बुधवार, 25 जून 2014

आकाश शर्मा पत्थर की दस कविताएँ

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माँ
बात बचपन की है जब मैं छोटा सा था,
बैग कंधे धरा और किताबें भरी ,
पहन कपडे नये माँ से कहने लगा।
"आज ऑफिस मैं जाऊंगा ओ मेरी माँ ,
शाम को लौट आऊंगा मैं काम से "
माँ की आँखों में थोड़ी चमक आ गयी,
और होंठों पे भीनी से मुस्कान भी।


माँ ने हस के कहा लल्ला ये तो बता,
आज संडे को ऑफिस में करना है क्या ।
मैंने बोला कि माँ मैं बहुत व्यस्त हूँ,
सोचता हूँ की पापा को आराम दूँ ।
मैंने अब तक बहुत कुछ है उनसे लिया,
वक़्त आया की मैं उनको उपहार दूँ ।
सुनके मुझको क्यों जाने वो रोने लगी,
आज पहले ही दिन कुछ तो गलती हुई ।
फिर गले से लगा के बड़े प्यार ,
बोली तुम हो स्वयं जैसे उपहार से ।
बेटे ज़िद्द ना करो बात मानो मेरी ,
एक दिन और दफ्तर की छुट्टी सही ।


बात मम्मी की सुन के मैं रोने लगा,
पूछ बैठा की माँ कब मैं हूँगा बड़ा ।
माँ ने सर मेरा आँचल से यूँ ढंक लिया,
सिमट आया हो आँचल में आकाश सा।
इतना आराम था उनके आँचल तले,
एक झपकी लगी औ हम दफ्फ़तर चले।
शाम को फिर से खुद में ही मैं खो गया,
सारी बातें थी, बातें हैं, बातों का क्य।


आज दूरी है इतनी जो मिटती नहीं ,
माँ है गुमसुम मगर कुछ भी कहती नहि।
रात दिन जिनके सपनों में मैं ही तो हूँ,
हैं पिता जिनकी आँखें भी बहती नहि।
बंन्द आँखों से भी सब नज़र आ रहा ,
आज फिर बैग ले कर मैं दफ्तर चला।
आज अम्मा की फिर है ज़रूरत मुझे,
आज फिर बैग ले कर मैं दफ्तर चला।
मन है भारी सा और जोश फ़ीका पड़ा ,
आज फिर बैग ले कर मैं दफ्तर चला।
मन ही मन मैं हूँ खुद को ही कोसे पड़ा ,
आज फिर बैग ले कर मैं दफ्तर चला।


कैसे कैसे सितम कर रही है हवा

कैसे कैसे सितम कर रही है हवा,
तेरी खुशबू सी छू कर गुज़र जाती है।
बाँध लो अपनी जुल्फों में तुम ये घटा,
ज़िन्दगी यूँ जवानी को समझाती है ।
कैसे कैसे सितम कर रही है हवा.....

ये हुआ क्या है मुझको खबर कुछ नहीं,
तेरे क़दमों के साये पे चलने लगा।
तुमसे मिलना बिछुड़ना न जाने है क्या,
इश्क़ की आग में मैं भी जलने लगा ।
कैसी गुमसुम सी खामोश सी ये फ़िज़ा,
शुष्क आहट भी ठिठुरन सी दे जाती है ।
कैसे कैसे सितम कर रही है हवा.....

यूँ तो सदियों की कोई तमन्ना न है ,
साथ पल भर का ही करदे मुझको अता ,
आओ फिर से वो लम्हें जियें इस तरह ,
जैसे यौवन बिखेरे कोई आइना ,
आओ ऐसे की ये फासले ना रहें ,
जैसे रिश्ता है बूंदों से बरसात का ।
कैसे कैसे सितम कर रही है हवा,
याद आती है आकर ठहर जाती है ।
कैसे कैसे सितम कर रही है हवा,
तेरी खुशबू सी छु कर गुज़र जाती है।

 

 

 


खिलौना

वही हुआ है जो अकसर ही होता आया है ,
दिया था दिल जिसे उसने ही दिल दुखाया है |
नया नहीं है ये मंजर मैं इसका आदि हूँ,
जो दर्द ना हो तो लगता है जैसे खाली हूँ|
जो चोट लगती है तो चीख भी निकलती है ,
है आग दिल की ये जलती है और सुलगती है |

जो जल के ख़ाक हुए उनको बहा आऊंगा ,
जो बच गए हैं उनको फिर से मैं सजाऊंगा |
कोई तो होगा कहीं जो अदब से आएगा ,
मुझसे खेलेगा और धीमे से मुस्कुराएगा।
कभी तो वो भी बड़ा होगा और वो सोचेगा ,
ये खिलौना है पुराना वो ऐसा बोलेगा |
किसी अलमारी के कोने में बैठ जाऊंगा ,
साल दर साल अकेला ही गुनगुनाउंगा |
इसी उम्मीद में की कोई फिर से आएगा ,
मुझसे बोलेगा वो और मुझको भी वो हंसाएगा |
आपने प्यारे से उन हाथों से मुझको थामेगा ,
हूँ मैं अच्छा ये कह के गले लगा लेगा |

यही है हाल यहाँ के सभी खिलौनों का ,
वही टिकता यहाँ जो है बसर डिठौने सा |
मुझसे खेलो मुझे फेंको या मुझसे प्यार करो ,
मुझको अपनाओ ठुकराओ तार तार करो |
सभी एहसास मैं शीशे छोड़ आया हूँ,
यकीं था मुझको तभी साथ तेरे आया हूँ |
मैं हूँ उस पल को निहारता जो ये भी हो जाये ,
जान तो हो मगर धड़कन ज़रा ठहर जाये|
बहुत हुआ अभी शायद ये मुझसे ना होगा ,
यहीं रूकूंग मैं बैठूंगा इस से पूछूंगा |
क्यों बार बार चोट खाने को तू आता है ,
तू बोलता क्यों नहीं क्यों अभी लजाता है |
ये हैं अन्धे इन्हें आवाज़ सुनाई देगी ,
क्यों तू बेबस से अपने अश्क दिखाता है |
नहीं नहीं ज़रा ठहरो क्या तलाशते हो नया ,
नया सा कुछ भी नहीं सब वही पुराना है ,
वही हुआ है जो अकसर ही होता आया है ,
दिया था दिल जिसे उसने ही दिल दुखाया है

 

 

काश

अब काश यहीं मैं सो जाऊं इक अच्छा सपना आ जाये,
और आँख खोलूं जीवन में धीरे से अँधेरा छा जाये ।
अब काश यहीं मैं सो जाऊं।

अब काश ये धड़कन रुक जाये ,
अब काश ये चिलमन बुझ जाये,
अब काश ये सूरज ना निकले,
अब काश ये सांसें रुक जाएं ,
अब काश मैं आँखें जब खोलूं ये अश्क की धारा रुक जाये।
अब काश यहीं मैं सो जाऊं।

अब काश ये प्याले खाली हों ,
अब काश ये रातें काली हों,
अब काश ये आँखें ना सोएं ,
अब काश ये लब कुछ ना बोलें,
अब काश कदम ना चल पाएं ,
अब काश ये लम्हा थम जाये,
अब काश ये आँखें जब खोलूं जीवन की कली मुरझा जाये ।
अब काश यहीं मैं सो जाऊं।

अब काश ये काश ही जीवन के,
सागर का मधुर किनारा हो,
हर इक रस्ते की मंजिल हो,
हर पथिक का यही सहारा हो,
ये सपना बस इक सपना हो,
बस काश ही काश हमारा हो,
बस काश ही काश हमारा हो,
अब काश यहीं मैं सो जाऊं।

अब मुझको कुछ करना होगा

अब मुझको कुछ करना होगा ,
हंसता हूँ बहुत रोना होगा ,
चंचलता से कुछ ना होगा ,
गम्भीर ज़रा रहना होगा ,
अब मुझको कुछ करना होगा ।

जब तक मैं हंसता रहता हूँ ,
तुम्हें अच्छा अच्छा कहता हूँ ,
तुम मेरी बातें सुनते हो ,
मुझको भी अच्छा कहते हो ,
अब मुझको सच कहना होगा ,
गम्भीर ज़रा रहना होगा,
अब मुझको कुछ करना होगा ।

तुम्हें होगा खुद पे लाख गुमाँ ,
हम भी उसके ही बंन्दे हैं ,
तुम होगी खुद से ताज महल,
आँखों से नहीं हम अंन्धे हैं ,
उपहास कभी ना किया मगर ,
अब आज मुझे लड़ना होगा ,
अब मुझको सच कहना होगा ,
गम्भीर ज़रा रहना होगा,
अब मुझको कुछ करना होगा।

सम्मान तुम्हारा करते हैं ,
ये सोच के लब बस नहीं खुले ,
अपमान कहीं ना हो जाये ,
था याद तभी मुंह रहे सीए ,
ना हूँ गांधी और हाथ भी हैं ,
अगला थप्पड़ मेरा होगा ,
मर्यादा याद जो ना होती ,
प्रहार बहुत गहरा होता ,
अब मुझको सच कहना होगा ,
गम्भीर ज़रा रहना होगा,
अब मुझको कुछ करना होगा।

मैं अर्जुन कृष्णा सरीखा हूँ ,
इस रण सारे दुश्मन हैं ,
जब तक टलता है युद्ध मगर ,
प्रयास सादा हम करते हैं ,
रण नीति भी यह कहती है ,
निसश्त्र पे तुम ना वार करो ,
गर बैरी खुद भूले नीति ,
कर आँखें बन्द प्रहार करो ,
सच है ये गीता सार नहीं ,
ये सार तम्हें गढ़ना होगा ,
अब मुझको कुछ करना होगा ,
गम्भीर ज़रा रहना होगा,
अब मुझको कुछ करना होगा।

 

 

 

डर

डर लगता है मुझको ऐसी सच्ची झूठी बातों से ,
डर लगता है मुझको उन कसमों से और उन वादों से ,
और डर लगता है मुझको उन् सपनों से महताब से हैं ,
डर लगता है मुझको उन् अपनों के जो बस नाम के हैं ,
डर लगता है कन्धे पर उस भारी भारी बस्ते से ,
औ डर लगता है मुझको उस प्यारी सी पावन थपकी से ,
क्यों बिसर रहा खुद से करी हर इक उन् चंन्चल बातों को,
क्यों सहम गया हूँ मन ही मन जीवन के इन आघातों से ,
और क्यों न जाने कोई हो कठोर अंदर ही अंदर खेल रहा ,
क्यों काल सरीखा ये त्रिशूल सपनों को मेरे भेद रहा ,
क्यों करुणा रुपी यह बदल बस विष ही विष बरसाता है ,
क्यों सावन में भी बन पतझर यह जीवन बहता ,
ना जाने क्यों लगता है लगता है डर अपने मन का कुछ करने में ,
डर लगता है ना जाने क्यों अच्छे को अच्छा कहने में ,
डर लगता है मुझको की मैं शायद खुद को खो दूंगा ,
इस पालक झपकती दुनिया में बन संजय अब मैं रो दूंगा ।
मैं शायद खुद को खो दूंगा ……।

 

 

 

 

 

मन मोहि चंचल काया

मन मोहि चंचल काया थी
मन लूटने को तैयार भी था
मंजुल मनोज़ उन् नयनन में
मुझको सारा संसार दिखा ।

कुछ शब्द गुलाबी हूंठों को ,
छू करके शराबी हो बैठे ।
तेरी तन सुगंन्ध चहुँ ओरे है यूँ ,
मौसम बरसाती हो जैसे ।
साँसों की महक जुल्फों की घटा ,
कोई शाम सुहानी हो जैसे।
हर शब्द तेरे उपमा ,
खुद में ही कहानी हो जैसे।
ऐ हुस्न तेरी तस्वीर में ही ,
रंगों का मुझे विस्तार दिखा ।
मंजुल मनोज़ उन् नयनन में
मुझको सारा संसार दिखा ।

मेरे हर पल में बातों में तुम ,
सपनों में हो और रातों में तुम।
तुम हो मन में सु-विचारों सी ,
खुशबू सी कोई हो बागों की।
तुम हो आँगन जो की ,
मन मंदिर को सुशोभित करता है ।
तुम वो मदिरा का प्याला हो ,
जिसे पा मैकश मतवाला हो।
प्रारम्भ भी हो और अंत भी तुम ,
तम्हें देख के मन उल्लसित हो।
जिसके भी जीवन में तुम हो,
फिर और उसे क्या ख्वाहिश हो।
फिर और उसे क्या ख्वाहिश हो ……।

 

 


कैसे कह दूँ की कुछ हुआ ही नहीं

कैसे कह दूँ की कुछ हुआ ही नहीं ,
सोचता हूँ क्यों ये हुआ यूँ ही।
शाम को नींद गुम थी आंखों से,
रात सपने सज़ा के सोया था।
भोर होते ही चाँद को देखा ,
बांहों में बांहें डाले सोया था ।

आज का दिन कहीं न ढल जाये ,
ठहर जा आसमान वाले ,
ज़रा सा थम जा रे।
आज की शाम के तसवुर में ,
मैं बेबस हूँ उनके पहलू में ।
मेरी नज़रें भी कर रही हैं बगावत मुझसे ,
साँस करती हो ज़िन्दगी से अदावत जैसे।
तेरी उम्मीद में न जाने क्यों सुकूँ सा है ,
इश्क बेताश् है मुझको या फिर जुनूँ सा है ।
कोई तो बात है मैं जिसको भूलता ही नहीं ,
अभी नहीं , अभी नहीं थोड़ा ठहर ज यहीं ।

अभी खुला नहीं है उसके दिल का दरवाज़ा ,
इश्क चढ़ने लगा है मुझपे और भी ज़्यादा ।
रंग गहरा रहा है सुर्ख़ तेरे होठों का ,
साँस मरहम बानी है आज दिल की चोटों का।
आज भर जाएंगे जखम सारे ,
आज टूटेंगे ये भरम सारे ।
आज सब कुछ भुला के आया हूँ ,
मुझको उड़ने दे इन में हवाओं में।
आज कलियाँ चुरा के लाया हूँ ,
बन के खुशबू बिखर फ़िज़ाओं में ।
सुन ले ऐ आसमान वाले थोड़ा रहम करदे ,
जो है मेरा उसे तू मेरे एहतराम करदे ।
ठहर जा आज की ये दिन न फिर से आयेगा....|
आज रूठा जो मुझसे वो संगदिल ,
यकीं है फिर न लौट पायेगा ।
ठहर जा आसमां तुझको कसम है तारों की ,
आज थम ज है बात दिल के चमन बहारों कि।
ठहर जा आसमां वाले ,
ज़रा सा थम ज रे…।


घड़ी

ये कैसी घड़ी बनायीं है,
मेरे मन को जो ना भायी है ।
बस चौबीस घंन्टे हैं इसमें ,
दिन लंम्बे रात ज़रा सी है ।
ये कैसी घड़ी बनायीं है,
मेरे मन को जो ना भायी है ।

बिस्तर पर सुइयां तेज़ चले,
दफ्फ़तर में काँटा जम जाये ।
बस राम राम जपता हूँ मैं ,
शायद ये लंगड़ा चल जाये ।
कुछ न कुछ है षडयंत्र छुपा ,
किसने ये अकल लड़ाई है ।
किसने ये घड़ी बनाई है ……
मेरे मन को जो ना भायी है ।

यह कैसा खेल खिलौना है।,
सब जिसके आगे बौना है ।
कुछ न कुछ तो बदलावा करो ,
बस मेरा बेडा पार करो ।
कोई ऐसी घड़ी बनाओ तुम ,
जो चलती हो तारे गिन गिन ।
जल्दी से अब ये कर डालो ,
बस इसमें ही चतुराई है ।
किसने ये घड़ी बनाई है ……
मेरे मन को जो ना भायी है ।

खुशियों के पल छोटे करदे ,
और गम में ये विस्तार करे ।
ये सच में अपनी दुश्मन है ,
कुछ भी हो ये चलती ही रहे ।
क्यों घड़ी घड़ी घड़ियाल घड़ी ,
है मगर मगर सच्चाई है ।
किसने ये घड़ी बनाई है ……
मेरे मन को जो ना भायी है ।

ये तीन सखा मिल आपस में पकड़म पकड़ाई खेल रहे ,
हस्ते गाते हर इक पलछिन मेरे मन आनंद को भेद रहे ।
इनकी इस भागा दौड़ी में क्यों मैंने जान फसायी है ,
किसने ये घड़ी बनाई है ……
मेरे मन को जो ना भायी है ।

ये सन्नाटों में शोर करे ,
टिक टिक से मुझको बोर करे।
ये मुर्गा बांग भी देती है ,
ये चिड़िया सरस चहकती है ।
इतना कुछ इसमें कर डाला ,
कांटे निकाल नम्बर डाला ।
दीवाल से उठ ये हाथ बँधी ,
जो थी दिक्कत वो वहीँ रही ।
अब भी दिन लम्बे के लम्बे ,
अब भी मेरे मेरी रातें छोटी हैं ।
जिसने ये घड़ी बनायी है,
उसकी भी पुश्तें रोती हैं ।

 

 

 


शर्मा यु कैन लीव फॉर दा डे

कितने सपने कितने अरमान ले कर हम तेरे दर पे खड़े
और आप ने ऐसे कैसे कह दिया
शर्मा यु कैन लीव फॉर दा डे ।

थकता चेहरा बोझल आँखें कुछ तुमको दीखता ही नहीं,
मेरी मेहनत मेरा पसीना सब झूठा बस तुम ही साही।
तुम हो भूत, पिसाच, निशाचर हम भी अपनी ज़िद्द पे अड़े,
और आप ने ऐसे कैसे कह दिया
शर्मा यु कैन लीव फॉर दा डे ।

कि अरमानों पे घात लगाये बैठे थे क्यूं मेरे तुम,
भीड़ बहुत थी साब अच्छे थे तुम मेरे हाय पेले क्यूं। .
हमसे भूल हुई हैं भैया अब हम तुम्हारे पैर पड़े,
और आप ने ऐसे कैसे कह दिया,
शर्मा यु कैन लीव फॉर दा डे ।

और आज जो शर्मा चल देगा फिर मुड़ कर कभी ना आएगा,
जितना तेरा कद है ये उसपे से नींव उठाएगा ।
दोष न देना अब मुझको मैं ये कदम बढ़ता हूँ ,
अरमानों की ख़ाक जोड़ सपनों को आज सजाता हूँ ।
अब ना कोई अश्क बहेगा और ना सपना टूटेगा ,
जिसने जिसका सपना लूटा ,
ये शर्मा उसको लूटेगा.......|
 

(चित्र – रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति)

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