सोमवार, 16 जून 2014

पुस्तक समीक्षा - प्रभावी तुम्हारी तपोसाधना

प्रभावी तुम्हारी तपोसाधना: अमृतोत्सव रचना ग्रंथ
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                                          -- मनोज 'आजिज़'

जमशेदपुर शहर पूरे झारखण्ड में अपनी साहित्यिक गतिविधियों के चलते जाना जाता है और कुछ मायने में तो राष्ट्रीय अपील भी कायम कर सका है । इस शहर को कई स्वनामधन्य साहित्यकारों ने ख्याति दिलायी है और उनमे से सर्वाधिक लोकप्रिय एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं डॉ बच्चन पाठक 'सलिल' । ३१ मई को सिंहभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन/ तुलसी भवन के तत्वावधान में इनका अमृत महोत्सव आयोजित हुआ था जिसमे साहित्य की विभिन्न विधाओं, विभिन्न वादों और पीढ़ियों के प्रतिनिधियों ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया था । प्रभावी तुम्हारी तपोसाधना, इसी अवसर पर डॉ सलिल के अभिनन्दन स्वरुप प्रकाशित अभिनन्दन ग्रंथ है जिसमे ६८ छोटी-बड़ी रचनाएँ संकलित हैं । इसका सफल संपादन तुलसी भवन के मानद महासचिव और साहित्यकार डॉ नर्मदेश्वर पाण्डेय ने किया है । इस पुनीत परंपरा को स्थापित करने के लिए डॉ पाण्डेय एवं तुलसी भवन साधुवाद के पात्र हैं । ग्रन्थ में कई संस्मरण, कवितायेँ और लेख हैं जिन्हें पढ़ने से डॉ सलिल के व्यक्तित्व और कृतित्व का एक आभास हो जाता है । डॉ सलिल राष्ट्रभाषा हिंदी और उनकी मातृभाषा भोजपुरी दोनों की ईमानदार सेवा की है । उनका साहित्यिक योगदान निश्चित रूप से सराहनीय और उत्प्रेरक है । उक्त ग्रन्थ के आलेखों से यह स्पष्ट होता है कि डॉ सलिल हमेशा से नए लोगों को प्रोत्साहित करते आये हैं । गजेन्द्र वर्मा 'मोहन' जी लिखते हैं-- "पिछले एक दशक की निकटता से मैंने पाया कि सलिल जी ने स्वयं साहित्य-साधना करते हुए कई नव-लेखकों को साहित्यकार बना दिया । वे अदभुत प्रेरणा स्रोत हैं ।"

ग्रन्थ में संकलित प्रमुख रचनाकार हैं--दिनेश्वर प्रसाद सिंह 'दिनेश', डॉ मनोहर लाल गोयल, मंजू ठाकुर, नन्द कुमार सिंह 'उन्मन', यमुना तिवारी, श्रीराम पाण्डेय 'भार्गव', डॉ त्रिभुवन ओझा, श्यामल सुमन, डॉ रागिनी भूषण, हरे राम राय 'हंस', डॉ श्याम लाल पाण्डेय, पद्मा मिश्रा, डॉ स्नेहलता सिन्हा, उमेश चतुर्वेदी, गजेन्द्र वर्मा 'मोहन', डॉ त्रिपुरा झा, शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल', कल्याणी कबीर, मनोज 'आजिज़, वरुण प्रभात, डॉ आसिफ रोहतासवी इत्यादि । ये सभी रचनाकार विभिन्न क्षेत्रों के हैं । कोई प्राध्यापक है, कोई चिकित्सक, कोई सेवा निवृत्त प्रबंधक और कोई विशुद्ध साहित्यकार । रचनाकारों की साहित्यिक और वैचारिक प्रतिवद्धता में भी विविधता है और उम्र के मायने से भी यह कहा जा सकता है कि हर उम्र के साहित्यकारों ने अपनी अभिव्यक्ति दर्ज़ करायी है जिससे यह प्रतीत होता है कि डॉ सलिल सभी उम्र-वर्ग में सम्मानित हैं और उन्होंने अपने जीवन में पीढ़ियों के बीच सेतु का काम किया है । इन लोगों की रचनाएँ पढ़ने से डॉ सलिल के व्यक्तित्व और कृतित्व की झाँकी प्राप्त हो जाती है । देश और विदेश में दिए गए उनके भाषणों का जहाँ वर्णन है वहीँ उनकी कुछ पुस्तकों की हल्की समीक्षा भी है । डॉ रागिनी भूषण अपनी कविता के  माध्यम से डॉ सलिल के प्रति श्रद्धा ज्ञापन की है और उनकी कुछ पंक्तियाँ हैं--

बसन्ती लेखन को रंग, सुगन्धों की मसि भर कर
बहारों पर बहारें, आप लिखते जा रहे जीभर ।
चहकती बुलबुलें स्वरों की व्यञ्जनाओं  में
सजाते आशु गीतों को हृदय की रञ्जनाओं में ।

प्राध्यापिका व शायरा डॉ रिज़वाना परवीन इरम अपनी कविता में लिखती हैं--

सरस-सलिल भाषा के ज्ञानी
अमृत-उत्सव के सम्मानी
ज्ञान के सागर हैं पाठक जी
मधुर-मधुर सी इनकी वाणी ।

उनके अत्यंत निकट रही एवं पुत्रीवत स्नेह-सम्मान पाने वाली कवयित्री पद्मा मिश्रा डॉ सलिल की कविताओं पर गहन अध्येता के रूप में लिखतीं हैं-- "उनकी कविताओं की बेबाक चौंकाने वाली अभिव्यक्तियाँ, कहीं भावना के प्रवाह में रुलाती हैं तो कहीं गुदगुदाती, हँसाती हैं और फिर कहीं गंभीर चिंतन के लिए विवश कर देती है ,नारी विमर्शों में लिखी गई कवितायेँ मन को छू जाती हैं ---नारी भी एक नदी है ,,,,,,,।"

शायर शैलेन्द्र पाण्डेय 'शैल' अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं-- "गुरूजी के साथ बैठकर कभी भी ऐसा नहीं लगता कि हम साहित्य पटल के इतने बड़े हस्ताक्षर के साथ बैठ हैं । उनकी निश्छल हँसी, बात करने का बेलौस एवं चुटीला अंदाज तथा भारी से भारी विषय को सरल एवं सुग्राह्य भाषा में रख जाना, इत्यादि कुछ ऐसे गुण हैं जिनसे सामने वाला अभिभूत होता रहता है ।"

डॉ सलिल के स्नेह और सान्निध्य की निकटता ने मुझे भी साहित्यिक गौरव प्रदान किया है -उनका पितृवत स्नेह और साहित्यिक चर्चाओं ने उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को जानने का अवसर दिया है,साहित्यिक प्रेरणाओं और जीवन-आदर्शों के के लिए उनका आभारी हूँ --
यह एक रोचक बात है कि विभिन्न वादों के साहित्यकारों ने बिना किसी प्रतिवद्धता की सीमा में रहे उनके अपनत्व की चर्चा की है और कई अनछुए प्रसंग आए हैं । आज साहित्य में इस प्रकार के अजातशत्रु व्यक्तित्व का मिलना दुर्लभ हो रहा है । ऐसी अवस्था में यह पुस्तक नए साहित्यकारों को एक नया जीवन-दर्शन देगी, इसमें संदेह नहीं है ।

समीक्ष्य पुस्तक -- प्रभावी तुम्हारी तपोसाधना
समीक्षक -- मनोज 'आजिज़'
प्रकाशक- सिंघभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन/ तुलसी भवन, जमशेदपुर
संपादक-- डॉ नर्मदेश्वर पाण्डेय

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