बुधवार, 25 जून 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - गुणवत्ता शिक्षा के लिए व्यवस्था परिवर्तन जरूरी नित नये प्रयोगों ने पहुँचाया लचर स्थिति में

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    अब नवीन शिक्षा सत्र् 2014-15 शुरू हो चुका है। यही कारण है कि प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षा को पटरी पर लाने की कवायद शुरू कर दी है। यह स्पष्ट है कि अब तक की सरकारों ने यह तो स्वीकार किया है कि देश और प्रदेश के शिक्षा की व्यवस्था संतोषजनक नही है। प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक शालाओं में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए पिछले लगभग डेढ़ माह से जिलाध्यक्षों के माध्यम से बैठक लेते हुए चिन्तन किया जा रहा है। हर बैठक में युक्ति युक्तकरण की बात की जाती है। यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि राज्य मे शिक्षको की कमी नही है। बावजूद इसके शिक्षकों की पदस्थापना में लापरवाही स्पष्ट नजर आ रही है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों एवं विद्यार्थियो के बीच का अनुपात 1:20 होना चाहिए, किन्तु वह कहीं 1:13, 1:15 पाया जा रहा है, तो कहीं शिक्षकों की भारी कमी दिखायी पड़ रही है। बनाये गये नियमों के अनुसार निःशुल्क शिक्षा के अधिक पद रिक्त नही होने चाहिए । वस्तुस्थिति यह है कि अधिकता वाली शालाओं में भी शिक्षक नियमित उपस्थिति दर्ज नही करा रहे हैं, कमी वाले क्षेत्रों की तो दुर्दशा का बखान करना ही गलत होगा।


    शिक्षकों के युक्ति युक्तकरण के लिए मई 2014 तक आवश्यक कार्यवाही पूर्ण कर लेने की बात योजना में की गयी है। चिन्तनीय यह है कि कमी वाली शालाओं में शिक्षकों का पदांकन राजनीतिक पहुँच रखने वालों के चलते कैसे पूरी हो पायेगी? सचिव छत्तीसगढ़ शासन, स्कूल शिक्षा विभाग की मंशा के अनुसार अतिशेष शिक्षको कोनिकटतम विकास खण्ड पर युक्ति युक्तकरण करते हुए केवल जिला स्तरीय समिति द्वारा विचार किया जाना प्रावधानित किया गया है। कठिनाई का दौर यहीं से जन्म लेता है और वह शिक्षक अथवा शिक्षाकर्मी अपना नाम हटाने जोर मारने लगता है जिसे मालूम है कि उसे अन्यत्र भेजा जा सकता है। ऐसी स्थिति में जिला स्तरीय समिति के सदस्य भाई-भतिजा वाद से नही उठ पा रहे हैं। एक नियम के अनुसार युक्ति युक्तकरण में पदस्थापना हेतु विकलाँग और महिलाओं को प्राथमिकता की बात भी कही गयी है जो वास्तव में छलावा मात्र है। न तो महिलाओं के साथ न्याय किया जा रहा है और न ही विकलांगो को सुविधा दी जा रही है।

देखा जाये तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक तथा तकनीकी शिक्षा से लेकर व्यवसायिक शिक्षा तक अभूतपूर्व क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। साथ ही शिक्षा का क्षेत्र व्यापक होने के साथ-साथ बहुआयामी भी हो गया है।


    देश की शिक्षा व्यवस्था को सुचारू करने अनेक प्रयास गंभीरता के साथ किये जा रहे हैं। इतिहास उठाकर देखें तों वर्ष 1976 तक शिक्षा संविधान की राज्य सूची में सम्मिलित थी अर्थात् शिक्षा के संबंध में राज्य सरकारें ही कानून बनाने के लिए सक्षम थी, किन्तु इसी वर्ष संविधान में संशोधन करते हुए (42 वाँ संशोधन) शिक्षा को समवर्त्ती सूची में डाल दिया गया। अब केन्द्र तथा राज्य सरकारें दोनो ही कानून बना सकती हैं, परंतु यदि केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये गये कानूनों में अन्तर होता है तो केन्द्र का कानून वैध माना जाता है। जहाँ तक मैं समझता हूँ इसी व्यवस्था ने शिक्षा तंत्र को उलझाकर रख दिया है। राज्य सरकार अपने सेटअप के अनुसार व्यवस्था बनाती है और केन्द्र सरकार अपने संसाधनों के आधार पर। जहां तक हो सकें राज्य और केन्द्र की साझा बैठक में शिक्षा का ढाँचा तैयार किया जाये ताकि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के अनुसार प्रधान पाठक से लेकर विषय शिक्षकों का पदांकन छात्रों की संख्या के आधार पर हो सके, जो नही हो पा रहा है। कठिनाई किस स्तर पर आ रही है इसका मुल्यांकन जरूरी है। यह तो स्पष्ट है कि सरकार जरूरत से ज्यादा राशि खर्च कर रही है, किन्तु कहीं न कहीं नेताओं का हस्तक्षेप, क्रियान्वयन में आड़े आ रहा है। यदि किसी शाला में अतिशेष शिक्षक पाये जा रहे है तो नियमों का हवाला देते हुए उन्हें अन्यत्र भेजने पर मंत्रालय से लेकर जिला शिक्षा विभाग तक किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करते हुए युक्ति युक्तकरण करें तो शिक्षा की स्थिति में गुणात्मक सुधार आसानी से लाया जा सकता है। पति-पत्नी का युक्ति युक्तकरण जहाँ तक सम्भव हो सके  एक ही स्थान पर करने की बात भी की जा रही है, जो कहीं दिखायी नही पड़ रही ऐसे दम्पत्ति शिक्षा विभाग के चक्कर काटते थक रहे है।


    हिन्दुस्तान में शिक्षा की मशाल को रोशन रखने के लिए प्रशासन स्तर पर हर किश्म की कोशिशे की जाती रही है। शिक्षा को गुणवत्ता के दायरे में बनाये रखन के एक नही अनेक शिक्षा शास्त्रीयों की अध्यक्षता में कमेटियों का गठन भी किया गया। विडम्बना यह है कि किसी भी शिक्षा कमेटी की सिफारिशों को पूर्णतः लागू करने से पूर्व ही बदल दिया गया अथवा उसके  स्वरूप में परिवर्तन कर नयी-नयी सोच को स्थान दे दिया गया। कहने का तात्पर्य यह कि हमारे देश की सरकारों ने शुरू से ही शिक्षा के क्षेत्र को प्रयोगों का पिटारा बनाकर रख दिया है। वास्तव में देखा जाये तो भारत वर्ष में शिक्षा का ढँाचा भूल-भुलैया में उलझा हुआ हैं। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र मे किये जाने वाले सरकारी  प्रयास न सिर्फ नाकाफी हैं, बल्कि नीतियों के स्तर पर भी अंतर्विरोधों से भरे पड़े हैं। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के महँगे स्कू लों ने अच्छी शिक्षा को एक छोटे से वर्ग का विशेषाधिकार बना डाला है। परिणाम के रूप में हम पा रहे हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में बराबरी लाने की तमाम-कोशिशें शिक्षा में विषमता बढ़ाने का सबसे बड़ा औजार बन कर रह गयी हैं।


    सच तो यह है कि लार्ड-मैकाले द्वारा हमें सौंपी गयी शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव हमें इस कदर जकड़े हुए हैं कि हम विद्या से दूर होते जा रहे हैं और उस शिक्षा के गुणगान में लगे हैं जो सिर्फ किताबी कीड़ों की फ ौज तैयार कर रही है। इन सारी स्थितियों को देखकर लगता है कि कुटिल अंग्रेज लार्ड-मैकाले अपने मन्तव्य में आज भी कई गुना कामयाब है। लार्ड-मैकाले ने एक सोची समझी साजिश के तहत एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का लबादा हमें उढ़ाया जो हमारी सनातन परंपरा पर कफन तो साबित हुआ ही साथ ही अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया। मैकाले द्वारा प्रद्त शिक्षा पद्धति और स्कूली पाठ्यक्रम ने जिस शिक्षा की नींव रखी, हम उसे ही विद्या समझने की भूल कर बैठे । अब जब हम पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं है, तब भी हम प्रतिवर्ष नवीन सत्र प्रारंभ होने से पूर्व नये प्रयोगों को जन्म देते आ रहे हैं। हमारे शिक्षा शास्त्री और सरकार में बैठे शिक्षा विभाग के मंत्री या तो खुद शिक्षा की महत्ता समझ पाने में असमर्थ होते हैं या फिर कमेटी का गठन कर उनके सुझावों की बैशाखी पर शिक्षा तंत्र को एक और साल के लिए प्रायोगिक तौर पर सभी जिला शिक्षा अधिकारियों पर लाद देते है।


    शिक्षा व्यवस्था पर जमी स्याह परत बड़ी आसानी से उजली की जा सकती है बशर्ते कि इच्छा शक्ति प्रबल की जाये। मात्र आयोगों और समितियों के गठन और उनसे सुझाव प्राप्त कर लेने भर से शिक्षा जगत की समस्याओं को समाप्त नही किया सकता है न ही शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिवर्ष नाम मात्र का बजट बढ़ा देने से इसमें व्याप्त बुराइयों और कठिनाइयों का सुक्ष्मता से अध्ययन कर दीर्घकालीन नियोजन, राजनैतिक, प्रशासकीय दृढ़ इच्छाशक्ति, जन सहयोग और जन कल्याण की भावना से सभी संबंधित व्यक्तियों द्वारा अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना पर्याप्त होगा। अतः समुचित वातावरण बनाने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। इस संबंध में कुछ सुझाव इस प्रकार हो सकते हैं -


1.     शिक्षा विभाग के अंतर्गत किसी भी शाला में पदस्थ शिक्षक अथवा किसी अन्य कर्मचारी को सांसद, विधायक अथवा मंत्री स्तरीय व्यक्ति का सचिव न बनाया जाये ताकि शाला कार्य सुचारू रूप से चल सके  ।


2.     जिला शिक्षा विभाग और अधिकारी के साथ चाटुकारिता कर शाला कर्तव्य से बचने वाले शिक्षकों को उनका कर्त्तव्य याद दिलाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी अच्छी पहल कर सकते हैं।


3.    शिक्षकों की कमी वाली शालाओं से भी शिक्षकों को अधिगृहित करते हुए शिक्षा के अतिरिक्त काम कराने की प्रवृत्ति भी समाप्त की जानी चाहिए।


4.    जनसंख्या गणना से लेकर, विकलांगों की गणना, पशुगणना, चुनावों के दौरान वोटर लिस्ट की पूर्णता में शिक्षकों का संलग्निकरण न करते हुए कुछ ऐसी व्यवस्था बनायी जाये कि बेरोजगारों को अवसर प्रदान कर दो पक्षीय लाभ लिया जा सके ।


5.    शिक्षकों पर कड़ाई अथवा नियम थोपने से पूर्व विकासखण्ड शिक्षा अधिकारियों को नियमितता पूर्ण  निरीक्षण हेतु दिशा-निर्देशित किया जाना भी उचित हो सकता है।


    शिक्षा में गुणवत्ता लाने की बात करने वाले छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के कर्णधारों को गंभीरता पूर्वक सोचना होगा कि कक्षा आठवीं तक परीक्षा की औपचारिकता द्वारा फेल न करने का नियम कितना उचित और कारगर है। शिक्षा की गुणवत्ता तो दूर उसे अपाहिज बनाने वाले नियमों के तहत अब कक्षा दसवीं और बारहवीं बोर्ड में अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों को पत्राचार की तरह चार मौके देना कौन सी गुणवत्ता की ओर शिक्षा तंत्र को ले जायेगा, इस पर भी विचार जरूरी है। एक और परिवर्तन द्वारा नवीन शिक्षा सत्र से एक पाली में लगने वाली शासकीय शालाओं का समय सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक करने के पीछे कौन सी सोच काम कर रही है, यह भी समझ से परे है। कारण यह कि न तो बच्चे को सुबह 9 बजे गरम भोजन मिल सकता है और न वापस लौटने पर 3 बजे ही। इसे हम महज एक नया प्रयोग ही कह सकते हैं, जो आने वाले समय में निश्चित रूप से बदलाव की माँग करता दिखायी पड़ सकता है।    

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