के लिए सादर आभार | अनामिका जी , लेखन से ये प्रयास करता हूँ की हम तर्कों से बाहर निकलकर, उनके लिए कुछ कर सके जो स्वयं अपने लिए कुछ नहीं कर सकते बोल सकते .... काश हम मौन की आवाज सुन सकते ...

    धन्यवाद,

    उत्तर देंहटाएं

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