रविवार, 15 जून 2014

देवेन्द्र सुथार की बाल कहानियां

नम्रता का पाठ

तमिलनाडू के एक नगर मेँ असंख्य लोगोँ के साथ ही दो विलक्षण व्यक्ति निवास करते थे। एक अत्यन्त विनम्र,साधु प्रवत्ति के निर्धन सज्जन ळी तिरुवल्लपुर थे। इस सज्जन के विपरित गुणोँ वाला सम्पन्न व्यापारी काइस्ट वेटा देवदत्त हाथोँ से बना कपडा बेचकर ळी तिरुवल्लपुर जीवनयापन करता था। एक बार देवदत्त और उसके मित्र बात कर रहे थे । प्रसंग आ गया ळी तिरुवल्लपुर का और मित्र ने प्रशंसा करते हुए कहा- ळी तिरुवल्लपुर जैसा सज्जन व्यापारी मैँने कभी नहीँ देखा,अत्यन्त ही विनम्र है। वे बोले उनके चेहरे पर मैँने कभी क्रोध नहीँ देखा । देवदत्त बोला-तो यह कौन-सी बडी बात है। मैँ उन्हेँ क्रोधित कर सकता हूं। तब तुम देख तुम्हारी भी मनोकामना पूरी हो जायेगी इसके क्रोध को देखकर।

और एक दिन अपने मित्र सहित देवदत्त बाजार के उस स्थान पर पहुंच गया जहां तिरुवल्लपुर कपडा बेच रहा था। देवद्त्त ने एक चादर हाथ मेँ लेकर देखते हुए उसने दाम पूछे ,दो रुपये दाम सुनकर देवदत्त ने उस चादर को बीच से फाड़ दिया और फिर एक टुकडे का दाम पूछा। ळी तिरुवल्लपुर ने सहजता से उत्तर दिया - चार आने। देवदत्त ळी तिरुवल्लपुर का शांत स्वभाव और अति विनम्रता देखकर आवक रह गया। फिर भी वह हटी-दुष्ट अहंकारवश बोला - मॅँ इन टुकडोँ का क्या करुंगा बेकार है ये। मेरे लिये ळी तिरुवल्लपुर ने कहा-आपने सही कहा आपके लिए ये वास्तव मेँ अनुपयोगी है। देवदत्त ने फिर पांसा फेँका- ठीक है ये टुकडे मुझे दे दो,लो ये इस चादर का मूल्य दो रुपये। परम संत तिरुवल्लपुर ने अत्यन्त विनम्रता से उत्तर दिया-नहीँ इन बेकार टुकडोँ का मूल्य मैँ कैसे स्वीकार करुँ। ये टुकडेँ निक्ष्क्षित ही आपके लिए बेकार है। आपके किसी काम नहीँ आएंगे। यदि मैँ उन टुकडोँ का मूल्य स्वीकार करुँ तो आपके अहंकार मेँ कोई कमी नहीँ आयेगी पर मैँ इन टुकडोँ को सी कर स्वयं ही प्रयोग मेँ लूंगा। इस प्रकार इस चादर की उपयोगिता भी बनी रहेगी और मेरी क्षतिपूर्ति भी हो जायेगी। देवदत्त की सारी दुष्टता,अहंकार पानी के बुलबुले की भांति नष्ट हो गया और वह ळी तिरुवल्लपुर के चरणोँ मेँ गिरकर क्षमा याचना करने लगा।

 

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रिश्ते की मजबूती

 

यह संयोग ही था कि प्रसिद्ध वकील शंकरलाल की तीनोँ छोटी बहनोँ की पुत्रियोँ की शादी कुछ-कुछ दिनोँ के अंतराल मेँ होनी थी।

उनकी एक बहन पास के कस्बे के शिक्षक की पत्नी थी। वहां भांजी की शादी मेँ शामिल होने के सवाल पर हां-ना,हां-ना करते शंकरलाल आखिरकार फैरोँ के दौरान पहुंचे और भांजी को डेढ तोले चांदी की पायल भेँट मेँ दी।

दूसरी बहन कुछ दूर के शहर मेँ प्रोफेसर से ब्याही गई थी। वहां भांजी की शादी के लिए शंकरलाल ऐन शादी के दिन पहुंचे और उसे तीन तोले चांदी की पायल भेँट में दी।

तीसरी बहन काफी दूर के शहर के उद्योगपति-राजनीतिज्ञ की पत्नी थी। उसके यहां शंकरलाल एक दिन पहले ही पहुंच गए और तीन ग्राम सोने की दिन पहले ही पहुंच गए और तीन ग्राम सोने की अंगूठी भांजी को भेँट मेँ दी।

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बाल कथा

पेडोँ को बचाओ

सर्दियोँ का मौसम था। ठंड अपने घरोँ मेँ छिप गए थे। मनुष्य भी घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीँ जुटा पा रहे थे। ऐसी सर्दी कई सालोँ से नहीँ पडी थी। सूरज तक जैसे सर्दी से डरकर किसी कोने मेँ जा छुपा था। सुनसान सी एक घाटी मेँ ऐसे ही एक दिन एक उडन तश्तरी आसमान से धीरे-धीरे नीचे उतरी। दूर से लग रहा था जैसे कोई जहाज जमीन पर आ रहा हो,किन्तु यह एक उडान तश्तरी ही थी। इस उडन तश्तरी से सांय सांय की आवाजोँ के साथ किसी दूसरी दुनिया से आया मेहमान धरती पर उतरा। हुन-हुन हुआँ नाम के इस एलियन ने धरती को पहली बार देखा था।

वह हैरान होकर चारोँ ओर देख रहा था। हरी-भरी यह घाटी देखकर एलियन चौँक गया। उसने पहले कभी पेड नहीँ देखे थे। एलियन ने अपना ज्ञान गुरु सिस्टम निकाला और उसका बटन दबाया। क्षण भर मेँ ही ज्ञान की तमाम बातेँ उस एलियन को दिखाने लगी,किन्तु तब भी वह पेड के बारे मेँ जानकारी नहीँ पा सका। तब उसने अपनी भाषा मेँ ज्ञान प्राप्ति बटन दबाया और पेडोँ के पास जाकर बोला-"तुम कौन हो?" "हम पेड हैँ"एक पेड ने उत्तर दिया।"लोग हमेँ वृक्ष,तरु,विटप आदि भी कहते हैँ।""तुम कहाँ-कहाँ मिलते हो? मैँने तुम्हेँ पहले कभी नहीँ देखा।"हुन हुन हुआ ने पूछा।

"हम बस पृथ्वी पर ही मिलते हैँ। हमारे कारण ही यह धरती हरी भरी है। हम ही पृथ्वीवासियोँ के जीवन का कारण हैँ। पर यह मूर्ख प्राणी तब भी हमेँ नष्ट कर रहे हैँ।" पेड बोले। हुन हुन हुआ ने हैरान होकर कहा-"पर वे ऐसा क्योँ करते हैँ और तुम उन्हेँ जीवन कैसे देते हो?"

पेड बोले-"हम धरती पर भगवान का रुप हैँ। हमेँ मनुष्य को आँक्सीजन गैस देते हैँ जिससे वे सांस ले पाते हैँ। हम उन्हेँ फल फूल खाने को देते हैँ। तेज धूप से छाया प्रदान करते हैँ। बीमारियोँ मेँ दवाएँ भी हमसे बनती हैँ।"

हुन हुन हुआ पेडोँ की बातेँ सुनकर बहुत खुश हुआ और बोला"जब तक पेड धरती पर हैँ कोई एलियन धरती का कुछ नहीँ बिगाड सकता। धन्य हो तुम।"यह कह कर एलियन धरती से वापिस चला गया।

 

(राष्ट्रदूत साप्ताहिक बाल मंडल में प्रकाशित)

 

देवेन्द्र सुथार s/o इन्द्रमल सुथार

आतमणावास गाँधी चौक बागरा जिला -जालोर (राजस्थान) 343025

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