सोमवार, 16 जून 2014

लता सुमन्त का आलेख - राम कथा में युद्ध

            राम कथा में युद्ध की विभीषिका : आधुनिक संदर्भ में 
                                                              डॉ. लता सुमन्त

            युद्ध एवं शांति का द्वंद्व मानव स्वभाव की एक शाश्वत समस्या रही है. पुरातनकाल से मनुष्य अपनी रक्षा के लिए युद्ध करता रहा है.युद्ध की उचितता या अनुचितता उसे हमेशा व्याकुल करती रही है. महाभारत युद्ध में भी अर्जुन युद्ध की अनिवार्य स्थिति तथा उसके औचित्य को लेकर दुविधाग्रस्त हुए थे.हिन्दी - काव्य में प्रयोगवादोत्तर रचनाओं में युद्ध तथा युद्धजनित विभीषिकाओं का निरुपण अनेक रुपों में हुआ है. वस्तुतः दो महायुद्धों का अनुभव एवं तृतीय महायुद्ध की ्आशंका इस धारा के कवियों कि चेतना को उद्वेलित करती रही है.इस तरह की समस्याओं की अभिव्यक्ति तथा निरुपण के लिए इन कवियों ने अधिकतर महाभारत युद्ध की पुराकथा को स्वीकार किया है.
             कवि श्री नरेश मेहता ने अपनी प्रबंध रचना - संशय की एक रात में सर्वप्रथम रामकथा की पृष्ठभूमि पर युद्ध की समस्या को प्रस्तुत किया है.रचना के मूल उद्देशय की ओर दृष्टिपात करते हुए वे कहते हैं - युद्ध आज की प्रमुख समस्या है.शाश्वत : सभी युगों की . इस विभीषिका को सामाजिक एवं वैयक्तिक धरातल पर सभी युगों में भोगा जाता रहा है.इसके लिए राम को प्रतीकत्व प्रदान कर कुछ प्रश्न उठाए गए.जिस प्रकार कुछ प्रश्न सनातन होते हैं उसी प्रकार कुछ प्रज्ञापुरुष भी सनातन प्रतीक होते हैं.अपने प्रयोजन के लिए कवि ने वह स्थल चुना जो घटनाहीन था.,लेकिन कवि की रचना संभावना के लिए उर्वर राम जिस द्विविधत्वको प्रस्तुत करते हैं उसके लिए यही स्थल उपयुक्त था  - यह अंतरीप मन का, स्थल का.
           संशय की एक रात - श्री नरेश मेहता द्वारा रचित नाट्य शैली में राम -काव्य परंपरा का आधुनिक प्रबंधकाव्य है.कवि ने पौराणिक आख्यान के आधार पर समकालीन परिवेशमें आधुनिकबोध को स्पष्ट किया है.कवि ने राम को आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व प्रदान करते हुए कहा है -राम आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व करते हैं.
युद्द आज की प्रमुख समस्या है.कवि ने अपने प्रबंध में राम - कथा को एक दृष्टिकोण से उभारा हो.राम भारतीय संस्कृति के मेरुदंड हैं जो कवि के सामने ेक नई चिंता के साथ अवतरित होते हैं. परंपरागत् रामकथा में राम की संशयात्मक मनोदशा के उदाहरण नहीं मिलते.निराला की राम की शक्तिपूजा -में राम संशय की मनःस्थिति से ग्रस्त नहीं थे.संशय की एक रात  -के राम का अन्तर्द्वन्द्व इससे भिन्न है. उनकी चिंता सीता के उद्वार के लए होनेवाले इस औचित्य से सम्बद्ध है.वे अपनी शक्ति के प्रति आशवस्त हैं.लेकिन इससे जुडे कई प्रश्न ख़डे रहते हैं.राम -रावण युद्ध क्या राम का व्यक्तिगत प्रश्न था?
यह युद्ध राम अपने स्वत्व के लिये नहीं वरन् अपहृत नारी के उद्धार के लिए कर रहे थे.फिर संशय कैसा? संशय की एक रात - में राम व्यष्टि मन के प्रतीक हैं.नरेश मेहता ने संशय की एक रात - की भूमिका में कहा है -कि जिस प्रकार कुछ प्रश्न सनातन होते हैं.उसी प्रकार कुछ पुरुष भी सनातन प्रतीक होते हैं.राम ऐसे प्रज्ञा प्रतीक हैं जिनके माध्यम से प्रत्येक युग अपनी समस्याओं को सुलझाता रहा है.
             अपने प्रयोजन के लिए कवि ने वह स्थल चुना जो घटना -हीन था। लेकिन कवि की रचना संभावना के लिए उर्वर. राम जिस द्विविधत्व को प्रस्तुत करते है. उसके लिए यही स्थल उपयुक्त था - यह अंतरीप मन का, स्थल का.
               संशय की एक रात - श्री नरेश महेता द्वारा रचित नाट्यशैली में निरुपित राम - काव्य परंपरा का आधुनिक काव्य है.कवि ने पौराणिक आख्यान के आधार पर समकालीन परिवेश में आधुनिक बोध को स्पष्ट किया है.कवि ने राम को आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व प्रदान करते हुए कहा है - राम आधुनिक प्रज्ञा का प्रतिनिधित्व करते हैं.युद्ध आज की प्रमुखसमस्या है.कवि ने अपने प्रबंध में राम कथा को एक नए दृष्टिकोण से उभारा है.राम भारतीय संस्कृति के मेरुदंड हैं जो कवि के सामने एक नई चिंता के साथ अवतरित होते हैं.परंपरागत् रामकथा में राम की संशयात्मक मनोदशा के उदाहरण नहीं मिलते.निराला की राम की शक्ति पूजा में राम संशय की मनःस्थिति से ग्रस्त नहीं थे. संशय की एक रात के राम का अंतव्दंव्द इससे भिन्न है.उनकी चिंता सीता के उद्धार के होनेवाले इस युद्ध के औचित्य से सम्बद्ध है.वे अपनी शक्ति के प्रति आश्वस्त हैं.लेकिन इससे जुडे कई प्रश्न खडे होते हैं. राम - रावण युद्ध क्या राम का व्यक्तिगत् प्रश्न था? यह युद्ध राम अपने स्वत्व के लिए नहीं वरन् अपहृत नारी के उद्धार के लिए कर रहे थे.फिर संशय कैसा? संशय की एक रात में राम व्यष्टि मन के प्रतीक हैं. नरश मेहता ने संशय की एक रात की भुमिका में कहा है कि - जिस प्रकार कुछ प्रश्न सनातन होते हैं उसी प्रकार कुछ पुरुष भी सनातन प्रतीक होते हैं राम ऐसे प्रज्ञा प्रतीक हैं जिनके माध्यम से प्रत्येक युग अपनी समस्याओं को सुलझाता रहा है.
            संशय की एक रात - चार सर्गों में आबद्ध है. जिसमें परंपरागत रामकथा के केवल एक प्रसंगसूत्र सेतु - बंध को ग्रहण किया गया है.वे युद्ध और शांति के अतंव्दंव्द से संत्रस्त समुद्रतट पर टहलते दिखाई देते हैं.सीताहरण उनकी व्यक्तिगत् समस्या है.इसी सोच के चिंतन तहत वे युद्ध टालना चाहते हैं.सिकता तट पर बैठे हुए एकाकी राम का मन संशयग्रस्त है - सिता उद्धार के लिए होनेवाले भावि युद्ध के औचित्य को लेकर.विभ्रम- उदास मन सीता के साथ अपने जीवन की मधुर स्मृतियों में डूब जाता है.उनके लिए दुखी हैं -सीता, लक्ष्मण,उर्मिला दशरथ, जटायु, हनुमान, सुग्रीव, तथा वानरजन. इन सबकी पीडा को देखते हुए क्या इतने बडे युद्ध का आयोजन उचित है? उनकी अपनी समस्याऐं क्यों ऐतिहासिक कारणों को जन्म दें?
          व्यक्ति का वनवास
          परिजन और पुरजन के लिए
          अभिशाप क्यों बन जाए ?
          व्यक्तिगत मेरी समस्याऐं
          कयों ऐतिहासिक कारणों को जन्म दें.
कवि ने इस समस्या के समाधान को दो रूपों में प्रस्तुत किया है.शाश्वत एवं कालनिरपेक्ष मानदंड तथा परिस्थितिजन्य.इस प्रकार के कारण कई बार युद्ध की स्थिति उत्पन्न करते है.व्दितीय सर्ग में राम पुनः युद्ध की चिंता में लीन हैं. उसी समय राम को सेतु बुर्ज एक अलौकिक छाया घूमती दिखाई देती है.वास्तव में वह उनके पिता दशरथ की आत्मा है तथा फडफडाता हुआ पक्षी जटायु है.वे राम से वार्तालाप करते हुए कहते हैंकि वे उनके व्दारा की गई अंतयष्टि से संतुष्ट हैं लेकिन उनके मन में उपजी कुछ चिंताओं का वे समाधान करना चाहते हैं.मुत्युपरान्त दशरथ की आत्मा के अवतरण का प्रसंग रामचरितमानस में भी निरुपित है.इस प्रसंग को कवि ने बिल्कुल मौलिक रूप में प्रस्तुत किया है.राम के प्रति अपने प्राणों कोनिछावर करनेवाले जटायु और दशरथ का राम के प्रति चिंतातुर होना स्वाभाविक है. उनके विचारानुसार युद्ध केवल राम का ही व्यक्तिगत प्रश्न नहीं है.यह असत्य के विरुद्ध सत्य का और अनास्था के विरुद्ध आस्था का संघर्ष है. राम के लिए कर्म का अस्तित्व ही श्रेष्ठ है.
            राम
            मोह असत्य है
            किसी का भी हो
            तुम्हें अपनी अनास्था से नहीं
            संशयी व्यक्तित्व से नहीं
            तुम्हें लडना युद्ध है
            असत्य से.
राम के मन में उपजी चिंता का निराकरण करते हुए दाशरथि छाया कहती है -
         कीर्ति, यश,नारी, धरा,
         जय, लक्ष्मी
         ये नहीं हैं कृपा या अनुदान .
         मेरे पुत्र
         भिक्षा से नहीं
         वर्चस्व से
         अर्जित हुए हैं आज तक.
   तृतीय सर्ग में रामयुद्ध परिषद का आयोजन  करते हैं तथा लक्ष्मण, हनुमान ,विभीषण , जांबवंत युद्ध से संबंधित अपने तर्क देते हैं.युद्ध को तत्काल स्वीकार करने के बाद भी उनकी चिंता अभी भि बनी हुई है.कि क्या युद्ध के बाद भी शांति स्थापित हो पाएगी?संपूर्ण काव्य में यही एक विषय समस्या रुप में राम को आन्दोलित करता रहता है. कवि ने संशय के रुप में काव्य में उसे प्रस्तुत किया है. सीता का अपहरण सामान्य जन के लिए चिन्ता का विषय है. अतःयुद्ध के प्रति मनुष्य का विद्रोह भाव निरुपित हुआ है.
                 मानव के विद्रोह भाव का
                 प्रथम
                 किन्तु अद्भुत प्रतीक है.
         वास्तव में युद्ध,साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से अनीति और अनाचार का प्रतीक है. सीताहरण राम का व्यक्तिगत प्रश्न भले ही हो, लेकिन इस अनीति के विरुद्ध युद्ध करना वे अपना दायित्व समझते हैं.इस निर्णय के साथ ही राम का संशयी मन पराजित हो जाता है और उनका मन विवेक से कहता है -
            ओ मेरे विवेक
            मुझसे प्रश्न मत करो
            प्रश्नों की बेला अब नहीं रही
            अब मैं केवल प्रतीक्षा हूँ,
            कवचित कर्म हूँ
            प्रतिश्रुत युद्ध हूँ
            निर्णय हूँ सबका
            सबके लिए.
रामकथाओं में यह संदर्भ घटनाहीन थाकिन्तु कवि ने अपनी प्रज्ञा, भावप्रवणता, मनोवैज्ञानिकता एवं आधुनिक दृष्टिकोण से इस संदर्भ को महत्वपूर्ण घटना के रूप में प्रस्तुत किया है.कवि स्वयं कहते हैं कि - अपने विशेष प्रयोजन के लिए ही रामकथा का मैंने वह स्थल चुना जो घटनाहीन था किन्तु मेरी रचना संभावना के लिए उर्वर था.राम जिस व्दिविधात्व को प्रस्तुत करते हैं उसके लिए वही उपयुक्त स्थल था.
             इस प्रबंधकाव्य के रचनाकाल के दौरान चीन आक्रमण की समस्या मुखर थी.जनमानस चीन के व्दारा हो रहे अन्याय के विरुद्ध लडने के लिए तैयार था और सेना भी युद्ध के आदेश के लिए तैयार प्रतीक्षारत्, किन्तु तत्कालीन सरकार ,निर्णायक प्रधानमंत्री इस उधेडबुन में थे कि युद्ध का आदेश दे या न दे वे भी युद्ध के निर्णय के प्रति दुविधा में थे.राम भी युद्ध नहीं चाहते थे. सीता उनकी व्यक्तिगत समस्या थी अतः मानव रक्त पर पग धरती सीता उन्हें नहीं चाहिए थी. रुस प्रबंध के अन्य जनमानस - लक्ष्मण,हनुमान तथा अन्य परिषद सदस्य युद्ध के पक्ष में हैं.बहुमत न्याय है, सत्य है.इसी आधार पर अन्याय और अनीति पर विजय प्राप्त की जा सकती है.कई बार दो पलों के  बीच का फासला इतना होता है कि उनमें कई घटनाऐं घटित हो जाती है.ऐसे में तो राम को अपना अधिकार - कर्म करना था , फल के रुप में इतिहास बन जाने कीचिन्ता का नहीं.राम के साथी - गण तथा प्रजा के  व्दारा प्रस्तुत तर्को के आधार पर राम का संशयी मन पराजित हो जाता है और वे युद्ध का निर्णय ले लेते हैं. राम जिस समस्या को वैयक्तिक स्तर पर आँक रहे थे उसी समस्या को वानर गण अपने उत्साह और जोश के व्दारा सेतु - बंध बनाकर यह स्थापित कर देते हैं कि यह युद्द व्यक्तिगत नहीं , सार्वजनिक है. रुस तरह राम युद्द करने की घोषणा करते हुए अपना निर्णय तटस्थ रुप में प्रस्तुत करते हैं.
           कवि ने नाटकीय टेकनीक के व्दारा राम के अंतर्व्दन्व्द तथा बाहरी संघर्ष कासुन्दर निरुपण किया है.इस तरह से कवि ने अपने प्रतिपाद्य को संवेद्य बनाया है.
         
संदर्भग्रंथ -आधुनिक हिन्दी काव्य और पुराणकथा  - मालतीसिंह
            संशय की एक रात, भूमिका -नरेश मेहता.
            नरेश मेहता -डा. कल्याण वैष्णव

        सुजीत माँ को ं देते हुए उसके मुख को देख रहा था.कितना शांत,क्लांत,निर्लीप्त ! वास्तव में उसकी माँ वैसी ही थी जैसी दिखती थी.ना कोई कृत्रिमता,ना कोई स्वार्थ और ना ही कोई दिखावा.वो तो जैसे अपनों के लिए ही जी रही थी.अपने भी केवल पति और बच्चे ही नहीं बल्कि उसके पडोस में रहनेवाले समीर और  अमीना उसके अपने ही थे.उनके लिए भी वह किसी तरह से पीछे नहीं  ह़टती थी.
         सुजीत को याद नहीं आ रहा था कि इसके पहले कब उसकी माँ बीमार हुई थी.वह एक कम्पनी में काम करती थी बस उसी थोडी - सी तनख्वाह से वह घर चलाती थी.एकबार लौटते वक्त वह मेरे लिए कहानी की कुछ पुस्तकें ले आई जो मुझे बहुत पसंद थी.माँ से मैंने कहा -माँ ,तुम व्यर्थ ही परेशान होती हो.माँ कहने लगी -बेटा, परेशानी कैसी? अपनों के लिए कुछ करना मुझे अच्छा लगता है.वह हर दूसरे दिन कुछ न कुछ ले आती.तब शायद.मैं ये नहीं सोच पाता था कि माँ इतना सब कैसे कर लेती है.आज उसी कि दुआ से मैं इस काबिल हुआ कि मैं कुछ सोच सकता हूँ. और भगवान से यही दुआ करता हूँ कि वहीं सोचूँ जो माँ चाहती है.
      पढ लिखकर मैं इस काबिल हुआ कि माँ के बोझ को हल्का कर सकूँ.मैंने माँ से कहा माँ अब तुम्हें नौकरी करने की कोई आवश्यकता नहीं है.लेकिन माँये बात मानने को तैयार ही नहीं थी. वह कहती- क्या इसी दिन के लिए मैने तुझे पाल पोस कर ब़ड़ा किया था कि बडा होते ही सारी जिम्मेदारी तुझ पर डाल दूं.नहीं तूने भी तो अभी - अभी सुख देखा है.तुझे सुख भोगने का और परिवार के शाथ आनंद करने का पूरा अधिकार है.मैं तो हमेशा से तेरे साथ हूँ.मैं कहाँ जा रही हूँ?माँ की बातें सुनकर उसे लगा वास्तव में उसकी माँ इस पृथ्वी पर बसनेवाली वो माँ है -जो बेटा होने के बावजुद अपनी जिम्मेदारियों तथा अपेक्षाओं तले उसके अरमानों को रौंदना नहीं चाहती थी.कुछ देर माँ की आँख

लगी थी. मगर उसे तो वह नयनसुख प्राप्त हुआ था जो आज के इस दौर में अन्य सुखों से बढकर था.
        बेटा तो नयन सुख प्राप्त कर रहा था मगर नींद में भी लीला हर माँ के लिए अपने जैसा बेटा चाहती थी जो केवल माँ के बुढापे का सहारा ही नहीं उसकी भावनाओं का कद्रदान भी बने.

 

                                                              
           
                                   AssociateprofessorinHindi    

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