शनिवार, 7 जून 2014

सौराज सिंह का व्यंग्य - मैं व्यंग्यकार हूँ।

कृपया निम्न लेख को पढ़ते समय ध्यान रखें कि यह एक व्यंग्य है।

 

अब कलम उठाऊँ तो किस मुद्दे पर अनेक मुद्दों की बहार है । मेरी मानो तो बाबा सब तमाशेबाज है जनता बहुत अच्छी है। लोग बहुत अच्छे हैं। नेता सब नालायक हैं। जनता ज़मीन से पैदा होती हैं। नेता आसमान से टपकते हैं न जाने कब अच्छे नेताओं की बारिश होगी। ऐसा नहीं कि नेता सब बुरे हैं, कुछ अच्छे भी हैं एक ने तो अभी मेरी क़िताब छपवाने में मदद की। एक ने उसका विमोचन किया। तीसरे ने अभी एक खाली पड़ी जमीन पर मेरा कब्जा कर दिया है। लगभग मुफ्त का। चौथे के मेरे घर आते-जाते रहने से पड़ोसियों में मेरी छवि भी ख़ासी दमदार बनी हुई हैं। राशन-गैस भी घर बैठे आ जाते हैं । अब इन्ही सफ़ेदपोशों की वजह से मेरी पुलिस ,प्रशासन से लेकर हर महकमें में इज्जत -आबरु हैं। अब क्या करूँ। अब एक सामान्य नागरिक को इससे ज्यादा और क्या चाहिए जो इतनी उम्र में मुझे साहित्य से हासिल हो गया।

आज से कुछ साल पहले जब मेरे सिर पर व्यंग्यकार बनने का भूत सवार हुआ, तो मुझे घर पर बहुत समझाया गया। “मान जा बेटा”, नहीं तो किसी दिन तुम्हारा ये सिर किसी नेता के यहाँ संग्राहलय में दिखने को मिलेगा, लेकिन मैंने इस डर को सपना समझकर भुला दिया और देखते ही देखते मैं व्यंग्यकार बन गया। मेरे इस जन्मदिवस पर एक पार्टी की भी योजना भी वही लोग बना रहे हैं। खैर जो भी दुनियादारी भी तो कोई चीज़ है। 'एडजस्ट' तो करना ही पड़ता है न। आजकल कुछ लोग कहने लगे हैं कि जैसा समाज होता है वैसा ही उसका नेता होता है। लगता है इन लोगों ने अपने खाने-पीने रहने का 'फुलप्रूफ' जुगाड़ कर लिया है, लेकिन मेरे सामने तो सारी ज़िंदगी पड़ी है। अपना 'कैरियर' भी तो सँवारना है। मैं ऐसी बातें खुलकर कैसे कह सकता हूँ। मुझे अपनी ऐश की जिन्दगी में वो हश्र नही करवाना जो आप सब जानते हैं।

मैंने ऐसा भी सुना है कि लोग तो प्रकाशकों और व्यंग्यकारों की भी बुराई करते हैं, और ये कहते हैं कि आजकल के व्यंग्यकार चापलूस और कामचलाऊ मात्र रह गये हैं इसलिए लोगो में पढ़ने की रुचि नहीं है लेकिन ये भी गलत है क्योंकि मेरे नये व्यंग्य ” कुँवारी लड़की” और "एक हसीना - सात दीवाने" को छापने के लिए कई प्रकाशक अभी से दरवाज़ा पीट रहे हैं। कुछ पाठकों के तो प्रशंसा फोन भी अभी से आ गए हैं।

अगर मेरी बात की जाए तो मैं एक उद्योग हूँ। व्यंग्य एक उत्पाद है। पाठक एक ग्राहक है। कुछ अन्तराल पर आपको नया व्यंग्य सप्लाई करना होता है। बड़ा ही मेहनत का काम है। अगर मसाला चटक नहीं है तो पाठ्क शायद ही लिंक पर क्लिक करें प्रतिक्रिया तो दूर की बात है लाइक भी न दें। वैसे बहुत कम ही ऐसा होता है। मेरे मायने से आज व्यंग्य भी नई -नवेली दुल्हन की तरह है । अगर उसकी लेखन या बनावट् में कुछ भी फ़िट या एड्जस्ट नही है अर्थात कुछ नया नहीं है । तो नकार ही दिया जायेगा। लेकिन पाठक खुलेआम प्रतिक्रिया न दे पायें लेकिन आंतरिक तो जरुर देंगे ।

4 blogger-facebook:

  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव2:30 pm

    किस तरह की टिप्पणी की आपको दरकार
    है यह भी लिखते तो अच्छा होता वैसे इसमें
    हसीं तो दूर चेहरे पर मुस्कराहट तक नहीं
    आई अब इसे रचना का कसूर मानू या मेरा
    व्यंग तो यह नहीं ही लगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव2:31 pm

    किस तरह की टिप्पणी की आपको दरकार
    है यह भी लिखते तो अच्छा होता वैसे इसमें
    हसीं तो दूर चेहरे पर मुस्कराहट तक नहीं
    आई अब इसे रचना का कसूर मानू या मेरा
    व्यंग तो यह नहीं ही लगा

    उत्तर देंहटाएं
  3. व्यंगकार जी,

    आपकी रचना पूरी पढ़ी. इसमें मसाला तो पूरा है पर शैली का आभाव लगा. जिसकी वजह से अखिलेश जी की टिप्पणी आ गई है. निराश न हों ... भाषा में पैना पर, तीखा पन लाईए ताकि व्यंग में तानों का एहसास हो... शुभेच्छा.

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनी शैली में तीखापन व पैनापन लाईए.. ताकि व्यंग ताना लगने लगे न कि एक संवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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