सोमवार, 9 जून 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - पीठ के पीछे की सुनो…

पीठ के पीछे की सुनो .....

आजकल मुह पे लोग गलत कुछ नहीं बोलते |ढेर सारी चिकनी –चुपडी सुना के जाते हैं |क्या जी आपने तो खूब मेहनत की | लोग आप को समझ नहीं पाए जी |पिछली बार अच्छे से समझे थे |पता नहीं इस बार क्या कारण रहा ? आपको कुछ मालुम है क्या कारण रहे होंगे भला ....?

प्रकट में हारे हुओं के साथ हमदर्दी के यही शब्द जगह-जगह कहे जाते हैं |

परोक्ष में ,यानी पीठ के ठीक पीछे,....... कहते फिरते हैं ,खूब ताव आ गया था....... स्साले में ,आदमी को आदमी नहीं समझता था |

कुत्तों ,गुलामो की तरह बिहेव करता था |

हारना ही था |

अब भुगतो पांच साल को |

और पांच भी क्या ग्यारंटी कि वापस हो ले |

गए..... |

उधर प्रकट में ,नेता जी की मति फिरती है, इतने सारे लोग कह रहे हैं हमारी हार होनी नहीं थी ...?

फिर हुई तो हुई कैसे ....?

हार के कारणों के विश्लेषण के लिए अपने चमचों की कमेटी को काम सौंपते हैं |

देखो हार के बाद अब ज्यादा खर्च करने के मूड में तो हम हूँ नहीं ,मगर कारण जानने भी अहम जरुरी हैं |

तुम लोग अलग-अलग जगह जाओ और कारण तलाशो |देखे क्या निकलता है |

चमचे नेता जी से राशन-पानी,डीजल-पेट्रोल दुपहिया-चार पहिया का इन्तिजाम पाकर निकल पड़ते है|

आठ-दस दिनों की खोजबीन में इकट्ठे किये तथ्यों को वे एक के बाद एक सामने रखते हैं |

महराज ,मैं किशनपुरा इलाके में गया था,वहाँ से आप बीस हजार से पिछड़े थे |

जिस महाजन बनिया के घर में आपने पार्टी दफ्तर खोल रखा था ,दरअसल ,लोग उसके सख्त खिलाफ थे |वो डीजल में केरोसीन मिला के गाव में दुगने दाम में बेचता था |अनाज,कपडे रोजाना के सामान, सब खराब क्वालिटी का रखता मगर सबके दाम आसमान में चढाये रखता था,जिसे गरज हो वो ले नहीं तो पचास कोस दूर शहर को जाए |सामान वापस करने जाओ तो,दैय्या-मैया करके भगा देता था |किसानों को चौमासे में जो उधार दिए रहता था उसका सूद इतना चढा देता था कि लोग अपनी गिरवी रखी चीज वापस ही नहीं पा सकते थे |अब ऐसे दुष्ट के साथ आप अपना प्रचार करवाने निकलोगे तो जीतने की गुजाइश कहीं बचती है क्या ?

भैय्याजी ,हम उसी के बगल वाले गाँव की रिपोर्ट लाये हैं |वहाँ ये हुआ है कि,मंनरेगा में जिस ठेकेदार को आपने काम दिलवाया था वो पडौस के किसी दूसरे के गाव से कम दाम वाले कमीशन में अपने मजदूर भर लिए |अपने गाव के मतदाता मजदूरों को कहीं और मजदूरी करने को जाना पडता रहा और तो और वे मतदान के दिन तो दूर के दूसरे गाव में थे सो मत कहा दे पाते |लिहाजा आपको ७-८ हजार की चोट पहुची |

भय्या जी आपके लठैत के रंग –ढंग अच्छे नहीं थे |

· -काय बिलवा,खुल के बता न ...?अब वे भइय्या जी का उखाड लेंगे ....?

भईया जी,हमने पहले कही थी,लठैतों को शुरु से मत उतारो|आप मानते कहा हो ...? वे रोज दारु-मटन खा-पी मस्तियाय रहे|गाँव में लौंडिया छेड़ते रहे|आपकी, वो क्या कहते हैं ,साफ सुथरी इमेज को ‘सर्फ’ से धोने लायक भी न रख छोड़ा|

जानते हैं अगर ये लठैत नहीं होते तो आप ठेठवार- कुर्मियों के गाव से अकेले पच्चीस – तीस की लीड करते|

महाराज,जिसे आपने अपने पक्ष में ,पांच पेटी दे के बिठाया , वो मनराखन साहू ,बहुत कपटी आदमी निकला |विरोधियों से मिल कर दो-तीन लाख और बना लिया हरामी पिल्ले ने ..... |वो तो अच्छा हुआ कि न वो हमारे न विरोधी के पक्ष में काम किया|दारु पी के सोते रहा पूरे इलेक्शन भर |आप भी कहाँ –कहाँ फंस जाते हो ,समझ नहीं आता | वो पिल्ला बोलता है ,इलेक्शन के खम्भे हर साल क्यों नहीं गडाए जाते ...?मूतने में सहूलियत होती |

महराज ,आपने एक बात,पटरी पार वाले गाव की नोट की ?

आपने उधर शहर को जोडने वाले पुल बनवाए | रोड को मजबूती दी , सीमेंटीकरण करवाए,बुजुर्गो के लिए उद्यान,कन्याओं के लिए गल्स कालेज खुलवाए |उधर के लोग आपको जबरदस्त मानते हैं |आपको बेतहाशा सपोर्ट मिले हैं |केवल इसी एरिया में आपका परचम जी भर के लहराया है भाई जी |

काश ऐसे ही विकास के काम और जगह हुए होते ...?आपकी जीत निश्चित होती |

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

2 blogger-facebook:

  1. बहुत ही उम्दा व्यंग्य..पढके मजा आ गया..मूड एकदम फ्रेश हो गया..ढेरों बधाईयाँ.... प्रमोद यादव

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव11:33 am

    पीठ के पीछेकी सुनो एक अच्छा व्यंग है हारने वाले कारणों का पता तो लगते ही हैं ये सटीक है
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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