रविवार, 8 जून 2014

राजीव आनंद का आलेख - स्मृति शेष : ज्योत्स्ना मिलन का जाना


    हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री व लेखिका ज्योत्स्ना मिलन का भोपाल में 3 मई को 73 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. उनका अनायास चले जाना हिन्दी साहित्य को अपूर्णीय क्षति कर गया. बंबई में 1941 को जन्मी ज्योत्सना मिलन कवयित्री के रूप में अपना साहित्यिक सफर शुरू किया था यद्यपि हिन्दी साहित्य में अपने उपन्यासों यथा 'अपने साथ', 'अ अस्तु का' और 'केशरमाँ' लिखकर खासी प्रसिद्धि बटोरी. इसके अतिरिक्त उन्होंने कविताएं एवं कहानियाँ यथा, 'बा', 'धड़ बिना चेहरे का', 'संभावित रूकमा.....' भी लिखी जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान है. उन्होंने बतौर संपादक स्त्री संगठन 'सेवा' की पत्रिका 'अनसूया' को अपना विशिष्ट योगदान दिया. इसके अतिरिक्त ज्योत्सना जी ने कई जाने-माने गुजराती लेखकों यथा, सुरेश जोशी, इला भट्ट, गुलाब मोहम्मद शेख, प्रियकांत मणियार की रचनाओं का हिन्दी में उत्कृष्ठ अनुवाद भी किया.


    ज्योत्स्ना मिलन जी स्त्री-पुरूष के लेखन में किसी फर्क को नहीं मानती थी. उनका विचार था कि लेखक लेखक पहले होता है स्त्री या पुरूष बाद में. किसी भी रचना का रचना की कसौटी पर रचना के तौर पर खरा उतरना जरूरी है, इस अर्थ में किसी भी लेखन को लेखन और किसी भी लेखक को लेखक होना चाहिए स्त्री या पुरूष नहीं.
सृजन के एक समग्र परिदृश्य को चाहने वाली ज्योत्स्ना जी खुद को स्त्रीवादी लेखिका कहलाना कभी पसंद नहीं किया. स्त्रीवादी होकर उन्होंने कभी कुछ नहीं लिखा, स्त्रियों के बारे में शुरू से उन्होंने सहज ही लिखा. स्त्री को प्रकृति का दर्जा देने वाली ज्योत्स्ना जी कहा करती थी कि सृजन स्त्री का स्वाभाविक धर्म है और उसका जीवन एक रचनारत जीवन है. लय-विलय यानी होना न होना सहज ही उसके स्व-भाव में शामिल है.


ज्योत्स्ना जी का मानना था कि इस चराचर सृष्टि में हर चीज की अपनी स्वायत्त दुनिया है और ये चीजें अपनी समूची सत्ता के साथ उनके लेखन में देखा जा सकता है. स्त्री-पुरूष के दो सत्ताओं का द्वन्द्व ज्योत्स्ना जी के लेखन में बहुत ही कलात्मक सधाव एवं गहराई से रूपायित हुआ है. स्त्री-पुरूष के जटिल संबंध के बीहड़ में उतरने वाली ज्योत्स्ना जी की कहानियाँ 'बा', 'धड़ बिना चेहरे का', और 'संभावित रूकमा....' में देखा जा सकता है. इन कहानियों को पढ़ने के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि एक लेखक के जीवन में वह चाहे जिसका भी तरफदार रहा हो पर लेखन में वही लोग जब चरित्र बन जाते है तो लेखक उस चरित्र का तरफदार लेखन में रहे ही यह जरूरी नहीं और तभी एक तटस्थ संवेदनशील लेखक ऐसे दमदार चरित्र खड़े कर पाता है जो सदा के लिए पाठक के भीतर बस जाते है. 'बा' कहानी में बापू की तरफदार समझी जाने वाली नातिन कहानी के अंत में अपने को 'बा' के पाले में खड़ा पाती है. 'बा' में ज्योत्स्ना जी 'बा' और 'बापू' के चरित्रों के बीच तटस्थ रहकर 'बा' और 'बापू' के चरित्रों को अपनी संपूर्ण सत्ता में खडा किया है जरा भी विचलित हुए. तटस्था की उपलब्धि ज्योत्स्ना जी के पाले में जाती है.


ज्योत्स्ना जी धीमी लेखन की पक्षधर रही. अपने दूसरे उपन्यास 'अ अस्तु का' के बाद 'केशरमाँ' नामक उपन्यास लगभग एक दशक बाद उन्होंने लिखा. उनका मानना था कि एक रचना चाहे वह कहानी हो, कविता या उपन्यास हो, को दूसरे से यथासंभव शिल्प, कथ्य, भाषा और स्वरूप हर दृष्टि से अधिक से अधिक अलग होना चाहिए. हर लेखक अपनी हर रचना के बाद दूसरी रचना में अपने को लांघना चाहता है और ज्योत्स्ना जी ने अपने पहले उपन्यास 'अपने साथ' जैसा लिखीं उससे बिल्कुल अलग शिल्प, कथ्य, भाषा और स्वरूप में दूसरा उपन्यास 'अ अस्तु का' लिखीं तथा इन दोनों उपन्यासों से भिन्न अपने तीसरे उपन्यास 'केशरमाँ' में ज्योत्स्ना जी को देखा जा सकता है. हर उपन्यास एक दूसरे से अलग कथ्य, शिल्प, भाषा और स्वरूप में लिखने की कसौटी में ज्योत्स्ना जी खरी उतरी है जो साहित्य में बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है.


निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव वेद के लेखन को पंसद करने वाली ज्योत्स्ना जी इन्हें हिन्दी कथा साहित्य के दो सिरे मानती थी क्योंकि दोनों ने हिन्दी भाषा को अपने लेखन में एकदम मौलिक ढ़ंग से बरता, हिन्दी भाषा की क्षमता को बढ़ाया, उसमें मौलिक विचलन पैदा किया. अपने लेखन के शुरूआती दौर में ज्योत्स्ना जी को निर्मल वर्मा उनके लिए एक जरूरी लेखक की तरह मिल गए थे. उन्हें निर्मल वर्मा कृत 'जलती झाड़ी' ने काफी प्रभावित किया था. ज्योत्स्ना जी के कृष्ण बलदेव वेद का उपन्यास 'बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां' को पढ़ने का अनुभव तब तक के उनके द्वारा कथा साहित्य को पढ़ने के अनुभव की चूलें हिलाकर रख दी थीं.


ज्योत्स्ना जी ने गद्य तो लिखा ही पर सच पूछा जाए तो उनका नाल संबंध कविता से ही रहा. लिखने की शुरूआत उन्होंने कविता से ही किया था जो अंत तक जारी रहा. अपनी एक कविता 'औरत' में उन्होंने लिखा, 'प्यार के क्षणों में / कभी कभी / ईश्वर की तरह लगता है मर्द औरत को / ईश्वर.....ईश्वर की पुकार से / दहकने लगता है उसका समूचा वजूद / अचानक कहता है मर्द / देखो मैं ईश्वर हूँ / और औरत देखती है उसे / और ईश्वर को खो देने की पीड़ा से बिलबिलाकर / फेर लेती है अपना मुँह '


पुरूष के ईश्रत्व के अहसास से गुजरने के सघनतम अनुभव से एकदम बाहर फिंका जाने की पीड़ा को महसूसते हुए लेखिका ने कविता में पाते पाते ईश्वर को खो देने की पीड़ा को कितनी सुंदर अभिव्यक्ति दी है. लेखिका स्त्री-पुरूष संबंध को सबसे कठिन और जटिल मानते हुए स्त्री-पुरूष संबंध को सबसे अधिक संभावनायुक्त संबंध माना है. उनका कहना था कि पुरूष का पुरूषत्व ऐसा लगता है कि उसकी शान हो, स्त्री का स्त्रीत्व उसका गुनाह या उसकी शर्म, जबकि देह तो पुरूष की भी उतनी ही देह है जितनी स्त्री की देह है. अपने स्त्रीत्व को सहज होकर जी सके ऐसी स्थिति क्या स्त्री को सुलभ है ? क्या स्त्री की उद्याम जीवन क्षमता ने, उसके सृजन आवेग ने पुरूष को इतना आक्रांत नहीं किया कि स्त्री के होने के इस आवेग को नियंत्रित करने कि प्रक्रिया का शिकार होने से वह अपने को नहीं बचा पाया ? क्या इसी आक्रांति के कारण पुरूष स्त्री को
घेरता और अपने को मुक्त करता नहीं चला गया ?


    ज्योत्स्ना जी का जाना हिन्दी साहित्य से एक विलक्षण रचनाकार का जाना है. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
   

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह ;झारखंड़द्ध 815301

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